जून 2026 की रचनाएँ


जून 2026 की रचनाएँ

01.06.2026

कुण्डलिनी छंद

आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल।
कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल।
चुभ जाएँगें फूल,समय भी साथ न देगा।
जो नर नित कर ध्यान,प्रभू का नाम न लेगा।

ललित किशोर 'ललित'

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05.06.2026
कुण्डलिनी छंद

जीना मानव को यहाँ,केवल है दिन चार।
चार दिनों के ही लिए,काटे पेड़ हजार।
काटे पेड़ हजार,धरा सूनी कर डाली।
कंकरीट  का जाल,बिछा हर ली हरियाली।

ललित किशोर 'ललित'

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कुण्डलिया छंद

दर्शन करने जाइए,मंदिर में जब आप।
नोट हरे ले जाइए,जेबों में तब आप।
जेबों में तब आप,नोट की महिमा देखो।
दर्शन देंगें देव,नोट की गरिमा देखो।
लाइन में लग 'ललित',नहीं कर पाएँ अर्चन।
दिखलाओ कुछ नोट,करो जी भर के दर्शन।

ललित किशोर 'ललित'
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11.06.2026
कुण्डलिया छंद
देखा-देखी

देखा-देखी ने छुआ,जीवन का हर छोर।
नहीं किसी को व्यापती,महँगाई पुरजोर।
महँगाई पुरजोर, बहुत पीछे रह जाती। बढ़-चढ़ होता खर्च,तभी रौनक है आती।
'ललित' खर्च की हाय,न सीमा रेखा देखी।
हर विवाह में खर्च,बढ़े बस देखा-देखी।

ललित किशोर 'ललित'

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13.06.2026
कुण्डलिया छंद

रिश्तों की जादूगरी,रिश्तों का हर खेल।
रिश्तों में धोखाधड़ी,रिश्तों में ही मेल।
रिश्तों में ही मेल,अनोखे धन के नाते।
धनहीनों से दूर,सभी नाते हो जाते।
ललित अचंभित देख,अजब चालें रिश्तों की।
पौ-बारह है खूब,नकद वाले रिश्तों की।

ललित किशोर 'ललित'

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13.06.26
कुण्डलिया छंद

कहना था सो कह दिया,मंत्री जी ने आज।
कहने सुनने से चलें,मंत्री जी के काज।
मंत्री जी के काज,नजर कागज पर आएँ।
जहाँ बताया बाग,वहाँ बंजर ही पाएँ।
कदम-कदम बकवास,हुई मंत्री का गहना।
जनता की जो पीर,अजी उसका क्या कहना ?

ललित किशोर 'ललित'

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14.06.2026
कुण्डलिया छंद

अपयश की हों प्यालियाँ,या थोड़ा अपमान।
सब में निज-हित खोज ले,सब का कर सम्मान।
सब का कर सम्मान,गरल को गले लगा ले।
करता जा विषपान,विषों को तू अपना ले।
कहे ललित कविराय,न कर चिंता कटु रस की।
अंत खुलेगी पोल,निरे झूठे अपयश की।

ललित किशोर 'ललित'

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14.06.2026
कुण्डलिया छंद

घाव पुराने टीसते,मन को मथते खूब।
जाए चंचल बावरा,मन घावों में डूब।
मन घावों में डूब,नहीं भूले वो बातें ।
निशि-दिन करता याद,पुरानी सारी घातें।
ललित कहे दिन-रात,लिखे जा नए तराने।
कर देंगें बर्बाद,नहीं तो घाव पुराने।

ललित किशोर 'ललित'

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15.06.2026
मरहटा छंद

बाँसुरिया वाले,निपट निराले,यशुदानंदन श्याम।
ओ व्रज के प्यारे,नंद दुलारे,सुधि लो हे घनश्याम।
ना बँगला गाड़ी,कनक अटारी,ना चाहूँ धन श्याम।
राधा के सँग में,भगवा रँग में,रँग दो ये मन श्याम।

ललित किशोर 'ललित'
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16.06.26
मरहटा छंद

ये मन घबराए,समझ न पाए,क्या होगा परिणाम ?
उलझन सुलझेगी,या उलझेगी,और अधिक हे राम ?
कैसे समझाऊँ,क्या समझाऊँ,अंतर्मन को
श्याम ?
इस व्याकुल मन की,चंचल मन की,खींचो नाथ लगाम ।

ललित किशोर 'ललित'

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17.06.26
हरि गीतिका छंद

निज-धर्म का पालन हुआ,इतना कठिन क्यों आज है ?
हरि मंदिरों में दान लुटता,टूटा हरिक क्यों साज है ?
क्या धारणा लेकर किया,होगा किसी ने दान वो ?
क्यों आज खुद मुखिया बना,हर बात से अंजान वो ?

ललित किशोर 'ललित'
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19.06.2026
मरहटा छंद

तुम हरदम महको,निशि-दिन चहको,फैलाओ उजियार।
जब भी मुख खोलो,मीठा बोलो,करो मधुर व्यवहार।
नित पुलकित मन से,मधुर वचन से,जीतो सब संसार।
तुम खुद मुसकाओ,और हँसाओ,सब को दे उपहार।

ललित किशोर 'ललित'

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लावणी छंद

दिनमणि की साक्षी में प्रभु-धन,चोर चुरा कर कहाँ गये ?
दान-चढ़ावा गिनते थे जो,वो काउंटर कहाँ गये ?
वीआई पी के रक्षक सारे,वो बाउंसर कहाँ गये ?
कहाँ गये अब बुलडोजर वो,एनकाउंटर कहाँ गये ?

ललित किशोर 'ललित

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20.06.2026
मरहटा छंद

कर दान दक्षिणा,पूजा करना,सिखलाता है धर्म।
क्या हुआ दान का,भेद जानना,सिखलाता है कर्म।
बन बैठे भक्षक,क्यों खुद रक्षक,आय नहीं क्यों शर्म?
क्यों दान चुराया,धर्म गिराया,क्या है इसका मर्म ?

ललित किशोर 'ललित'

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24.06.2026
रुचिरा छंद

सरिता की चंचल लहरों सा,चंचल चतुर निराला मन।
मानव को वश में कर लेता,दे विवेक
पर ताला मन।
वायु समान बली इस मन को,वश में करना है मुश्किल।
कहता अर्जुन मन की गति से,घबराता है मेरा दिल।

मत निराश हो अर्जुन अब तू ,बात ध्यान से मेरी सुन।
अभ्यास योग वैराग्य ध्यान,नित्य-नियम से कर अर्जुन।
मन को वश में करने का इक,यही मंत्र है अति पावन।
अपने मन को वश में कर ले,ज्यों नभ को करता सावन।

ललित किशोर 'ललित'

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25.06.2026
रुचिरा छंद

रिम-झिम रिम-झिम रिम-झिम बरसे,सुख-दुख का मिश्रित सावन।
दुख उतना ही चुभन प्रदाता,सुख है जितना मनभावन।
दुख की बरसातों में सुख की,कुछ बूँदें देतीं राहत।
मगर मूसलाधार बारिशें,कर देतीं मन को आहत।

ललित किशोर 'ललित'

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26.06.26
रुचिरा छंद

स्वच्छ-साफ निर्मल छवि जिसकी,और आचरण है सुंदर।
कब उसका मन कितना फिसले,मैला हो कितना अंदर ?
कब आँखों में धूल झोंक दे,लूट मचा कर हो चम्पत।
नहीं जान सकता ईश्वर भी,कौन यहाँ कितना लम्पट ?

ललित किशोर 'ललित'

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28.06.2026
रुचिरा छंद

थोड़ी सच्ची थोड़ी झूठी,खबरें सब को सुनवा कर।
इतराता है खूब मीडिया,मिर्च-मसाला मिलवाकर।
सत्य नहीं बाहर आ पाता,झूठ खड़ा चौराहे पर।
सच फाँसी पर चढ़ा दिया हर,गाँव-गली दोराहे पर।

ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
लावणी छंद
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सोच रहा हूँ वोट किसे दूँ,और किसे जितवाऊँ मैं।
कीमत मेरी आज बढ़ी है,सोच-सोच इतराऊँ मैं।
फोन आ रहे हैं उनके भी,जिनसे परिचय नहीं हुआ।
कभी कहीं निर्णय लेने में,इतना संशय नहीं हुआ।
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ललित किशोर 'ललित'

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29.06.2026
रास छंद

देखे ऐसे,मीत न जिनको,प्यार हुआ।
लेकिन जिनको, देते थे हम,खूब दुआ।
प्यार छलावा,था ये हमने,जान लिया।
यही हमारी,किस्मत थी ये,मान लिया।

ललित किशोर 'ललित'

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29.06.2026
रास छंद

जिसको खुद पर,नहीं यकीं था,फेल हुआ।
उसे हराना,पल दो पल का,खेल हुआ।
जिस बंदे में,आत्मा-बल था,जीत गया।
खुद को निर्बल,समझा जिसने,रीत गया।

ललित किशोर 'ललित'

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29.06.2026
रास छंद

आओ हम सब,मिलकर अब इक,खेल करें।।
इक दूजे की,कविताओं का,मेल करें।
उसी भाव से,मिलता-जुलता,छंद रचें।
उसके भावों ,को लेकर नव,बंध रचें।

ललित किशोर 'ललित'
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29.06.2026
रास छंद

हे मनमोहन,और करो मत,बावरिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।

वंशी-स्वर में,सात सुरों का,नाद भरा।
इस प्रभात को,सुरमय कर दो,आज जरा।
बरसाने की,राधा बोले,साँवरिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।

अधर गोलकर,आँखें मटका,सुर बरसा।
वंशी सुनने,सारा ये व्रज,है तरसा।
मोर मुकुट धर,ओढ़े काली, काँबलिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।

वंशी-वादक,इक तुम ही तो,हो व्रज में।
तव चरणों की,छाप लगी है,इस रज में।
बाल सखा सब,आ बैठे ले,चादरिया।
हमें सुना दो,प्रीत भरी वो,बाँसुरिया।

ललित किशोर 'ललित'

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29.06.2026
रास छंद

जिस कान्हा सा,और न कोई,परम सखा।
उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।

भाव भक्ति से,मनमोहन का,दर्श किया।
पत्र-पुष्प फल,जल तुलसी-दल,भेंट किया।
मन-मंदिर में,कृष्ण-कृपा का,स्वाद चखा।उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।

हाथ जोड़ कर,विनती करना,सीख लिया।
उसने सिर पर,प्रीत-हस्त को ,देख लिया।
दर्द-दुखों से,उसका तन-मन,नहीं पका।
उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।

दर्शन के हित,रहा पंक्ति में,सदा खड़ा।
मिला उसी को,हरि दर्शन का,पुण्य बड़ा।
उसके तप पर,रीझ गया वो,श्याम सखा।
उसके मंदिर,में जिसने भी,कदम रखा।

ललित किशोर 'ललित'

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30.06.2026
रास छंद
पूर्व जन्म का,किया हुआ कुछ,पाप बड़ा।
इस जीवन में,आ पहुँचा ले,शाप बड़ा।
तभी मूढ़-मति,मंदिर का धन,चोर रहा।
पापों का घट,फिर भरने को, दौड़ रहा।

ललित किशोर 'ललित'

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30.06.2026
रास छंद

झूठी दुनिया,के सब बंधन ,तोड़ चला।
रिश्ते-नाते,सारे पीछे, छोड़ चला।
अपनी धुन में,मस्त-मगन वो,झूम रहा।
नयी दिशा में,नये पथों को,चूम रहा।

ललित किशोर 'ललित'

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सितम्बर 2026 की रचनाएँ

07.09.26
चौपई छंद

हम पर कृपा करो हनुमान,संकट मोचन कृपा निधान।
अब लो पवनपुत्र ये जान,तुम हो बल में पवन समान।

सुन लो प्रार्थना महावीर,हर लो सब संकट सब पीर।
अपनी सेना भेजो वीर,धरी न जाती है अब धीर।
अटके संकट में हैं प्राण,रक्षा करो वीर हनुमान।
हम पर कृपा करो हनुमान,संकट मोचन कृपा निधान।

चोला सिंदूरी ले धार,तुमने किया खूब श्रृंगार।
खुश सिंदूर देख हों राम,निशिदिन जपो राम का नाम।
हम को बल-बुधि-विद्या-ज्ञान,दे दो भक्ति-शक्ति वरदान।
हम पर कृपा करो हनुमान,संकट मोचन कृपा निधान।

ललित किशोर 'ललित'

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18.09.2026
प्रार्थना
आल्हा छंद

क्या बतलाऊँ तुम को मेरे,मन की इच्छा ओ हनुमान ?
जब मेरी हर इच्छा का है,तुमको पहले ही अनुमान।
चाह तुम्हारी में मिल जाए,मेरे मन की हर इक चाह।
और तुम्हारे चरण-कमल तक,पहुँचे जीवन की हर राह।

यही कामना यही प्रार्थना,और यही है तुमसे आस।
तन से दूर भले हो पर तुम,रहना मेरे मन के पास।
मन-मंदिर में आन विराजो,सीता-राम-लखन के साथ।
नैन बंद कर ध्यान करूँ तो,दर्शन दे देना हे नाथ।

ललित किशोर 'ललित'

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21.09.26

2122 2122, 2122 2121

शुद्ध गीता छंद

मुस्कुराकर राधिका की,राह रोके नंदलाल।
थाम बहियाँ फिर न छोड़े,और चूमे लाल गाल।
शर्म से राधा सिकुड़ कर,श्याम से करती गुहार।
छोड़ दो मेरी कलाई,मत मरोड़ो बार-बार।

ललित किशोर'ललित'

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22.09.26
शुद्ध गीता छंद

क्या हुआ जो आज अपने,पास हैं फिर भी न पास ?
व्यर्थ में तू कर न चिंता,सोच कर मत हो उदास।
हर किसी की ज़िंदगी में,मुश्किलें आती हजार।
जो न चाहे साथ चलना,मत पुकारे बार-बार।

ललित किशोर'ललित'

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24.09.26
शुद्ध गीता छंद

रंग अद्भुत है दिखाती,ज़िंदगानी बार-बार।
दुःख के सँग-सँग दिखाए,रंग सुख के भी हजार।
रंग दुख के कौन चाहे,चाह सुख की है अनंत।
रंग बेरँग हो न सकता,दु:ख सुख का है न अंत।

ललित किशोर 'ललित'

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निश्चल छंद

बड़ी अनोखी देखी नश्वर,जग की रीत।
नये मुखौटे नित्य धारते,देखे मीत।
सागर की लहरों सा नश्वर,है जो प्यार।
उसी प्यार में डूबा देखा,सब संसार।

ललित किशोर 'ललित'

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मई 2026 की रचनाएँ

01.05.2026
विधाता छंद 

तुम्हारी भक्ति से हनुमत, मिले सुख-शांति इस मन को।
न कोई दु:ख टिक पाता,न व्यापें व्याधियाँ तन को।
कृपा जितनी तुम्हारी है,बखानी जा नहीं सकती।
तुम्हारे दर्श से दाता,न ये आँखें कभी थकतीं।

ललित किशोर 'ललित'

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05.05.2026
विधाता छंद 

नहीं कोई यहाँ अपना,न कोई मीत है मन का।
बनो तुम मीत खुद अपना,यही है सार जीवन का।
अकेले था यहाँ आना,न कोई साथ है जाना।
अनोखी है बड़ी दुनिया,सुने कब दुख भरा गाना।

सुनाओ भी किसी को मत,कभी कुछ आप बीती तुम।
तुम्हारी दुख भरी गाथा,हँसी में वो करेंगें गुम।
करेगा कौन अब चिन्ता, तुम्हारे रूप धन जाँ की।
बसा लो नैन में अपने,कन्हैया लाल की झाँकी।

जपो इक नाम कान्हा का,जपो सँग नाम राधा का।
नहीं फिर राह में होगा,कहीं भी नाम बाधा का।
सुनेगा वो कन्हैया सब,करोगे प्रार्थना जितनी।
सँभाले भी न जाएँगी,भरेगा झोलियाँ इतनी।

ललित किशोर 'ललित' 

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विधाता छंद 
राधा कृष्ण की मान मनुहार

न जाओ फेरकर नजरें,न रूठो राधिका रानी।
बिना ही बात हम से यों,कहो क्यों रार है ठानी ? 
तुम्हारे थे तुम्हारे हैं,तुम्हारे ही रहेंगें हम।
हजारों साल तक रानी,नहीं ये प्यार होगा कम।

मनाने से न मानोगी, रहोगी रूठती कब तक ? 
हमारे प्यार की नैया, रहेगी डूबती कब तक ? 
इशारों में समझ जाओ,न हम कुछ बोल पाएँगें।
बँधी है डोर जो तुमसे,नहीं हम खोल पाएँगें।

सितारों से तनिक सीखो,सदा क्यों टिमटिमाते हैं।
धरा के प्यार में बेसुध,सदा यों टिटिमाते हैं।
अरे तुम चाँदनी से ही,समझ लो प्यार की बातें।
सदा उस चाँद के ही वो,बिताए साथ में रातें।

ललित किशोर 'ललित' 

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12.05.2026
त्रिभंगी छंद

शुभ मंगलकारी,अति सुख कारी,भक्ति तुम्हारी,हनुमंता।
जो मन से ध्यावे,सब सुख पावे,नहीं सतावे, दुख-चिंता।
ओ बजरँग प्यारे,राम-दुलारे,कष्ट हमारे,हर लेना।
ओ केसरि-नंदन,दु:ख निकंदन,राम- भक्ति मन,भर देना।

ललित किशोर 'ललित' 

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14.05.2026
त्रिभंगी छंद 
अद्भुत शिक्षा

है अद्भुत शिक्षा,रद्द परीक्षा,नित्य निराशा,हाथ लगे।
हर छात्र परेशाँ,पिता परेशाँ,खोती आशा,मात लगे।
हर पाठ पढ़ा था,स्वप्न गढ़ा था,रात-रात भर,जाग सखे।
संकल्प अनूठा,कर ले बेटा,फिर रातों में,जाग सखे ?

ललित किशोर 'ललित'

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31.05.2026
कुण्डलिनी छंद

चल देगा कब वक्त ये,कहाँ कौन सी चाल ?
मानव के मस्तिष्क में,गूँजे यही सवाल।
गूँजे यही सवाल,समय कब शुभ फल देगा ?
कब निखरेगा भाग्य,अँधेरा कब चल देगा।

ललित किशोर 'ललित'

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अगस्त 2026 की रचनाएँ

पीयूष वर्ष छंद
वृद्धावस्था
गीत

हाथ पैरों में ज़रा भी दम नहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

दाँत हिल-हिल साथ छोड़े जा रहे।
स्वाद रसना को नये नित भा रहे।
दर्द घुटनों का न जाने दे कहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

याद में डीमेंशिया झूला हुआ।
नाम अब हर चीज का भूला हुआ।
मौन रह कर मुस्कुराना है यहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

साथ छोड़े जा रही अब चाम भी।
बेरहम कितनी हुई ये शाम भी ?
अश्रुओं की धार आँखों से बही।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

प्यार के दो बोल सुनने के लिए।
अब तरसते प्रीत के बुझते दिए।
उम्र ने रुसवाइयाँ सबकी सहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

ललित किशोर 'ललित'

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11.08.26

सिंधु छद

खिला था आसमां में चांँद जब पूरा।
तभी चुप चाँदनी ने चाँद को घूरा।
सितारों से बहुत तुम प्यार करते हो।
कि पूनम को अनोखा रूप धरते हो।

नहीं तुम देखते हो इक नजर मुझको।
धरा की ओर धकियाते मगर मुझको।
नहीं हैं याद तुमको वो पुराने दिन।
हमारे इश्क की रातें सुहाने दिन।

ललित किशोर 'ललित'
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14.08.26

मुक्तक

फूलों का गुलशन चाहा था,शूलों की दरकार न थी।
हँस न सकें जो कागज के उन,फूलों की दरकार न थी।
माना चाहत पूरी होना,मुश्किल होता है लेकिन।
सावन की रिमझिम चाही थी,झूलों की दरकार न थी।

ललित किशोर 'ललित'

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18.08.26

मधुमालती छंद

वो चाहते हैं चुप रहो।
हर ताप हर पीड़ा सहो।
वो राज करना चाहते।
सच से मुकरना चाहते।

क्यों दर्द बाहर आ रहा ?
क्यों गर्द बढ़ता जा रहा ?
क्यों उठ रही आवाज है ?
वो हुक्मराँ नाराज है।

इस दर्द को सहते रहो।
मत हुक्मराँ से कुछ कहो।
मत आसमाँ को तुम तको।
मत स्वप्न में भी सुख चखो।

जो थम गया वो जल नहीं।
जो झुक गया वो बल नहीं।
चलते रहो बढ़ते रहो।
नव स्वप्न नित गढ़ते रहो।

ललित किशोर 'ललित'

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19.08.26

मधुमालती छंद

जो भाव इस दिल में बहें।
हर बात वो किससे कहें ?

दिल की लगी किसको पता।
क्यों कौन सुन लेगा व्यथा ?
जो घाव इस दिल पर लगे।
इक दर्द सा उनमें जगे।
हैं अनगिनत ग़म की तहें।
हर बात वो किससे कहें ?

है राह जो उलझी हुई।
कैसे कहें सुलझी हुई ?
हर मोड़ पर ही धुंध है।
ये देख कर मति कुंद है।
मथती सदा दिल को रहें।
हर बात वो किससे कहें ?

ललित किशोर 'ललित'

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20.08.2026

मधु मालती छंद

इस ज़िंदगी ने क्या दिया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखने को जो मिला।
वो कर्म का ही है सिला।
जो हाथ खाली थे मिले।
अब रिक्त हैं तो क्या गिले?
इक स्वप्न सा जीवन जिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

जो कुछ मिला संसार से।
सब छूटता वो प्यार से।
कैसे रहें पकड़े उसे ?
खुद भाग्य ही छीने जिसे।
सारी उमर भटका किया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखना पीछे नहीं।
हैं मंजिलें आगे कहीं।
अब है सहारा आस का।
उस ईश में विश्वास का।
संकल्प का प्या़ला पिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

ललित किशोर 'ललित'

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22.08.2026
मुक्तक

सनातनी होने का दावा,करता था जो नर हरदम।
धर्म-सनातन की रक्षा का,जो रखता था हर दमखम।
आज वही खुद इक मंदिर में,बन भगवान
विराजा है।
चुप हैं सारे संत महात्मा,अंध-भक्त बोलें बम-बम।

ललित किशोर 'ललित'

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मुक्तक
1.

तुम तो जीना सीख न पाए,कहते हैं वो हम से।
खा लो पी लो मौज मना लो,दूर रहो हर ग़म से।
अब उनको हम क्या बतलाएँ,अपनी राम कहानी ?
हाँ बस इतना ही कह पाए,सीखेंगें अब तुमसे।

2.

मन ही मन हम सोच रहे थे,क्यूँ थे पापड़ बेले ?
क्यों जीवन-भर झंझावातों,तूफानों से खेले ?
मन मौजी थे हम भी लेकिन,पैसों की थी
तंगी।
कैसे मौज मनाते हम जब,पास नहीं थे धेले।

ललित किशोर 'ललित'

31.08.26

विष्णु पद छंद

अनसुलझी अनबूझ पहेली,मन का चैन हरे।
चिंतित मन को क्या समझाएं,कैसे धीर धरें ?
समझ-समझ कर ये समझा है,इस पागल मन ने।
बचैनी से रिश्ता जोड़ा,है घायल मन ने।

ललित किशोर'ललित'
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गीत
31.08.26
छंद सुमेरु
1222 122,2122

तुम्हारी राधिका रो,रो पुकारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

न जाओ श्याम व्रज से,छोड़ हमको।
नहीं क्या रास आया,रास तुमको ?
यशोदा नंद बाबा,के दुलारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे बिन रहेगा,मौन व्रज में।
करेगा रास कान्हा,कौन व्रज में ?
सखा संगी तजेंगें,काज सारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे दर्श ने दुख,दर्द टाले।
तुम्हारी बाँसुरी के,सुर निराले।
बजाएगा मुरलिया,कौन प्यारे ?
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

ललित किशोर 'ललित'

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छंद श्री सम्मान

 मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय!!!

हिंदी साहित्यिक स


मूह " मुक्तक लोक " द्वारा आयोजित तरंगिनी छंद समारोह में मेरी छंद रचना को चयनित कर 

"छंद श्री सम्मान" प्रदान किया गया, इस हेतु समारोह अध्यक्ष आद.

सुश्री अनीता सुधीर ‘आख्या’ जी

संयोजक- छंदकार श्री राकेश मिश्र जी

संचालक द्वय- श्री अश्वनी कुमार जी एवं सुश्री गीतांजलि गुप्ता जी संरक्षक आदरणीय प्रो. विश्वम्भर शुक्ल जी एवम मंच के समस्त गुणीजनों का सादर हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ


जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...