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पेज 10 से 14 मुक्तक 25.10.17


25 10.17 साझा संग्रह हेतु
पेज 10
मुक्तक 16:14 (लावणी)
*1
बीज प्यार का जिसने बोया,फल उसने है कब पाया?
बीज और अंकुर को सींचा,छलनी करके निज काया।
बीजों का सागर है जो फल,याद रखे क्यूँ माली को?
फल-फल फल-फल फल -फल फल-फल,फल की ही है सब माया।
*2
जैसा प्यारा कृष्ण कन्हाई,वैसी न्यारी है राधा।
राधा औ' मुरली से कान्हा,प्यार करे आधा आधा।
अधरामृत पीती मुरली तो,राधा नैन सुधा पीती।
राधा राधा नाम जपो तो,मिट जाएगी भव बाधा।
*3
राधा के नैनों में मोहन,ने ऐसा डेरा डाला।
राधा वन-वन खोजे उसको,पर न दिखे मुरलीवाला।
पलकें बन्द करे राधा तो,मोहन के दर्शन होते।
खुली आँख से कहाँ किसी को,दिखता है नटखट ग्वाला।
*4
टूट -टूट कर टुकड़े होते,सपने हरजाई हरदम।
रूठ-रूठ कर दूर खिसकते,दिखते जो अपने हमदम।
दिल के अरमानों की किश्ती,भी टूटे मझधारों में।
चोट उन्हीं से है मिल जाती,बनना हो जिनको मरहम।
*5
मिट्टी जल आकाश हवा औ',अगन देव मिलकर सारे।
मानव देह बना बैठे सब,खेल खेल में मतवारे।
रब ने उसमें जान फूँक कर,आत्मा डाली इक प्यारी।
आत्मा ऐसी रमी देह में,भूल गयी हरि के द्वारे।
'ललित'

************************************
पेज -11
मुक्तक 16:14(लावणी)
1
कुछ अपनों में कुछ सपनों में,जीवन के दिन बीत गए ।
कुछ पाने में कुछ खोने में,सुंदर सपने रीत गए।
जीवन का सपनों से रिश्ता,मन क्यूँ समझ नहीं पाया।
जिनके सपनों खोया मन,भूल वही मनमीत गए।
2
बात सदा दुनियावी लिखता,नूरानी कोई गल लिख।
महबूबा की पायल लिखता,माँ का सूना आँचल लिख।
जो लायी थी तुझे धरा पर,आँखों में कुछ ख्वाब लिए।
उसकी बुझती आँखों में भी,सच्चाई का काजल लिख।
3
दिल की हर धड़कन कुछ बोले,पागल मनवा है सुनता।
सुनकर धड़कन की सुर तालें,ख्वाब अनोखे है बुनता।
सुंदर सपनों की वो दुनिया,कब किस को सुख दे पायी।
लेकिन समझ दार मानव तो,दुख में से भी सुख चुनता।
4
दिल की बातें दिल में रखकर,दिल से ही मैं कहता हूँ।
शोर बाहरी क्या सुनना जब,दिल के ताने सहता हूँ।
खोजा करता हूँ उस दिल को,शायर जिसको दिल कहते।
दिल के द्वार बन्द कर यारों,दिल में ही मैं रहता हूँ।
5
बात कहूँ मैं अपने दिल की,औरों की मैं क्या जानूँ।
फूलों में जजबात नहीं हैं,भौंरों की मैं क्या जानूँ।
प्यार बिके अरमान बिकें हैं,आज यहाँ सब कुछ बिकता।
झरनों में आवाज नहीं है,धौरों की मैं क्या जानूँ।
'ललित'
************************************
पेज 12
मुक्तक लावणी
1
दिल की बगिया में महका इक,सुंदर प्यार भरा सपना।
अपनापन पाकर निखरा वो,लेकिन हो न सका अपना।
सपने में यूँ खोया ये दिल,भूल गया अपनी धड़कन।
नींद खुली तो सपना टूटा,भूला सपनों में खपना।
2
"जब भी खुलकर हँसना चाहा,दिल ने अधरों को रोका।
जब भी हँसकर जीना चाहा,अपनों ने ही
तो टोका।
अब तो हमने सीख लिया है,दिल ही दिल में खुश रहना।
चाही दिल ने खुशियाँ तो फिर,मन्दिर में जाकर ढोका।
3
कुछ फूलों की चंचल खुशबू,संग हवा के चल देती।
औ' कुछ की खुशबू माली के,नथुनों को संबल देती।
कुछ ऐसे निगुरे होते जो,खुशबू कभी नहीं देते।
और कई पुष्पों की खुशबू,बगिया को हलचल देती।
4
दिल की दीवारों में कितने,ख्वाब सुनहरे पलते हैं।
उन ख्वाबों में डूबे मानव,अद्भुत चालें चलते हैं।
सपने तो सपने हैं आखिर,टूटा करते हैं अक्सर।
टूटे सपने भी इंसाँ को,जीवन भर फिर
छलते हैं।
5
नैन मटक्का करे कन्हैया,राधा गोरी गोरी से।
छाँव कदम की बतियाता है,बरसाने की छोरी से।
गोप गोपियाँ आनन्दित हो,प्रेम-पुष्प वर्षा करते।
राधा रानी हाथ छुड़ाए,पकड़े कान्हा जोरी से।
'ललित'
***********************************
पेज -13
मुक्तक लावणी
1
फूलों ने हँसना छोड़ा है,कलियाँ भी मुरझाई हैं।
माली सींच रहा बगिया पर,पानी भी हरजाई है।
कली-कली पर भौंरे डोलें,प्रेम नहीं कुछ मन में है।
खिलने से पहले रस चूसा,अब केवल तनहाई है।
2
मात पिता के चरणों में ही,सुख का सागर बहता है।
वहीं डाल दो डेरा अपना,वहीं कन्हैया रहता है।
उन चरणों की सेवा करके,भार मुक्त हो जाओगे।
कान लगा कर सुनो जरा तुम,उनका दिल क्या कहता है?
3
कौन किसी का मीत यहाँ पर,कौन किसी का अपना है।
सबकी अपनी अपनी दुनिया,अपना अपना सपना है।
साथी पर जब पीर पडे तो,मोड सभी मुख जाते हैं।
गाँठ बाँध लो दुख आए तो,राम नाम ही जपना है।
4
छोड़ चले तारे अम्बर को,कान्हा की बंसी बोले।
गोप-गोपियाँ लें अँगड़ाई,मोहन की छवि मन डोले।
यमुना तीरे से बाँसुरिया,देती है ये संदेशा। 
उसकी बंसी बजे मधुर जो,बातों में मधु-रस घोले।
5
माँ-बेटी का होता जग में,सबसे सुंदर नाता है।
प्यार दिया जो तू ने मुझको,झोली में न समाता है।
अपनी इस बेटी का दामन,खुशियों से माँ भर देना।
चूमे जब तू माथा मेरा,रोम रोम खिल जाता है।
'ललित'
************************************

पेज 14
मुक्तक 14:12  व 14:14
1 
क्यूँ भ्रमर गुंजन करें क्यूँ,श्याम की मुरली बजे?
राधिका के नाम से क्यूँ,बाँसुरी के सुर सजें?
क्यूँ लताएं झूमती हैं,साँवरे के नाम से?
बाँसुरी की तान पर क्यूँ,गोपियाँ घर को तजें?
2  
हड्डियों का एक ढाँचा,आज बनकर रह गया।
जिन्दगी ने यूँ बजाया,साज बनकर रह गया।
स्वप्न सब आँसू बने अब,आँख से हैं बह रहे।
साथ छोड़ा चाम ने भी,खाज बनकर रह गया।
3  
जिन्दगी जी भी न पाया,हाय यौवन खो गया।
भीग तन मन भी न पाया,और सावन खो गया।
ख्वाब खुश्बू के दिखा कर,फूल सब ओझल हुए।
कर्म फल दे भी न पाए,हाय जीवन खो गया।
4 
ज़िन्दगी से आज हमको,चोट इक प्यारी मिली।
कौन सा मरहम लगाएँ,हर दवा खारी मिली।
ज़ख्म जो दिल में हुआ है,दीखता हरदम नहीं।
घाव पर मरहम लगाती,ख्वाहिशें सारी मिली।
5   
चलो इक बार फिर से हम,नयी दुनिया बसाते हैं।
नयी सुर-ताल सरगम पर,नया इक गीत गाते हैं।
गिले-शिकवे दिलों में जो,दिलों में ही दफन कर दें।
चलो पतवार बनकर हम,भँवर को भी हराते हैं।
'ललित'
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पेज 7 से 9 मुक्तक(कुकुभ आधारित)साझा संग्रह हेतु 25.10.17

25.10.17
साझा संग्रह हेतु
पेज - 7
मुक्तक(कुकुभ आधारित)
*1
माँ शारद की किरपा से ये,मन भावों में बहता है।
छंदो की नक्काशी से कवि,सुंदर कविता कहता है।
गुरू ज्ञान की सरिता से ही,'काव्य सृजन' ये निखरा है।
गुरू बिना तो मानो सब कुछ,बिखरा बिखरा रहता है।
*2
आज बिरज में कान्हा का इक,बाबा ने दर्शन पाया।
मोहन भी रोना भूला जब,भोला बाबा बन आया।
बाबा भूल गया बाबापन,जब मोहन की छवि देखी।
बाबा अपलक देख रहा था,अलख निरंजन हरि माया।
*3
रास रचाए रस बरसाए,रसिक रास की इक छोरी।
गोप गोपियों को नचवाए,बरसाने की इक गोरी।
मुरली से पायल बजवाए,वंशी का वादक न्यारा।
मट मट मट आँखें मटका जो,करता सबका दिल चोरी।
*4
प्रेम जगत के सुंदर सुंदर,ख्वाब हमें क्यूँ दिखलाए?
बरखा-सावन के वो नगमे,क्यूँ हमको थे सिखलाए?
झूँठी प्रीत तुम्हारी निकली,झूँठे निकले सब वादे।
हाय हमें बहलाने को तुम,झूँठे खत क्यूँ लिखलाए?
*5
प्रेम-प्यार औ' रिश्ते-नातों,से अब मानव घबरावे।
मात-पिता,भाई-भावज की,कोई बात न अब भावे।
टूटे दिल के तार यहाँ पर,कोई जोड़ न अब पाता।
अब तो बीबी-बच्चों में ही,सब संसार नजर आवे।
'ललित'
*************************************
पेज - 8
मुक्तक(कुकुभ आधारित)
*1
प्राची ने ओढ़ी है चुनरी,चमके ज्यों केसर क्यारी।
कलियों ने मुस्कान सजाली,अधरों पर निर्मल प्यारी।
तारों ने अम्बर को छोड़ा,डाल रहा दिनकर डेरा।
हर हर हर हर महादेव का,घोष कर रहे नर नारी।
*2
कैसी माया प्रभु ने रच दी,कैसा मन को भरमाया
मानव तन की कीमत प्राणी,जीवन भर न समझ पाया।
पैसा खूब कमाने में ही,बीता यह जीवन सारा।
खाली हाथ एक दिन जाना,कभी न मन को समझाया।
*3
सतरंगी दुनिया के सातों,रंग बड़े सुंदर प्यारे।
ममता रूपी रंग जहाँ हो,फीके रंग वहाँ सारे।
जितना प्यार करे माँ सुत को,उतना रंग निखरता है।
लेकिन सुत तो बूढ़ी माँ का,निश्छल रंग न मन धारे।
*4
नारंगी कुछ सतरंगी कुछ,बेरंगी कुछ गम होते।
कड़ुवे कुछ तीखे-खट्टे कुछ,गम मीठे कुछ कम होते।
गम ही तो बहलाते दिल को,खुशियाँ कब खुश रख पातीं।
वो सब का दिल हैं बहलाते,जो सुख-दुख में सम होते।
*5
काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।
'ललित'
************************************
पेज - 9
मुक्तक(कुकुभ आधारित)
*1
इस सुन्दर मोती को माँ तू ,रो रो कर मत बहने दे।
अपने दिल के अरमानों को,आँख के अंदर रहने दे।
तेरी दुआ से इन नैनों में,खुशी के आँसू भर दूँगा।
तेरी इस पीड़ा को माँ बस,कुछ दिन मुझको सहने दे।
*2
भोला-भाला औघड़ बाबा,करे बड़ा गड़बड़ झाला।
शीश शशि गल नील गरल धरे,औ' नागों की गलमाला।
राख-मसानी अंग-अंग में,सिर धारे पावन गंगा।
भांग धतूरा और हलाहल,खुश हो पीता मतवाला।
*3
पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,दिल ही दिल में जलते हैं।
*4
दिल छोटा औ' पीर बड़ी है,नहीं किसी से कह पाऊँ।
दिल में उठती टीस बड़ी है,नहीं जिसे मैं सह पाऊँ।
अपनों ने जो घाव दिए वो,दिल में गहरे उतरे हैं।
घावों का अपनापन प्यारा,कैसे उन बिन रह पाऊँ।
*5
सपनों से सुख सपने जैसा,हमको जैसे मिलता है।
अपनों से दुख अपना जैसा,हमको वैसे मिलता है।
टूट गया इक सपना प्यारा,अपना हमसे जब रूठा।
क्या बतलाएं अब वो अपना,हम से कैसे मिलता है?
*6
रास रचाए रस बरसाए,नंदन-वन में इक ग्वाला।
गोरी-गोरी व्रजवासिन को,नाच नचाए इक काला।
मधुर-मधुर अधरों से वंशी,लगा झूमता मतवाला।
आत्मानंदी प्रीत जगाए,गैयन का इक रखवाला।
'ललित'

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पेज 1से 3 रुबाई मुक्तक साझा संग्रह हेतु 25.10.17

साझा संग्रह हेतु 25.10.17

पेज - 1
रुबाई मुक्तक

*1
चाँद छुपा बदली के पीछे,धरती को यूँ तड़पाए।
कान्हा जैसे राधा को छू,छेड़छाड़ कर भड़काए।
राधा-कान्हा की मस्ती को,सखियाँ छुप-छुप कर देखें।
साँवल श्याम किशोरी राधा,चाँद न आगे बढ़ पाए।
*2
पत्थर की छत-दीवारों से,मकान न्यारा बन जाए।
रहते हैं जब सभी प्रेम से,तब सुंदर घर बन पाए।
प्यारा सबसे वो घर जिसमें,प्यारी सी इक मुनिया हो।
आँगन में तुलसी-वन हो जो,याद प्रभू की दिलवाए।
*3
माँ तेरे दामन की खुशबू,मन को शीतल कर जाए।
तेरे ये दो नैना मुझ पर,स्नेह सुधा नित बरसाएँ।
पथ में जो काँटे बिखरे माँ,दूर उन्हें तुम कर देना।
तेरे आँचल की छाया माँ,मन में खुशियाँ भर जाए।
*4
तेरा जलवा जब से देखा,जादू सा मुझ पर छाया।
तेरी सूरत इतनी प्यारी,दिल पर काबू कब पाया।
नजरों के आगे रहती है,हरदम ही मूरत तेरी।
तेरा ही मुख देखा जब भी,शीशे के सम्मुख आया।
*5
राही मैं अनजान डगर का,चलना है फितरत मेरी।
मंजिल दूर सफर मुश्किल है,साथ चले किस्मत मेरी।
हार जीत से डरना मैंने, जीवन में है कब सीखा।
मेरा प्यार जहाँ मिल जाए,वो होगी जन्नत मेरी।
'ललित'
***********************************

पेज -- 2
रुबाई मुक्तक
1
वन-उपवन सावन मनभावन,फिर भी लगता मन सूना।
साजन के बिन आँगन सूना,शोर करे पायल दूना।
विरहन की अँखियन मेंं आँसू,बदरा आँसू बरसाएं।
स्वप्न मिलन के दिखला कर वो,चला गया साजन पूना।
2
फूल और काँटों का रिश्ता,मानव नहीं समझ पाये।
पुष्पों की रक्षा करते ये,काँटे ही हरदम आये।
कंटक से फूलों की शोभा,आजीवन हमदम काँटे।
काँटों में जो फूल खिले वो,कहीं न फिर ठोकर खाये।
3
फूल महकते जब बगिया में,झूमे खुश होकर माली।
गजरे में कुछ गुँथ जाएंगें,पहने कोई मतवाली।
कुछ माला में बँध महकेंगें,मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारे।
कुछ मरने वाले की अर्थी,की हर लेंगे बदहाली।
4
रात सखी मेरे सपने में,श्यामल वो मोहन आया।
दिनकर से तपती धरती कोे, दे दी हो ज्यों घन छाया।
मुरली की आलौकिक धुन पर,झूम रहा था मतवाला।
वंशी की वो मधुर तान दिल,भूल नहीं अब तक पाया।
5
मैया तेरा वो नटखटिया,करता है माखन चोरी।
नैन मटक्का करता है जब,दिखे कहीं सुंदर छोरी।
जादू की बाँसुरिया से वो,तान मधुर मनहर छेड़े।
जिसको सुन छम-छम नाचे वृषभानु सुता चंचल गोरी।
'ललित'
************************************
पेज -- 3
रुबाई मुक्तक

1
प्रेम भरा हो दिल में जितना,उतना ही वो छलकेगा।
नैन झरोखे से वो शीतल,मोती बनकर ढलकेगा।
जिसके सीने में नाजुक सा,प्यार भरा इक दिल होगा।
उसकी उठती गिरती पलकों,में हरदम वो झलकेगा।
2
सपनों में रँग भरने वाले,थोड़ा सा तू रुक जा रे।
खूब सुनहरे रँग सपनों में,मत भरना तू सुन प्यारे।
सपनों का जब उड़ता है रँग,वो पल बड़ा दुखद होता।
बदरँग सपनों में रँग भरना,सीख जरा तू मतवारे।
3
इस दिल पर जो जख्म लगे मैं,नहीं चाहता दिखलाना।
दिल को घावों की भाषा मैं,नहीं चाहता सिखलाना।
जख्म कुरेदें जितने उतना,दर्द और है बढ़ जाता।
दर्दे दिल की दवा किसी को,कौन चाहता पिलवाना?
4
कुछ कच्चे कुछ पक्के हैं घट,और निराले कुछ बाकी।
कुछ पेंदे के कुछ बेपेंदे,उड़ने वाले कुछ बाकी।
चम-चम-चम-चम चमकें कुछ घट,कुछ को दूजे चमकाते।
कुछ गोरे कुछ काले हैं घट,लालम-लाले कुछ बाकी।
5
कुछ को किस्मत ने चमकाया,कुछ चमके ठोकर खाके।
कुछ ने किस्मत को चमकाया,करके साँझ-सुबह फाके।
कुछ को लूट लिया किस्मत ने,देकर केवल तनहाई।
कुछ धोखा देते किस्मत को,हर मुश्किल में मुसकाके।
'ललित'
**********************************

3 ताटंक छंद साझा काव्य संग्रह

ताटंक छंद
1    कन्या भ्रूण हत्या
माँ तू नारी होकर इतनी,निष्ठुर क्यूँ बन जाती है।
कन्या की आहट सुन तेरी,चिन्ता क्यूँ बढ़ जाती है।
तेरी हिम्मत से ही माता,युग परिवर्तन आएगा।
तू आवाज उठाएगी तो,कोई दबा नहीं पाएगा।
माँ मै तुझ सी प्यारी सूरत,लेकर जग में आऊँगी।
किलकारी से घर भर दूँगी,पैंजनियाँ छनकाऊँगी।
तेरी गोद हरी कर दूँगी,साँस मुझे भी लेने दे।
जीवन रूपी रथ की ऐ माँ,रास मुझे भी लेने दे।
जब तू मुझको छूती है माँ,अपने मन की आँखों से।
मन करता है उड़ जाऊँ मैं,तेरे मन की पाँखों से।
माँ इतना ही वादा कर ले,मुझको जग में लाएगी।
किसी दुष्ट की बातों में आ,मुझको नहीं गिराएगी।

2   गर्भवती माँ की संवेदना

मेरे अन्दर पनप रही जो,एक कली अरमानों की।
नजर न लगने दूँगी उसको,इन बेदर्द सयानों की।
बेटी मेरी माँ बनने की,आस तभी पूरी होगी।
गोदी में खेलेगी जब तू,नहीं तनिक दूरी होगी।
लड़ जाऊँगी मैं दुनिया से,बेटी तुझे बचाने को।
सीखूँगी सब दाँव पेंच मैं,ताण्डव नाच नचाने को।
मेरे आँगन में किलकारी,भरने तू ही आएगी।
तेरी जान बचाने में ये,जान भले ही जाएगी।
'ललित'

2 ताटंक छंद साझा काव्य संग्रह

ताटंक छंद
1
श्याम तुम्हारे नयनों का ये,कजरा मुझे सताता है।
कान्हा की आँखों में रहता,कहकर ये इतराता है।
आज तुम्हीं सच कहना कान्हा,देखो झूँठ नहीं बोलो।
गर मैं हूँ कजरे से प्यारी,अपने नयन अभी धोलो।
राधा तू नयनों में बसती,दिल ये तेरा दीवाना।
तेरे सिवा किसी को मैंने,अपना कभी नहीं माना।
चाहे तो ये दिल मैं रख दूँ ,कदमों में तेरे राधा।
जिससे होता पूरा होता,प्यार नहीं होता आधा।
2
सबसे सुंदर है इस जग में,राधा-कान्हा की जोड़ी।
जिसने हृदय बसा ली ये छवि,प्रीत वही समझा थोड़ी।
चौंसठ कला निपुण हैं कान्हा,शक्ति स्वरूपा हैं राधा।
राधे-राधे नाम जपो तो,मिट जाएगी भव बाधा।
3
पत्थर पत्थर में भी देखो,कितना अन्तर होता है।
इक मूरत बन पूजा जाता,इक नाली में रोता है।
इक पर बैठी शोख हसीना,इक को लहरें ठोकें हैं।
इस किस्मत का खेल निराला,कर्मों ने सब झोंके हैं।
कर्म बने सत्कर्म तुम्हारा,हर पल ऐसे जी जाओ।
दीन दुखी की सेवा कर लो,उनके सब गम पी जाओ।
गौमाता की रक्षा कर लो,गौसेवा में मेवा है।
अपनी खातिर जिये मरे तो,कोई नाम न लेवा है।
'ललित'

8 लला और माया ,साझा काव्य संग्रह

भुजंग प्रयात छंद

वृद्ध माता पिता की व्यथा

'लला और माया'

कई मन्दिरों पे मनौती भराई,चढ़ा भेंट पूजा कथा भी कराई।
हुई आस पूरी न फूले समाये,भरी गोद सूनी लला नेक पाये।
दिवाली मनाई जगारा जगाया,लला प्यार से वो गले से लगाया।
बड़े चाव से पालने में झुलाया,सुना लोरियाँ लाल को था सुलाया।
कहे माँ,लला तू हमारा कन्हैया,गले से लगा चूमती ले बलैया।
तु ही प्यार मेरा तु संसार मेरा,तु ही साँझ मेरी तु मेरा सवेरा।
बला पे चली आ रही हों बलायें,दुआ ये करूँ मैं तुझे छू न पायें।
पिता भी कहे तू दुलारा हमारा,जरा भी कमी हो नहीं है गवारा।
उचारे ममा तो ,पिता फूल जाता,बजें पायलें जो, ज़रा लोच खाता।
नहीं दूध पीता, हुआ क्या लला को,ममा सोचती है ,भगाऊँ बला को।
जगे रात में वो ,लला को सुलाती,पुकारे लला जो, वहीं दौड़ आती।
कभी दूर जाता,कभी पास आता,सुना तोतले बोल माँ को हँसाता।
करें प्यार दादी कहानी सुनायें,करें लाड़ दादा मनौती मनायें।
ममा ढोक देना नमाना सिखायें,पपा खूब सारे खिलौने दिखायें।।
चला नर्सरी में नई ड्रेस लाये,पला नाज से है खुशी रोज पाये।
कभी ज़िन्दगी में कमी आ न पाई,खिलाया पिलाया पढ़ाई कराई।।
लला को पढ़ाया उधारी  चढ़ाके,ममा और पापा करें रोज फाके।

यही आस बेटा पढ़ेगा लिखेगा,लला का बड़ा नाम ऊँचा दिखेगा।
बड़ा नेक बेटा दिलासा दिलाता,सदा मान देता प्रभू को धियाता।
ममा और पापा ,ददा और दादी,सभी के दिलों में उमंगें जगादी।
पढ़ूँगा बनूँगा बड़ा आदमी मैं,करूँ मात सेवा सदा लाजमी मैं।
लला फोन मोबाइलों से घुमाता,नहीं बात कोई ममा से छुपाता।
सभी खास बातें हमेशा बताता,ममा और पापा विधाता जताता।
कभी भी ममा को न ये भास होता,लला काश मेरा सदा पास होता।
बड़ी ही सुहानी कहानी यहाँ से,ममा की जुबानी सुनो जी वहाँ से।
लला आज सी एस सी ए हुआ है,सुनो राम जी की बड़ी ये दुआ है।
लला के पपा आप बाजार जाओ,मिठाई फलों का चढावा चढ़ाओ।
मिठाई बँटाओ गली औ' बजारों,मिलेंगी दुआएँ लला को हजारों।
ददा ये कहें आज संसार सारा,कहेगा लला खास पोता हमारा।
लला झूमता खूब देखो नजारा,ममा औ' पपा का बनूँगा सहारा।
रही ख्वाहिशें आपकी जो अधूरी,करूँगा सभी ब्याज के साथ पूरी।
पपा की खुशी का नहीं है ठिकाना,सुधारा बुढ़ापा सही आज जाना।
लला की बड़ी काम की होशियारी,मिली नौकरी साथ पैकेज भारी।
चुकाने लगा वो पपा के उधारे,कमोबेश हालात यूँ ही सुधारे।
सवा साल बीता दिवाली मनाते,नया दौर आया बहाने बनाते।
लला ने फसाना पुराना सुनाया,पढ़ी साथ थी जो परी नाम माया।
वही ज़िन्दगी है वही प्यार मेरा,उसी से शुरू होय संसार मेरा।
किया है उसी से ममा एक वादा,जिऊँगा उसी संग है ये इरादा।
ममा और पापा हुए यूँ पराये,लला की खुशी देख फेरे कराये।
हनीमून से लौट के आज आये,ममा से निगाहें रहे वो चुराये।
निगाहें झुकाये लला बोल जाता,ममा आपका ये घराना न भाता।
बहू भी न चाहे यहाँ और आना,हमें आज ही हैदराबाद जाना।
ममा और पापा नहीं रोक पाये,रहे सोचते जो कहा भी न जाये।
रवाना हुए यों लला और माया,सभी ख्वाब तोड़े लला ने हराया।
मनौती मनाई ममा ने जहाँ थी,उसी देवरे आज बैठी वहाँ थी।
मुझे देव क्यों पूत ऐसा दिया था,भुला आज पापा ममा को गया था।
लला आज ऐसा दिखाता समा है,जने क्यों सुतों को जहाँ में ममा है।
बताओ प्रभू ये ममा और पापा,गुजारें कहाँ और कैसे बुढ़ापा।
मिला के तभी देवता से निगाहें,पुकारे ममा आज वीरान राहें।
लला ने भरी आज संताप से मैं,करूँ कामना ये प्रभू आप से मैं।
लला को प्रभू नेक राहें दिखाना,ममा को न भूले कभी ये सिखाना।
लला से बड़ी आस दाता लगाई,बड़ी भूल की आस क्यों थी जगाई।
प्रभू ने सुनी ये ममा की कहानी,लला भूल पाया न यादें पुरानी।
लला दौड़ माता पिता पास आया,ददा ने गले से लला को लगाया।
ममा ने कहा यूँ तुझे देख पाला,गले से उतारा न कोई निवाला।
पपा ने उधारा लिया तू पढ़ाया,बड़ी मुश्किलों से उधारा चुकाया।
हमें आज तेरा सहारा मिलेगा,यही सोचते थे सवेरा दिखेगा।
करी आपने जो नहीं वो नवाई,कराते सभी हैं सुतों को पढ़ाई।
ममा आपके एहसाँ मानता हूँ,पढ़ाया लिखाया मुझे जानता हूँ।
यही चाहता हूँ बनूँ मैं सहारा,हुआ हूँ ममा मैं बड़ा बेसहारा।
न भूलो कहाँ आज जाये जमाना,बड़ी मुश्किलों से भरा है कमाना।
मुझे कार ले बंगला भी बनाना,बड़ा काम भारी पपा ने न जाना।
ममा आज जो भी बड़ी कार लेता,जमाना उसे ही बड़ा मान देता।
ममा सोचती है लला और माया,इन्होंने जमाना नया है दिखाया।
पपा का न पूछो हुआ हाल था जो,पराया हुआ वो सगा लाल था जो।
जिसे पालने में खपाई जवानी,उसी लाल ने आज दे दी रवानी।
ममा रो रही आज देती दुहाई,रहे मौज आनंद में तू सदाई।
कभी जिन्दगी में न देखे गमी तू,बना आज माया सखा है डमी तू।
पपा ने लला की ममा को पुकारा,लुटा आज संसार सारा हमारा।
लला ये न होता लली काश होती,अजी आस यों तो लगाई न होती।
लली प्यार दोनों जहाँ का जताती,हमारी कभी बात खाली न जाती।
किसी को न देना प्रभू लाल ऐसा,करे जो बुरा हाल कंगाल जैसा।

                 समाप्त

'ललित'

6 मदिरा सवैया छंद साझा काव्य संग्रह

मदिरा सवैया छंद
1
श्रृंगार रस

चाल चले छमियाँ गज सी तन यौवन से गदराय रहा।
नैन मिलें चहके चिहुँके कर में गजरा इतराय रहा।
फूल झड़ें जब वो हँसती मन बागन को बिसराय रहा।
झूल रही जब बागन में हर फूल हँसी बिखराय रहा।
2
श्रृंगार रस

चाँद निहार नहीं थकता जब मादक चाल
चले गजनी।
साजन संग मिले सजनी अरु प्रीत समेट पगे रजनी।
पायल संग बजे कँगना जब साजन संग जगे सजनी।
पागल प्रीत नहीं छुपनी जब पैरन पायल हो वजनी।
3
शोभित

शोभित हैं तरु पल्लव सुंदर शोभित वो यमुना तट है।
शोभित गोपिन के मुख सुंदर शोभित मोहन की लट है।
शोभित रास मनोहर सुंदर शोभित वो ब्रज का नट है।
शोभित देव निहारत हैं छवि शोभित वो ब्रज का वट है।
4

मोहन
श्यामल कोमल निर्मल मोहन माखन का घट फोड़ गया।
ग्वाल सखा सब चाटत माखन साँवल बाहर दौड़ गया।
खीझ रही अब ढूँढ़त गोपिन चोर कहाँ मुख मोड़ गया।
ग्वाल कहें सब साँवल मोहन माखन देकर छोड़ गया।

वानर,बालक,गोप सखा,सब संग लला बतराय रहा।
खोजत है हर रोज नया घर गोपिन को चकराय रहा।
फोड़ दिया घट मोहन ने झट माखन खा इतराय रहा।
बाल सखा सब माँगत माखन माधव है बिखराय रहा।
'ललित'

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...