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ज़िंदगी,दिल,दर्द

पियूष वर्ष
कुछ यूँ ही

जिन्दगी का इक अजब अन्दाज है।
हर फसाने में छिपा इक राज है।
जिन्दगी ये गुल खिलाती है कभी। 
राह में कंटक बिछाती है कभी।

दंश दे देती कभी इतने बुरे।
खवाब में सोचे न थे जितने बुरे।
और बन जाती कभी है बन्दगी।
बन्दगी से ही निखरती जिन्दगी।

कौन जिन्दा है बिना गम के यहाँ।
बस गमों से ही भरा है ये जहाँ।
ईश में विश्वास रखते जो सदा।
हो नहीं पाते कभी वो गमज़दाँ।

ललित

सार छंद

कौन कहाँ कब दे जाएगा,दर्दे दिल दर्दीला?
जान नहीं पाता है कोई,ये विधना की लीला।
गरज-गरज जो बादल नभ में,झूम-झूम छाते हैं।
बिन बरसे ही जाने क्यों वो,दूर चले जाते हैं?

ललित

मन के मीत कुकुभ मुक्तक


मुक्तक (कुकुभ आधारित)
26.2.17
1
काव्य सृजन

माँ शारद की किरपा से ये,मन भावों में बहता है।
छंदो की नक्काशी से कवि,सुंदर कविता कहता है।
गुरू ज्ञान की सरिता से ही,'काव्य सृजन' ये निखरा है।
गुरू बिना तो मानो सब कुछ,बिखरा बिखरा रहता है।

2
माँ

माँ तेरे दामन की खुशबू,मन को शीतल कर जाए।
तेरे ये दो नैना मुझ पर,स्नेह सुधा नित बरसाएँ।
पथ में जो काँटे बिखरे माँ,दूर उन्हें तुम कर देना।
तेरे आँचल की छाया माँ,मन में खुशियाँ भर जाए।

3
भोला बाबा

आज बिरज में कान्हा का इक,बाबा ने दर्शन पाया।
मोहन भी रोना भूला जब,भोला बाबा बन आया।
बाबा भूल गया बाबापन,जब मोहन की छवि देखी।
बाबा अपलक देख रहा था,अलख निरंजन हरि माया।

4
रास

रास रचाए रस बरसाए,रसिक रास की इक छोरी।
गोप गोपियों को नचवाए,बरसाने की इक गोरी।
मुरली से पायल बजवाए,वंशी का वादक न्यारा।
मट मट मट आँखें मटका जो,करता सबका दिल चोरी।

5

झूठी प्रीत
प्रेम जगत के सुंदर सुंदर,ख्वाब हमें क्यूँ दिखलाए?
बरखा-सावन के वो नगमे,क्यूँ हमको थे सिखलाए?
झूँठी प्रीत तुम्हारी निकली,झूँठे निकले सब वादे।
हाय हमें बहलाने को तुम,झूँठे खत क्यूँ लिखलाए?

6
रिश्ते-नाते

प्रेम-प्यार औ' रिश्ते-नातों,से अब मानव घबरावे।
मात-पिता,भाई-भावज की,कोई बात न अब भावे।
टूटे दिल के तार यहाँ पर,कोई जोड़ न अब पाता।
अब तो बीबी-बच्चों में ही,सब संसार नजर आवे।

7
प्राची

प्राची ने ओढ़ी है चुनरी,चमके ज्यों केसर क्यारी।
कलियों ने मुस्कान सजाली,अधरों पर निर्मल प्यारी।
तारों ने अम्बर को छोड़ा,डाल रहा दिनकर डेरा।
हर हर हर हर महादेव का,घोष कर रहे नर नारी।

8
माया

कैसी माया प्रभु ने रच दी,कैसा मन को भरमाया
मानव तन की कीमत प्राणी,जीवन भर न समझ पाया।
पैसा खूब कमाने में ही,बीता यह जीवन सारा।
खाली हाथ एक दिन जाना,कभी न मन को समझाया।

9
ममता

सतरंगी दुनिया के सातों,रंग बड़े सुंदर प्यारे।
ममता रूपी रंग जहाँ हो,फीके रंग वहाँ सारे।
जितना प्यार करे माँ सुत को,उतना रंग निखरता है।
लेकिन सुत तो बूढ़ी माँ का,निश्छल रंग न मन धारे।

10
गम

नारंगी कुछ सतरंगी कुछ,बेरंगी कुछ गम होते।
कड़ुवे कुछ तीखे-खट्टे कुछ,गम मीठे कुछ कम होते।
गम ही तो बहलाते दिल को,खुशियाँ कब खुश रख पातीं।
वो सब का दिल हैं बहलाते,जो सुख-दुख में सम होते।

11
काँटे

काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।

12
माँ
इस  सुन्दर मोती को माँ तू ,रो रो कर मत बहने दे।
अपने दिल के अरमानों को,आँख के अंदर रहने दे।
तेरी दुआ से इन नैनों में,खुशी के आँसू भर दूँगा।
तेरी इस पीड़ा को माँ बस,कुछ दिन मुझको सहने दे।
              
13
भोला बाबा

भोला-भाला औघड़ बाबा,करे बड़ा गड़बड़ झाला।
शीश शशि गल नील गरल धरे,औ' नागों की गलमाला।
राख-मसानी अंग-अंग में,सिर धारे पावन गंगा।
भांग धतूरा और हलाहल,खुश हो पीता मतवाला।

'ललित'
15
कुकुभ मुक्तक 16 ..14
पुष्प

पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,
काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,
मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,
काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,
दिल ही दिल में जलते हैं।

💖💖"

16
दिल

दिल छोटा औ' पीर बड़ी है,
नहीं किसी से कह पाऊँ।
दिल में उठती टीस बड़ी है,
नहीं जिसे मैं सह पाऊँ।
अपनों ने जो घाव दिए वो,
दिल में गहरे उतरे हैं।
घावों का अपनापन प्यारा,
कैसे उन बिन रह पाऊँ।

17
सपने

सपनों से सुख सपने जैसा,
हमको जैसे मिलता है।
अपनों से दुख अपना जैसा,
हमको वैसे मिलता है।
टूट गया इक सपना प्यारा,
अपना हमसे जब रूठा।
क्या बतलाएं अब वो अपना,
हम से कैसे मिलता है?
"
18

नज़रें

मात पिता की नज़रों से जो,
स्नेह सुतों को मिलता है।
उसी प्यार से जीवन बनता,
बच्चों का दिल खिलता है।
मात पिता फिर प्यार ढूँढते,
उन बच्चों की नज़रों में।
मगर प्यार का फल तो हरदम,
दूर पेड़ पर हिलता है।

ललित

कुकुभ मुक्तक
19
नजर

काम कभी ऐसा मत करना,नज़र झुकानी पड़ जाए।
एक बार नज़रों से गिरकर,कभी नहीं फिर उठ पाए।
नज़र रखो अपनी करनी पर,करनी ऐसी कर जाओ।
नाज करे ये दुनिया तुम पर,याद तुम्हारी जब आए।

ललित
20
हँसना

जब भी खुलकर हँसना चाहा,दिल ने अधरों को रोका।
जब भी हँसकर जीना चाहा,अपनों ने ही
तो टोका।
अब तो हमने सीख लिया है,दिल ही दिल में खुश रहना।
चाही दिल ने खुशियाँ तो फिर,मन्दिर में जाकर ढोका।

'ललित'

6.7.17
मुक्तक कुकुभ
किरपा

इतनी किरपा कर दे कान्हा,गीत मधुर मैं लिख पाऊँ।
छू कर तेरे अधरों को मैं,धुन मुरली की बन जाऊँ।
राधा जी के चरणों को जो,पायल है हर-पल छूती।
बन वो ही पायलिया निश-दिन,छम-छम-छम-छम-छम गाऊँ।

'ललित'
राधे राधे

छंद मनोरम रचना

छंद मनोरम
जिंदगी

जिंदगी ने जो सिखाया।
वक्त ने जो कुछ दिखाया।
हाथ कुछ आया नहीं वो।
मुट्ठियाँ खाली रहीं वो।

ये फसाना है पुराना।
जिंदगी है इक तराना।
कौन गा पाया सुरों में।
जिंदगी उलझी धुरों में।

दिल गमों के गीत गाये।
आज मौसम छू न पाये।
प्रीत को गम खा रहा है।
घोर तम अब छा रहा है।

देह भी मुख मोड़ती है।
ख्वाहिशें दम तोड़ती हैं।
प्यार का नकली खजाना।
क्या खुशी देगा न जाना।

'ललित'

छंद मुक्त मुक्तक 1


छद मुक्त मुक्तक
1
गम

बेवजह आसमां हम तकने लगे हैं
गम से गम को ही हम ढकने लगे हैं ।
रंग कितने दिखायेगी अब जिन्दगी
बिन बरखा इंद्रधनुष दिखने लगे हैं ।

प्यार है व्यापार बना मानते हम
गम से है संसार सना मानते हम ।
गमों की दुकान उठा ले जिन्दगी
गम के क्रेता न बनना चाहते हम।

न आसाँ है गमों को भूल जाना
न सम्भव है उनसे मुक्ति पाना
मगर सम्भव है केवल हर समय
गमों की टीस को सहलाते जाना।

रब ने तब तो जरूर सोचा होगा ,
जब गमों को जमीं पर भेजा होगा।
इंसाँ को हजार खुशियों के साथ,
गम का इक डोज तो देना होगा ।

मर जायेगा वरना वो मारे खुशी के,
हर तरफ सुनाई देंगें नारे खुशी के।
खुशी की इंसाँ कदर तब करेगा ,
आसमाँ गमों का सितारे खुशी के।

गम को रब ने किस जगह,
                  कैसे छिपा कर रख दिया।
जिस दर से चाही थी खुशियाँ,
                   गम वहीं से मिल गया।
ख्वाब में सोचा न था,
                    ऐसा कभी हो जायेगा।
जो था खुशियों का समन्दर,
                    गम उसी से मिल गया।

आदमी ने जो भी चाहा ,
                    जिन्दगी में पालिया।
एक झटके में ही लेकिन
                     छीन किस्मत ने लिया।
क्या कहे,किससे कहे,
                     कौन समझेगा व्यथा?
जिन्दगी ने किस कदर,
                   गम का समन्दर दे दिया?
'ललित'

2
बागबान

बागबान मौन है,फूल खिलखिला रहे।
कंटकों के बीच भी,देखो लहलहा रहे।
फूल दे रहे हैं आज,बागबाँ को गालियाँ।
कंटकों की सेज पर,बागबाँ को ला रहे।
            
 'ललित' 

3

प्यार

जाने क्यों खुदा ने संसार बनाया ,
और उस संसार में प्यार बनाया।
प्यार में धोखे की  गाँठ लगाकर,
इंसाँ के गले का पुष्पहार बनाया।
ललित

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