जून 2026 की रचनाएँ
कुण्डलिनी छंद
आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल।
कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल।
चुभ जाएँगें फूल,समय भी साथ न देगा।
जो नर नित कर ध्यान,प्रभू का नाम न लेगा।
ललित किशोर 'ललित'
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05.06.2026
कुण्डलिनी छंद
जीना मानव को यहाँ,केवल है दिन चार।
चार दिनों के ही लिए,काटे पेड़ हजार।
काटे पेड़ हजार,धरा सूनी कर डाली।
कंकरीट का जाल,बिछा हर ली हरियाली।
ललित किशोर 'ललित'
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कुण्डलिया छंद
दर्शन करने जाइए,मंदिर में जब आप।
नोट हरे ले जाइए,जेबों में तब आप।
जेबों में तब आप,नोट की महिमा देखो।
दर्शन देंगें देव,नोट की गरिमा देखो।
लाइन में लग 'ललित',नहीं कर पाएँ अर्चन।
दिखलाओ कुछ नोट,करो जी भर के दर्शन।
ललित किशोर 'ललित'
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11.06.2026
कुण्डलिया छंद
देखा-देखी
देखा-देखी ने छुआ,जीवन का हर छोर।
नहीं किसी को व्यापती,महँगाई पुरजोर।
महँगाई पुरजोर, बहुत पीछे रह जाती। बढ़-चढ़ होता खर्च,तभी रौनक है आती।
'ललित' खर्च की हाय,न सीमा रेखा देखी।
हर विवाह में खर्च,बढ़े बस देखा-देखी।
ललित किशोर 'ललित'
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13.06.2026
कुण्डलिया छंद
रिश्तों की जादूगरी,रिश्तों का हर खेल।
रिश्तों में धोखाधड़ी,रिश्तों में ही मेल।
रिश्तों में ही मेल,अनोखे धन के नाते।
धनहीनों से दूर,सभी नाते हो जाते।
ललित अचंभित देख,अजब चालें रिश्तों की।
पौ-बारह है खूब,नकद वाले रिश्तों की।
ललित किशोर 'ललित'
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13.06.26
कुण्डलिया छंद
कहना था सो कह दिया,मंत्री जी ने आज।
कहने सुनने से चलें,मंत्री जी के काज।
मंत्री जी के काज,नजर कागज पर आएँ।
जहाँ बताया बाग,वहाँ बंजर ही पाएँ।
कदम-कदम बकवास,हुई मंत्री का गहना।
जनता की जो पीर,अजी उसका क्या कहना ?
ललित किशोर 'ललित'
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14.06.2026
कुण्डलिया छंद
अपयश की हों प्यालियाँ,या थोड़ा अपमान।
सब में निज-हित खोज ले,सब का कर सम्मान।
सब का कर सम्मान,गरल को गले लगा ले।
करता जा विषपान,विषों को तू अपना ले।
कहे ललित कविराय,न कर चिंता कटु रस की।
अंत खुलेगी पोल,निरे झूठे अपयश की।
ललित किशोर 'ललित'
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14.06.2026
कुण्डलिया छंद
घाव पुराने टीसते,मन को मथते खूब।
जाए चंचल बावरा,मन घावों में डूब।
मन घावों में डूब,नहीं भूले वो बातें ।
निशि-दिन करता याद,पुरानी सारी घातें।
ललित कहे दिन-रात,लिखे जा नए तराने।
कर देंगें बर्बाद,नहीं तो घाव पुराने।
ललित किशोर 'ललित'
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15.06.2026
मरहटा छंद
बाँसुरिया वाले,निपट निराले,यशुदानंदन श्याम।
ओ व्रज के प्यारे,नंद दुलारे,सुधि लो हे घनश्याम।
ना बँगला गाड़ी,कनक अटारी,ना चाहूँ धन श्याम।
राधा के सँग में,भगवा रँग में,रँग दो ये मन श्याम।
ललित किशोर 'ललित'
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16.06.26
मरहटा छंद
ये मन घबराए,समझ न पाए,क्या होगा परिणाम ?
उलझन सुलझेगी,या उलझेगी,और अधिक हे राम ?
कैसे समझाऊँ,क्या समझाऊँ,अंतर्मन को
श्याम ?
इस व्याकुल मन की,चंचल मन की,खींचो नाथ लगाम ।
ललित किशोर 'ललित'
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17.06.26
हरि गीतिका छंद
निज-धर्म का पालन हुआ,इतना कठिन क्यों आज है ?
हरि मंदिरों में दान लुटता,टूटा हरिक क्यों साज है ?
क्या धारणा लेकर किया,होगा किसी ने दान वो ?
क्यों आज खुद मुखिया बना,हर बात से अंजान वो ?
ललित किशोर 'ललित'
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19.06.2026
मरहटा छंद
तुम हरदम महको,निशि-दिन चहको,फैलाओ उजियार।
जब भी मुख खोलो,मीठा बोलो,करो मधुर व्यवहार।
नित पुलकित मन से,मधुर वचन से,जीतो सब संसार।
तुम खुद मुसकाओ,और हँसाओ,सब को दे उपहार।
ललित किशोर 'ललित'
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लावणी छंद
दिनमणि की साक्षी में प्रभु-धन,चोर चुरा कर कहाँ गये ?
दान-चढ़ावा गिनते थे जो,वो काउंटर कहाँ गये ?
वीआई पी के रक्षक सारे,वो बाउंसर कहाँ गये ?
कहाँ गये अब बुलडोजर वो,एनकाउंटर कहाँ गये ?
ललित किशोर 'ललित
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20.06.2026
मरहटा छंद
कर दान दक्षिणा,पूजा करना,सिखलाता है धर्म।
क्या हुआ दान का,भेद जानना,सिखलाता है कर्म।
बन बैठे भक्षक,क्यों खुद रक्षक,आय नहीं क्यों शर्म?
क्यों दान चुराया,धर्म गिराया,क्या है इसका मर्म ?
ललित किशोर 'ललित'
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24.06.2026
रुचिरा छंद
सरिता की चंचल लहरों सा,चंचल चतुर निराला मन।
मानव को वश में कर लेता,दे विवेक
पर ताला मन।
वायु समान बली इस मन को,वश में करना है मुश्किल।
कहता अर्जुन मन की गति से,घबराता है मेरा दिल।
मत निराश हो अर्जुन अब तू ,बात ध्यान से मेरी सुन।
अभ्यास योग वैराग्य ध्यान,नित्य-नियम से कर अर्जुन।
मन को वश में करने का इक,यही मंत्र है अति पावन।
अपने मन को वश में कर ले,ज्यों नभ को करता सावन।
ललित किशोर 'ललित'
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25.06.2026
रुचिरा छंद
रिम-झिम रिम-झिम रिम-झिम बरसे,सुख-दुख का मिश्रित सावन।
दुख उतना ही चुभन प्रदाता,सुख है जितना मनभावन।
दुख की बरसातों में सुख की,कुछ बूँदें देतीं राहत।
मगर मूसलाधार बारिशें,कर देतीं मन को आहत।
ललित किशोर 'ललित'
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26.06.26
रुचिरा छंद
स्वच्छ-साफ निर्मल छवि जिसकी,और आचरण है सुंदर।
कब उसका मन कितना फिसले,मैला हो कितना अंदर ?
कब आँखों में धूल झोंक दे,लूट मचा कर हो चम्पत।
नहीं जान सकता ईश्वर भी,कौन यहाँ कितना लम्पट ?
ललित किशोर 'ललित'
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28.06.2026
रुचिरा छंद
थोड़ी सच्ची थोड़ी झूठी,खबरें सब को सुनवा कर।
इतराता है खूब मीडिया,मिर्च-मसाला मिलवाकर।
सत्य नहीं बाहर आ पाता,झूठ खड़ा चौराहे पर।
सच फाँसी पर चढ़ा दिया हर,गाँव-गली दोराहे पर।
ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
लावणी छंद
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सोच रहा हूँ वोट किसे दूँ,और किसे जितवाऊँ मैं।
कीमत मेरी आज बढ़ी है,सोच-सोच इतराऊँ मैं।
फोन आ रहे हैं उनके भी,जिनसे परिचय नहीं हुआ।
कभी कहीं निर्णय लेने में,इतना संशय नहीं हुआ।
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ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
रास छंद
देखे ऐसे,मीत न जिनको,प्यार हुआ।
लेकिन जिनको, देते थे हम,खूब दुआ।
प्यार छलावा,था ये हमने,जान लिया।
यही हमारी,किस्मत थी ये,मान लिया।
ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
रास छंद
जिसको खुद पर,नहीं यकीं था,फेल हुआ।
उसे हराना,पल दो पल का,खेल हुआ।
जिस बंदे में,आत्मा-बल था,जीत गया।
खुद को निर्बल,समझा जिसने,रीत गया।
ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
रास छंद
आओ हम सब,मिलकर अब इक,खेल करें।।
इक दूजे की,कविताओं का,मेल करें।
उसी भाव से,मिलता-जुलता,छंद रचें।
उसके भावों ,को लेकर नव,बंध रचें।
ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
रास छंद
हे मनमोहन,और करो मत,बावरिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।
वंशी-स्वर में,सात सुरों का,नाद भरा।
इस प्रभात को,सुरमय कर दो,आज जरा।
बरसाने की,राधा बोले,साँवरिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।
अधर गोलकर,आँखें मटका,सुर बरसा।
वंशी सुनने,सारा ये व्रज,है तरसा।
मोर मुकुट धर,ओढ़े काली, काँबलिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।
वंशी-वादक,इक तुम ही तो,हो व्रज में।
तव चरणों की,छाप लगी है,इस रज में।
बाल सखा सब,आ बैठे ले,चादरिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।
ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
रास छंद
जिस कान्हा सा,और न कोई,परम सखा।
उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।
भाव भक्ति से,मनमोहन का,दर्श किया।
पत्र-पुष्प फल,जल तुलसी-दल,भेंट किया।
मन-मंदिर में,कृष्ण-कृपा का,स्वाद चखा।उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।
हाथ जोड़ कर,विनती करना,सीख लिया।
उसने सिर पर,प्रीत-हस्त को ,देख लिया।
दर्द-दुखों से,उसका तन-मन,नहीं पका।
उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।
दर्शन के हित,रहा पंक्ति में,सदा खड़ा।
मिला उसी को,हरि दर्शन का,पुण्य बड़ा।
उसके तप पर,रीझ गया वो,श्याम सखा।
उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।
ललित किशोर 'ललित'
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30.06.2026
रास छंद
पूर्व जन्म का,किया हुआ कुछ,पाप बड़ा।
इस जीवन में,आ पहुँचा ले,शाप बड़ा।
तभी मूढ़-मति,मंदिर का धन,चोर रहा।
पापों का घट,फिर भरने को, दौड़ रहा।
ललित किशोर 'ललित'
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30.06.2026
रास छंद
झूठी दुनिया,के सब बंधन ,तोड़ चला।
रिश्ते-नाते,सारे पीछे, छोड़ चला।
अपनी धुन में,मस्त-मगन वो,झूम रहा।
नयी दिशा में,नये पथों को,चूम रहा।
ललित किशोर 'ललित'
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