जुलाई 19 की रचनाएँ
माता-पिता-बेटा-बेटी
पियूष वर्ष छंद
दुआ
फूल उपवन से चले मुख मोड़कर।
क्यारियों में डालियों को छोड़कर।
डालियाँ जड़ से बँधी हरदम रहीं।
और जीवन में सहा कुछ गम नहीं।
पुष्प चल पाए कदम दो चार ही।
और जड़ का पा न पाए प्यार ही।
कौन सुन पाए कभी उन की व्यथा?
भोगते जो आप ही अपनी खता।
दूर रहकर भी जड़ों को पूजते।
पुष्प वो क्यों आज गम से धूजते?
प्यार से देती जड़ें उनको दुआ।
तो हवा भी आज बन जाती दवा।
ललित
कुण्डलिनी छंद
प्यारी होती है सुता,प्यारा उसका साथ।
हो जाती इक दिन विदा,थाम सजन का हाथ।
थाम सजन का हाथ,चली जाती है जैसे।
उसके दिल की पीर,समझ आएगी कैसे?
ललित
कुण्डलिनी
नहीं हुआ पैदा अभी,कवि-लेखक निष्णात।
शब्दों में जो लिख सके,माँ-मन के जजबात।
माँ-मन के जजबात,समन्दर से भी गहरे।
इतने शांत कि पूत,नहीं सुन सकते बहरे।
ललित
मन के मीत कुकुभ मुक्तक
मुक्तक (कुकुभ आधारित)
26.2.17
1
काव्य सृजन
माँ शारद की किरपा से ये,मन भावों में बहता है।
छंदो की नक्काशी से कवि,सुंदर कविता कहता है।
गुरू ज्ञान की सरिता से ही,'काव्य सृजन' ये निखरा है।
गुरू बिना तो मानो सब कुछ,बिखरा बिखरा रहता है।
2
माँ
माँ तेरे दामन की खुशबू,मन को शीतल कर जाए।
तेरे ये दो नैना मुझ पर,स्नेह सुधा नित बरसाएँ।
पथ में जो काँटे बिखरे माँ,दूर उन्हें तुम कर देना।
तेरे आँचल की छाया माँ,मन में खुशियाँ भर जाए।
3
भोला बाबा
आज बिरज में कान्हा का इक,बाबा ने दर्शन पाया।
मोहन भी रोना भूला जब,भोला बाबा बन आया।
बाबा भूल गया बाबापन,जब मोहन की छवि देखी।
बाबा अपलक देख रहा था,अलख निरंजन हरि माया।
4
रास
रास रचाए रस बरसाए,रसिक रास की इक छोरी।
गोप गोपियों को नचवाए,बरसाने की इक गोरी।
मुरली से पायल बजवाए,वंशी का वादक न्यारा।
मट मट मट आँखें मटका जो,करता सबका दिल चोरी।
5
झूठी प्रीत
प्रेम जगत के सुंदर सुंदर,ख्वाब हमें क्यूँ दिखलाए?
बरखा-सावन के वो नगमे,क्यूँ हमको थे सिखलाए?
झूँठी प्रीत तुम्हारी निकली,झूँठे निकले सब वादे।
हाय हमें बहलाने को तुम,झूँठे खत क्यूँ लिखलाए?
6
रिश्ते-नाते
प्रेम-प्यार औ' रिश्ते-नातों,से अब मानव घबरावे।
मात-पिता,भाई-भावज की,कोई बात न अब भावे।
टूटे दिल के तार यहाँ पर,कोई जोड़ न अब पाता।
अब तो बीबी-बच्चों में ही,सब संसार नजर आवे।
7
प्राची
प्राची ने ओढ़ी है चुनरी,चमके ज्यों केसर क्यारी।
कलियों ने मुस्कान सजाली,अधरों पर निर्मल प्यारी।
तारों ने अम्बर को छोड़ा,डाल रहा दिनकर डेरा।
हर हर हर हर महादेव का,घोष कर रहे नर नारी।
8
माया
कैसी माया प्रभु ने रच दी,कैसा मन को भरमाया
मानव तन की कीमत प्राणी,जीवन भर न समझ पाया।
पैसा खूब कमाने में ही,बीता यह जीवन सारा।
खाली हाथ एक दिन जाना,कभी न मन को समझाया।
9
ममता
सतरंगी दुनिया के सातों,रंग बड़े सुंदर प्यारे।
ममता रूपी रंग जहाँ हो,फीके रंग वहाँ सारे।
जितना प्यार करे माँ सुत को,उतना रंग निखरता है।
लेकिन सुत तो बूढ़ी माँ का,निश्छल रंग न मन धारे।
10
गम
नारंगी कुछ सतरंगी कुछ,बेरंगी कुछ गम होते।
कड़ुवे कुछ तीखे-खट्टे कुछ,गम मीठे कुछ कम होते।
गम ही तो बहलाते दिल को,खुशियाँ कब खुश रख पातीं।
वो सब का दिल हैं बहलाते,जो सुख-दुख में सम होते।
11
काँटे
काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।
12
माँ
इस सुन्दर मोती को माँ तू ,रो रो कर मत बहने दे।
अपने दिल के अरमानों को,आँख के अंदर रहने दे।
तेरी दुआ से इन नैनों में,खुशी के आँसू भर दूँगा।
तेरी इस पीड़ा को माँ बस,कुछ दिन मुझको सहने दे।
13
भोला बाबा
भोला-भाला औघड़ बाबा,करे बड़ा गड़बड़ झाला।
शीश शशि गल नील गरल धरे,औ' नागों की गलमाला।
राख-मसानी अंग-अंग में,सिर धारे पावन गंगा।
भांग धतूरा और हलाहल,खुश हो पीता मतवाला।
'ललित'
15
कुकुभ मुक्तक 16 ..14
पुष्प
पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,
काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,
मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,
काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,
दिल ही दिल में जलते हैं।
💖💖"
16
दिल
दिल छोटा औ' पीर बड़ी है,
नहीं किसी से कह पाऊँ।
दिल में उठती टीस बड़ी है,
नहीं जिसे मैं सह पाऊँ।
अपनों ने जो घाव दिए वो,
दिल में गहरे उतरे हैं।
घावों का अपनापन प्यारा,
कैसे उन बिन रह पाऊँ।
17
सपने
सपनों से सुख सपने जैसा,
हमको जैसे मिलता है।
अपनों से दुख अपना जैसा,
हमको वैसे मिलता है।
टूट गया इक सपना प्यारा,
अपना हमसे जब रूठा।
क्या बतलाएं अब वो अपना,
हम से कैसे मिलता है?
"
18
नज़रें
मात पिता की नज़रों से जो,
स्नेह सुतों को मिलता है।
उसी प्यार से जीवन बनता,
बच्चों का दिल खिलता है।
मात पिता फिर प्यार ढूँढते,
उन बच्चों की नज़रों में।
मगर प्यार का फल तो हरदम,
दूर पेड़ पर हिलता है।
ललित
कुकुभ मुक्तक
19
नजर
काम कभी ऐसा मत करना,नज़र झुकानी पड़ जाए।
एक बार नज़रों से गिरकर,कभी नहीं फिर उठ पाए।
नज़र रखो अपनी करनी पर,करनी ऐसी कर जाओ।
नाज करे ये दुनिया तुम पर,याद तुम्हारी जब आए।
ललित
20
हँसना
जब भी खुलकर हँसना चाहा,दिल ने अधरों को रोका।
जब भी हँसकर जीना चाहा,अपनों ने ही
तो टोका।
अब तो हमने सीख लिया है,दिल ही दिल में खुश रहना।
चाही दिल ने खुशियाँ तो फिर,मन्दिर में जाकर ढोका।
'ललित'
6.7.17
मुक्तक कुकुभ
किरपा
इतनी किरपा कर दे कान्हा,गीत मधुर मैं लिख पाऊँ।
छू कर तेरे अधरों को मैं,धुन मुरली की बन जाऊँ।
राधा जी के चरणों को जो,पायल है हर-पल छूती।
बन वो ही पायलिया निश-दिन,छम-छम-छम-छम-छम गाऊँ।
'ललित'
राधे राधे
गीतिका छंद-गीत
गीतिका छंद
गीत
माँ
गम विदाई का तुम्हारी,माँ मुझे दहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को,आज भी सहला रहा।
रोज पाता था जहाँ मैं,दो जहाँ का प्यार माँ।
खोजता मैं फिर रहा हूँ,फिर वही संसार माँ।
वो तुम्हारी झिड़कियाँ भी,याद आती हैं मुझे।
आज भी जो मुश्किलों में,पथ दिखाती हैं मुझे।
ये तुम्हारा ढीठ बबुआ,आदमी कहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को आज भी सहला रहा।
याद मुझको आ रही हैं,प्यार की वो थपकियाँ।
औ'तुम्हारी गोद में ली,नींद की वो झपकियाँ।
वो तुम्हारा गोद में ले,चूमना भी याद है।
फिर मुझे झूले झुलाकर ,झूमना भी याद है।
माँ तुम्हारे नैन का मैं,स्वप्न था पहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को आज भी सहला रहा।
जिन्दगी की जंग लड़ना,माँ तुम्हीं सिखला गईं।
बन्दगी का रासता भी,हाँ तुम्हीं दिखला गईं।
नेकचलनी भी सिखाई,माँ तुम्हीं ने थी मुझे ।
प्यार की हर धुन सुनाई,माँ तुम्हीं में दी मुझे।
आज हर इक शख्स मुझको,झूँठ से बहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को आज भी सहला रहा।
ललित
कुकुभ छंद विधान एवँ रचनाएँ 25.07.16
कुकुभ छंद
25.07.16
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-------कुकुभ छंद विधान-----
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1.यह कुल 30 मात्राओं वाला मात्रिक छंद है।
2.इसमें 16,14 मात्राओं पर यति होती है।
3.इस छंद के अंत में दो गुरुवर्ण होना अनिवार्य है उससे पूर्व दो लघु वर्ण होने चाहिए।
4. अंत में दो लघु वर्णों को गुरु वर्ण नहीं माना जा सकता।
5.क्रमानुसार दो- दो पंक्तियों में समतुकांत रखे जाते हैं।
**** उदाहरण ****
कुकुभ छंद
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कान्हा की वंशी की सरगम,कानों में मधुरस घोले।
राधा की पायल की छम-छम,सुन कान्हा का मन डोले।
राधा जी का रूप निहारें,मोहन तिरछी अँखियों से।
राधा जी अन्जानी बनकर,बतियाती हैं सखियों से।
*************रचनाकार****************
ललित किशोर 'ललित'
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कुकुभ छंद रचनाएँ
1.
मोड़
किसी मोड़ पर हार गए तो,मन से हार नहीं मानो।
वही मोड़ इक दिन जीतोगे,मन में यह निश्चय जानो।
हार गया जो उसे चिढ़ाना,सबको अच्छे से आता।
हारे को सम्बल देना बस,कुछ ही लोगों को भाता।
ललित किशोर 'ललित'
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2.
माँ शारद
माँ शारद की किरपा से ये,मन भावों में बहता है।
छंदो की नक्काशी से कवि,सुंदर कविता कहता है।
गुरू ज्ञान की सरिता से ही,'काव्य सृजन' ये निखरा है।
गुरू बिना तो मानो सब कुछ,रहता बिखरा बिखरा है।
ललित किशोर 'ललित'
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3.
काँटे
काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए क्यों,जो फूलों को बहलाएं।
ललित किशोर 'ललित'
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4.
फूल और कंटक
फूल बना कोई इस जग में,कोई कंटक बन आया।
एक बीज से दोनों उपजे,एक जमीं से जल पाया।
जिसका जैसा अंतर्मन हो,वैसी काया मिलती है।
सुरभित सुंदर तन लेकर यूँ,कोमल कलियाँ खिलती हैं।
ललित किशोर 'ललित'
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5.
वादे
प्रेम जगत के सुंदर सुंदर,ख्वाब हमें क्यूँ दिखलाए?
बरखा-सावन के वो नगमे,क्यूँ हमको थे सिखलाए?
झूँठी प्रीत तुम्हारी निकली,झूँठे निकले सब वादे।
दिल को टीस दिया करती हैं,हाय तुम्हारी सब यादें।
ललित किशोर 'ललित'
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6.
प्रभो
प्रभो आपके चरणों में ये,छोटा सा दिल रखता हूँ।
ध्यान धारणा नहीं जानता,राम नाम रस चखता हूँ।
ऐसी किरपा कर दो भगवन,नाम तुम्हारा नित गाऊँ।
राम नाम ही मुख से निकले,दुनिया से मैं जब जाऊँ।
ललित किशोर 'ललित'
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7.
अंत समय
अंत समय पर जो काशी में, राम नाम ले मरते हैं।
भवसागर से पार करें शिव,ध्यान राम का करते हैं।
राम सुमिरते हैं शिव जी को,करें सदा मानस पूजा।
राम और शिव मय जग सारा,और नहीं है कुछ दूजा।
ललित किशोर 'ललित'
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8.
भोर
प्राची ने ओढ़ी है चुनरी,चमके ज्यों केसर क्यारी।
कलियों ने मुस्कान सजाली,अधरों पर निर्मल प्यारी।
तारों ने अम्बर को छोड़ा,सूरज की है अब बारी।
हर हर हर हर महादेव का,घोष कर रहे नर नारी।
ललित किशोर 'ललित'
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9.
संसारी
इस दुनिया से जाने वाले,जाते कहाँ प्रभू जानें।
पंचतत्व में मिल जाते हैं,सब संसारी यह मानें।
ऐसी माया रचदी हरि ने,प्राणी नहीं समझ पाया।
अंत समय तक समझे खुद को,हिलती डुलती इक काया।
ललित किशोर 'ललित'
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10.
कड़वा सत्य
कड़वा सत्य न सुनना चाहें,लगता झूँठ जिन्हें प्यारा।
झूँठों की इस दुनिया से तो,हर सच्चा मानव हारा।
निगल सत्य के सुंदर मोती,रिश्वतखोरी पनपे है
कच्चे गोटे के बागे अब,ठाकुर जी के तन पे हैं।
ललित किशोर 'ललित'
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11.
माया
झूँठ सत्य की इस माया में,सच्चा मानव पिसता है।
इन दोनों का आपस में इक,अन्जाना सा रिश्ता है।
झूँठे रँग में रँगा हुआ सच,ठोकर खाता दिखता है।
सत् में लिपटा हुआ असत् भी,महँगे दामों बिकता है।
ललित किशोर 'ललित'
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12.
गरीब माँ बेटे
बोझ किताबों का बस्ते में,लादे बच्चा चलता है।
खेल कूद सब भूल गया वो,झोंपड़िया में पलता है।
बैशकीमती बचपन खोया,राजधानियाँ रटने में।
माँ का जीवन उलझ रहा है,आज रोटियाँ बँटने में।
ललित किशोर 'ललित'
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13.
कान्हा
वो ही तो है जो मेरे इस,दिल को हर पल धड़काता।
वो ही तो है जो मेरे हर ,दुश्मन को है हड़काता।
वो ही मेरी नस नस में यूँ,जीवन बनकर बहता है।
जो कान्हा मेरी साँसों में,प्राण वायु बन रहता है।
ललित किशोर 'ललित'
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14.
रुबाई
चलो देश में आजादी की,फिर से अलख जगाते हैं।
लूट रहे जो आज देश को,उनको दूर भगाते हैं।
राम राज्य का सपना अब हम,सच करके दिखलाएंगें।
भ्रष्टाचारी शासन में हम,मिल कर सेंध लगाते हैं।
ललित किशोर 'ललित'
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15.
भारत की मिट्टी
भारत की मिट्टी में पलकर,भारत को मत बिसराओ।
ऊँची शिक्षा पाते पाते,मत विदेश में बस जाओ।
मातृभूमि का कर्ज चुकाने,तुम भारत वापस आना।
अपना ज्ञान देश की सेवा,मे ही अर्पण कर जाना।
ललित किशोर 'ललित'
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16.
श्रृंगार रस
राकेश जी के सुझाव से परिष्कृत
शीतल शांत सरोवर जल में,बिम्ब चाँद का हिलता है।
जलक्रीड़ा में मस्त चाँदनी,चाँद गले आ मिलता है।
हौले हौले हिण्डोले दे,पवन मगन हो मुसकाए।
दिनकर की आहट सुन दोनों,सर के तल में घुस जाएं।
ललित किशोर 'ललित'
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17.
कोटा में परसों एक बच्ची
सडक पर बैल की टक्कर से
असमय मृत्यु का ग्रास बन गई
उसे विनम्र श्रृद्धांजलि
सुंदर होनहार बच्ची थी,नाम अंजना जिसका था।
हरदम हँसती रहती थी वो,काम हँसाना उसका था।
नज़र लग गई नगर निगम की,एक बैल आ टकराया।
पल में वो गिर पड़ी धरा पर,शव ही वापस घर आया।
सूना घर अब सूनी गलियाँ,सूने हैं मंजर सारे।
माँ की आँखों मेंआँसू हैं,तात भ्रात रोकर हारे।
विद्यालय में शिक्षक रोते,आँसू रोकें सहपाठी ।
आँखें मूँद बैठना कोटा,नगर निगम की परिपाटी।
भगवन उस प्यारी बेटी को,चरण शरण में रख लेना।
मात-पिता भ्राता को ये दुख,सहने की ताकत देना।
कोटा के सब नगर निवासी,प्रभु से विनती करते हैं।
उस आत्मा को सद्गति देना,शीश चरण में धरते हैं।
ललित किशोर 'ललित'
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18.
सतरंगी दनिया
सतरंगी दुनिया के सातों,रंग बड़े सुंदर प्यारे।
ममता रूपी रंग जहाँ हो,फीके रंग वहाँ सारे।
जितना प्यार करे माँ सुत को,उतना रंग निखरता है।
लेकिन सुत को बूढ़ी माँ का,निश्छल रंग अखरता है।
ललित किशोर 'ललित'
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19.
दो रोटी
बच्चो को दो रोटी देकर,माँ खुद भूखी रहती है।
फटी साड़ियों से तन ढकती,बच्चों को खुश रखती है।
बच्चों को सूखे में रखकर,माँ गीले में पड़ जाए।
अपने बच्चों की खातिर वो,दुनिया भर से लड़ जाए।
ललित किशोर 'ललित'
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20.
माँ का दिल
माँ के दिल के कोने में इक,छोटी दुनिया रहती है।
प्यारा सा इक मुन्ना रहता,चंचल मुनिया रहती है।
माँ की पलकों की कोरों में,सुंदर सपने रहते हैं।
बच्चे जग में नाम करेंगें,वो सपने ये कहते हैं।
ललित किशोर 'ललित'
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21.
भारत माँ
भारत माँ अपने बच्चों की,खातिर सब दुख सहती है।
पूर्व दिशा में खड़ा हिमालय,पावन गंगा बहती है।
हर भारतवासी को माता,जीवन के सब सुख देती।
फिर भी मुख वो मोड़े माँ से,
ललित किशोर 'ललित'
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22.
माँ
याद आ रही हैं वो बातें,माँ जो मुझसे कहती थी।
उसके नैनों से हरदम जो,अमृत गंगा बहती थी।
मेरे मन की दुविधा को वो,आँखों से थी
पढ़ लेती।
मुझे दिलासा देने को थी,नई कहानी गढ़ लेती।
ललित किशोर 'ललित'
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3 ताटंक छंद साझा काव्य संग्रह
ताटंक छंद
1 कन्या भ्रूण हत्या
माँ तू नारी होकर इतनी,निष्ठुर क्यूँ बन जाती है।
कन्या की आहट सुन तेरी,चिन्ता क्यूँ बढ़ जाती है।
तेरी हिम्मत से ही माता,युग परिवर्तन आएगा।
तू आवाज उठाएगी तो,कोई दबा नहीं पाएगा।
माँ मै तुझ सी प्यारी सूरत,लेकर जग में आऊँगी।
किलकारी से घर भर दूँगी,पैंजनियाँ छनकाऊँगी।
तेरी गोद हरी कर दूँगी,साँस मुझे भी लेने दे।
जीवन रूपी रथ की ऐ माँ,रास मुझे भी लेने दे।
जब तू मुझको छूती है माँ,अपने मन की आँखों से।
मन करता है उड़ जाऊँ मैं,तेरे मन की पाँखों से।
माँ इतना ही वादा कर ले,मुझको जग में लाएगी।
किसी दुष्ट की बातों में आ,मुझको नहीं गिराएगी।
2 गर्भवती माँ की संवेदना
मेरे अन्दर पनप रही जो,एक कली अरमानों की।
नजर न लगने दूँगी उसको,इन बेदर्द सयानों की।
बेटी मेरी माँ बनने की,आस तभी पूरी होगी।
गोदी में खेलेगी जब तू,नहीं तनिक दूरी होगी।
लड़ जाऊँगी मैं दुनिया से,बेटी तुझे बचाने को।
सीखूँगी सब दाँव पेंच मैं,ताण्डव नाच नचाने को।
मेरे आँगन में किलकारी,भरने तू ही आएगी।
तेरी जान बचाने में ये,जान भले ही जाएगी।
'ललित'
4 कुकुभ छंद साझा काव्य संग्रह
कुकुभ छंद
1
माँ
माँ तेरे दामन की खुशबू,अब भी घर को महकाये।
स्नेह दिया जो तूने मुझको,अब भी मन को चहकाये।
क्या तू मुझको देख रही है,नील गगन की खिड़की से।
जीवन मेरा सँवर गया माँ,तेरी प्यारी झिड़की से।
2
दिल
दिल छोटा औ' पीर बड़ी है,नहीं किसी से कह पाऊँ।
दिल में उठती टीस बड़ी है,नहीं जिसे मैं सह पाऊँ।
अपनों ने जो घाव दिए वो,दिल में गहरे उतरे हैं।
उन घावों से आज हुए इस,दिल के कतरे-कतरे हैं।
3
कंटक
कुछ छोटे कंटक होते हैं,चुभने में अतिशय मीठे।
कुछ मध्यम कंटक होते जो,घाव करें हरदम ढीठे।
और बड़े कंटक जो सीधे,दिल के पार उतरते हैं।
नज़र नहीं आते हैं पर वो,दिल को रोज कुतरते हैं।
4
माया
जग की झूठी माया सच से,ओत-प्रोत हो रहती है।
सच की अनगिन पर्तों की वो,ओट लिए जो रहती है।
मृग मरीचिका माया मन को,यों दबोच कर रखती है।
चंगुल से वो छूट न पाये,माया ही सच दिखती है।
5
मुखड़े
कौन किसी का सगा जहाँ में,
सभी पराये मुखड़े हैं।
सबकी अपनी-अपनी दुनिया,
अपने -अपने दुखड़े हैं।
प्रेम-प्यार का नाम नहीं है,
मतलब से सब मिलते हैं।
कलियुग में सब फूल-कली भी,
मतलब से ही खिलते हैं।
'ललित'
1 ताटंक छंद साझा काव्य संग्रह
ताटंक छंद
(1)
माँ की याद में
माँ मैं मूरख समझ न पाया,तेरे दिल की बातों को।
मेरी राह तका करती थी,क्यूँ सर्दी की रातों को?
मेरे सारे सपनों को माँ,तू ही तो पर देती थी।
मेरी हर इक चिन्ता को तू,आँचल में भर लेती थी।
आज अकेला भटक रहा हूँ,मैं इस जग के मेले में।
तेरी कमी अखरती है माँ,जब भी पड़ूँ झमेले में।
माँ तेरी यादों में मेरी,आँखें नीर बहाती हैं।
तेरी सीखें अब भी मुझको,राह सदा दिखलाती हैं।
(2)
पलकें झपका भोर रही है,निशा चली मुँह फेरे है।
कली-कली ने घूँघट खोला,तितली रंग बिखेरे है।
आसमान पर छायी लाली,गोरी ले अँगड़ाई रे।
पनघट पर बाजें पैंजनियाँ,चूड़ी बजे कलाई रे।
(3)
सुबह सुबह अपने खेतों में,धूप सुहानी भाती थी।
पनघट से गगरी ले गोरी,ठुमक ठुमक जब आती थी।
उसकी पायल की छम छम तब,नए तराने गाती थी।
दिल जाता था भूल धड़कना,साँसें थम ही जाती थीं।
4
सबसे सुंदर है इस जग में,राधा-कान्हा की जोड़ी।
जिसने हृदय बसा ली ये छवि,प्रीत वही समझा थोड़ी।
चौंसठ कला निपुण हैं कान्हा,शक्ति स्वरूपा हैं राधा।
राधा-कृष्ण की भक्ति कर लो,मिट जाएगी भव बाधा।
'ललित'
जून 2026 की रचनाएँ
जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...
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********************* --दुर्मिल सवैया छंद विधान--- ********************* 1. यह एक वार्णिक छंद है। 2.इसमें चार चरण होते हैं। 3.चार ...
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******************************** ------मदिरा सवैया छन्द विधान------ ******************************** 1. यह एक वार्णिक छंद है 2. इसकी हर ...
