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नवम्बर 2019 की रचनाएँ

नवम्बर 2019


विधाता छंद
मुस्कान पत्नी की

बड़ी शीतल बड़ी प्यारी,बड़ी शालीन मुस्कानें।

हँसे पत्नी तभी लगता,कि लेगी जान ही जाने।

जरा सा मुस्कुराएँ हम,चलें बाज़ार कहती वो।

दिला बस एक साड़ी दो,इसी को प्यार कहती वो।

ललित



विधाता छंद
मुस्कान रहित

मिली है अफसरी उनको,अजी क्या बात है उनकी?
नहीं वो मुस्कुरा सकते ,बड़ी औकात है उनकी।
नहीं वो हँस सकें ढँग से,सदा गर्दन अकड़ती है।
न जाने अफसरी की बू  ,उन्हीं को क्यूँ जकड़ती है?

ललित




विधाता छंद
सरल मुस्कान

सरल मुस्कान पोती की,बढाए शान दादू की।
मगर दादू यही सोचे,छड़ी मिल जाय जादू की।
बचाए पोतियों को जो,दरिंदों की निगाहों से।
नहीं सरकार से आशा,हटाए शूल राहों से।

ललित

 
विधाता छंद
मधुर मुस्कान
मधुर मुस्कान तो केवल,दिखे उस श्याम के मुख पर।

सदा जो मुस्कुराता है,दुखी होता नहीं दुख पर।

उसी मुस्कान की वो राधिका रानी दिवानी थी।

समाई बाँसुरी में प्रीत की ये ही कहानी थी।

ललित



विधाता छंद
सहज मुस्कान

सहज मुस्कान अधरों पर,दिखे मन-भावनी न्यारी ।
सुने जब झुन-झुने की धुन,ममा की लाडली प्यारी। 
कभी हँस दे इशारों पर,बजा 'जयकृष्ण' पर ताली।
कभी गुम-सुम दिखाई दे,
हिलाए हाथ वो खाली।

ललित

30.11.19

मुक्तक

आदमी की मुस्कुराहट खो गई जाने कहां?
हर कली की चुलबुलाहट खो गई जाने कहाँ?
हाथ मोबाइल लिए हर आदमी खुद में रमा।
वो हँसी वो खिलखिलाहट खो गई जाने कहाँ?

ललित

कुटिल मुस्कान

सरल मुस्कान मुखड़े पर,दिखे जब वोट माँगे वो।
बने मंत्री,तभी मुख पर,कुटिल मुस्कान टाँगे वो।
नहीं फिर हाथ जोड़े वो,न वादे याद ही करता।
नहीं जनता दिखे उसको,उड़ानें खूब है भरता।

ललित

29.11.19
नकली मुस्कुराहट

बाग में कुछ लोग मिलकर,नित लगाते हैं ठहाके।
गम भुलाने को सभी वो,साथ मिलकर चहचहाते।
मुस्कुराहट ओढ़ नकली,बाग में फिर हैं टहलते।
इस बहाने से सभी के, गम-भरे दिल हैं बहलते।

ललित


विधाता छंद

कभी वो मुस्कुराते हैं,कभी नज़रें झुका लेते।
कभी तिरछी निगाहों को,गगन में वो टिका देते।
न हम कुछ भी समझ पाते,हँसे हैं या फँसे हैं वो।
कि हमको ही फँसाकर बेतहाशा यूँ हँसे हैं वो।

ललित


28.11.19
विधाता छंद

तुम्हारी मुस्कुराने की,अदाएँ ही निराली हैं।
नज़र के तीर चलने दो,निगाहें क्यूँ चुराली हैं।
धरा को चूमती देखो,धवल ये चाँदनी प्यारी।
तुम्हारी मुस्कुराहट पर,हसीं ये चाँदनी वारी।

ललित


गीतिका छंद

मुस्कुराने के लिए बस इक बहाना चाहिए।
एक सुंदर सा मुबाइल साथ लाना चाहिए।
सैलफी अपनी जरा सा मुस्कुरा कर लीजिए।
और अपने मित्रगण को भेज जल्दी दीजिए।

ललित


27.11.19
मुस्कान
मुक्तक 16:14

कुछ मुस्कानें अपने भीतर,दर्द समेटे हैं होतीं।
अधर-मधुर मुस्कान बिखेरें,पलकें छुप-छुप कर रोतीं।
बुझी-बुझी सी आँखें दिल का,दर्द बयाँ हैं कर देती।
चिंता के गहरे सागर से,अँखियाँ ले आतीं मोती।

ललित



मुक्तक

मुस्कुराहट के यहाँ दिखते कईआयाम हैं।

मदभरी मुस्कान में मय के छलकते जाम हैं।

कौन सी मुस्कान अधरों पर सजानी है कहाँ?

जानता ये बात जो उसके सँवरते काम हैं।

ललित




26.11.19
गीतिका छंद

मुस्कुराते हैं कई जन,इक अलग अंदाज से।
भींच लेते हैं अधर वो,दीखते नाराज से।
अति कुटिल मुस्कान से कुछ,पातकी नर यों हँसें।
सोचने लगते सभी हम,क्यों यहाँ पर आ फँसे?

ललित


26.12.19
महाश्रृंगार छंद
श्रृंगार प्रयास

नैन शर्बतिया गोरे गाल,मटकती मटकी वाली नार।
चली पनघट से भरकर नीर,साथ में कमसिन सखियाँ चार।
सभी इठलाकर करती बात,सुनातीं-सुनतीं 
हँस-हँस राज।
राज की बातें ऐसी खास,जिन्हें सुन शर्माए खुद लाज।


'ललित'


26.11.19
गीतिका छंद

मुस्कुराने का खजाना खोजना मुश्किल हुआ।
क्यों कहाँ कब मुस्कुराएँ सोचना मुश्किल हुआ?

मुस्कुराने की अदाएँ इस कदर महँगी हुई।
आदमी में मुस्कुराहट पोसना मुश्किल हुआ।

ललित

25.11.19
महाश्रृंगार छंद

चला आ कान्हा यमुना-तीर,राह देखें सब गोपी-ग्वाल।
सुना है नन्हा सा गोपाल,बजाए वंशी बड़ी कमाल।
राधिका भी सखियों के साथ,करेगी रास आज की रात।
चाँद का भी निखरा है रूप,चाँदनी भिगो रही है गात।

ललित


24.11.19
छंदमुक्त 
चिंता

मन कहता है
चिंता मत कर चिंतन कर।
मगर दिल...
वह तो चिंतन को 
चिंता में बदल देता है।
और दिमाग...
मत पूछिए
दिन भर में चिंता के
हजारों शूल पैदा कर देता है
जो चुभ-चुभ कर 
प्राणों को घायल करते रहते हैं।
सोचिए जरा...
ये दिल,दिमाग और मन 
क्या हैं?
कहाँ रहते हैं?
इंसान के वश में क्यों नहीं आते?
प्राणों को क्यों हैं तड़पाते?
और चिंता करने से...
क्या झंझावात नहीं आते?

महाश्रृंगार छंद
आज का प्रयास
समीक्षा हेतु


प्रार्थना इतनी सी है श्याम,करो तुम सदा हृदय में वास।
बंद जब नैन करूँ गोपाल,दिखो राधा सँग करते  रास।
मुझे दिल की धड़कन में श्याम,सुनाई दे वंशी की तान।
अंत जब निकलें तन से प्राण,करे हर साँस श्याम गुण-गान।

ललित



महाश्रृंगार छंद

पुष्प से करते हैं सब प्यार,फूल के कदमों तले बहार।
बहारों का मतलब है फूल,पुष्प के पीछे चले बहार।
न हो जिसको फूलों से प्यार,उसी को तो कहते हैं शूल।
शूल को भी पनपाएँ खूब,बहारें करती भारी भूल।

ललित


गीतिका

क्यों ललित मन बावरा ये लिख ग़ज़ल सकता नहीं?
दूर लिखना तो बहुत ये कर नकल सकता नहीं।

ज़िंदगी भर जब ललित बोता रहा था आम तू।
क्यों अभी फिर आम की तू पा फसल सकता नहीं?

क्या हुआ कैसे हुआ ये ज़िंदगी की शाम में?
सोच बैठा क्यों ललित तू ,फल बदल सकता नहीं?

है अभी दम बाजुओं में,कर ज़रा तदबीर तू।
कौन कहता है अभी खिल नव-कमल सकता नहीं?

ललित

20.11.19
महाश्रृंगार छंद

बहन की प्रीत बड़ी निःस्वार्थ,प्रेम भाई का
ज्यों सौगात।
सुता-सुत की वो भोली जिद्द,लुभाती पत्नी की हर बात।
पिता के दिल में छिपा सनेह,छलकता माँ का निश्छल प्यार।
प्यार के पहियों पर ही यार,टिका है यह सारा संसार।

ललित


20.11.19
महाश्रृंगार छंद


हुई हमसे ये कमसिन भूल,कि कर बैठे हम उनसे प्यार।
नहीं है जिन्हें प्यार की कद्र,उन्हीं को पहना बैठे हार।
अटपटा इकतरफा ये प्यार,चुभे ज्यों पग में कोई शूल।
चल रही इक पहिए पर हाय,गई ये गाड़ी रस्ता भूल।

ललित



महाश्रृंगार छंद

ज़रा दे दो मुझको घनश्याम,तुम्हारे चरणों की वो धूल।
जिसे लूँ मैं अपने सिर वार,खिले फिर मेरे मन का फूल।
ज़रा मेरे नयनों में श्याम,बसेरा कर लो राधा संग।
मगन हो किया करूँ दीदार,खिले फिर मेरा हर इक अंग।

ललित


महाश्रृंगार छंद

यशोदा माँ का पकड़े हाथ,ठुमक-ठुम ठुमके नंद-कुमार।
बजे पायल छुटके के पाँव,चले जब फुदक-फुदक सुकुमार।
सुनहरी बाँसुरिया ली थाम,हिलाए छोटे-छोटे हाथ।
हिले सिर मोर-पंख का ताज,किलोलें करे जगत का नाथ।

ललित


18.11.19
महाश्रृंगार छंद

अरे ओ मुरलीधर घनश्याम,सुना दे वो वंशी इक बार।
जिसे सुनते ही नंगे पाँव,दौड़ आती थी हर व्रज-नार।
भाग्य मुरली सा दे-दे श्याम, करूँ मैं नित अधरामृत पान।
भूल कर जग के सारे काम,सुनूँ मैं बाँसुरिया की तान।

ललित

मुक्तामणि छंद

कभी ज़िंदगी के लिए,प्यार जताना सीखा। 
कभी बंदगी के लिए,फूल चढ़ाना सीखा।

निखर उठी ये ज़िंदगी,प्यार तुम्हारा पाया।
निखर उठी जब बंदगी,फूल चढ़ाना आया।

ललित

मुक्तक

राधा गोरी हुई बावरी,श्याम तुम्हारे लिए।
भूल गई कान्हा खुद का भी,नाम तुम्हारे लिए।
बैठी रहती है पनघट पर,प्यासी तव दर्शन की।
भूल गई सुबहा वो भूली,शाम तुम्हारे लिए।

ललित


मुक्तामणि छंद


पायल के घुँघरू बजें,मधुर ताल से जैसे।
इठलाती नवयौवना,चली जा रही ऐसे।

घूँघट में से झाँकते,कजरारे दो नैना।
इक पल में ही ले गए,साजन जी का चैना।

दिल की धड़कन हो गई,दिल से गायब जैसे।
चैन चुरा कर ले गयी,मतवाली वो ऐसे।

गगरी में पानी भरा,कुछ ऐसे गोरी ने।
पल्लू ढलका कर किया,दिल घायल छोरी ने।

ललित



15.11.19
कुण्डलिया छंद

चौराया जो एक है,नयापुरा में खास।
बृजटाकिज में से यहाँ,आती दूषित बास।

आती दूषित बास,यहाँ नित कचरे में से।
लगे कचोरी स्वाद, भला बदबू में कैसे?

नगर-निगम ये हाय,'ललित' कैसा बौराया?
बना नरक का द्वार,दिया है ये चौराया।

ललित

मुक्तामणि छंद

कई भाँति के लोग हैं,जीवन है इक मेला।
कुछ के मुख मुस्कान है,कुछ पर ग़म का रेला।

कुछ कड़वे-तीखे यहाँ,कुछ स्वभाव से मीठे।
कुछ निर्मल मन के धनी,कुछ चिकने अरु चीठे।

उनमें कुछ अपने लगें,सुंदर सपने जैसे।
जिनके हिय में प्यार हो,मीत मिलें कुछ ऐसे।

सबसे रीत निभाइए,प्रीत दिखा संसारी।
सबको गले लगाइए,मुस्कानें दे प्यारी।

ललित




15.11.19

मुक्तामणि छंद

चंचल मन चिंता करे,सोच-सोच मर जाए।
होनी तो होकर रहे,मनवा रोक न पाए।

होनी जब टलती नहीं,करो यत्न कितना भी।
मनवा चिंता मत करे,मत सोचे इतना भी।

ललित

मुक्तक 16-16

आज अचानक याद आ गये,गिल्ली-डण्डा,कंचे खो-खो।
रस्सा-कशी आईस-पाईस,छुपम-छुपाई हो-हो-हो-हो।
सतोलिया चौपड़ चंगा-पो,पोषम्पा भई पोषम्पा।
रस्सी-कूद कबड्डी हॉकी,धड़ी-मार-घूँसा दो-दो-दो।

ललित


मुक्तामणि छंद

दिल की धड़कन क्या कहे,मीत ज़रा सुन मेरे।
क्या होती है प्यार की,आहट दिल में तेरे?

धड़कन दिल की तेज है,साँसें रुक-रुक जाती।
दिल झूमे है प्यार से,कहे नज़र मदमाती।

ललित

11.11.19
मुक्तामणि छंद
13:12
यति पूर्व लघु गुरू
अंत दो गुरू
दो-दो समतुकांत

मुक्तामणि छंद

अनगिन स्वर्णिम रश्मियाँ,छुएँ धरा को ऐसे।
रात नहीं इक युग हुआ,मिले बिना हो जैसे।
धवल-चाँदनी रात में,धरती पर बिछ जाए।
सखी-धरा पर चाँदनी,प्यार-छटा बिखराए।

ललित


मुक्तामणि छंद

सुख-दुख की सरिता बहे,अविरल जीवन सारे।
वो पाए आनन्द जो,कभी न गोता मारे।

मन-मौजी बन कर रहो,कटी पतँग के जैसे।
संग हवा के चल पड़ो,दुख व्यापेगा कैसे?

ललित


कुण्डलिनी छंद

खेल चुका हर रंग से,हुआ वृद्ध वो आज।
अब हर रँग फीका दिखे,करें न नैना काज।
करें न नैना काज,दर्द घुटनों में होता।
माया-ममता-मोह,लगाएँ मन में गोता।

ललित



जयकारी छंद
समीक्षा हेतु

भिन्न जातियों वाला देश।
सब धर्मों का जहाँ प्रवेश।
अलग-अलग हैं भाषा-भेष।
प्रेम-प्यार का दे संदेश।

नहीं विश्व में कोई देश।
रखता भारत सा परिवेश।
ब्रम्हा-विष्णु-महेश-गणेश।
राम-कृष्ण के भक्त अशेष।

भगवदगीता और कुरान।
इनसे महके हिंदुस्तान।
गुरूग्रंथ साहिब दे ज्ञान।
सब धर्मों का हो सम्मान।

हिंदू-मुस्लिम औ सरदार।
मन्दिर-मस्जिद अरु गुरुद्वार।
गिरिजाघर में भली प्रकार। 
पूजा करते सब नर-नार।



ललित


कुण्डलिनी छंद

कान्हा तेरे प्यार की,कर दे इतनी छाँव।
जिसमें परमानन्द की,हो थोड़ी सी ठाँव।
हो थोड़ी सी ठाँव,ध्यान-जप मन को भाए।
सुख-दुख की बरसात,नहीं मन को छू पाए।

ललित


7.11.19

जयकारी छंद

स्वच्छ रखो नाली घर-द्वार।
शौचालय अरु स्नानागार।
छोटी सी ये मानो बात।
मच्छर से फिर मिले निजात।

पानी भरे न घर के पास।
साफ नीर मच्छर का वास।
उसमें डालो थोड़ा तेल।
हो जाए मच्छर को जेल।

ललित

5.11.19

गीतिका छंद

गूँजती हरदम जहाँ हैं,प्यार की शहनाइयाँ।
प्रीत की खुशबू हवा में,ले जहाँ अँगड़ाइयाँ।
आँख मींचे साथ मेरे,हमसफर तू चल वहाँ।
चल पड़ी है साथ तो मत,सोच मंजिल है कहाँ?

ललित

चौपाई

कलियों ने जब घूँघट खोले।बजी बाँसुरी हौले-हौले।
वंशी-वट यमुना के तीरे,झूमे कान्हा धीरे-धीरे।ल

अधर मुरलिया में रस घोलें।गोप-गोपियाँ धुन-सुन डोलें।
नैन कन्हैया के जब मटकें।राधा जी की पलकें अटकें।

पायलिया मुँहजोर हुई है।घुँघरूओं ने तान छुई है।
नारी बन शिव-शम्भू घूमें।घूँघट में 
कान्हा सँग झूमें।

नंदन-वन की शोभा न्यारी।छम-छम नाचें 
कृष्ण-मुरारी।
बेसुध होकर गोपी-ग्वाले,आत्म-ज्ञान के पीते प्याले।

दोहा

बजा सुरीली बाँसुरी,यमुना जी के तीर।
व्रज-वासी नर-नार की,कान्हा हरते पीर।

ललित

ताटंक छंद

जितना कोमल जितना छोटा,प्यारा दिल है सीने में।
उतना ये उत्पात मचाए,मजा न आए जीने में।
रोज़ नया इक स्वप्न दिखाए,नहीं कभी जो हो पूरा।
दिल मुश्किल कर दे जीना जब,अरमानों का हो चूरा।

ललित

चौपई छंद
बाल कविता

चाँद-चाँदनी खाकर पान।
चले घूमने हिंदुस्तान।
देख हिमालय  श्वेत विशाल।
हुई चाँदनी आज निहाल।

गंग नदी की शीतल धार।
भारत-माता का गलहार।
संगमरमरी सुंदर ताज।
चाँद-चाँदनी देखें आज।

लाल-किला दिल्ली की शान।
और स्वच्छता का अभियान।
चमक रहा नव-हिंदुस्तान।
देख चाँद की निकली जान।

ललित


मुक्तक

स्वप्नों की मायानगरी ये,कैसी 
श्याम बना डाली।
झोली भरते जीवन बीते,अंत-समय मिलती खाली।
स्वप्न-स्वप्न बस स्वप्न देखते,समय बिताता जो सारा।
अंत-समय वो मानव पाता,खुद को स्वप्नों से हारा।

ललित

जयकारी छंद

गरल हवा में डाला घोल।
क्या कर बैठा नर तू बोल?
मुश्किल में बच्चों की जान।
नहीं साँस लेना आसान।

अम्बर नीला दिखे न आज।
धूल-धुआँ का है बस राज।
कीचड़ में बदला है आब।
सूखे कूप-नदी तालाब।

लिया दानवों ने है धार।
पॉलीथिन रूपी अवतार।
नर-नारी बालक आवाम।
पॉलीथिन के सभी गुलाम।

निश्चय ग़र कर लें हम आज।
पॉलीथिन का रहे न राज।
आतिश-बाजी कर दें बंद।
रखें हवा को हम स्वच्छंद।

ललित

1.11.19
जयकारी छंद

देख लिया सारा जग घूम।
कहीं नहीं दिल पाया झूम।
सबसे प्यारा हिंदुस्तान।
प्यारी जिसकी है मुस्कान।

स्वर्णिम होती इसकी भोर।
नाच उठे जब मन का मोर।
रंगीली होती हर शाम।
साँध्य-आरती हो निष्काम।

ललित

जयकारी छंद

नारंगी केला अमरूद।
सार-तत्त्व इनमें मौजूद।
कुछ खट्टा कुछ मीठा आम।
उससे मीठा काला जाम।

काजू किशमिश और बदाम।
पिश्ता चिलगोजा के नाम।
रखना बच्चों हरदम याद।
बड़ा अनूठा इनका स्वाद।

ललित




अगस्त 2019 की रचनाएँ

अगस्त 19

चौपाई
तन-मन-धन

बड़ा लालची मानव मन है,
हर रिश्ते में खोजे धन है।

ईश्वर को भी धन दिखलाए,
हरि को भी देना सिखलाए।

तन करता धन का  साधन है,
मन काला और गोरा तन है।

नहीं मिले जब मनचाहा धन।
बिदक-बिदक जाता है ये मन।

धनवानों को सब ही पूजें।
देख रंक को मुखड़े सूजें।

धन ने रिश्तों को बिसराया।
मन मानव का समझ न पाया।

दोहा

तन-मन-धन का खेल ये,मानव समझ न पाय।
धन के पीछे मन चले,और चले तन हाय।

ललित

कुण्डलिनी छंद
माया

इतनी उलझी डोर में,माया की भगवान।
क्यों बाँधा तूने बता,भोला ये इंसान?
भोला ये इंसान,डोर में ऐसा उलझे।
खूब लगाए जोर,नहीं फिर भी वो सुलझे।

ललित

मुक्तक 16-12
हमसफर

कुछ दूर तक तो साथ मेरे,चल जरा ओ हमसफर।
ये ज़िन्दगी है खूब छोटी,खूबसूरत है डगर।
मंजिल तलक चलती रहेंगी,प्यार की पुरवाइयाँ।
हर राह की तन्हाइयों में,साथ होगा तू अगर।

ललित

चौपाइयाँ
दिल की धड़कन

दिल की धड़कन क्या कहती है?
मन को ये चिन्ता रहती है।

क्या दिल में ममता रहती है?
या थोड़ी समता रहती है?

क्या छुप-छुप कर रोता है दिल?
या गम ओढ़े सोता है दिल?

क्या खुशियों में दिल हँसता है?
या आशा में वो  फँसता है?

क्या भूखा ही रहता है दिल?
या सूखा ही रहता है दिल?

दिल करता मन से विनती है।
क्या दिल की भी कुछ गिनती है?

दोहा

दिल गूँगा-बहरा नहीं,और न ये पाषाण।
दिल से ही इंसान है,दिल में ही हैं प्राण।

ललित



.4.08.19
चौपाइयाँ
दिल

दिल अक्सर चुप ही है रहता।
सारे ग़म खुद ही है सहता।

खुशियाँ सबसे साझा करता।
ग़म अपनी झोली में भरता।

ललित

 पीयूष वर्ष छंद
श्याम सुंदर

श्याम सुंदर साँवरे मुरलीधरा।
घूम ले कश्मीर तू भी अब ज़रा।
घाटियों में बाँसुरी कुछ यूँ बजा।
आसमाँ छूने लगे भारत-ध्वजा।

'ललित'


पीयूष वर्ष छंद
प्रीत

प्रीत में भीगा हुआ सावन जगा।
प्यार दिल में दस्तकें देने लगा।
गूँजती शहनाइयाँ ले आइए।
कुछ फुहारें प्यार की दे जाइए।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
तीन सौ सत्तर

तीन सौ सत्तर हटा ऐसे दिया।
आसमाँ में छेद कर जैसे दिया
दानवों से मुक्त कर कश्मीर को।
है सँवारा हिंद की तकदीर को।

ललित

गीतिका छंद
वादियाँ

वादियों में फूल महके,राह निष्कंटक बनी।
खिल उठे मुख हैं सभी के,और दीवाली मनी।
चाँद मुस्काने लगा है, आसमाँ भी हँस रहा।
दुश्मनों का प्राण मानो,हलक में है फँस रहा।

 ललित


गीतिका छंद
ज़िंदगी का कारवाँ

ज़िंदगी के कारवाँ में प्यार की बरसात हो।

खूबसूरत ज़िन्दगी हो प्रीत की सौगात हो।

द्वार से ही लौट जाए दुःख उल्टे पाँव से।

ज़िंदगी शीतल रहे हरदम सुखों की छाँव से।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
कश्मीर

हिंद का सरताज जो कश्मीर है।
वो सदा से हिंद की जागीर है।
नींद से अब जाग तू इमरान जा।
हिंद का कश्मीर है ये मान जा

क्या हुआ मायूस तू क्यों होगया?
तीन सौ सत्तर हवा जो हो गया।
डाल मत कश्मीर पर गंदी नज़र।
है हमें आतंक का कुछ भी न डर।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
बाँसुरी

बाँसुरी थी क्यों बजाई साँवरे?
छोड़ना था जब तुझे व्रज-गाँव रे।
गोपियों सँग रास भी था क्यों रचा?
राधिका को क्यों रहा था तू नचा?

ललित

पीयूष वर्ष छंद
बदरा

झूम कर बरसो बदरवा साँवरे।
नीर का प्यासा हमारा गाँव रे।
सुन जरा प्यासी धरा की सिसकियाँ।
प्यास से रोती धरा की हिचकियाँ।

ललित

दोहा

नौटंकी करते रहे,इतने दिन तक आप।
क्या अब तक लेते रहे,गहराई का नाप?

ललित

पीयूष वर्ष छंद
राधिका की प्रीत

राधिका की प्रीत ऐसी श्याम से।
राह में आँखें बिछाए शाम से।
श्याम जब आए चमन दिल का खिले।
माधुरी मुस्कान अधरों पर मिले।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
गीत

राधिका की प्रीत ऐसी श्याम से।
राह में आँखें बिछाए शाम से।
प्रीत राधा कृष्ण की यों पावनी।
शांत शीतल ज्यों फुहारें सावनी।
रात-रानी सी महक उठती वहाँ।
श्याम राधा का मिलन होता जहाँ।


श्याम जब आए चमन दिल का खिले।
माधुरी मुस्कान अधरों पर मिले।
हर लता खुश हो हवा में झूमती।
चाँदनी निर्मल धरा को चूमती।
चाँद भी कुछ पल ठहर जाता वहाँ।
श्याम राधा का मिलन होता जहाँ।


बाँसुरी छूती अधर जब श्याम के।
गूँजते हैं सुर हृदय विश्राम के।
बंद हों जब नैन राधा के चपल।
दल-दलों में खिल उठें सुंदर कमल।
देवता सब देखते नभ से वहाँ।
श्याम राधा का मिलन होता जहाँ।

ललित

मुक्तक
राधा

बनी घनश्याम की छाया,बिरज में घूमती 
है वो।
सुरीली बाँसुरी की धुन,सुने तो झूमती है वो।
बड़ी चंचल बड़ी भोली,दिवानी श्याम की राधा।
चिढ़े वो जिस मुरलिया से,उसी को चूमती है वो।

ललित

मुक्तक 14-14
फुहारें

फुहारें छू रही तन को,अगन में झोंकती मन को।
हवा शीतल सुहानी ये,बढ़ाती और उलझन को।
करे कल-कल नदी ऐसे,नवेली ज्यों चले छम-छम।
चले आओ सजन जल्दी,करो रंगीन सावन को।

ललित

मुक्तक 14-14
सितारे

सितारों की टिमा-टिम से,यहाँ रंगीन हैं रातें।
रजत से चाँदनी-चंदा,करें गुप-गुप मुलाकातें।
हिले वो चाँद सरवर में,चँदनिया गुन-गुनाती है।
नदी के कूल पर सजनी,करें हम प्यार की बातें।

ललित


छंद सिंधु
1222 1222 1222
दो दो समतुकांत

19.08.19
छंद सिंधु
धुन

न जाने कौन सी धुन पर थिरकता मन?
नई नित चाहतों में ये सरकता मन।

बसे मद-मोह-माया लोभ हर रग में।
न मन वश में किया तो क्या किया जग में?
ललित

छंद सिंधु
सुख-दुख

बिना दुख के किसे सुख है यहाँ मिलता?
बिना कंटक चुभे गुल है कहाँ खिलता?
निराला है यहाँ पर भाग्य का लेखा।
परिश्रम से बदलता भाग्य भी देखा।

ललित

छंद सिंधु
बहारें

बहारों का रहे मौसम सदा प्यारा।
तुम्हारी ज़िन्दगी में ग़म न हो याराँ।
मिले हर भोर ताजा इक खुशी तुमको।
भुला लेकिन न देना तुम कभी हमको।

ललित


छंद सिंधु
राधा


दिवानी श्याम की ऐसी  हुई  राधा।
लुभाए साँवरा रँग और भी ज़्यादा।
निगाहें खोजती हर-पल कन्हैया को।
बजैया  बाँसुरी के,गौ-चरैया को।

ललित
 


कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा
भानमती ने कुनबा जोड़ा।
वही बना अब जानी-दुश्मन
जोड़ा था जो थोड़ा-थोड़ा।


महाश्रृंगार छंद
मुरलीधर

सुना है मुरलीधर घनश्याम,बजाता मुरली तू हर भोर।
सुने जो उस वंशी की तान,वही हो जाता
भाव विभोर।
मोरपंखी है तेरा ताज,और तू चोरों का सिरमौर।
चुराता है माखन हर रोज,मचाता है गलियों में शोर।

ललित

पंचचामर छंद
खुशी

कभी मिले खुशी कभी पहाड़ दुःख के मिले।
कभी बहार तो कभी न एक भी कली खिले।
हसीन मोड़ ज़िन्दगी कभी दिखा गई हमें।
कभी हज़ार ठोकरें मज़ा चखा गईं हमें।

ललित

पंचचामर छंद
सुता

सुता मिली नसीब से न हो दुलार की कमी।
गले लगा रखो  उसे रहे न प्यार की 
कमी।
पढ़ा-लिखा करो जवाँ छुए न आसमान क्यों?
जहाँ सुता पले वहाँ बढ़े न आन-बान क्यों?

ललित

पंचचामर छंद
राम नाम

लिया न नाम राम का जपा न श्याम नाम ही।
न लोभ-मोह से बचा भुला सका न काम ही।
हसीन जिंदगी जिया किए न पुण्य दान ही।
चला गया जहान से बचा सका न प्राण ही।

ललित

पंचचामर छंद
श्याम

बजा रहा न बाँसुरी न एक कौर खा रहा।
न नंद-लाल ग्वाल-बाल-धेनु संग जा रहा।
न खेलता न कूदता न धूम वो मचा रहा।
कि राधिका बिना न श्याम गोपियाँ नचा रहा।

ललित

पंचचामर
देशभक्ति

खिलें वहाँ हजार फूल फौज हिंद की जहाँ।
करे हजार शूल चूर्ण फौज हिंद की वहाँ।
उठा सके न आँख शत्रु देख हिंद के जवाँ।
हरेक जंग के लिए जवान हिंद के रवाँ।

ललित
कुण्डलिनी छंद
कनटोप

कमर-बेल्ट बाँधे हुए,माथ धरे कनटोप।
नहीं चले तो दस गुना,जुर्माना तू सौंप।

जुर्माना तू सौंप,भले टूटी हैं सड़कें।
साँड लड़ें हर ओर,करम-फूटी हैं सड़कें।

ललित


अप्रेल 2019

अप्रेल 2019

मुक्तक 16-14

जितना काला कृष्ण-कन्हैया,उतनी गोरी है मैया।
क्या जाने मैया ये कान्हा,तारेगा सबकी नैया।
माखन-मिश्री खिला जिसे वो ,रोज सुनाती है लोरी।
नहीं जानती नाग-फणों पर,नाचेगा ता-ता थैया।

ललित


आल्हा छंद

रंग-बिरंगी बाँसुरिया मैं,ले आया हूँ बीच बजार।

मधुर धुनों से जो भर देगी,कर्णों में मधुरिम रस-धार।

अधरों से लगकर गाएगी ,मन को सुख दें ऐसे गीत।

इसी मुरलिया से कान्हा ने,पाई थी हर दिल पर जीत।

सात सुरों के संगम से ये,मधुर धुनों की छेड़े तान।

सुनने वाले के अधरों पर ,छा जाती है मधु-मुस्कान।

सिखलाती जीवन जीने का,एक अलग ही ये अंदाज।

इसीलिए तो करता था वो, श्याम मुरलिया पर यूँ नाज।

ललित


कुण्डलिनी

वोट माँगता फिर रहा,गली-गली वो खास।
बाद चुनावों के नहीं,डालेगा जो घास।

डालेगा जो घास,गधों को या चमचों को।
कर लो ये विश्वास,नहीं  ऐ मित्रों चौंको।

ललित

मधुमालती छंद

नदिया जहाँ कल-कल बहे।
सुरभित हवा शीतल बहे।
सुख-छाँव वंशीवट करे।
नित भोर गोरी घट भरे।

फूलों भरी सब क्यारियाँ।
मुस्कान की फुलवारियाँ।
कलियाँ सभी खिलने लगें।
प्रेमी हृदय मिलने लगें।

ललित

मधुमालती छंद

नव वर्ष में है कामना।
माँ हाथ मेरा थामना।
मुश्किल न आए राह में।
हर-पल रहूँ उत्साह में।

सत्संगियों से नित मिलूँ।
सद्धर्म के पथ पर चलूँ।
करता रहूँ माँ बन्दगी।
पुरुषार्थ मय हो जिंदगी।

ललित
क्रमशः

मधुमालती छंद

फिर सोचना क्या प्यार में?

जब रब दिखा दिलदार में।

संसार सुंदर हो गया।

जब यार में दिल खो गया।


इस प्यार में क्या बात है?

चंचल हुआ ये गात है।

मन की कली खिलने लगी।

दीवानगी पलने लगी।


ये प्यार की दीवानगी।

जिसकी नहीं कुछ बानगी।

साँसें रुकें रुक-कर चलें।

सुख-स्वप्न नयनों में पलें।


सजना नयन में आ बसा।

छाया बहारों पर नशा।

जब भी मिलें सजना कहें।

हर पल मिलें मिलते रहें।

ललित

मधुमालती छंद

कुछ धूप में कुछ छाँव में।
जीवन जिया इस गाँव में।
कुछ प्यार में कुछ खार में।
भटका किया मँझधार में।

अब आ गया वो दौर है।
इक हाशिया हर ओर है।
यूँ ही गुज़ारी ज़िन्दगी।
कुछ हो न पाई बन्दगी।

जो ख्वाब थे दिल में पले ?
वो कब हकीकत में ढले ?
कुछ स्वप्न सपने रह गए।
कुछ आँसुओं में बह गए ।

जो ज़िन्दगी की चाल है।
उलझी हुई हर हाल है।
जैसी मिले स्वीकार है।
जैसी चले स्वीकार है

ललित

मधुमालती
रास आनंद.

वंशी अधर से ज्यों छुई।

वो चाँदनी शीतल हुई।
मुरली मधुर बजने लगी।
घर गोपियाँ तजने लगी।

जो बाँसुरी की धुन सुने।
वो राह मधु-वन की चुने
चूड़ी बजे पायल बजे।
गजरा सजे वेणी सजे।

जब श्याम से नैना मिले।
गल-हार राधा का हिले।
सब गोप-गोपी झूमते।
बादल धरा को चूमते।

ललित

कुण्डलिनी छंद

हाथ जोड़ कर माँगता,नर-नारी से वोट।
अधरों पर मुस्कान है,दिल में भारी खोट।

दिल में भारी खोट,करे वो झूठे वादे।
वादों पर दें वोट,सभी जन सीधे-सादे।

ललित

गीतिका

रासलीला गीतिका कुछ यूँ बनी
सादर प्रस्तुत....
2122 2122 212

कृष्ण-राधा-रास की क्या बात है?
रात पूनम की बनी  सौगात है।

गोप-गोपी सँग कन्हैया नाचता।
हर लता का झूमता हर पात है।

धुन सुरीली बाँसुरी की गूँजती।
ताल दे-दे झूमता हर गात है।

चाँद भी रुक सा गया आनंद में।
रास-लीला की अनोखी रात है।

पायलें छम-छम-छमा-छम बोलतीं।
बाँसुरी को आज देनी मात है।

आत्म की सब खुल रही हैं गुत्थियाँ।
हो रही परमात्म-रस बरसात है।

रास-लीला ज्ञान ये है दे रही।
आत्म औ' परमात्म की इक जात है।

ललित किशोर 'ललित'


सार छंद

शिव-शंकर से माँग रहा हर,नेता आज मनौती ।
पहन श्वेत खादी का कुर्ता,और बाँध कर धोती।

नहीं चाहिए सोना-चाँदी,गहने-हीरे-मोती।
सीट वही दिलवा दे बाबा,संसद में जो  होती।

बैठ सीट पर मैं जाऊँ तो,सेवक कहलाऊँगा।
अपने घर में धन-दौलत की ,वर्षा कर पाऊँगा।

मुझे बता दे बाबा कैसे ,जनता ये रीझेगी।
करूँ घोषणा क्या जिससे ये,वोट मुझे ही देगी?
ललित


मुक्तक( विष्णुपद आधारित)

हे शिवशंकर हे अभयंकर,निर्भय तू कर दे।
अमर सुहाग रहे मेरा हे!नाथ मुझे वर दे।

हे मात-अम्बिके-दुर्गा-गौरी,विनती है तुझसे।
रहूँ सुहागिन अंत-साँस तक,हाथ शीश धर दे।

ललित

9.4.19
तोटक छंद

112 112 112 112

हर भोर बजे मुरली व्रज में।
बस प्यार बसा जिसकी रज में।
वृषभानुसुता सँग साँवरिया।
चहकें सखियाँ सुन बाँसुरिया।

ललित

10.04.19
तोटक छंद

112 112 112 112

गणनाथ गजानन प्रात जपे।
नर वो न कभी दुख-धूप तपे।
जिस द्वार विराज गणेश रहे।
उस द्वार नहीं दुख-क्लेश रहे।

शिवशंकर नाम सदा जपता।
नर वो भव-ताप नहीं तपता।
मन में शिव-ध्यान किया करता।
भव-सागर से नर वो तरता।

हरि-नाम जपे नर जो मुख से।
दुख भी सहता समता-सुख से।
हरि मूरत देख झुके सिर जो।
भव-सागर पार करे फिर वो।

वृषभानुसुता सँग श्याम कहे।
सुख की सरिता नर डूब रहे।
मुरलीधर का नित ध्यान धरे।
नर वो भव से हर हाल तरे।

सिय-राम बसें जिसके मन में।
कब रोग बसें उसके तन में।
बजरंग-बली सिय-राम भजे।
नर वो भव-दुःख तमाम तजे।

ललित

तोटक छंद

112 112 112 112

चलता-फिरता दिखता नर है।

पलता कितना विष भीतर है।

चुपचाप निरंतर रोग बढ़े ।

फिर देह तपे अरु ताप चढ़े।


फिर डाक्टर चंगुल वो फँसता।

मन ही मन डॉक्टर है हँसता।

वह फीस व जाँच कमीशन ले।

लिख डोज बड़ी पोजीशन ले।


ललित

तोटक छंद

112 112 112 112

नव-वधू

बलखाय चले इठलाय चले।

पग-पायल खूब बजाय चले।

चहकी-चहकी फिरती अँगना।

नव-सेज सजी बजते कँगना।


अमियाँ लटकें वन-बागन में।

छमियाँ रमती निज साजन में।

सजना सँग प्रीत जवान हुई।

अँखियाँ अब तीर-कमान हुई।

ललित

गीतिका छंद

ज़िन्दगी का हर सितम हम,प्यार से सहते गए।

दुःख-सुख की धार में हम,नाव-सम बहते गए।

स्वप्न टूटे चौंक कर हम ,नींद में जगने लगे।

अब किनारे भी पराए से हमें लगने लगे।

ललित

मुक्तक

भूल-भुलैया में जीवन की,आँख मिचौली 

खेल लिए।

हमने सब किस्मों के पापड़,इस जीवन में बेल लिए।


खुशियों के सब स्वप्न सुनहरे,किर्चों में बिखरे देखे।

अब क्या बाकी रहा झेलना,बेदर्दी गम झेल लिए।


ललित किशोर 'ललित'


12.4.19

तोटक छंद

मन

मन चंचल धीर नहीं धरता।

नव-आस लिए उड़ता फिरता।

समझा मन की गति कौन यहाँ?

समझा मन की मति कौन यहाँ?


कुछ ज्ञान लिए नर डोल रहा।

मन मेंं मन को नर तोल रहा।

तन में नर खोज रहा मन को।

मन मौन करे बस में तन को।


मन जो कहता तन वो करता।

मन तर्क-वितर्क कला-धरता।

कुछ धीर हुए ऋषि-संत बड़े।

मन सम्मुख ज्यों हनुमंत अड़े।


मन हार रहा जब था रण में।

गुरु-ज्ञान-प्रकाश मिला क्षण में।

मन को वश में कर कृष्ण-सखा।

उस अर्जुन ने गुरु-मान रखा।

ललित

तोटक छंद

 मित्र

सुख में दुख मेंं अरु दुर्दिन में।

रहता सँग जो सब व्याधिन में।

वह नंद-लला गिरिराज उठा।

व्रज-वासिन संकट देत मिटा।


ललित

तोटक छंद

सिय-राम

सिय-राम सदा जप लो मुख से।

जय तारण-हार कहो सुख से।

जप ये हनुमान सदा करते।

भव-ताप दुखी-जन के हरते।


दिल में सिय-राम बिठाय लिए।

दिल-चीर सबै दिखलाय दिए।

हनुमान समान न भक्ति कहीं।

सिय-राम समान न शक्ति कहीं।


शबरी तकती नित राह जहाँ।

वन में पहुँचे प्रभु राम वहाँ।

चख बैर खिलाय रही शबरी।

पद-पंकज ध्याय रही शबरी।


मन केवट पावन भाव रहा।

तट-गंग लिए निज नाव रहा। 

उसको पग राम पखारन दें।

निज भक्तन जन्म सुधारन दें।


सिय-राम सदा जप लो मुख से।

जय तारण हार कहो सुख से ।

ललित

15.04..19

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

लगी डूबने नाव उनकी जहाँ।

मिले मंच पर एक सारे वहाँ।

निराला बहुत एक दुश्मन मिला।

सभी को उसी से रहा बस गिला।


करें यत्न सब हाथ में हाथ दे।

कि दुश्मन नहीं अब हमें मात दे।

लिए हाथ पतवार भागें सभी।

किनारे बड़ी दूर दिखते अभी।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

बजाए लला जादुई बाँसुरी।

चले राधिका के जिया पे छुरी।

मचलते जिया को लिए हाथ में।

लगी राधिका नाचने रात में।

सुरीली बड़ी बाँसुरी की धुनें।

मगन ध्यान में गोप-गोपी सुनें।

थिरकने लगे घुँघरुओं के वदन।

कि मदहोश खुद होगया है मदन।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

सद्भाव

न सोचें-विचारें  ,न मानें कभी।

न आचार-व्यवहार, जानें कभी।

रहे दौड़ अंजान पथ-पर युवा।

कि मंजिल जहाँ वासना का कुँआ।


न अनुभव-भरा ज्ञान ही चाहिए।

सहारा किसी का नहीं चाहिए।

फँसेगी भँवर में कभी नाव जो।

करेंगें तभी याद सद्भाव को।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

चाँदनी

महकती हुई चाँदनी रात में।

सितारे चले चाँद के साथ में।

हसीं चाँदनी ने धरा को छुआ।

मिली ज्यों धरा को अनोखी दुआ।


ललित

चाँदनी

दुआ में धरा को मिली चाँदनी।

धरा के बिना कब खिली चाँदनी?

मिली बादलों से जहाँ चाँदनी।

गुमी बादलों में वहाँ चाँदनी।

ललित

चाँदनी

नहीं बादलों में घुली चाँदनी।

गले चाँद से जा मिली चाँदनी।

चमकने लगा चाँद फिर रात में।

सितारे हँसे चाँद के साथ में।

मुक्तक 16-14

कुछ ज़ुबान से फिसले होंगें,कुछ यूँ ही बोले होंगें।

बेचारे नेता ने शायद,शब्द नहीं तोले होंगें।

शब्दों की माया-नगरी में,उलझे जो नेता सारे।

क्यों उनको लगता है वोटर,गैया-सम भोले होंगें?

ललित

आल्हा छंद

मतदाता पहचान पत्र क्या,होता क्या बोलो आधार?

कैसा होता है घर पक्का,होता क्या उसका आकार?

नहीं जानते हैं हम कुछ भी,कैसे डाले जाते वोट।

भूखे ही सो जाते हैं हम,रोज़ इसी पाइप की ओट।

ललित

शक्ति छंद

सदा खिल-खिलाकर हँसे प्यार से।

बिखेरे खुशी सौम्य व्यवहार से।

निराली सरस रास-लीला करे।

लुटा आत्म-रस प्रीत-प्याले भरे।


रही राधिका खोज उस चोर को।

रखे शीश पर जो मुकुट-मोर को।

बजा बाँसुरी चैन जिसने हरा।

छुपा है कहाँ श्याम मुरलीधरा?


ललित

शक्ति छंद

प्रभो द्वार तेरे खड़े हम सभी।

निहारो हमें प्यार से भी कभी।

बनाए रखो नाथ ऐसी कृपा।

नहीं दुःख हमको सकें अब तपा।

ललित

शक्ति छंद

कृपा है प्रभो आपकी सब कृपा।

नहीं दुःख मुझको सके जो तपा।

यही मात्र विनती करूँ रात-दिन।

न इक-पल गुजारूँ कभी जाप बिन।

ललित

शक्ति छंद

नदी

122 122 122 12

नदी नाव की मित्रता हो जहाँ।

न कैसे किनारा मिले फिर वहाँ?

मिले आत्म को ज्ञान परमात्म का।

न उद्धार रुकता वहाँ आत्म का।


चले जीव सद्भाव के पथ सदा।

करे कूप उपकार ज्यों सर्वदा।

न गंगा न यमुना उसे धो सके।

भरा मैल मन में अगर नर रखे।

ललित 

मुक्तक 16-10

चोर-चोर का शोर मचाते,मुख सूखे जिनके।

हाथ जोड़ माफी माँगें अब,उतरे मुँह उनके।

खोजा करते थे तिनके जो,दाढी में सबकी।

साफ जरा कर लें वो खुद की ,दाढी के तिनके।

ललित 

शक्ति छंद

कली

122 122 122 12

मिली स्वप्न में एक नाजुक कली।

बड़ी खूबसूरत बड़ी मनचली।

निगाहें मिलाकर झुकाती रही।

कली स्वप्न में भी छकाती रही।


कभी प्यार से वो निहारे हमें।

यही सोचकर हम वहाँ थे थमे।

मगर प्यार की बात मन में रही।

खुली नींद तो स्वप्न नगरी बही।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

प्यार हर दिल में पनपता है जहाँ।

ज़िंदगी भी मुस्कुराती है वहाँ।

ज़िन्दगी जिंदादिली से जो जिए।

है भला गम चीज क्या उसके लिए?

ललित

पियूष वर्ष छंद

बाँसुरी

2122 2122 212

बाँसुरी की मस्त धुन में खो गया।

वो कन्हैया का दिवाना हो गया।

नाम राधा का जपे दिन-रात है।

चाहता घनश्याम का जो साथ है।

ललित

पियूष वर्ष छंद

प्यार  

2122 2122 212

प्यार की धुन में मगन दो दिल मिले।

फूल खुशबू से भरे सुंदर खिले।

नैन में हैं स्वप्न सुख-संसार के।

दिल धड़कते हैं लिए सुर प्यार के।


प्यार की खुशबू भरी हो ज़िंदगी।

है नहीं इससे बड़ी कुछ बंदगी।

प्यार है निष्काम जिस दिल में भरा।

है वही दिल हर कसौटी पर खरा।


प्यार की नगरी बड़ी जादू भरी।

प्रीत की नौका भँवर में भी तरी।

चाँद-तारों को ज़मीं से आस है।

प्रेम के दम पर टिका आकाश है


हर समंदर प्यार का प्यासा दिखा।

प्यार सबके भाग्य में है कब लिखा?

प्रीत की हो प्यास जिस दिल में जगी।

इक अनोखी आग उस दिल में लगी।

ललित

पियूष वर्ष छंद

प्रदूषण

2122 2122 212

ज़िंदगी का बेसुरा अब राग है।

अब हवाओं में सुलगती आग है।

स्वार्थ नर ने इस कदर पोषित किए।

वायु,धरती और जल दूषित किए।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

चैन मन पाए नहीं संसार में।

खूब भटके रूप के बाजार में।

ध्यान तब धर लो जरा तुम श्याम का।

नाम जप लो तब जरा तुम राम का।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

साजना ये चाँदनी क्या कह रही?

प्रीत की प्यासी नदी क्यों बह रही?

चाँद से है चाँदनी को प्रेम गर।

प्यार करती है समंदर से लहर।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

सोलहों श्रृंगार कर सजनी सजी।

छम-छमा-छम रात भर पायल बजी।

तार दिल के छेड़ बैठा यूँ पिया।

नींद रूठी हो गया चंचल जिया।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

हिंद देश की आजादी का,पर्व बड़ा मतदान का।

वोट डालने से चमकेगा, मुखड़ा हिंदुस्तान का।

सोचो,समझो और विचारो,किसको देना वोट है।

चुनो उसीको अपना नेता,जिसमें कुछ कम खोट है।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

मनमोहना हे! श्याम सलौने,विनती इतनी सी सुनो।

चरणों की सेवा में प्रभु जी,चाकर मुझको ही चुनो।

इक पल भी मैं तुम्हें न भूलूँ,सुमिरन आठों 

याम हो।

राधे-कृष्णा जाप तुम्हारा,जिव्हा से अविराम हो।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

भोर सुहानी मंगलकारी,देती है संदेश ये।

मुस्कानों की चादर ओढ़ो,छोड़ क्लेश का वेश ये।

नित्य भोर में ऊर्जा भर लो,तन में प्राणायाम से।

ध्यान-भजन का समय निकालो,थोड़ा दैनिक काम से।

ललित

मुक्तक 16-14

सपनों की माया-नगरी में,उधेड़-बुन  सपना होगा।

सत्य एक ईश्वर का मन से,नाम सदा जपना होगा।

ये संसार असत्-क्षण-भंगुर,मान बात ये ले प्राणी।

संचय कर लेगा तू जितना,पुण्य वही अपना होगा।

ललित किशोर 'ललित'


मधुमालती छंद

2212 2212

जीवन पुकारे ओ पथिक।
रुकना न तू इक पल तनिक।
चलता निरंतर जो रहे।
मंजिल उसी की हो रहे।

हो कंटकों से सामना।
तो पग न अपना थामना।
फूलों भरी राहें मिलें।
सम्भव नहीं ये सिलसिले।

ललित

अप्रेल 2019

मधुमालती छंद

2212 2212

हर आदमी इस देश का।
हर जाति का हर वेश का।
हर राज्य का हर गाँव का।
पूछे पता बस छाँव का।

हर छाँव उससे छिन गई।
बस धूप है हर दिन नई।
अब छाँव भी बिकने लगी।
रोटी कहीं सिकने लगी।

कुछ भाषणों में खो रहे।
कुछ बोझ अपना ढो रहे।
जनता झुकी ही जा रही।
बस स्वप्न में सुख पा रही।

नेता निराले हैं यहाँ।
पग-पग शिवाले हैं यहाँ।
नेता वहीं सुख पा रहे।
निश-दिन शिवाले जा रहे।

है देश की चिन्ता किसे?
नेता बना जो क्या उसे?
ये सोचने की बात है।
नेता करे क्यों घात है?

ललित






फरवरी 2019 रचनाएँ

फरवरी 2019 (ई मेल)
जीवन की तस्वीर में रंग

प्यार के अंकुर जब
        फूट रहे थे दिल में

नैन उलझे थे उसके
         गालों के तिल में।

प्यार के जज़्बात का
         इज़हार न हो पाया

अधरों तक आकर शब्द
          लौट गए दिल में...

ललित

सार छंद

प्याज और रोटी का मुश्किल,से जुगाड़ है होता।
उस पर छोटा मुन्ना उसका,चॉकलेट को रोता।
माँ की आँखों में दो आँसू ,रह जाते हैं फँसकर।
चॉकलेट फीकी लगती है,कह देती है हँसकर।

ललित

दो होठों ने मिलकर
छलकते जाम से
ऐसे चखी
प्यार की मदिरा
कि
प्याले खुद
मदहोश होगए
एक दूसरे के आगोश में खो गए...

.....

दो होठों ने मिलकर
ज़मीं आसमाँ को मिला दिया
चाँदनी चाँद से यूँ लिपटी
बादलों को हिला दिया

बुधवार 13 फरवरी 2019
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मुक्तक -14-14
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹चलो इक बार फिर से हम,
           नयी दुनिया बसाते हैं।
नयी सुर-ताल सरगम पर,
           नया इक गीत गाते हैं।
गिले-शिकवे दिलों में जो,
           दिलों में ही दफन कर दें।
चलो पतवार बनकर हम,
            भँवर को भी हराते हैं।
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ललित किशोर 'ललित'
कोटा ,राजस्थान
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मुक्तक

चलो इक बार फिर से हम,
           नयी दुनिया बसाते हैं।
नयी सुर-ताल सरगम पर,
           नया इक गीत गाते हैं।
गिले-शिकवे दिलों में जो,
           दिलों में ही दफन कर दें।
चलो पतवार बनकर हम,
            भँवर को भी हराते हैं।

ललित किशोर 'ललित'

सार छंद

उजड़ी माँग कलाई सूनी,आँखें पथराई हैं।
जिसने देखा हाल उसी की,आँखें भर आई हैं।
व्यर्थ किसी हालत में इनका,ये बलिदान न जाए।
गिन-गिन कर हैं बदले लेने,समय यही समझाए।

ललित।

18.2.19

कुण्डलिनी छंद

आँखों में चिंगारियाँ,और दिलों में रोष।
देख शहीदों को भरा,भारत में नव-जोश।
भारत में नव-जोश,आज है ऐसा छाया।
नष्ट करो वो पाक,हमें जिसने तड़पाया।

ललित

कुण्डलिनी छंद

जीवन में जो भी मिले,मान और अपमान।
समता में रह कर पियो,विष को अमृत जान।
विष को अमृत जान,पिए जाओ तुम ऐसे।
गरल भरा था जाम,पिया मीरा ने जैसे।

ललित

22.02.19

कुण्डलिनी छंद

दिल की धड़कन क्या कहे,सुन मेरे मनमीत।
साँस-साँस में गूँजता,मधुर-मधुर संगीत।

मधुर-मधुर संगीत,प्रीत की धुनें सुनाता।
आए जब तू पास,नज़र से तीर चलाता।

ललित.

कुण्डलिनी छंद

खींच रहा क्यूँ साँवरे,तू चुनरी का छोर?
नभ में बदरा झूमते,नाचें वन में मोर।
नाचें वन में मोर,हिया में आग लगी है।
जियरा धड़के हाय,मिलन की प्यास जगी है।

ललित

कुण्डलिनी छंद

छम-छम-छम-छम छम बजे,पायल आधी रात।
समझ न पाए साजना,पायल के जज्बात।

पायल के जज्बात,और कँगना की बोली।
सजना समझ न पाय,सजनिया भी है भोली।
ललित

कुण्डलिनी छंद

नटवर-नागर~~~~💝~~~~💝

नटवर-नागर साँवरा,मटकाए यूँ नैन।
रातों की नींदें हरे, छीने दिन का चैन।

छीने दिन का चैन,राधिका दौड़ी आए।
नैना हों जब चार,हिया शीतल हो जाए।

~~~~💝~~~~💝~~~'ललित'
काव्य सृजन परिवार~~~~💝~~

कुण्डलिनी छंद
सैनिक

दुश्मन के छक्के छुड़ा,सीमा पर बन काल।
ओढ़ तिरंगा आ गया,भारत माँ का लाल।

भारत माँ का लाल,गया था माँ से कह कर।
नहीं हिलूँगा मात,गोलियाँ भी मैं सह कर।

ललित

कुण्डलिनी छंद

शादी

भट्टी पर से रोटियाँ,धीरे-धीरे आयँ।
मेकप वाली छोरियाँ,लपक-लपक ले जायँ।

लपक-लपक ले जायँ, हमारे हाथ न आएँ।
सोच रहे हम आज,चलो चावल ही खाएँ।

ललित

कुण्डलिनी छंद
बाल-विवाह

छोटी सी दुल्हन चली,जब दूल्हे के साथ।
रोती थी वो जोर से,काँप रहा था गात।
काँप रहा था गात,गले लगती थी मैया।
बछिया का बलिदान,दे रही हो ज्यों गैया।

ललित

कुकुभ छंद

नमन देश के उन वीरों को,करते सब भारत-वासी।
करी जिन्होंने जाँ न्यौछावर ,उनको करे नमन काशी।
अंत समय जो बोल रहे थे,जय-जय हे! भारत माता।
हो शहीद वो खोल रहे थे,पुण्यों का अद्भुत खाता।

ललित किशोर 'ललित'

कुण्डलिनी छंद

कितने प्यारे हैं सभी,काव्य सृजन के मीत।
मेरी झोली में भरे,शुभ संदेशी गीत।
शुभ संदेशी गीत,सभी के दिल से आए।
आज खुशी के गीत,हृदय मेरा भी गाए।
ललित

कुण्डलिनी छंद

रूप-रंग का है चढ़ा,जिस पर खूब खुमार।
उस नारी से हो गई,अपनी आँखें चार।

अपनी आँखें चार,हुई ऐसी नारी से।
करती है जो प्यार,रूप की फुलवारी से।

ललित

कुण्डलिनी

राधा जैसी प्रीत हो,मीरा जैसा प्यार।
मित्र सुदामा सा मिले,कान्हा जाएँ वार।
कान्हा जाएँ वार,प्रेम-रस के दीवाने।
श्याम प्रेम की खान,राधिका ही ये जाने।

ललित

26.02.19

कुण्डलिनी

ठुमक-ठुमक कर नाचता,छुटका नंदकिशोर।
छोटी सी मुरली लिए,कर में माखन-चोर।

कर में माखन-चोर,लिए माखन जब घूमे।
बाल-सखा सब ग्वाल,तालियाँ दे-दे झूमें।

ललित

कुण्डलिया छंद

बम-गोले बरसा रहा,क्रोधित हिंदुस्तान।
सीना छप्पन इंच का,देखे पाकिस्तान।

देखे पाकिस्तान,काँपती अपनी धरती।
आतंकी क्यों हाय,किए थे पहले भर्ती?

कहे 'ललित' रे! पाक,पाप तू अब भी धोले।
बरसेंगें दिन-रात,नहीं तो ये बम-गोले।

ललित

जयहिंद

धुकुर-पुकुर होने लगी,भारी मचा धमाल।
जब नापाकी खून से,धरा हो गई लाल।

धरा हो गई लाल,लगा मुख पर यूँ ताला।
कहता है इमरान,यहाँ सब कुछ है आला।

ललित

27.02.19
गीतिका छंद

क्या हुआ कैसे हुआ रे,पाक तू कुछ तो बता?

घाव यूँ अपने छुपा कर,शान मत अपनी जता।

क्यों नहीं तू मान लेता,आज भी अपनी
खता?

जो छुपे हैं आतताई,दे हमें उनका पता।

ललित

कौन है कलाकार जो,रच बैठा संसार।

28.02.19
कुण्डलिया छंद
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बम-गोले बरसा रहा,क्रोधित हिंदुस्तान।
सीना छप्पन इंच का,देखे पाकिस्तान।

देखे पाकिस्तान,काँपती अपनी धरती।
आतंकी क्यों हाय,किए थे पहले भर्ती?

कहे 'ललित' रे! पाक,पाप तू अब भी धोले।
बरसेंगें दिन-रात,नहीं तो ये बम-गोले।

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ललित किशोर 'ललित'

28.02.19

भारत के पुष्प..........जयहिंद....!

पुष्प    अनोखे   वो   होते   हैं,
               भारत  में  जोें  पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,
              मुस्कानों   में   ढलते   हैं।
सौरभ उनकी चहुँ-दिशि  फैले,
               दुश्मन  बेबस   रह जाते।
डर जाते हैं आतंकी भी,
               दिल ही दिल में जलते हैं।

 ललित किशोर 'ललित'

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