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समय

सार छंद

टिक-टिक-टिक-टिक करती घड़ियाँ,समय नापती जाती।
अच्छे बुरे पलों की सारी,खबर छापती जाती।
कैसा भी हो समय घड़ी को,फर्क कहाँ है पड़ता?
चलती रहती घड़ियाँ सूरज,गिरता चाहे चढ़ता।

ललित

कुकुभ छंद रचनाएँ

कुकुभ छंद
में रचना

समय

समय बड़ा नखराला भैया,
          नखरे अनगिन करता है।
भोर रुके नहि साँय रुके औ',
            लम्बे डग ये भरता है।
इसे पकड़ नहि पाये कोई,
             बहुत बड़ा ये छलिया रे।
तोड़े ये अभिमान सभी का,
              करत गेहुँ का दलिया रे।

ललित

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...