ज़िंदगी,दिल,दर्द
पियूष वर्ष
कुछ यूँ ही
जिन्दगी का इक अजब अन्दाज है।
हर फसाने में छिपा इक राज है।
जिन्दगी ये गुल खिलाती है कभी।
राह में कंटक बिछाती है कभी।
दंश दे देती कभी इतने बुरे।
खवाब में सोचे न थे जितने बुरे।
और बन जाती कभी है बन्दगी।
बन्दगी से ही निखरती जिन्दगी।
कौन जिन्दा है बिना गम के यहाँ।
बस गमों से ही भरा है ये जहाँ।
ईश में विश्वास रखते जो सदा।
हो नहीं पाते कभी वो गमज़दाँ।
ललित
सार छंद
कौन कहाँ कब दे जाएगा,दर्दे दिल दर्दीला?
जान नहीं पाता है कोई,ये विधना की लीला।
गरज-गरज जो बादल नभ में,झूम-झूम छाते हैं।
बिन बरसे ही जाने क्यों वो,दूर चले जाते हैं?
ललित
प्यार,प्रीत,प्रेम
पियूष वर्ष छंद
प्रेम/प्रीत/प्यार
प्यार की दुनिया भुलावा तो नहीं?
प्रीत तेरी इक छलावा तो नहीं?
प्रेम पर विश्वास मैंने है किया।
बुझ न पाए आस का दीपक पिया।
आस पर ही ये टिका संसार है।
प्यार करना क्यूँ बना व्यापार है?
हाथ जो थामा पिया मत छोड़ना।
प्रेम का धागा पिया मत तोड़ना।
है जरूरी प्रीत जीने के लिए।
प्रेम के बिन आदमी कैसे जिए?
प्रीत के बिन है भला क्या जिन्दगी?
प्रेम ही करना सिखाता बन्दगी।
ललित
पियूष वर्ष
देख लो हम को जरा तुम प्यार से।
मानते हो क्यों नहीं मनुहार से?
प्रीत के बिन जिन्दगी दुश्वार है।
जान लो हम को तुम्हीं से प्यार है।
ललित
पियूष वर्ष छंद
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2122 2122 212
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प्यार तेरा ये दिखावा तो नहीं।
वासना का इक छलावा तो नहीं।
दूरियों में प्यार की सौरभ
बसे।
प्रीत तन की वासना में कब बसे।
ललित
पियूष वर्ष
हमसफर
हम सफर जो साथ मेरे थे चले।
नैन को भी जो रहे लगते भले।
खूब था जिन पर मुझे विश्वास भी।
और जिनसे थी लगाई आस भी।
छोड़ वो मुझको अचानक चल दिए।
प्रीत ने ऐसे भला क्यूँ फल दिए?
नाज था जिस प्यार पर मुझको सदा।
आज वो ही कह गया है क्यों विदा?
ललित
कुण्डलिनी
प्यार
प्यार तुझे यदि चाहिए,बाँट प्यार सौ बार।
बाँटे से फूले-फले,ये ऐसा व्यापार।
ये ऐसा व्यापार,नहीं जिसमें है घाटा।
जितना बाँटे प्यार,रहेगा उतना ठाटा।
ललित
8.2.18
सार छंद
कुछ अपनों में कुछ सपनों में,जीवन के दिन बीते।
अपनों ने अब तेवर बदले,सपने निकले रीते।
मानव-मन कितना पागल है,सोच नहीं जो पाए।
दोपहरी में गायब होते ,खुद अपने ही साए।
ललित
सार छंद
दिल कितना नाजुक होता है,ये हमने अब जाना।
वो ही तोड़ गया इस दिल को,जिसको था रब माना।
दिल के टूटी किरचों की भी,देखी खूब रवानी।
टूट-टूट कर और टूटती,जुड़ने की कब ठानी।
ललित
मन के मीत कुकुभ मुक्तक
मुक्तक (कुकुभ आधारित)
26.2.17
1
काव्य सृजन
माँ शारद की किरपा से ये,मन भावों में बहता है।
छंदो की नक्काशी से कवि,सुंदर कविता कहता है।
गुरू ज्ञान की सरिता से ही,'काव्य सृजन' ये निखरा है।
गुरू बिना तो मानो सब कुछ,बिखरा बिखरा रहता है।
2
माँ
माँ तेरे दामन की खुशबू,मन को शीतल कर जाए।
तेरे ये दो नैना मुझ पर,स्नेह सुधा नित बरसाएँ।
पथ में जो काँटे बिखरे माँ,दूर उन्हें तुम कर देना।
तेरे आँचल की छाया माँ,मन में खुशियाँ भर जाए।
3
भोला बाबा
आज बिरज में कान्हा का इक,बाबा ने दर्शन पाया।
मोहन भी रोना भूला जब,भोला बाबा बन आया।
बाबा भूल गया बाबापन,जब मोहन की छवि देखी।
बाबा अपलक देख रहा था,अलख निरंजन हरि माया।
4
रास
रास रचाए रस बरसाए,रसिक रास की इक छोरी।
गोप गोपियों को नचवाए,बरसाने की इक गोरी।
मुरली से पायल बजवाए,वंशी का वादक न्यारा।
मट मट मट आँखें मटका जो,करता सबका दिल चोरी।
5
झूठी प्रीत
प्रेम जगत के सुंदर सुंदर,ख्वाब हमें क्यूँ दिखलाए?
बरखा-सावन के वो नगमे,क्यूँ हमको थे सिखलाए?
झूँठी प्रीत तुम्हारी निकली,झूँठे निकले सब वादे।
हाय हमें बहलाने को तुम,झूँठे खत क्यूँ लिखलाए?
6
रिश्ते-नाते
प्रेम-प्यार औ' रिश्ते-नातों,से अब मानव घबरावे।
मात-पिता,भाई-भावज की,कोई बात न अब भावे।
टूटे दिल के तार यहाँ पर,कोई जोड़ न अब पाता।
अब तो बीबी-बच्चों में ही,सब संसार नजर आवे।
7
प्राची
प्राची ने ओढ़ी है चुनरी,चमके ज्यों केसर क्यारी।
कलियों ने मुस्कान सजाली,अधरों पर निर्मल प्यारी।
तारों ने अम्बर को छोड़ा,डाल रहा दिनकर डेरा।
हर हर हर हर महादेव का,घोष कर रहे नर नारी।
8
माया
कैसी माया प्रभु ने रच दी,कैसा मन को भरमाया
मानव तन की कीमत प्राणी,जीवन भर न समझ पाया।
पैसा खूब कमाने में ही,बीता यह जीवन सारा।
खाली हाथ एक दिन जाना,कभी न मन को समझाया।
9
ममता
सतरंगी दुनिया के सातों,रंग बड़े सुंदर प्यारे।
ममता रूपी रंग जहाँ हो,फीके रंग वहाँ सारे।
जितना प्यार करे माँ सुत को,उतना रंग निखरता है।
लेकिन सुत तो बूढ़ी माँ का,निश्छल रंग न मन धारे।
10
गम
नारंगी कुछ सतरंगी कुछ,बेरंगी कुछ गम होते।
कड़ुवे कुछ तीखे-खट्टे कुछ,गम मीठे कुछ कम होते।
गम ही तो बहलाते दिल को,खुशियाँ कब खुश रख पातीं।
वो सब का दिल हैं बहलाते,जो सुख-दुख में सम होते।
11
काँटे
काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।
12
माँ
इस सुन्दर मोती को माँ तू ,रो रो कर मत बहने दे।
अपने दिल के अरमानों को,आँख के अंदर रहने दे।
तेरी दुआ से इन नैनों में,खुशी के आँसू भर दूँगा।
तेरी इस पीड़ा को माँ बस,कुछ दिन मुझको सहने दे।
13
भोला बाबा
भोला-भाला औघड़ बाबा,करे बड़ा गड़बड़ झाला।
शीश शशि गल नील गरल धरे,औ' नागों की गलमाला।
राख-मसानी अंग-अंग में,सिर धारे पावन गंगा।
भांग धतूरा और हलाहल,खुश हो पीता मतवाला।
'ललित'
15
कुकुभ मुक्तक 16 ..14
पुष्प
पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,
काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,
मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,
काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,
दिल ही दिल में जलते हैं।
💖💖"
16
दिल
दिल छोटा औ' पीर बड़ी है,
नहीं किसी से कह पाऊँ।
दिल में उठती टीस बड़ी है,
नहीं जिसे मैं सह पाऊँ।
अपनों ने जो घाव दिए वो,
दिल में गहरे उतरे हैं।
घावों का अपनापन प्यारा,
कैसे उन बिन रह पाऊँ।
17
सपने
सपनों से सुख सपने जैसा,
हमको जैसे मिलता है।
अपनों से दुख अपना जैसा,
हमको वैसे मिलता है।
टूट गया इक सपना प्यारा,
अपना हमसे जब रूठा।
क्या बतलाएं अब वो अपना,
हम से कैसे मिलता है?
"
18
नज़रें
मात पिता की नज़रों से जो,
स्नेह सुतों को मिलता है।
उसी प्यार से जीवन बनता,
बच्चों का दिल खिलता है।
मात पिता फिर प्यार ढूँढते,
उन बच्चों की नज़रों में।
मगर प्यार का फल तो हरदम,
दूर पेड़ पर हिलता है।
ललित
कुकुभ मुक्तक
19
नजर
काम कभी ऐसा मत करना,नज़र झुकानी पड़ जाए।
एक बार नज़रों से गिरकर,कभी नहीं फिर उठ पाए।
नज़र रखो अपनी करनी पर,करनी ऐसी कर जाओ।
नाज करे ये दुनिया तुम पर,याद तुम्हारी जब आए।
ललित
20
हँसना
जब भी खुलकर हँसना चाहा,दिल ने अधरों को रोका।
जब भी हँसकर जीना चाहा,अपनों ने ही
तो टोका।
अब तो हमने सीख लिया है,दिल ही दिल में खुश रहना।
चाही दिल ने खुशियाँ तो फिर,मन्दिर में जाकर ढोका।
'ललित'
6.7.17
मुक्तक कुकुभ
किरपा
इतनी किरपा कर दे कान्हा,गीत मधुर मैं लिख पाऊँ।
छू कर तेरे अधरों को मैं,धुन मुरली की बन जाऊँ।
राधा जी के चरणों को जो,पायल है हर-पल छूती।
बन वो ही पायलिया निश-दिन,छम-छम-छम-छम-छम गाऊँ।
'ललित'
राधे राधे
उल्लाला 2(13.2.17 से)
उल्लाला
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शादी की वर्षगाँठ की अशेष शुभकामनाएं राकेश जी व भाभीजी को......
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याद 'राज' वो दिन करो,रौनक थी बारात में।
नयी नवेली जब मिली,दुल्हन थी सौगात में।
गठबंधन जब हो गया,'ललिता' जी के साथ में।
जीवन की खुशियाँ सभी,आ बैठी थी हाथ में।
धीरे धीरे जुड़ गये,'यश'-'माही' परिवार में।
कविताएं बनने लगीं,इस सुंदर संसार में।
काव्यसृजन के मित्र सब,करते हैं ये कामना।
मंगलमय दिन रात हों,न हो गमों से सामना।
ललित
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उल्लाला
छूते हैं आकाश को,हम ऊँची परवाज से।
लक्ष्य साधना सीखते,नभ में उड़ते बाज से।
दुश्मन करता वार है,दो धारी तलवार से।
दुश्मन को है मारना,हमको इक दिन प्यार से।
ललित
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राधा गोविंद15-2-17
उल्लाला
राधा-राधा
कान्हा तेरे नाम का,जयकारा चहुँ ओर है।
राधा जी के नाम का,मचा बिरज में शोर है।
राधा-राधा बोलते,कान्हा के सब दास हैं।
राधा-राधा जो जपें,मोहन उनके खास हैं।
ललित
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उल्लाला
प्यार भरा दिल तोड़के,हँसते हैं वो प्यार से।
दिल के टुकड़े हो गए,जिनके नैन कटार से।
टूटा दिल का आइना,टूट गया विश्वास है।
टूटे दिल की दोसती,आज गमों से खास है।
ललित
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उल्लाला
राधा गोविन्द 14-2-17
कैसे भूल हमें गया,मथुरा जाकर श्याम तू।
सारे जग में साँवरे,होगा रे बदनाम तू।
तुझ बिन मन को साँवरे,आए कैसे चैन रे?
रो-रो कर हैं थक गए,राधा के दो नैन रे।
झूठी तेरी प्रीत थी,सपनों सा मधुमास था।
पर मन को विश्वास है,सच्चा तेरा रास था।
वन-उपवन औ' वाटिका,लतिकाएं व्रजधाम की।
निश-दिन माला जप रहे,कान्हा तेरे नाम की।
ललित
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उल्लाला
अँखियों से ओझल हुए,स्वप्न सुनहरे आज हैं।
बिन सजना बजते नहीं,कोई भी अब साज हैं।
साँसों की अब दोसती,हुई गमों के साथ है।
राहें धोखा दे गईं,अब केवल फुटपाथ हैं।
ललित
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4 कुकुभ छंद साझा काव्य संग्रह
कुकुभ छंद
1
माँ
माँ तेरे दामन की खुशबू,अब भी घर को महकाये।
स्नेह दिया जो तूने मुझको,अब भी मन को चहकाये।
क्या तू मुझको देख रही है,नील गगन की खिड़की से।
जीवन मेरा सँवर गया माँ,तेरी प्यारी झिड़की से।
2
दिल
दिल छोटा औ' पीर बड़ी है,नहीं किसी से कह पाऊँ।
दिल में उठती टीस बड़ी है,नहीं जिसे मैं सह पाऊँ।
अपनों ने जो घाव दिए वो,दिल में गहरे उतरे हैं।
उन घावों से आज हुए इस,दिल के कतरे-कतरे हैं।
3
कंटक
कुछ छोटे कंटक होते हैं,चुभने में अतिशय मीठे।
कुछ मध्यम कंटक होते जो,घाव करें हरदम ढीठे।
और बड़े कंटक जो सीधे,दिल के पार उतरते हैं।
नज़र नहीं आते हैं पर वो,दिल को रोज कुतरते हैं।
4
माया
जग की झूठी माया सच से,ओत-प्रोत हो रहती है।
सच की अनगिन पर्तों की वो,ओट लिए जो रहती है।
मृग मरीचिका माया मन को,यों दबोच कर रखती है।
चंगुल से वो छूट न पाये,माया ही सच दिखती है।
5
मुखड़े
कौन किसी का सगा जहाँ में,
सभी पराये मुखड़े हैं।
सबकी अपनी-अपनी दुनिया,
अपने -अपने दुखड़े हैं।
प्रेम-प्यार का नाम नहीं है,
मतलब से सब मिलते हैं।
कलियुग में सब फूल-कली भी,
मतलब से ही खिलते हैं।
'ललित'
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