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मई 2019 रचनाएँ

मई 2019
कर्मठ नारी
मुक्तक

नयनों में हैं सुंदर सपने,सिर पर बोझ तगारी का।

भाल पसीने में है भीगा,ऐसी कर्मठ नारी का।

मजदूरी कर पेट पालना,और पढ़ाना बच्चों को।

मुश्किल काम बड़ा है पर ये,जीवन है खुद्दारी का।

ललित किशोर 'ललित'

साजन-सजनी
प्रदीप छंद
16-13

मधुर-मधुर कल-कल लहरों की,कर्णों में रस घोलती।
पतवारों के दम पर बढ़ती,नैया ढुल-मुल डोलती।
शीतल सुरभित पवन सुहानी,सहलाती जब गात को।
साजन अँखियों में ही कहता,समझो सजनी बात को।

ललित

गोरी के अँगना
प्रदीप छंद
16-13

गोल-गोल मोती सी बूँदें,लेकर बदरा आ
गए।
गोरी के अँगना में रिम-झिम,वो बूँदें बरसा गए।
भिगो दिया गोरी का तन-मन,रंग-रँगीली शाम में।
भीगे वसनों में लिपटी वो,खोई घर के काम में।

ललित

नन्हा कान्हा
प्रदीप छंद
16-13

मैया इक मुरली मँगवा दे,नन्हा कान्हा मचल गया।
मोर-पंख का मुकुट लगाया,नन्हा मोहन बहल गया।
गैया के सँग वन जाऊँगा,लेकर लकुटी साथ में।
ग्वाल-बाल सँग नृत्य करूँगा,लिए बाँसुरी हाथ में।


ललित

05.05.19
दोहा

जीवन की इस दौड़ का,पकड़ न आए छोर।
मन चाहे कुछ और है, मिलता है कुछ और।

' ललित '

मुस्कान
छंद प्रदीप

कुछ बन्दे अंजाने भी हैं,हँसी और मुस्कान से।

कमा न पाए मुस्कानें जो,जीवन की दूकान से।

मन्द-मधुर मुस्कानों की जो,नर हैं कीमत जानते।

अधरों पर मुस्कानें रखने,की वो मन में ठानते।

ललित

मुस्कान
छंद प्रदीप

चुरा न पाए मुस्कानें जो,जीवन की दूकान से।
कुछ बन्दे अंजाने भी हैं,हँसी और मुस्कान से।
मन्द-मधुर मुस्कानों की जो,नर हैं कीमत जानते।
अधरों पर मुस्कानें रखने,की वो मन में ठानते।

ललित

मुस्कान
मुक्तक 

कुछ मुस्कानें ऐसी होती,जादू सब पर जो करें।
कुछ मुस्कानें दीन-दुखी के,दुःख और चिन्ता हरें।
कुछ मुस्कानें पगी प्रीत में,प्रियतम को करती सुखी।
होयँ कुटिल कुछ मुस्कानें जो,नेता नित मुख पर धरें।

ललित 

मुस्कान
हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

अधरों पर मुस्कान,गाल पर लाली।
मदिर-गुलाबी नैन,चाल मतवाली।

मस्त नज़र के तीर,चला कर गोरी।
गयी चली वो हाय,गाँव की छोरी।

ललित

श्रृंगार रस
हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

कल-कल बहती जाय,नदी दीवानी।
सागर के सँग प्यार,करेगी रानी।
मिलने की है चाह,बला की मन में।
लगी अजब सी आग,मचलते तन में।

खारी हो जल-धार,भले साजन की।
लेगी बहियाँ थाम,करेगी मन की।
लग सागर के अंग, नदी बहकेगी।
तन-मन होंगें एक,प्रीत महकेगी।

ललित

आपा-धापी

आपा-धापी में बीता जो,जीवन वो क्या जीवन है?
वो घर भी क्या घर है जिसमें,नहीं लगा तुलसी-वन है?

हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

माँ

माँ है जिसके पास,वही बड़-भागी।
माँ चरणों का खूब,रहे अनुरागी।

करता है जो पूत,मात की सेवा।
बन जाए हर काम,चखे वो मेवा।

ललित

हंस गति छंद
आनंद लीजिए

वृन्दावन सरताज,कन्हैया प्यारा।
बाँका वो नँद-लाल,जगत से न्यारा।

पल में करे कमाल,मटकियाँ फोड़े।
हाथ न आए श्याम ,गोपियाँ दौड़ें।

ललित

14.05.19
कान्हा
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

माखन-मिश्री हाथ में,लेकर कान्हा भागा।
लीला जिसने देख ली,भाग्य उसी का जागा।

छोटा सा नँद-लाल ये,माखन-चोर निराला।
माखन जिसको दे वही, हो जाता मतवाला।

ललित

स्वप्न सुनहरे
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

स्वप्न सुनहरे देखते,जीवन सब का बीते।
कुछ की भरती झोलियाँ,कुछ रह जाते रीते।

धर्म-राज की पोथियाँ,रखतीं सब का लेखा।
पाप-पुण्य जो भी किया,देखा या अनदेखा।

ललित

16.05.19
मन पागल
मुक्तक

मन पागल क्यों मचल रहा है?
क्या भीतर कुछ उबल रहा है?
क्या कोई कविता लिखने को
मन में लेखक टहल रहा है?

अपना जिसको मान रहा था
जिसको अपनी  जान कहा था
मृगमरीचिका सम वो निकली
दिल में जिसका प्यार बहा था।

क्यों अक्सर ऐसा है होता ?
ये दिल जिसके प्यार में खोता
प्यार नहीं उसको है पचता
तब बेबस दिल प्यार है ढोता।

ललित

15.05.19
दिल की बातें
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत


कौन सुने किससे कहूँ,दिल की बातें सारी?
किसने नैया दी डुबो,अरु किसने है तारी?

बेगाने अपने हुए,मीत हुए बेगाने।
नहीं मिला वो मीत जो,दिल की पीड़ा जाने।

ललित

तुलसी
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत


फूलों की हों क्यारियाँ,मनहर सौरभ वाली।
सुंदर फूलों से लदी,हर गुलाब की डाली।

उस घर की तुलना भला,किस मंदिर से होगी।
तुलसी की सेवा जहाँ,करता हो इक योगी।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

वाम नैन के पास जो,छोटा-सा तिल  काला।
गोरी उसने ही मुझे,यूँ पागल कर डाला।

उस पर बाँकी चाल ये,और महकता गजरा।
दिल को घायल कर गया,नैनों का ये कजरा।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद

चाँद चाँदनी से रहे,हरदम कुछ शरमाता।
गोरी सुंदर चाँदनी,रूप बड़ा मदमाता।

टिम-टिम-टिम तारे करें,देख चाँदनी चम-चम।
मधुर-रास में नाचती, राधा-रानी छम-छम।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद

नैना ऐसे मद भरे,जैसे मदिरा प्याले।
अधर मधुर रस से भरे,तरसें पीने वाले।

नखरों की क्या बात है,मटक-मटक वो चलती।
नैनों से जादू चला,दीवानों को छलती।

ललित

मुक्तामणि छंद

कैसा होगा रास वो,कैसी होंगीं बातें?
विश्व-नियंता नाचता,था जब सारी रातें।

व्रज-रज का हर कण जहाँ,गीत प्रीत के गाता।
राधा के सँग गोपियाँ,करती थीं जगराता?

ललित

18.05.19
मुक्तामणि छंद आधारित गीतिका

छोटे से इक गाँव में,नानी जी का घर था।
छोटी सी थी झोंपड़ी,ऊपर इक छप्पर था।

मन्दिर था इक पास में,ठाकुर जी का प्यारा।
ठाकुर जी के बाग में,तुलसी-वन सुंदर था।

मीठे पानी का कुआँ,वहीं एक था गहरा।
मनहर सौरभ से भरा,मन्दिर का परिसर था।

होती थी नित आरती,साँझ ढले मंदिर में।
लगता मुझको तो बड़ा,सुंदर वो मंजर था।

कुल चार बैलगाड़ियाँ,थी नानी के घर में।
पहियों में जिनके कभी,नहीं हुआ पंचर था।

ललित

मुक्तामणि छंद

मैया में श्री राम का,दूत नाम हनुमंता।
ढूँढन आया आपको,दिल में हैं भगवंता।

राम-नाम की मुद्रिका,भेजी है रघुवर ने।
देख मुद्रिका नैन में,लगे अश्रु थे भरने।

ललित


20.05.19
शंकर छंद

वो मुस्कुराकर देख लेना,आपका इक बार।
था जान लेवा ही कसम से,आपका दीदार।
अब रात-दिन मैं देखता हूँ,आपकी तस्वीर।
फिर कर सकूँ दीदार ऐसी,है कहाँ तकदीर।

ललित

20.05.19
शंकर छंद


ऐसी  दिखायी ज़िन्दगी ने,प्यार की तासीर।
अब आगयी है समझ में हर,बागबाँ की पीर।
जो प्यार का गुलशन सजाए,सींच कर दिन-रात।
उस बाग के कब सुमन मानें,बागबाँ
की बात?

ललित 

शंकर छंद

सुन राधिका अब ध्यान से तू,सार की ये बात।
व्रज-गोपियों सँग मैं करूँगा,रास सारी रात।
जब छम-छमा-छम पायलें सब,की बजेंगीं 
खूब।
परमात्म रस बरसात में हर,जीव जाए डूब।

ललित

16:11

चुनाव बीते खत्म हुआ सब,नेताओं का जोश।
इ वी एम में भाग्य बंद कर,जनता है खामोश।
झूठे-सच्चे चैनल खोलें,एग्ज़िट वाली पोल।
जनता के क्या कहने जो अब,हँसती है दिल खोल।

ललित


22.05.19
शब्द युग्म समारोह 258
चयनित युग्म"फटाफट'
स. अ. आ.श्री रवींद्र वर्माजी,सं.आ.कांति शुक्लाजी,
आ.उमा प्रसादजी एवं मंच को निवेदित
दो मुक्तक
1 मुक्तक

फिसल रहा है समय फटाफट,हाथों से अपने।
लेकिन देखे ये चंचल मन,नित्य नए सपने।
सपनों में डूबा मानव मन,भूल गया हरि को।
सुबह-सवेरे निकल पड़े वो,इस जग में खपने।

2 मुक्तक

करना है हर काम फटाफट,नहीं समय है पास।
भाग-दौड़ मानव जीवन का,हिस्सा है अब खास।
दो पल रुककर नहीं करे वो,प्रभु का थोड़ा ध्यान।
धन-दौलत-माया-ममता का,हर मानव है दास।

ललित

22.05.19

शंकर छंद

लव पर लिए मुस्कान ताजा,और स्वर में साज।

पा ले हजारों दर्द दिल में,घूमता नर आज।

जिससे कहे वो पीर दिल की,है कहाँ वो मीत?

डूबा हुए निज दर्द में भी,गारहा वो गीत।

ललित

मुक्तक
अपने दिल को ज़िंदा रख

यश-अपयश सुख-दुख जो आएँ,सबको थोड़ा-थोड़ा चख।
मीत मिलें या दुश्मन सबको,एक नज़र से ही तू लख।
जीवन की नैया तो भैया,डोलेगी डगमग-डगमग।
ज़िंदादिल हो कर जी प्यारे, अपने दिल को ज़िंदा रख।

ललित

शंकर छंद

नदिया ओढ़ चुकी है चुप्पी,आज झरने मौन।
सागर की लहरें चुप-चुप हैं,जिम्मेदार कौन?
बाँध बना छीनी मानव ने,नदी की आवाज़।
मानव ने दानव बन कर दी,बंजर धरा आज।

ललित
23.05.19
दोहे
हाथों के तोते उड़े, हुए शर्म से लाल।
धोती-कुर्ता कर सका,नहीं कोई कमाल।


वो  चिल्लाते रह गए,  चोर है चौकीदार।
दिखा अँगूठा बन गई, चोरों की सरकार।


24.05.19

शंकर छंद

मनमोहना तेरे सिवा है,और मेरा कौन?
यूँ मोह-माया ने छला मैं,हो गया हूँ मौन।
कर दे कृपा घनश्याम ऐसी,आत्म का हो ज्ञान।
अपने-पराए सब भुला निशि,दिन करूँ मैं ध्यान।

ललित

शंकर छंद

जो बात मन को मथ रही वो,क्यों न कह दूँ आज?
क्यों ज़िन्दगी हर-पल दिखाती,इक नया अंदाज़?
इक पल सुनहरापन लिए तो,दूसरा रँग हीन।
इक क्षण भरा आनंद से तो,दूसरा ग़मगीन।

ललित 
शंकर छंद

ये ज़िंदगी इक खेल ही है,मानलो ये बात।
हर पल यहाँ मिलती नए इक,दर्द की सौगात।
हँसकर सहे हर दर्द को जो,है वही जाँबाज।
वो है सफल इंसान पहने ,दर्द का जो ताज।

ललित

शंकर छंद

यह भोर की बेला सुहानी,दे रही संदेश।
है मुस्कुराहट से भरा हर,प्रात का परिवेश।
मुस्कान कुछ उससे चुरा तुम,मुस्कुराओ मीत।
फिर चहचहाहट में परिंदों,की सुनो संगीत।

ललित


दिल पर लगा जो घाव वो है,सालता दिन- रात।

शंकर छंद
कुछ यूँ ही

जो चाँद धरती पर बिखेरे,
चाँदनी का नूर।
है वो धरा का चंद्रमा क्यों,
आज इतना दूर?
जिस चाँदनी से है चमकता,चाँद का  संसार।
वो चाँदनी निश्छल करे क्या,
चाँद से है प्यार?

ललित

शंकर छंद
ट्रेन में से

जो आँसुओं का दर्द समझें,वो कहाँ नर खास।
सब सेल्फियों में भूल जाते,दर्द का अहसास।
मरती न मानवता अगर यूँ,कैमरे में आज।
तो जान बच जाती किसी की,मौत आती बाज।

ललित


शंकर छंद
ट्रेन में से


जितना करो अभ्यास उतनी, लय पकड़ में आय।
माँ शारदे फिर लेखनी को,शब्द देती जाय।
हो छंद कोई भी मगर हो ,लेखनी में जोश।
रचना बने फिर खूबसूरत,बद्ध-लय बिन दोष।

ललित


जो घोंसला है नित बनाती,जोड़ तिनके बेशुमार।
है होगये हमतो उसी की,चहचहाहट पे निसार।


28.5.19

बाँसुरी
कुण्डल छंद

बाँसुरी की मनुहार,राधिका न माने।
छूती क्यों श्याम-अधर,जिया को जलाने।

राधा का कृष्ण-प्यार,जलन को बढ़ाए।
बाँसुरिया अधर धरे,श्याम मुस्कुराए।

ललित

बाँके बिहारी
कुण्डल छंद

बाँके-बिहारी सुनो,भक्त ये पुकारे।
चार कदम चलो साथ,दीन के सखा रे।

भक्त-माथ धरो हाथ,मोर-मुकुट धारी।
ले चलना श्याम जहाँ,चाह हो तुम्हारी।

ललित

भाव
कुण्डल छंद

मन में जो भाव उठें,शब्द में पिरोना।
कुण्डल है खास छंद,ताल-लय भरोना।
एकदंत दयावंत ,चार भुजा धारी।
इसी छंद लिखी गयी,आरती उतारी।

ललित

30.5.19

प्यार का पुजारी
कुण्डल छंद

अँखियों में प्रीत लिए,प्यार का पुजारी।
सजनी की राह तके,रात-रात सारी।

शशी ओर हाथ उठा,माँगता दुआ ये।
रुके रहो चाँद जरा,भोर हो न जाए।

ललित

विष्णु पद


विष्णुपद
सपना

सपनों से अब नाता तोड़ो,समझो जीवन को।
सपनों की माया में क्यों तुम,उलझाते मन को।
चंचल मानव-मन को हरदम,बहलाता सपना।
सपना वो ही तोड़ेगा जो,कहलाता अपना।
ललित

विष्णुपद छंद
अरजी

रद्दी में मत डाले कान्हा,मेरी ये अरजी।
अरजी तो पढ़ले तू करना,तेरी जो मरजी।
चरण-शरण में ले ले मुझको,अपना दास बना।
या मुझको तू अर्जुन जैसा,चेला खास बना।
ललित किशोर 'ललित'

फूल कहे काँटों से भैया,ध्यान ज़रा रखना।
दानव भौंरे जबरन चाहें,रस मेरा चखना।
प्रीत उसी से होती है जो,दिल से प्यार करे।
रस का लोभी भँवरा हरदम,छुपकर वार करे।
ललित

विष्णुपद
असली नकली

जिनके नथुनों में सौरभ के,बीज नहीं उगते।
नकली फूल उन्हें असली से,सुंदर हैं लगते।
असली नकली की माया में,मानव उलझ गया।
नकली सीता को हरकर भी,रावण सुलझ गया।
ललित

नारी शक्ति

1

सिंहावलोकन घनाक्षरी

नारी से ही ये समाज,
नारी से ही शोभे-साज।
नारी से ही जिन्दगी में,
प्यार की रवानियाँ।

प्यार की रवानियाँ जो,
जीवन सरस करें।
मधुर सुहास भरें,
प्रेम की दिवानियाँ।

प्रेम की दिवानियाँ ये,
प्रेम रस बरसायें।
सजन को हरषायें,
घर की ये रानियाँ।

घर की ये रानियाँ जो,
घर को सजा के रखें।
खुश रहें जहाँ सभी,
सास-देवरानियाँ।

ललित

2

कुण्डलिया छंद

जितने हैं गिरगिट यहाँ,अरु जितने हैं साँप।
दुर्गा माँ भी देखके,लेती है सब भाँप।

लेती है सब भाँप,गरल मय हवा चली है।
मान बड़ा अभिशाप,कली नाजुक मसली है।

कहे 'ललित' परिणाम,कहर ढायेंगें इतने।
रहें कुआँरे पूत,जनम अब लेंगे जितने।

'ललित'
नारी शक्ति
21.04.16

3
तोटक छंद

जिसके घर में बिटिया चहके।
घर स्वर्ग समान सदा महके।।
वह चंचल वायु समान रहे।
बन शीतल प्रेम प्रवाह बहे।

जब मात पिता पर पीर परे।
तब वो बिटिया तदबीर करे।।
मत सोच कभी घटिया रखना।
लछमी सम ही बिटिया रखना।।

'ललित'
नारी शक्ति
19.4.16
4
तोटक छंद

कुछ और नहीं मुझको कहना।
मत आज कहो मुझको बहना।।
जब लाज लुटे चुप हो रहते।
तब घाव हरे दिल के बहते।।

'ललित'
...................
आज अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष
दो कविताएं
1
परी कहो बेटी कह लो या,बिटिया रानी बोलो।
प्यारी सी सुंदर गुड़िया के,जीवन में रस घोलो।
उसे पढा दो और लिखा दो,इतना तो तुम भाई।
हँसते-हँसते पार करे वो,जीवन में हर खाई।
'ललित'

2
सुर साज सजे बजता तबला।
अब नार कहो न कहो अबला।।
करती सच आज सभी सपने।
फिर साथ चलें न चलें अपने।।
'ललित'

...............................................
6

जलहरण घनाक्षरी

कन्या भ्रूण हत्या
अजन्मी की व्यथा

मुख मत मोड़ना माँ,मुझे मत मारना माँ।
तेरी परछाई हूँ मैं,कातिल ये जहान है।

चलती है पुरवाई,बरखा है बरसती
दुनिया है फुलवारी,गायब बागबान है

लहराता समंदर,ऊपर नीला अम्बर।
सतरंगी बहार है,ये प्यारा गुलिस्तान है।

घूमी लख चौरासी मैं,मानुष योनि पाने को।
मुझको भी देखने दे,दुनिया आलीशान है।

'ललित'
नारी शक्ति
3.4.16
.............................................
7

रोला छंद
बेटी

देखा ये संसार,देख ली बातअनोखी।
बेटे से है प्यार,लगे बेटी कब चोखी।

कुदरत का उपहार,सुता से बड़ा न देखा।
बेटी से बलवान,भाग्य की होती रेखा।

पाल पोस कर एक,दान कन्या का करता। है वह इंसाँ नेक,पुण्य से झोली भरता।

'ललित'

8

10

मुक्तक 

28 मात्रा भार में
14  ..14 की यति पर
       
चलो इक बार फिर से हम,
           नयी दुनिया बसाते हैं।
नयी सुर-ताल सरगम पर,
           नया इक गीत गाते हैं।
गिले-शिकवे दिलों में जो,
           दिलों में ही दफन कर दें।
चलो पतवार बनकर हम,
            भँवर को भी हराते हैं।

'ललित'

हरिगीतिका छंद
16:12
बाल विवाह

बाली उमर में ब्याह जीवन ,नष्ट मत कर दीजिए।
पढ़-लिख बनूँ मैं आत्म-निर्भर,नेक अवसर दीजिए।
नाजुक कली हूँ बाग की मैं,रौंद यूँ मत डालिये।
सौरभ बनूँ इस बाग की मैं,नेह से यूँ पालिये।।

ललित

हरि गीतिका
बाल विवाह
क्या भूल मुझसे होगयी माँ,त्याग जो मुझको रही।
यदि प्यार करती है मुझे तू,ज्ञान दे मुझको सही।
बाली उमर में ब्याह मत माँ,दे मुझे परवाज तू।
इस बाग की नाजुक कली को,दे विदा मत आज तू।
देखा नहीं जाना नहीं है,जिंदगी के खेल को।
तू दे सहारा बेसहारा,बाग की इस बेल को।
देखे निराले स्वप्न मैं ने,क्या बताऊँ माँ तुझे।
हों स्वप्न वो साकार माँ दे,एक मौका तू मुझे।

'ललित'

दोहे
1 अजन्मी बेटी की व्यथा

मैया तेरी कोख का,मैं इक नन्हा बीज।
बनने दे पौधा मुझे,मत तू मुझ पर खीज।।

बेटा-बेटी हैं सदा,इक डाली के फूल।
बेटी दो कुल तारती,कभी न जाना भूल।।

दुनिया मैं भी देखना,चाहूँ मैया तात।
कैसे होते फूल हैं,कैसे होते पात।।

आँगन पावन हो वहाँ,सुता रखे जहँ पाँव।
सब का मन शीतल करे,ज्यों तुलसी की छाँव।।
ललित

सार छंद
3 प्रयास

नारी के अंतर्मन का दुख,कब किसने है जाना?
जननी है वह इस जीवन की,कहाँ किसी ने माना?
रमणी की नजरों से देखा,मिला जहाँ जब मौका।
इसीलिए तो डूब रही अब,मानवता की नौका।
'ललित'

[12/06 19:13] L K. Gupta 'ललित': सार छंद
3 प्रयास

नारी के अंतर्मन का दुख,कब किसने है जाना।
जननी है वह इस जीवन की,कहाँ किसी ने माना।
रमणी की नजरों से देखी,मिला जहाँ जब मौका।
इसीलिए है डूब रही अब,मानवता की नौका।
'ललित'
[12/06 19:13] L K. Gupta 'ललित': सार छंद
7 प्रयास

परी कहो बेटी कह लो या,बिटिया रानी बोलो।
प्यारी सी सुंदर गुड़िया के,जीवन में रस घोलो।
उसे पढा दो और लिखा दो,इतना तो तुम भाई।
हँसते-हँसते पार करे वो,जीवन में हर खाई।
'ललित'
[12/06 19:13] L K. Gupta 'ललित': सार छंद
1 प्रयास

नारी की महिमा है न्यारी,कहती दुनिया सारी।
वनिता यों महकाती घर को,जैसे हो फुलवारी।
हर महान मानव के पीछे,इक औरत है होती।
नारी ही जनती जीवन को,पाल कोख में मोती।
'ललित'
[12/06 19:13] L K. Gupta 'ललित': सार छंद
2 प्रयास

ईश्वर की सुंदरतम कृति ये,नारी जग महतारी।
बोझ उठाती है घर भर का,दुख से कभी न हारी।
शिकवा और शिकायत करना,इसने कभी न जाना।
जिस घर में वनिता खुश रहती,वह घर लगे सुहाना।

'ललित'
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सिंहावलोकन घनाक्षरी रचनाएँ

02.11.15

सिंहावलोकन घनाक्षरी

1
भजन

कभी जगदीश प्यारा,
सिंह जैसा दिखता है।
हिरणकशिपु को ज्यों,
नरसिंह दीखा था।

नरसिंह दीखा नाथ,
मौत जैसे हो साक्षात ।
काल के कराल हाथ,
विकराल चीखा था,

विकराल चीखा काल,
नखों से करे प्रहार।
गोद बैठाल वो तो,
वार किया तीखा था।

वार किया तीखा नोंच,
दिन  था न वो थी रात।
असुर को दिया मार,
चींटी के सरीखा था।

ललित

सिंहावलोकन घनाक्षरी
2
जिन्दगी

जिन्दगी के दिन चार,
             हँस के गुजारो यार।
गमों से कभी भी आप,
             दिल न लगाईये।
दिल न लगाईये जी,
              सदा मुसकुराईये।
प्यार के दो मीठे बोल,
              बोलते ही जाईये।
बोलते ही जाईये जी,
               प्रेम-रस घोल-घोल।
किसी के भी दोष आप,
                कभी न दिखाईये।
कभी न दिखाईये जी,
                गुण बस गिनाईये।
बहारों की दुनिया में,
                 पुरवा बहाईये।
ललित

 सिंहावलोकन घनाक्षरी
3
प्यार

प्यार मनुहार चाहे,नैनों में खुमार चाहे।
प्रीत बेशुमार चाहे,बात न भुलाईये।

बात न भुलाईये जी,प्यार से ही जिन्दगी है।
प्रेम बड़ी बन्दगी है,दीप ये जलाईये।

दीप ये जलाईये जी,मन उजियार होवे।
प्रभु से ही प्यार होवे,बात मान जाईये।

बात मान जाईये जी,झूठा ये संसार सारा।
झूठा यहाँ प्यार सारा,ईश को मनाईये।

ललित

3.11.15

सिंहावलोकन घनाक्षरी
4
वक्त

वक्त के हजार हाथ,
वक्त कहे सुनो बात।
वक्त के ही सदा साथ,
हाथ तो मिलाईये।

हाथ तो मिलाईये जी,
वक्त बड़ा कारसाज।
वक्त करे परवाज,
भूल तो न जाईये।

भूल तो न जाईये जी,
वक्त-वक्त की ये बात।
वक्त संग दिन-रात,
कदम बढ़ाइये।

कदम बढ़ाइये जी,
चाहे खुशी हो या ग़म,
हरदम रहो सम।
सदा मुस्कुराइये।

'ललित'

सिंहावलोकन घनाक्षरी
5
शारदा

शारदा का होवे साथ,
मन में हों जजबात।
थाम पेन कागजात,
लिखते ही रहना।

लिखते ही रहना वो,
जो भी देखो भेद-भाव।
दुखियों के हरे घाव
लखते ही रहना।

लखते ही रहना वो,
कुरीति समाज में जो।
आईना समाज के तो,
बनते ही रहना।

बनते ही रहना जो,
होवे बड़ा आततायी।
सदा उसकी कलाई,
खोलते ही रहना।

ललित
राधा गोविंद 15.2.17
सिंहावलोकन घनाक्षरी
6
प्रार्थना

थक गये अब नाथ,
नैया खेते मेरे हाथ।
आप ही सँभालो अब,
पतवार नाव की।

पतवार नाव की लो.
थाम करकमलों में।
झलक दिखादो जरा,
दयालु स्वभाव की।

दयालु स्वभाव की वो,
छवि तारणहार की।
दवा आज दे दो प्रभु,
मेरे हर घाव की।

मेरे हर घाव की वो,
दवा राम नाम की जो।
लगन लगा दो तव,
चरणों में चाव की।

ललित

04.11.15

सिंहावलोकन घनाक्षरी

7
प्रार्थना
स्वामी राम सुख दास जी के द्वारा
बतायी गयी प्रार्थना को सिंहावलोकन घनाक्षरी छंद में प्रस्तुत करने का तुच्छ प्रयास किया है।

प्रार्थना यही है नाथ,
लगो मुझे प्यारे आप।
एक यही मेरी माँग,
हाथ मेरा थामना।

हाथ मेरा थामना यूँ,
चाह करूँ स्वर्ग की तो।
नर्क मुझे भेज देना,
ये है मनोकामना।

ये है मनोकामना जी,
नहीं मिले मुझे चैन।
होय नहीं जब तक,
आप से ही सामना।

आप से ही सामना जी,
आप सिवा कौन मेरा।
कहूँ कासे,कौन सुने,
विनती महामना।

ललित

क्रमश:

सिंहावलोकन घनाक्षरी
8

प्रार्थना
भाग २

जाऊँ कहाँ दीनानाथ,
कोई नहीं देता साथ।
कर्त्तव्य विमूढ मन,
न यहाँ कोई मेरा।

यहाँ कोई नहीं मेरा,
जिन्हें मानता था मेरा।
उन से ही धोखा खाया,
जीवन है अंधेरा।

जीवन अंधेरा आज,
अनाथों के तुम नाथ।
पतित पावन प्रभु,
कर दो ना सवेरा।

कर दो सवेरा नाथ,
पापी कैसा तेरा दास।
जानते हो तुम तो ये,
लख चौरासी फेरा।

ललित
क्रमश:

सिंहावलोकन घनाक्षरी
9
प्रार्थना
भाग ३

एक आप ही आधार,
निराधार के हो नाथ।
प्रभु आप ही साधन,
साधनहीन के हो।

साधन हीन के आप,
दीनबंधु करतार,
सारे हर लो विकार,
मालिक दीन के हो।

सिंहावलोकन घनाक्षरी
10
शादी

जिसने करी न शादी,
उम्र होने आई आधी।
उसकी तो मानो यारों,
मति गयी मारी है।

मति गयी मारी है वो,
फिरे ब्रम्हचारी जैसे।
बिना नारी बरबाद,
जिन्दगी ही सारी है।

जिन्दगी ही सारी है वो,
कर रहा चूल्हा-चौका।
यार-बाजी में ही देखो,
जिन्दगी गुजारी है।

जिन्दगी गुजारी है ये,
पड़ोसी की मेख देख।
वहाँ दिखती जो रोज,
प्यारी एक नारी है।

ललित

सिंहावलोकन घनाक्षरी

11
नारी

नारी से ही ये समाज,
नारी से ही शोभे-साज।
नारी से ही जिन्दगी में,
प्यार की रवानियाँ।

प्यार की रवानियाँ जो,
जीवन सरस करें।
मधुर सुहास भरें,
प्रेम की दिवानियाँ।

प्रेम की दिवानियाँ ये,
प्रेम रस बरसाये।
सजन को हरषाये,
घर की ये रानियाँ।

घर की ये रानियाँ जो,
घर को सजा के रखें।
खुश रहें जहाँ सभी,
सास-देवरानियाँ।

ललित

06.11.15
12
सिंहावलोकन घनाक्षरी

दिवाली स्पेशल
एक दिवाली ऐसी भी
भाग १

बूढ़े मात-पिता आज,
हुए देखो मोहताज।
दूर से ही देख रहे,
घर में दिवालियाँ।

घर में दिवालियाँ जो,
मना रहे सुत सभी।
हँस-हँस बात करें,
बजा रहे तालियाँ।

बजा रहे तालियाँ वो,
बच्चे भी चहक रहे।
दूर से ही दिख रही,
मिष्ठानों की थालियाँ।

मिष्ठानों की थालियाँ वो,
घाव हरे कर रहीं।
मात-पिता याद करें,
सुत की वो गालियाँ।

ललित
क्रमश:

सिंहावलोकन घनाक्षरी

13

दिवाली स्पेशल
भाग २

नये-नये वसनों में,
नये-नये गहनों में।
सज रहे सारे आज,
जैसे राजा-रानियाँ।

जैसे राजा-रानियाँ वो,
घर में उजाला करें।
मात-पिता मन में हैं,
गहरी वीरानियाँ।

गहरी वीरानियाँ ये,
आँखों में ही दिख रही।
ढूँढ रही अपनों में,
अपनी निशानियाँ।

अपनी निशानियाँ जो,
भूल गयी अपनों को।
खोज रहे उनमें ही,
अपनी जवानियाँ।

ललित

सिंहावलोकन घनाक्षरी

14

मायावी दुनिया

चल रही फेस-बुक,
और वाट्सेप पर।
आज देखो दुनिया ये,
और सब यारियाँ।

और सब यारियाँ जो,
टिकी झूठ पर सदा।
उनमें फँसी हैं देखो,
आज सब नारियाँ।

आज सब नारियाँ ये,
और नर भूल रहे।
सीधा-सादा जीवन औ'
प्यारी फुलवारियाँ।

प्यारी फुलवारियाँ जो,
महकायें जीवन को।
आन लाईन करते,
सारी खरीदारियाँ।

ललित

सिंहावलोकन घनाक्षरी

15

जन्म दिन शुभकामना

दिन ये हजार बार,
आये बार बार भाभी।
नयी नयी खुशियाँ भी,
लाये ये अपार जी।

लाये ये अपार सदा,
धन-धान्य पूर रहे।
घर में भी छायी रहे,
सदा ही बहार जी।

सदा ही बहार रहे,
बगिया में आपकी।
चँदा और चाँदनी सा,
बना रहे प्यार जी।

बना रहे प्यार ऐसा,
कान्हा और राधा जैसा।
खुशियों से भरा रहे,
आपका संसार जी।

ललित
सिंहावलोकन घनाक्षरी
प्रार्थना

थक गये अब नाथ,
नैया खेते मेरे हाथ।
आप ही सँभालो अब,
पतवार नाव की।

पतवार नाव की लो.
थाम करकमलों में।
झलक दिखादो जरा,
दयालु स्वभाव की।

दयालु स्वभाव की वो,
छवि तारणहार की।
दवा आज दे दो प्रभु,
मेरे हर घाव की।

मेरे हर घाव की वो,
दवा राम नाम की जो।
लगन लगा दो तव
चरणों में चाव की।

ललित

शुभ दीपावली

दीवाली हजार बार,
आये बार-बार-बार।
नयी नयी खुशियाँ भी,
लाये ये अपार जी।

लाये ये अपार सदा,
धन-धान्य पूर रहे।
घर में भी छायी रहे,
सदा ही बहार जी।

सदा ही बहार रहे,
बगिया में आपकी।
चँदा और चाँदनी सा,
बना रहे प्यार जी।

बना रहे प्यार ऐसा,
कान्हा और राधा जैसा।
खुशियों से भरा रहे,
आपका संसार जी।

ललित किशोर 'ललित'

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