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विविध


शक्ति छंद
मधुर रास

सितारों भरी चाँदनी रात में,बजी पायलें खूब बरसात में।
गरजते हुए बादलों के तले,मिले राधिका से कन्हैया गले

बजे बाँसुरी चूड़ियाँ भी बजें,हँसें गोपियाँ कृष्ण राधा सजें।
कन्हैया सुनाता नये राग वो,सुनें गोपियाँ तो खुले भाग वो

दसों ही दिशाएं लगी झूमने,धरा भी गगन को लगी चूमने।
सजे मोगरा वेणियों में जहाँ,कन्हैया बजाए मुरलिया वहाँ।

बसन्ती हवाएं छूएं गात को,थिरकने लगीं गोपियाँ रात को।
नथनियाँ हिलें हास के साथ में,कि झुमके हिलें रास के साथ में।

ललित

निश्चल छंद
छलिया घनश्याम

राधा जी की रूप माधुरी,ललित ललाम।
चकित नैन कनखी से निरखे,मनहर श्याम।

अँखियों ही अँखियों से पीता, माखन चोर।
राधा के नैनों की मदिरा,वो नित भोर।

ऐसा जादू करता छलिया,वो घनश्याम।
खिंची चली आती है राधा,सुबहो शाम।

गोप-गोपियाँ हँसी उड़ायें,दे दे ताल।
वो नटखट नैना मटकाए,चूमे गाल।

कैसे कैसे नाच नचाता,नटवर श्याम।
आत्मानंदी रास रचाता,वो निष्काम।

मधुर बाँसुरी से छेड़े कुछ,ऐसी तान।
आलौकिक मद से भर देता,सबके कान।

जादू की मुरली ले आया,माखन चोर।
बजा मधुर वंशी खींचे वोे,मन की डोर।

व्रज का छोरा बरसाने की,छोरी साथ।
जोरा-जोरी करे छुड़ाए,गोरी हाथ।

सिंहावलोकन घनाक्षरी

प्रार्थना

थक गये अब नाथ,
नैया खेते मेरे हाथ।
आप ही सँभालो अब,
पतवार नाव की।

पतवार नाव की लो.
थाम करकमलों में।
झलक दिखादो जरा,
दयालु स्वभाव की।

दयालु स्वभाव की वो,
छवि तारणहार की।
दवा आज दे दो प्रभु,
मेरे हर घाव की।

मेरे हर घाव की वो,
दवा श्याम नाम की जो।
लगन लगा दो तव,
चरणों में चाव की।

ललित

गीतिका छंद

बेटियाँ

प्यार की हर इक कसौटी,पर खरी वो बेटियाँ।
तात-माता की दुलारी,हैं परी वो बेटियाँ।
हौसला दामन छुड़ाए,माँ-पिता का जब कभी।
बेटियाँ देती सहारा,हौसला रख कर तभी।

'ललित'

लावणी मुक्तक

मैं क्या जानूँ

बात कहूँ मैं अपने दिल की,औरों की मैं क्या जानूँ।

फूलों में जजबात नहीं हैं,भौंरों की मैं क्या जानूँ।
प्यार बिके अरमान बिकें हैं,आज यहाँ सब कुछ बिकता।
झरनों में आवाज नहीं है,धौरों की मैं क्या जानूँ।
'ललित'

ताटंक मुक्तक

किरचें

टूटे सपनों की कुछ किरचें,बाकी हैं अब झोली में।
कैसे कैसे रंग दिखे हैं,सपनों की इस होली में।
स्वप्न सुनहरे खो देते हैं,कब क्यूँ अपने रंगों को?
बेरंगा मन बैठा रहता,क्यूँ सपनों की डोली में?

मुक्तक
माँ 

क्यूँ होता है अक्सर ऐसा,माँ छुप-छुप कर रोती है?
बेटा नजरें फेर रहा क्यूँ,सोच दुखी वो होती है।
माँ के अरमानों का सूरज,दिन में क्यूँ ढल जाता है?
एक अँधेरे कोने में वो,बेबस सी क्यूँ  सोती है?

ताटंक छंद

नई धुनें

नये वर्ष में नयी धुनों पर,मुरली श्याम बजा देना।
मेरे अधरों पर मंगलमय,नित नव गीत सजा देना।
मनमंदिर में मूरत तेरी,संग राधिका प्यारी हो।
दिन तो दिन है कान्हा मेरी,नहीं रात भी कारी हो।
'ललित'

कुकुभ मुक्तक

पुष्प

पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,दिल ही दिल में जलते हैं।

ललित


कुकुभ मुक्तक

फूल और कााँँटे

फूल और काँटों का रिश्ता,मानव नहीं समझ पाये।
पुष्पों की रक्षा करते ये,काँटे ही हरदम आये।
कंटक से फूलों की शोभा,आजीवन हमदम काँटे।
काँटों में जो फूल खिले वो,कहीं न फिर ठोकर खाये।
ललित

मुक्तक

पहरेदारी


काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।

ललित

कुकुभ मुक्तक


प्रेम भरा हो दिल में जितना,उतना ही वो छलकेगा।
नैन झरोखे से वो शीतल,मोती बनकर ढलकेगा।
जिसके सीने में नाजुक सा,प्यार भरा इक दिल होगा।
उसकी उठती गिरती पलकों,में हरदम वो झलकेगा।
ललित

रोला छंद
गीत

दिल के रिसते घाव

दिल के रिसते घाव,छिपाकर जग में डोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

देखे सुंदर मीत,देख ली प्रीत अनोखी।
केवल अपनी जीत,लगे है सबको चोखी।
जब भी बोलो बात,जरा मन ही मन तोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

झूठा ये संसार,यहाँ की रस्में झूठी।
जो होता गमगीन,उसी से रहती रूठी।
पी लो गम के घूँट,मगर तुम मुँह मत खोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

दुनिया की है रीत,किसी के साथ न रोये।
हँसी उड़ाये और,राह में काँटे बोये।
जपलो हरि का नाम,पाप खुद अपने धोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

भगवन दयानिधान,उन्हीं से विनती करलो।
हरि को अपना मान,शीश चरणों में धरलो।
तर जाएगी नाव,प्रभू के आगे रो लो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

ललित

रोलाछंद

गीत

दे देते हैं घाव

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।

और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जिस पर है विश्वास,वही दिल को तोड़ेगा।
जो है अपना खास,वही फिर मुख मोड़ेगा।
सहलाता है घाव,नहीं शीतल सावन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जो होता फनकार,यशस्वी वो हो जाता।
दुनिया भर का प्यार,उसे फन है दिलवाता।
दिल के गहरे घाव,नही भर पाता फन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

ईश्वर से विश्वास,कभी यूँ ही उठ जाता।
जिसकी टूटी आस,नहीं फिर वो उठ पाता।
भर देता है घाव,कभी जानी दुश्मन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जीवन भर तो साथ,नहीं तन भी दे पाता।
विषम रोग में साथ,नहीं धन भी दे पाता।
भरें उसी के घाव,करे जो यहाँ भजन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

'ललित'

मनोरम छंद
वृद्धावस्था/बुजुर्गी

आँसुओं से तरबतर

आँसुओं से तर बतर था,एक बेबस वृद्ध नर था।
देह जर्जर हो गई थी,वासना भी सो गई थी।

प्यार की प्यासी निगाहें,जो खुली रहना न चाहें।
हर तरफ पसरी उदासी,दे खुशी क्यों कर जरा सी।

याद आती है जवानी,जब नसों में थी रवानी।
पाल बच्चों को लिया था,दो जहाँ का सुख दिया था।

बन गये लायक सभी वो,सुख न दे पाए कभी वो।
व्यस्त सब बच्चे हुए हैं,कान के कच्चे हुए हैं।

स्वप्न सब बिखरे सुनहरे,होगए हैं पूत बहरे।
दर्द में डूबी निगाहें,कण्ठ से निकलें कराहें।

जिन्दगी की क्या कला है?ये बुजुर्गी क्या बला है?
जान जीवन भर न पाया,बालकों ने जो दिखाया।

देह में रमता रहा था,नेह में जीवन बहा था।
स्वार्थमय जीवन जिया था,याद कब रब को किया था।

आज रब है याद आता,भूल इक पल वो न पाता।
या खुदा अब तो रहम कर,दु:ख दारुण ये खतम कर।

प्यार जो उसने दिया था,त्याग जो उसने किया था
काश बच्चे जान पाते,दर्द को पहचान पाते।

नेह से नजरें मिलाकर,दीप आशा का जलाकर।
घाव पर मरहम लगाते,बोल मीठे बोल जाते।

ललित

जून 2019 की रचनाएँ


जून 2019


01.06.19
राम नाम
कुण्डल छंद

रोम-रोम जपे नाम,राम-राम हर पल।
साँस रोक देत मौत,बिना किए हल-चल।
चार दिन की ज़िंदगी,मूल्यवान पाई।
जप ले तू राम-राम, चुका कर्ज भाई।

ललित

माँ

माँ तेरी अँखियों में मैंने,प्यार सदा निश्छल पाया।
भूल नहीं पाया मैं अब तक,तेरी ममता की
छाया।
सपनों में दिखती है अब भी,तू मेरा सिर सहलाती।
आज याद करके तुझको माँ,अश्रु आँख में भर आया।

ललित

03.06.19

हील
आधार छंद

नारंगी चश्मा लगा,पहने ऊँची हील।
चलते-चलते कर रही,मोबाइल पर डील।

पत्थर से टकरा गिरी,चश्मा छिटका दूर।
गरम सड़क थी कर रही,हँसकर उसको फील।

ललित

झटका
आधार छंद

ऐसा झटका था लगा,दिल को मेरे यार।
जब उस नारी से हुईं,मेरी आँखें चार।
बेशर्मी थी आँख में,फटी हुई थी जींस।
उमर साठ के पार थी,जुल्फें फुग्गे-दार।

ललित 

आधार छंद
स्वार्थ

मतलब की हैं यारियाँ,स्वार्थ भरे सम्बंध।
दें फूलों की क्यारियाँ,मतलब से  मधुगंध।
सबको अपनी है पड़ी,सबको खुद से प्रीत।
परमारथ के नाम से,हर दरवाजा बंद।

ललित.

सूर्यदेव
आधार छंद

सूर्य देव कुछ कम करो,गर्मी का ये ताप।
मत गरीब की हाय लो,लू-लपटें दे आप।
एसी-कूलर-कुल्फियाँ,वट-पीपल की छाँव।
सबको है झुलसा रही,ये गर्मी बे-माप।

ललित

आधार छंद
भोर-मोर

मधुर-मधुर जब बाँसुरी,बजती है हर भोर।
सात सुरों की रागिनी,बिखराए हर ओर।
अधरों पर कान्हा लिए,मंद-मंद मुस्कान।
वंशी सुनकर नाचते,नंदन-वन में मोर।

ललित

आधार छंद
राजनीति

बैरी से बैरी मिलें,राजनीति के मंच।
बेशर्मी लादे हुए,देखें सपने टंच।
जनता को उल्लू समझ,मिला हाथ में हाथ।
कुर्सी पाने के लिए,रचते खूब प्रपंच।

ललित

आधार छंद
देह

बहुत सँभाली प्यार से,माटी की ये देह।
और किसी को कब किया,इससे ज्यादा नेह?
वृद्धावस्था में मगर,साथ छोड़ती चर्म।
सिखला देती चाटना,राम-नाम अवलेह।

 ललित

आधार छंद
देश

इंद्रधनुष सम देश में,सात रँगों का मेल।
रिमझिम बारिश में दिखे,अद्भुत सुंदर खेल।
मिल-जुल कर सब जातियाँ,करें देश उत्थान।
छुक-छुक कर चलती रहे,सतरँग की ये रेल।

ललित

ताटंक छंद
चिड़िया

छोटी-सी इक नन्ही-सी इक ,चिड़ियामेरे घर आई।
मनी-प्लाँट की बेल न जाने,क्यों उसके मन को भाई?
एक माह तक हर-दिन थोड़े,तिनके चुन मुँह में लाई।
बना घोंसला मनी-प्लाँट पर,बन बैठी सबकी ताई।

ललित

आधार छंद
गर्मियाँ

कैसी-कैसी गर्मियाँ,सह सकते हैं आप।
वृक्ष लगो जब काटने,ये कर लेना माप।
हरी-भरी थी जो धरा,वन-उपवन समृद्ध।
कटे वृक्ष तो दे रही,नर को निशि-दिन शाप।

ललित

आधार छंद
नंदकिशोर

नैन बंद कर राधिका,मंद-मंद मुस्काय।
नटखट नंद-किशोर का,हिय में दर्शन पाय।
सब कहते वो साँवरा,ऐसा है चितचोर।
जिसका दिल चोरी करे,उसके हिय बस जाय।

ललित

आधार छंद
नई पौध

अनजानी सी हो गई,अब तो हर पहचान।
कंकरीट में फँस गई,ज्यों धरती की जान।
जल बिन बंजर हो रही,धराआज हर ओर।
वन-उपवन सर-कूप से,नई पौधअंजान।


ललित

रोला छंद
जजबात

फूलों के जजबात,यहाँ कब समझा कोई?
काँटों के सह वार,सदा ही कलियाँ रोई।
कलियाँ बनके पुष्प,कहाँ अब खिल पाती हैं।
पानी की क्या बात,हवा कातिल पाती हैं।

ललित


छंद सिंधु
कलियाँ

कहीं कलियाँ बिखरती थी हवाओं में।
कहीं भाषण दिए जाते चुनाओं में।
कहीं थी लाडली अस्मत रही खोती।
कहीं थी चैनलों पर ही बहस होती।

ललित

कलियाँ
छंद सिंधु

न कलियाँ मुस्कुरा सकती कभी खुलकर।
हवा में बह  रही जब वासना घुलकर।
न फूलों में बची खुशबू वहाँ कोई।
कि मानवता जहाँ मुख फेर कर सोई।

ललित

कलियाँ
मुक्तक 16-14

कलियाँ सब सिकुड़ी-सिमटी हैं,पवन चली हाहाकारी।

कंटक चीर रहे कोमल-तन,सिसक रही अबला नारी।

खग भी उड़ने से डरते हैं,बाज झपटते हैं ऐसे।

कैसा भारत कैसी महिमा,कैसे ये  सत्ताधारी?

ललित

देह
आधार छंद

पंचतत्त्व से जो बनी,भरी विषों से देह।
साथ सदा देगी नहीं,मत कर उससे नेह।
वृद्धावस्था में सदा,तन को छोड़े चाम।रसना से नित चाट तू,राम-नाम अवलेह।

ललित

सपने
मुक्तक  

सपनों की दुनिया में खोए,जगकर चलना भूल गए।
पापों से जो फटी चुनरिया,उसको सिलना 
भूल गए।
बचपन बीता गई जवानी,वृद्धावस्था गले पड़ी।
नाते-रिश्ते रहे निभाते,खुद से मिलना भूल गए।

ललित

जिंदगी
आधार छंद

चार दिनों की ज़िंदगी,हँसकर जी ले मीत।
कान लगाकर सुन ज़रा,जीवन का संगीत।
सुन कोयल की कूक तू, झरनों की आवाज़।
खुश रहना तू सीख ले,छिपी इसी में जीत।

ललित

गर्मी
आधार छंद

कुछ तो गर्मी कम करो,हे! दिनकर भगवान।
लू-लपटें नित ले रही,मासूमों के प्राण।
ताल-तलैया कूप में,जल की बची न बूँद।
एसी-कूलर ठप हुए,साँसत में है जान।

ललित

वृक्ष
आधार छंद

धरती को नंगा किया,काट-काट कर वृक्ष।
रुकी धरा की साँस है,घायल उसका वक्ष।
अब गर्मी का दोष दें,दिनकर को सब लोग।
मन ही मन कहते रहें,मानव खुद को दक्ष।

ललित
10.06.19

भोला-बाबा
कबीर छंद/सरसी

भोला-भाला बाबा आया,मात तुम्हारे द्वार।
श्याम-लला के दर्शन करने,की है बस  दरकार।
झाड़-फूँक कर नजर उतारे,ये बाबा है खास।
बालक रोना बंद करेगा,आएगा जब पास।

ललित 

कलियाँ
कबीर छंद/सरसी

भारत में कलियों का खिलना,दूभर कितना आज?
खिलने से पहले तन नोचें, कदम-कदम पर बाज।
सरकारें ही जब अंधी हों,अंधे थानेदार।
न्याय मिले आहत कलियों को,करो नहीं दरकार।

ललित

श्याम साँवरे
कबीर छंद/सरसी छंद

श्याम साँवरे तेरी मुरली,की धुन है क्या खूब।
धरती अम्बर और सितारे,जाते जिसमें  डूब।
सपने में ही हमें सुना दे,उस वंशी की तान।
जिसकी मधुर धुनों में बसती,है राधा की जान।

ललित

चाय
कबीर छंद

छम-छम-छम-छम बजें पायलें,जियरा झूमा जाय।
आएँगें अब साजन पीने,अदरक वाली चाय।
आज कहू्ँगी मैं प्रियतम से,अपने मन की बात।
मोबाइल को छोड़ो ये है,मधुर-मिलन की रात।

ललित

इंद्रधनुष
कबीर छंद

घन-घन-घन-घन बादल गरजें,मोर मचाएँँ शोर।

ऊँचे पर्वत के पीछे से,झाँके स्वर्णिम भोर।

शीतल निर्मल जल की बूँदें,ले आई बरसात।

इंद्रधनुष ने सात रंग की,दी अद्भुत सौगात।

ललित

17.06.19


कबीर छंद
सलाह

भाग-दौड़ से जीवन की कुछ,समय निकालो आप।
सुबह-सैर दो कोस करो सब,मिट जाएँ संताप।
खुली हवा में बैठो थोड़ा,कर लो कुछ व्यायाम।
प्राणायाम ज़रा कर लो तो,मन पाए विश्राम।

ललित

19.06.19

सुख-दुख
कुकुभ छंद

सुख-दुख में गोते खाते ही,बीत गया जीवन सारा।
वृद्धावस्था में आकर क्यूँ ,लगता है जीवन हारा?
जिस मस्ती में यौवन बीता,उस मस्ती में अब जी ले।
औरों से मत कर आशा तू,खुद अपने सब ग़म पी ले।

ललित

बाँसुरिया
कुकुभ छंद

जादू नगरी से बाँसुरिया,ऐसी लाया नँदलाला।
अधरों से जब लगती है तो,झूम उठे हर व्रज-बाला।

गोप-गोपियाँ दौड़े आते,काम छोड़ कर सब आधा।
बिना पादुका दौड़ी आती,सुन मुरली की धुन राधा।

ललित

मोबाइल
कुकुभ छंद

मोबाइल का भूत सभी को,लगता है बेहद प्यारा।
पाँच इंच की डिबिया में अब,बंद हुआ है जग सारा।
शादी की हर वर्ष-गाँठ अरु,जन्म-दिवस ये दिखलाता।
किसे बधाई कैसे देनी,मोबाइल ही सिखलाता।

ललित

दिनकर
कुकुभ छंद

एक अकेला दिनकर सारे,जग को रोशन कर देता।
स्वर्ण-रश्मियों की झिलमिल से,धरती का तम हर लेता।

जो नित सूर्यदेव को जल का, अर्पण करता इक लोटा।
दसों दिशा यश फैले उसका,कभी न देखे दिन खोटा।

ललित

20.06.19
कान्हा
कुकुभ छंद

माटी-खाना माखन-खाना,चोरी-करना कब छोड़ा?
ओ कान्हा बतला दे तूने,कपड़े हरना कब छोड़ा?
जिस प्यारी राधा के सँग तू,नंदन-वन में नित झूला।
जरा बता दे उस राधा को,क्यों-कर कैसे कब भूला?

ललित

बदरा प्यारे
ताटंक छंद

सूख गया सब नीर धरा का,बचे समंदर हैं खारे।
अधर नैन मन की प्यासों से,नर-नारी सब हैं हारे।
इंद्र-देव से आज्ञा लेकर,बरसा दे जल
के धारे।
इस धरती की प्यास बुझाने,आजा ओ बदरा प्यारे।

ललित


22.06.19
कुकुभ छंद
श्रृंगार

अंग सुकोमल रूप मनोहर,
चंचल चितवन तिरछी सी।

कान्हा की दीवानी राधा,
बोले तीखी मिरची सी।

छम-छम-छम-छम करती आए,
गीत बाँसुरी जब गाए।

देखे उसको इक-टक मोहन,
नज़र शरारत कर जाए।

ललित

चंचल मन
कुकुभ छंद

चंचल मन नित खोया रहता,नए-नए सुख-सपनों में।
खोजा करता खुशियों के पल,सभी परायों-अपनों में।
आनँद अपने अंदर का क्यों,देख नहीं ये मन पाता ?
वो आनँद जो अनुभव करता,नर वो भव से तर जाता।

ललित

वोट
कुकुभ छंद

देश-प्रेम की बातें कर जो,वोट बटोरा करते हैं।
उनसे अच्छे भिखमंगे गा,भजन कटोरा भरते हैं।
कुछ नेता जनता को धोखा,दे हत्याएँ करवाएँ।
कुछ वोटों की खातिर अपने,ही लोगों को मरवाएँ।

ललित

आपा-धापी
ताटंक छंद

कैसी आपा-धापी में कब,ये जीवन सारा बीता?
समझ नहीं पाया कुछ भी मन, क्या हारा अरु क्या जीता?
बचपन की कुछ मीठी यादें,सुंदर स्वप्न जवानी के।
यही बचे हैं अब झोली में,अंतिम दौर रवानी के।

ललित

ताटंक छंद
राधा-राधा

राधा-राधा रटते-रटते,मोर-मुकुट सिर है धारा।
कारे-कारे मनमोहन की,अँखियों में कजरा कारा।
पीताम्बर पहना दे मैया,राह निहारे है राधा।
बाँसुरिया-लकुटी पकड़ा दे,दिन चढ़ आया है आधा।


ललित

ताटंक
नवीन भाव

फूलों की बगिया में सौरभ,की ऐसी महिमा पाई।
हवा चुरा खुशबू सुमनों से,मन-आँगन में ले आई।
पुलक उठा यों मन का उपवन,
सौरभ से भीनी-भीनी।
आई हो ज्यों स्वप्न सुंदरी,ओढ़ चुनर झीनी-झीनी।

ललित

नन्ही परी
ताटंक छंद

सुंदर सपनों में रँग भरने,नन्ही एक परी आई। 
रंग-बिरंगे खुशियों के पल,अपनी झोली में लाई।
प्यारी-प्यारी बातें करती,शैतानों की नानी 
है।
रोज रात को दादू से वो,सुनती नयी कहानी है।

ललित

कारे बदरा
ताटंक छंद

कारे बदरा आगे मत जा,नीर यहीं बरसा जा रे।
जल बिन सूखे अधर हमारे,क्यों हमको
तरसाता रे?
बहुत सही है गर्मी हमने,लू ने बहुत तपाया है।
वो शीतलता हमको दे जा,सागर से जो लाया है।

ललित

बेटी
 ताटंक छंद

बहुत पढाया बेटों को अब,बेटी को भी मौका दो।
अपनी प्यारी बेटी को मत,जबरन चूल्हा चौका दो।
बेटी के सपनों में सुंदर,प्यारे रँग भरते जाओ।
उसकी राहें आसाँ कर दो, हर बाधा हरते जाओ।

ललित

सुख-दुख
कुकुभ छंद

सुख अरु दुख की परिभाषाएँ,आपस में यों उलझी हैं।
जीवन भर सुलझाए नर-मन,लेकिन ये कब सुलझी हैं?
दुख में सुख अनुभव करने की,कला कई
मानव जानें।
और कई मानव सुख में भी,अल्प कमी को दुख मानें।

ललित

राधा-कान्हा
ताटंक छंद

मन-मन्दिर में शोभित हो जब,राधा-कान्हा की जोड़ी।
नयन बन्द करते ही उठती,आनँद की लहरें थोड़ी।
कभी दिखाई देता कान्हा,मन्द-मन्द मुस्काता सा।
कभी दिखाई देता आँखें,गोल-गोल मटकाता सा।

नंदन-वन में गाय चराता,मुरली मधुर बजाता वो।
कभी राधिका अरु सखियों सँग,मनहर रास रचाता वो।
गोवर्धनधारी जो देता,मात इंद्र की चालों को।
खेल-खेल में वो मिलवाता,ईश्वर से व्रज वालों को।

ललित

बाबुल का अँगना
ताटंक छंद

अँखियों में हैं सुंदर सपने,दिल में प्रीत पिया की है।
डोली में बैठी है गोरी,थामे रास हिया की है।
छोड़ चली बाबुल का अँगना,छूट गईं सखियाँ सारी।
पहली पारी खेल चुकी अब,खेलेगी दूजी पारी।

ललित

माली
ताटंक छंद

फूलों में सुंदर रँग भरकर,खुशबू किसने है डाली?
सोच रहा खुश हो कर माली,देख गुलाबों की लाली।
मुस्कानों को भी देते हैं,जो सीखें मुस्काने की।
वही सुमन जानें तरकीबें,काँटों से टकराने की।

ललित

बच्चे
ताटंक छंद

सोच पुरानी की अब खिल्ली,उड़ा रहे हैं 
जो बच्चे।
जीवन की दुर्गम राहों में,इक दिन खाएँगें 
गच्चे।
जो जनरेशन-गैप कहाता,नहीं समझ में आता है।
बच्चों के बच्चे होते तो,गैप कहाँ खो जाता है?

ललित

रोला छंद विधान एवँ रचनाएं 5.10.15 से

28.02.2020
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     -------रोला छंद विधान-----
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1. यह चार पंक्तियों अर्थात आठ चरणों वाला अर्द्धसम मात्रिक छंद है जिसकी प्रत्येक पंक्ति में 11,13  की यति से कुल चौबीस मात्राएँ होती हैं।

2. रोला छंद के 
विषम चरणों (1,3,5, और 7) में 11 मात्राएँ तथा 
सम चरणों (2,4,6और 8) में 13 मात्राएँ होती है।

3. रोला छंद में दो अथवा चार तुकांत समान होते हैं ।

4. सम चरणों का अंत 22/112/211/1111 के मात्रिक क्रम से ही होना अनिवार्य है ।

5. रोला छंद में यति पूर्व सदैव लघु वर्ण ही रखा जाता है और बेहतर लय के लिए अंत में हमेशा दो गुरू वर्ण होते हैं।

6. दोहे और रोला छंद में मात्राएँ बिलकुल विपरीत होती हैं।
 दोहा लेखन में 13,11=24 मात्रा भार रखते हैं जबकि रोला छंद में इसके विपरीत 11,13 =24 मात्रा भार रखना है किन्तु विपरीत होने पर भी रोला छंद का शिल्प दोहे से भिन्न है।

             **** उदाहरण ****

रोला छंद

चलते-चलते श्वास,कलम की जब भी रुकती।
ले शारद का नाम,कलम कागज पर झुकती।
लिख देती है पीर,कभी गहरे सागर की।और कभी दिल खोल,लिखे खुशियाँ गागर की।

**********रचनाकार*************
ललित किशोर 'ललित'
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रोला छंद रचनाएँ

रोला छंद
1

फल से झुकता पेड़,राह हमको दिखलाता।
झुकने में है सार,यही हमको सिखलाता।
मत करना अभिमान,जीत का तुम जीवन में।
बोना सीखो बीज,प्रीत का सबके मन में।
ललित
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रोला
27.3.17

2
भर जाएंगे घाव,समय से धीरे धीरे।
भूल जरा तू घाव,अभी मस्ती में जी रे।
बैठ समय की नाव,चला चल हौले हौले।
पार लगेगी नाव,जपे जा भोले भोले।
ललित

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5.10.15
रोला छंद
3
करले सबसे प्यार,लगे है जीवन छोटा।
छूटेगा संसार, न कोई जाकर लौटा।
होगा भव से पार, करे जो माँ की सेवा।
चरणों में रख शीश, मिलेगा तुमको मेवा।


ललित

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5.10.15
रोला छंद
4
पत्नी को तो आप,सदा खुश रखना भाई।
करते रहना रोज,उसकी यूँ ही बड़ाई।
करना कभी न भूल,पीहर की तो बुराई।
पीहर तो हर हाल,नहले पे है दहाई।
'ललित'
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5.10.15
रोला छंद
5
दयावान भगवान,जान ले मन में प्यारे।
रखते सबकी लाज,सदा ही वो रखवारे।
करता क्यूँ फरियाद,हाथ उनके तू जोड़े।
मन में रख विश्वास,कभी वो आस न तोड़े।

ललित

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5.10.15
रोला छंद
6
पैसा ही भगवान,बताते लोग यहाँ हैं।
पैसे से हर काम ,उनका होता वहाँ है।
पैसा लेकिन देख,खरीद न साँसें पाए।
पैसे की ये मेख,अंत में साथ न जाए।

ललित
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06.10.15
रोला छंद
7
आज देश का हाल,अजी कुछ कहा न जाए।
नेता ठोकें ताल,देश को कौन बचाए।
परदेशों में सूट,बड़ी चर्चा करवाये।
अपना देशी प्याज,नयन आँसू भरवाये।

जिन से की थी आस,वही हम को भरमायें।
पाँच साल की रास,पकड़ के वो फरमायें।
आयेगा शुभ काल,सभी खाते खुलवायें।
चारों ओर अकाल,उन्हें क्यूँ नजर न आयें।
ललित
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7.10.15
रोला छंद
8
इक छोटा सा दीप,मेरे मन में जला दो।
दिल को लगे न पीर,दाता ऐसी कला दो।
भव सागर में नाथ, मुझको तरना सिखा दो।
हो जाऊँ भव-पार,वंदन करना सिखा दो।


ललित
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7.10.15
रोला छंद
9
काव्यसृजन परिवार,निरंतर उन्नति करता।
छंदों का दे ज्ञान,सृजन की क्षमता भरता।
करना मत अभिमान,सीख सबको ही देता।
सब को दे सम्मान,नहीं कुछ भी है लेता।

ललित
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7.10.15
रोला छंद
10
देखो ये भूचाल,देश में कैसा आया।
गौमाता भगवान,जमाना समझ न पाया।
नेता हैं बीमार,अनर्गल बातें करते।
करते झूठी रार,दिखावी घातें करते।
खाना वो गोमांस,जरूरी खूब बताते।
नरकों के भी वास,उन्हें तो नहीं डराते।


ललित
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11
7.10.15
रोला छंद
प्यारा ये संदेश,सुनायें चाँद-सितारे।
आजाओ अब देश,हमारे प्रीतम प्यारे।
बगिया का हर फूल,हमारी हँसी उड़ाता।
पाऊँ कभी न भूल,तुम्हारा मुख मुस्काता।

ललित
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12
8.10.15
रोला छंद
मुख से मीठे बोल,सदा ही बोलो राजा।
वाणी में रस घोल,न कोई रोके काजा।

सबसे करना प्यार,सभी से हिल-मिल रहना।
कड़वी तीखी बात,किसी से कभी न कहना।

अपने दिल की पीर,सदा दिल में ही रखना।
तेरे दुख का स्वाद,न  चाहे कोई चखना।

नहीं पराया दर्द,किसी ने अपना जाना।
नहीं बने हमदर्द,बड़ा बेदर्द जमाना।

अपनी गठरी खोल,पुण्य से झोली भरले।
इत-उत भी मत डोल,पाप मत सिर पे धरले।

जीवन है अनमोल,समय क्यूँ खोवे अपना।
रहना जग में मौन,नाम कान्हा का जपना।

ललित
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13
8.10.15.
रोला छंद

सपनों का संसार,बड़ा ही प्यारा होता।
जगने पर तो यार,सभी कुछ हारा होता।

सपने हैं निस्सार,न देखो कोई सपना।
दुख की अति को देख, रूठता है क्यों अपना।

करो सभी से प्रीत,मगर मत आशा रखना।
जीवन है संगीत,खुशी से गाते रहना।

झूठा सबका प्यार,प्रीत है सबकी झूठी।
कोई न देता साथ,नीयत सबकी अनूठी।

ललित
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14
8.10.15
रोला छंद
कुर्सी से है प्यार,जान से ज्यादा देखो।
नेता है हर बार,भूलता वादा देखो।
अफसर चूमे पैर,है नेता अन्नदाता।
सबसे सस्ता भोज,है सांसद रोज खाता।


ललित
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15
8.10.15
रोला छंद
किसकी है ये जीत,सोचो हार है किसकी।
नेता हरते चीर,भरे है जनता सिसकी।

किस माटी से भूल,नेता मैंने बनाया।
सोच रहा भगवान,कौनसी माँ ने जाया।

इस नेता ने आज,रावण को भी हराया।
लाऊँ कैसा राम,हरे जो इसकी माया।

ललित
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16
9.10.15
रोला छंद
श्री मद्भगवद् गीता जी
के अध्याय 2 के 22,23 वें
श्लोकों का सार
वस्त्र पुराने त्याग,नये ज्यों प्राणी लाता।
वैसेे छोड़ शरीर,नया जीवात्मा पाता।
आत्मा को दें काट, नहीं अब आयुध ऐसे।
जल वायु और अग्नि, मिटा कब सकते जैसे।

ललित
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17
9.10.15
रोला छंद
खुद पे रख विश्वास,मत कर और से आशा।
टूटे है जब आस,बढ़ जाती है निराशा।
जग ये मायाजाल,जगाता है मृगतृष्णा।
इससे तुझे निकाल,सके हैं केवल कृष्णा।

18
9.10.15
रोला छंद
कितने तेरे रूप,कितने नाम हैं दाता।
अलबेला हर भेष,निराला धाम कहाता।

तर जाये इंसान,शरण तेरी जो आये।
जिसे रुचैे जो देव,उसी से टेर लगाये।

तेरा हर इक रूप,हमें तो लगता प्यारा।
मधुर झलक से नाथ,मन भी झूमे हमारा।

सब में तू ही एक,मगर क्यूँ नजर न आये।
तेरी ये मुस्कान,भगत को शांति दिलाये।

ललित
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19
10.10.15
रोला छंद
जीवन का आगाज़,बड़ा ही सुंदर होवे।
क्यों भूले इंसान,अंत यह जीवन खोवे।
सारा जीवन नोट,कमाते बीता जाए।
हरि से कर ले नेह,समय ये रीता जाए।


ललित

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20
10.10.15
रोला छंद
मुख से निकली बात,नहीं वापस आ पाये।
गया समय जो बीत,नहीं फिर से वो आये।

तोल-मोल कर बात,हर दम सोच के बोलो।
चुभ जाये जो बात,उसी पे तुम मत डोलो।

समय बड़ी सरकार,समय से डरकर रहना।
यही समय दरकार,अहम से बचकर रहना।

इक छोटी सी बात,महाभारत में बदली।
कर बेटों पर नाज,हार कौरव ने चखली।

ललित
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21
10.10.15
रोला छंद

जीवन की ये नाव,चलेगी हिलते डुलते।
धूप मिले या छाँव,चलेगी घुलते मिलते।
कहीं किसी भी ठाँव,किसी को मीत न माने।
प्रभु ही खेवनहार,उन को मीत ही जाने।


ललित
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22
11.10.15
रोला छंद
जीवन के दिन चार,चला चल हौले हौले।
बोले जा दिन रात,निरंतर भोले भोले।
धन से मत कर प्यार,अंत सब छूटे प्यारे।
अपना कर उद्धार,नाम जप तू मतवारे।

ललित
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23
11.10.15
रोला छंद
कटु सत्य
रखी चिता पर लाश,जल रही धू धू काया।
यार कर रहे बात,भूल कर प्रभु की माया।
जल्दी मिले निजात,यही सब लोग मनाते।
अब तक तो व्यापार,चला धन खूब कमाते।

ललित
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24
रोला छंद
निधि जी को समर्पित
नहीं हुई पदचाप,न कोई पत्ता खड़का।
चली गई चुपचाप,दिलों को सबके  धड़का।
क्यों कोई आवाज,नहीं अब 'निधि' सुनती हो?
क्या कविताएँ आज,नहीं मन में बुनती हो?
कैसा है तू देव,भयानक काल कराला?
नाजुक थी जो देह,उसे पल में मथ डाला।
कैसा तेरा न्याय,रीत है कैसी दाता?
अनहोनी टल जाय,नहीं क्यूँ रीत बनाता?

ललित
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25
रोला छंद
मजदूर
बाँधा इक तिरपाल,बनाया एक घरौंदा।
जालिम थी सरकार,बुलडोजरों से रौंदा।
ऊपर है आकाश,नीचे तपती धरा है।
आँखों में है भूख,अगन से पेट भरा है।

ललित
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26
रोला छंद
मजदूर
मजदूरी से भाग्य,यहाँ किसका बनता है?
नेताओं की मौज,यहाँ पिसती जनता है।
आजाओ इक बार,गाँधी हाल तो देखो।
सूने हैं बाजार,आँधी मॉल की देखो।

ललित
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27
6.1.16
रोला छंद
सर्दी,गर्मी,बरसात
बेमौसम बरसात,सर्दी-गर्मी-बहारें।
कलियुग में बदजात,मौसम और नजारे।
सर्दी में भी धूप,अब तो खूब है तपती।
देखन को बरसात,दुनिया राम जपती।

ललित
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28
रोला छंद
सर्दी
ऋतुओं का सरताज,शीत का मौसम न्यारा।
सूट-बूट में खूब,सजे है दूल्हा प्यारा।।
शादी-पार्टी-भोज,ठण्ड में खूब लुभाते।
अनगिन लड्डू रोज,हजम सब ही कर जाते।।


ललित
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29
08.01.16
रोला छंद
विषय : जन्म,मृत्यु
जान लिया है आज,मैंने हरि को
जन्म लिया है आज,मैंने खुद में जरा सा।।
दे दी है परवाज,मैंने खुद को जरा सी।
पी ली शराब आज ,मैंने खुद ही जरा सी।।


ललित
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30
रोला छंद
विषय : जन्म,मृत्यु
खुद ही खुद में आज,हरि को मैंने निहारा।
खुद ही खुद में आज, पाया मैंने सहारा।।
नया जन्म है आज,अलौकिक मैंने पाया।
आत्मा अमर महान,देह है केवल साया।।

ललित
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31
रोला छंद
विषय : जन्म,मृत्यु
मानव जन्म अमोल,मिला है तुझको प्यारा।
लख चौरासी भोग,मिला ये अवसर न्यारा।।
कर ले सरल उपाय,किनारा कर माया से। व्यर्थ न जाने पायँ,कभी साँसें काया से।।

ललित
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32
विवाह
कैसी है ये रीत,बनी जो आज पहेली?
दुल्हन का हो ब्याह,रहें खुश सभी सहेली।
मात पिता हर्षायँ,बहू की सूरत देखें ।
नहीं जानते हाय,बदल देगी सब लेखे।

ललित
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33
रोला छंद
विवाह
तिलक हुआ है आज,नया मोबाइल लाया।
दूल्हा राजा दौड़, दुल्हन के पास आया।

खूब करेंगें बात,नये हम साजन-सजनी।
बाँटेंगें जजबात,भोर हो चाहे रजनी।

शादी के दिन चार,प्यार की पेंगें बढती।
एक साल के बाद,दुल्हन की भौंह चढती।

खटपट में ही हाय,होगये बच्चे पैदा।
अब तो सारी उमर,सिर वो पीटता रैंदा।

ललित
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34
09.01.16
रोला छंद
जीने का तरीका
पहले मन में तोल,बात फिर मुख से बोलो।
दर्द पटल मत खोल,जगत में हँसकर डोलो।

करती है गुमराह,सदा ये दुनिया खोटी।
चलो सत्य की राह,मिले इज्जत की रोटी।

ललित
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35
रोला छंद
दुनिया धोखेबाज,किसी का साथ न देती।
छोड़े ये मझधार,डुबा के खुश हो लेती।
खुद ही तरना सीख,मिलेंगें तुझको मोती।
क्यों तू माँगे भीख,खुशी अन्दर ही होती।

ललित
36

मोबाईल नेट
राजस्थानी भाषा
लाद्यो जी भर्तार,मोबाईल नीको सो।
नेट कराजो चार्ज,पड़ोसन भाभी को सो।
फेसबुकाँ भी रोज,नयी बाताँ बतलावे।
नया-नया सब लोग,दोस्त म्हारा बन जावे।

ललित

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37

रोला छंद
बेलन की दे चोट,नया मोबाइल तोड़ा।
बोली मुँह को मोड़,दुश्मन है ये निगोड़ा।
सारे दिन ही आप,इसी में सिर फोड़ो हो।
कविता लिखते एक,मात्रा साठ जोड़ो हो।

ललित
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38
रोला छंद
मोबाइल ने यार ,कहीं का हमें न छोड़ा।
बीबी भी अब रोज,लड़े है थोड़ा थोड़ा।

करते किस से बात,रात दिन तुम हो बोलो।
मोबाइल का लॉक,जरा फिर से तो खोलो।

कैसे खोलूँ लॉक,लगा जो मेरे मुख पर।
मोबाइल वो फैंक,आई मेरा सड़क पर।

अब पकड़े हैं कान,नहीं मोबाइल रखना।
करना हर इक फोन,एस टी डी से मखना।

ललित
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39
रोला छंद
जग की फैशन छोड़,प्रभू की फैशन वर लो।
तन की सज्जा छोड़,हृदय की सज्जा कर लो।।
इक दिन जग को छोड़,हरि के द्वार है जाना।
तन तो देगा छोड़,मन ही काम है आना।।
ललित
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40
रोला
नजर
जीना हो दुश्वार,नजर ही दे जब धोखा।
दिखता है संसार,नजर से ही सब चोखा।
कलम हुई लाचार,नजर ने मुँह जो फेरा।
लिखे शब्द दो चार,नजर का तोड़ा घेरा।
'ललित'
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41
रोला छंद
माँ
सहकर दर्द अपार,सुतों को जिसने जाया।
उसे सुतों से आज,मिला है दर्द सवाया।
फिर भी करती मात,सुतों से प्यार अपारा।कर न सके विश्वास,जगत का पालनहारा।
'ललित'

काव्य सृजन

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2-3-16
42
रोला छंद
नयी भोर का राज,समझ में जिसको आया।
लेता है हरि नाम,करे सब काम सवाया।
सुबहा हो या शाम,जगत को समझो माया।
खुद अपना ही पूत,हुआ है आज पराया।
ललित
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43
रोला छंद

भक्तों का विश्वास,न तोड़ो मुरली वाले।
आ जाओ इक बार,पुकारें गोपी-ग्वाले।।
मुरली की वो तान,सुना दो फिर से प्यारे।
तरस रहे हम श्याम,तुम्हारी राह निहारें।।
'ललित'

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रोला
44
हनुमत वचन
मैया का सिन्दूर ,राम को लगता प्यारा।
इसीलिए सिन्दूर,वदन पर मैंने धारा।।
जपता हूँ मैं राम,बजाता हूँ करतालें।
पुरुषोत्तम श्रीराम,नैया तारने वाले।
'ललित'

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45
रोला छंद
माँ
बचपन में थे मात,जिसे वो कहते सारे।
आज पड़ी बीमार,सुतों को यहाँ पुकारे।।
लेकिन किसके पास,समय औ' पैसा प्यारे।
बैठे माँ के पास,करें अब सभी इशारे।
चलो फैसला आज,करें हम मिलकर सारे।
किसकी है ये मात,कौन आँखों के तारे।।
'ललित'

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46
रोला छंद
बेटी
देखा ये संसार,देख ली बातअनोखी।
बेटे से है प्यार,लगे बेटी कब चोखी।
कुदरत का उपहार,सुता से बड़ा न देखा।
बेटी से बलवान,भाग्य की होती रेखा।
पाल पोस कर एक,दान कन्या का करता। है वह इंसाँ नेक,पुण्य से झोली भरता।
'ललित'

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47
रोला छंद
सम्पूर्ण गीत


जीवन है अनमोल,समय क्यूँ खोवे अपना।
करना इसका मान,नाम कान्हा का जपना।

अपनी गठरी खोल,पुण्य से झोली भरले।
इत-उत भी मत डोल,पाप मत सिर पे धरले।

इक दिन जग को छोड़,द्वार है हरि के  जाना।
तन जब जाए छोड़,काम मन को है आना।।

खुली आँख से देख,जिन्दगी है इक सपना।
करना इसका मान,नाम कान्हा का जपना।

अपने दिल की पीर,सदा दिल में ही रखना।
तेरे दुख का स्वाद,न  चाहे कोई चखना।

नहीं पराया दर्द,किसी ने अपना जाना।
नहीं बने हमदर्द,बड़ा बेदर्द जमाना।

पर दुख मे तो आज,न चाहे कोई खपना।
करना इसका मान,नाम कान्हा का जपना।

दुनिया धोखेबाज,किसी का साथ न देती।
छोड़े ये मझधार,डुबा के खुश हो लेती।

खुद ही तरना सीख,मिलेंगें तुझको मोती।
क्यों तू माँगे भीख,खुशी अन्दर ही होती

पाने को आनन्द,अभी है तुझको तपना।
करना इसका मान,नाम कान्हा का जपना।
'ललित'
समाप्त
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48
रोला छंद
कर ले सबसे प्यार
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करले सबसे प्यार,लगे है जीवन छोटा।
छूटेगा संसार, न कोई जाकर लौटा।।

होगा भव से पार, करे जो माँ की सेवा।
चरणों में रख शीश, मिलेगा तुमको मेवा।।

इक छोटा सा दीप,मेरे मन में जला दो।
दिल को लगे न पीर,दाता ऐसी कला दो।।

भव सागर में नाथ,मुझको तरना सिखा दो।
हो जाऊँ भव-पार,वंदन करना सिखा दो।।

मुख से मीठे बोल,सदा ही बोलो राजा।
वाणी में रस घोल,न कोई रोके काजा।।

सबसे करना प्यार,सभी से हिल-मिल रहना।
कड़वी तीखी बात,किसी से कभी न कहना।।

अपने दिल की पीर,सदा दिल में ही रखना।
तेरे दुख का स्वाद,न  चाहे कोई चखना।।

नहीं पराया दर्द,किसी ने अपना जाना।
नहीं बने हमदर्द,बड़ा बेदर्द जमाना।।

ललित किशोर 'ललित'

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5.12.16


रोला छंद रचनाएँ

रोला छंद
49

टूटा दिल का साज,हुई आवाज़ न कोई।
दिल रोया चुपचाप,नहीं पर आँखे रोई।

देगा कोई साथ,करें उम्मीदें कैसे।
आँखें दिल का साथ,नहीं जब देतीं ऐसे।

'ललित'

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रोला छंद
50
किस्मत की हर रेख,दे गयी उनको धोखा।
माया का संसार ,अजी है बड़ा अनोखा।

नोटों के भण्डार,देख साँसें चलती थी।
नहीं भरा जो टैक्स,अजी किसकी गलती थी।
ललित


51

नोटों के भण्डार,हुए हैं आज पराये।
नहीं भरा क्यों टैक्स, सोच अब आँसू आये।
ललित

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52

रोला छंद

बाँसुरिया की तान,राधिका को छलती है।
भूली जग को हाय,श्याम पीछे चलती है।
नटखट नटवरलाल,श्याम की प्रीत अनोखी।
सखियाँ देती ताल,लगे हैं उसको चोखी।
ललित

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रोला छंद
53

दिल क्यूँ थड़के हाय,समझ कब कोई पाया।
धक्-धक्-धक् का राज,पूछती है ये काया।

सुख-दुख के जज्बात,प्रेम-नफरत के धागे।
दिल है रखता सींच,सदा ही सबसे आगे।

ललित

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54

रोला छंद

सपनों का संसार,बड़ा ही प्यारा होता।
जगने पर तो हाय,सभी कुछ हारा होता।

इसीलिए हम रोज,खूब छक कर  हैं सोते।
सपनों में अरमान,सभी पूरे हैं होते।

'ललित'

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55

रोला रोला
एक प्यार ऐसा भी

कितनी सुंदर हाय,तुम्हारे लब की लाली।
होतीं तुम ही काश,हमारी प्यारी साली।
बीवी ने तो हाय,कभी भी घास न डाली।
साली तो सब लोग,कहें आथी घर वाली।

'ललित'

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रोला
56

पायलिया मुँह जोर,बजे छम-छम-छम ऐसे।
रख देगी हर राज,उजागर करके जैसे।
हरी चूड़ियाँ हाय,नहीं बस में हैं मेरे।
नटखट करें धमाल,रहें जब साजन घेरे।

'ललित'

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57

रोला
रोल हो कर वियोग होगया

दिल की सुन लो बात,सजन अब तो आ जाओ।
काबू में जजबात,करूँ कैसे बतलाओ।
मनवा है बेचैन,नींद आँखों से गायब।
प्रीतम तुमने हाय,किया है हाल अजायब।

'ललित'

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रोला
58

टूटा है विश्वास,करें किससे अब यारी।
तर्कश में से तीर,निकाले दुनिया सारी।
जीवन की हर आस,तोड़ती है दम अब तो।
हर अपना ही खास,छिटकता है गम अब तो।
'ललित'

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रोला

59
फूलों के जजबात,यहाँ कब समझा कोई?
काँटों के सह वार,सदा ही कलियाँ रोई।
कलियाँ बनके पुष्प,कहाँ अब खिल पाती हैं।
पानी की क्या बात,हवा कातिल पाती हैं।

ललित

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रोला
60

क्यों चुभते हैं शूल,सदा यूँ कोमल तन में ?
क्यों उठती है पीर,सदा ही निर्मल मन में?
क्यों दिखती गमगीन,हसीं रंगीन बहारें?
गरल मयी क्यों आज,सावन की ये फुहारें?

'ललित'

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रोला 
61

कैसे कैसे रूप,कंटकों ने हैं धारे?
रब ने सारे फूल,कंटकों पर हैं वारे।
चीख उठे हैं पुष्प,मगर काँटे हँसते हैं।
सुन फूलों की चीख,भ्रमर भी आ फँसते हैं।

'ललित'

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रोला
62

चुभें पैर में शूल,सजनिया भरती आहें।
बिछ जाते हैं फूल,सजन जब थामें बाहें।
साजन हों जब साथ,सजनिया खिल खिल जाए।
ज्यों पूनम की रात,चँदनिया खिल खिल जाए।
ललित

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रोला

63

सपनों में ही रात,चली आई वो ऐसे।
दिल का टूटा साज,जोड़ देगी वो जैसे।
टूटे दिल के तार,प्यार से चाहे छूना।
छूते ही पर घाव,दर्द करते हैं दूना।

'ललित'

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रोला
64

दिल अपनों के बीच,कहीं पर खो जाता है।
दिल सपनों के बीज,कहीं पर बो जाता है।
दिल प्रीतम पर दर्द,कहीं खुद है बरसाता।
दिल साजन के घाव,कहीं खुद है भरजाता।
ललित


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65

रोला
साँझ की दुलहन पर लिखना चाहा
घरवाली आ गयी

शर्मायी सी साँझ,सुनहरी चूनर डाले।
ले आई कुछ ख्वाब,स्वर्ग की परियों वाले।
परियों ने तो हाय,पीर ऐसी दे डाली।
सपना टूटा और,बगल में थी घर वाली।hi

'ललित'

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66

रोला छंद गीत

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जिस पर है विश्वास,वही दिल को तोड़ेगा।
जो है अपना खास,वही फिर मुख मोड़ेगा।
सहलाता है घाव,नहीं शीतल सावन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जो होता फनकार,यशस्वी वो हो जाता।
दुनिया भर का प्यार,उसे फन है दिलवाता।
दिल के गहरे घाव,नही भर पाता फन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

ईश्वर से विश्वास,कभी यूँ ही उठ जाता।
जिसकी टूटी आस,नहीं फिर वो उठ पाता।
भर देता है घाव,कभी जानी दुश्मन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जीवन भर तो साथ,नहीं तन भी दे पाता।
विषम रोग में साथ,नहीं धन भी दे पाता।
भरे उसी के घाव,करे जो यहाँ भजन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

'ललित'

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67

रोला

देश आज आजाद,नयी पीढ़ी को दे कर।
कर जाते हम वीर,अपनी जान निछावर।
रखना इसे सँभाल,बहुत आगे ले जाना।
दुश्मन के हर वार,से है इसको बचाना।

'ललित'


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जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...