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नवम्बर 2018 रचनाएँ

ऐनवम्बर 2018 (ई मेल)

सिंहावलोकन घनाक्षरी

एक अलबेली नार
अँखियों में लिए प्यार
झरोके से झाँककर
कुण्डी खड़का गई ।

कुण्डी खड़का गई वो
काले घुँघराले बाल
झटक-झटक कर
जिया धड़का गई ।

जिया धड़का गई जो
बोले मीठे-मीठे बोल
अधरों को कर गोल
नैन फड़का गई।

नैन फड़का गई जी
गजगामिनी सी चाल
छम-छम चलकर
डाल तड़का गई।

ललित

सिंहावलोकन घनाक्षरी

साँवरा वो नंद-लाल
सँग लिए ग्वाल-बाल
मधुर-मधुर वंशी
वन में बजा रहा।

वन में बजा रहा वो
राधा जी का चित-चोर।
मनोहर छवि देख
मदन लजा रहा।

मदन लजाए देख
घुँघराले काले बाल।
मोर-मुकुट शीश
साँवरा सजा रहा।

साँवरा सजा रहा वो
मटक-मटक कर।
नैनों से इशारे कर
राधा को खिजा रहा।

ललित

सिंहावलोकन घनाक्षरी

तीरथ किए तमाम
कर लिए चारों धाम।
मगर न साफ हुआ
मन में जो मैल था।

मन में जो मैल भरा
काम-राग-द्वेष भरा।
चलता उसीसे सदा
वासना का खेल था।

वासना का खेल छोड़
ममता की डोरी तोड़।
माया रूपी बन्धनों से
बना हुआ जेल था।

बना हुआ जेल था जो
सपनों का खेल था वो।
सपनों की दुनिया में
बना तू पटेल था।

ललित

शंकर छंद

प्यारी तेरी माया नगरी,साँवरे घनश्याम।
भोर सुनहरी सुंदर प्यारी,झिलमिलाती शाम।
दोपहरी में सूरज तपता,आग उगले धूप।
जितनी जलती धरती उतना,अन्न पके अनूप।

ललित

शंकर छंद

कितने ख्वाब पलें इस दिल में,अंत जाएँ टूट?
सपनों की माया नगरी में,भाग्य जाएँ फूट।

स्वप्नों की दुनिया से नाता,तोड़ मेरे मीत।
दौड़ हकीकत की धरती पर,निश्चित देख जीत।

ललित

शंकर छंद

जीवन की ये भूल-भुलैया,राह बदले खूब।
कुछ तर जाएँ भव से कुछ की,नाव जाती डूब।
पथरीले कंटकयुत पथ को,मान ले सौगात।
उस मानव को राह दिखाए,घोर काली रात।

ललित

शंकर छंद

कजरारे नयनों से छोड़े,राधिका जो तीर।
कान्हा जी का कोमल-कोमल,हृदय देते चीर।
बाँसुरिया बजना भूले जब,राधिका हो पास।
पायल की छम-छम से होता,अलौकिक आभास।

ललित

शंकर छंद

भीड़ बीच भी खुद को पाता,मैं अकेला आज।
आर्केस्ट्रा के सब दीवाने,मैं पुराना साज।
नए जमाने के बदलावों,को मेरा सलाम।
पिज्जा-बर्गर खाते दिखते,फैशन के गुलाम।

ललित

दोहे

कान्हा सुंदर साँवरे,विनती कर स्वीकार।
बीच भँवर नैया फँसी,तू ही खेवनहार।

नौका की चिन्ता नहीं,मुझको ऐ घनश्याम।
हाथ यहाँ थामे रहे,तू जो आठों याम।

ललित

शंकर छंद
गर्भ से बेटी की पुकार

माँ तू मुझको पैदा करके,मत होना उदास।
लड़की हूँ पर हिम्मत है माँ,खूब मेरे पास।

महका दूँगी तेरी बगिया,रौशन करूँ नाम।
थामूँगी तुझको मैं इक दिन,मुझको अभी थाम।

ललित

शंकर छंद

मैया मत कर शादी मेरी,मान इतनी बात।
छोटी सी गुड़िया मैं तेरी,कच्चा अभी गात।

शिक्षा मेरी अभी अधूरी,पढूँ ये है चाह।
पढ-लिख कर ही दिख सकती है,मात सच्ची राह।

ललित

शंकर छंद

उद्धव जी हम प्रेम दिवानी,छोड़ जग के काम।
हृदय हमारे में है बसता , साँवरा घनश्याम।
ध्यान-धारणा और तपस्या,योगियों सा ज्ञान।
नहीं जानतीं मगर हमारी,श्याम में है जान।

ललित

शंकर छंद

जीवन की आपा-धापी में,दौड़ आठों याम।
भूल गया था लेना मैं ओ,श्याम तेरा नाम।

माफ मुझे कर देना रखना,शीश पर तू हाथ।
नाम जपूँगा कान्हा मैं हर,साँस के ही साथ।

ललित

26.11.18

श्रृंगार छंद
1

जय-जय-जय-जय-जय सियाराम।
लिया जिसने भी पावन नाम।
बने हैं उसके बिगड़े काम।
अंत गया वो वैकुण्ठ-धाम।

ललित

श्रृंगार छंद

नमो नमस्ते श्री गणराय।
नमः नमः ऊँ नम: शिवाय।
अम्बिका माता करो सहाय।
सदाशिव भोला शंभु कहाय।

ललित

श्रृंगार छंद

सुना है हमने ओ घनश्याम।
तुम्हें प्यारा है ये व्रजधाम।
यहीं पनपी राधा सँग प्रीत।
यहीं गाए गोपी सँग गीत।

चुराया माखन मचा धमाल।
मधुर वंशी ने किया कमाल।
रचाया रास चाँदनी रात।
आत्म-रस में डूबे सब गात।

ललित

श्रृंगार छंद

बाग से चुन-कर सुंदर फूल।
कन्हैया आए यमुना कूल।
बना कर मधुर मनोहर हार।
किया राधा जी का श्रृंगार।

प्यार का गजरा पहन अनूप।
खिला राधा जी का रँग-रूप।
अलौकिक सौरभ से भरपूर।
राधिका की वेणी का नूर।

ललित

श्रृंगार छंद

सजा है कान्हा का दरबार।
ग्वाल सब बोलें जय-जय कार।
बाँसुरी वाला वो नँदलाल।
बजाए वंशी बड़ी कमाल।

चुराए माखन माखन-चोर।
साँवरा प्यारा नंदकिशोर।
खिलाकर मिश्री-माखन-भोग।
हरे भव-बन्धन रूपी रोग।

ललित

श्रृंगार छंद

साँवली सी इक सुंदर नार।
गले में पहन नौलखा हार।
चली इठलाती बीच बजार।
हाथ में पहने कंगन चार।

बजें छम-छम-छम पायल पाँव।
चले गजगामिनि झूमे गाँव।
लिए दिल में साजन का प्यार।
नैन में सपनों का संसार।

ललित

श्रृंगार छंद गीत

किसी को जितना तुमसे प्यार।
करो हँसकर उतना स्वीकार।
मिलो खुश होकर उतने यार।
किसी को जितना.........

नहीं होती है जबरन प्रीत।
मिलें मुश्किल से मन के मीत।
प्रीत की समझोगे जब रीत।
तभी पाओगे जग को जीत।
मिलेंगें ऐसे भी कुछ मित्र,
छोड़ देंगें तुमको मझधार।
किसी को जितना.........

कभी जब होने लगो हताश।
मित्र सब करदें तुम्हें निराश।
रखो तब मन में ये विश्वास।
कभी तो पूरी होगी आस।
नैन में जिसके देखो प्रेम,
उसीका मानो तुम उपकार।
किसी को जितना.........

जगत के सब बंधन बेकार।
लिए सब काँटों के गलहार।
ईश ही है इक सच्चा यार।
करो मन ही मन उससे प्यार।
बाँध लो उससे मन की डोर,
करे जो सबका बेड़ा पार।
किसी को जितना.........

ललित

श्रृंगार छंद
'स' शब्द से....

समस्या आज बड़ी गम्भीर।
सभी नेता खो बैठे धीर।
सुनें कब जनता की वो पीर।
सहेजें खुद अपनी ही खीर।

स्वप्न सब दिखलाते रंगीन।
सुरीली खूब बजाते बीन।
सुनेगी कब तक जनता दीन।
सुरीले बोलें नेता तीन।

ललित

श्रृंगार छंद
'स' शब्द से....

शारदे मात अरज है आज।
सदा रखना तुम मेरी लाज।
सहज सुंदर शीतल हों छंद।
सुहानी सुरभित शामें चंद।

शब्द संयोजन हो कुछ खास।
समेटे ईश्वर का अहसास।
सुरीली लय में हो जब गान।
सुरों में आए अद्भुत शान।

ललित

श्रृंगार छंद

दुलारी प्यारी बिटिया आज।
हमारे दिल पर करती राज।
करें हम उसको इतना प्यार।
नहीं है जिसका पारावार।

खिलौना जाता है जब टूट।
तभी वो हमसे जाती रूठ।
मनाना उसको तब हे!राम।
बड़ा मुश्किल होता है काम।

ललित

श्रृंगार छंद
टूटा फूटा प्रयास

साथ साजन सजती सारंग।
सुरीला सावन साजन संग।
सुनाएँ सखियाँ सब संगीत।
शर्म से सजी सुहानी प्रीत।

रैन में लगे बहकने नैन।
होगया है जियरा बेचैन।
नैन में नैन दिए यूँ डाल।
शर्म से लाल होगए गाल।

ललित

श्रृंगार छंद

चले तुम कहाँ गए दिलदार।
हुआ सूना मेरा संसार।
छा रहे बादल नभ में आज।
देख बजते हैं दिल में साज।

मोटरें आती हैं दिन-रात।
देख भड़कें दिल में जजबात।
चले तुम आओ जी इक बार।
छेड़ने मेरे दिल के तार।

ललित

श्रृंगार छंद
चित्र आधारित

राधिका कर लो ये विश्वास।
सदा से श्याम तुम्हारा दास।
रखूँ वंशी अधरों से दूर।
करो मत मुझको यूँ मजबूर।

बाँसुरी से है मेरी आन।
मगर तुम तो हो मेरी जान।
इशारों में समझो ये बात।
रास करना है सारी रात।

ललित

गीत(प्यार,माँ,लाडली,कामिनी,राधिका,बुढ़ापा,जवानी,आँख,आँसू,कान्हा,करुणानिधि,ज्ञान,प्रेम,ऊधो,घाव)

14.04.19

गीत (रोला छंद)

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जिस पर है विश्वास,वही दिल को तोड़ेगा।
जो है अपना खास,वही फिर मुख मोड़ेगा।
सहलाता है घाव,नहीं शीतल सावन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जो होता फनकार,यशस्वी वो हो जाता।
दुनिया भर का प्यार,उसे फन है दिलवाता।
दिल के गहरे घाव,नही भर पाता फन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

ईश्वर से विश्वास,कभी यूँ ही उठ जाता।
जिसकी टूटी आस,नहीं फिर वो उठ पाता।
भर देता है घाव,कभी जानी दुश्मन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जीवन भर तो साथ,नहीं तन भी दे पाता।
विषम रोग में साथ,नहीं धन भी दे पाता।
भरे उसी के घाव,करे जो यहाँ भजन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

'ललित'

श्रृंगार छंद गीत

किसी को जितना तुमसे प्यार।
करो हँसकर उतना स्वीकार।
मिलो खुश होकर उतने यार।
किसी को जितना.........

नहीं होती है जबरन प्रीत।
मिलें मुश्किल से मन के मीत।
प्रीत की समझोगे जब रीत।
तभी पाओगे जग को जीत।
मिलेंगें ऐसे भी कुछ मित्र,
छोड़ देंगें तुमको मझधार।
किसी को जितना.........

कभी जब होने लगो हताश।
मित्र सब करदें तुम्हें निराश।
रखो तब मन में ये विश्वास।
कभी तो पूरी होगी आस।
नैन में जिसके देखो प्रेम,
उसीका मानो तुम उपकार।
किसी को जितना.........

जगत के सब बंधन बेकार।
लिए सब काँटों के गलहार।
ईश ही है इक सच्चा यार।
करो मन ही मन उससे प्यार।
बाँध लो उससे मन की डोर,
करे जो सबका बेड़ा पार।
किसी को जितना.........

ललित

01.08.16

गीतिका छंद
गीत

गम विदाई का तुम्हारी,माँ मुझे दहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को,आज भी सहला रहा।

रोज पाता था जहाँ मैं,दो जहाँ का प्यार माँ।
खोजता मैं फिर रहा हूँ,फिर वही संसार माँ।
वो तुम्हारी झिड़कियाँ भी,याद आती हैं मुझे।
आज भी जो मुश्किलों में,पथ दिखाती हैं मुझे।

ये तुम्हारा ढीठ बबुआ,आदमी कहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को आज भी सहला रहा।

याद मुझको आ रही हैं,प्यार की वो थपकियाँ।
औ'तुम्हारी गोद में ली,नींद की वो झपकियाँ।
वो तुम्हारा गोद में ले,चूमना भी याद है।
फिर मुझे झूले झुलाकर ,झूमना भी याद है।

माँ तुम्हारे नैन का मैं,स्वप्न था पहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को आज भी सहला रहा।

जिन्दगी की जंग लड़ना,माँ तुम्हीं सिखला गईं।
बन्दगी का रासता भी,हाँ तुम्हीं दिखला गईं।
नेकचलनी भी सिखाई,माँ तुम्हीं ने थी मुझे ।
प्यार की हर धुन सुनाई,माँ तुम्हीं में दी मुझे।

आज हर इक शख्स मुझको,झूँठ से बहला रहा।
वो तुम्हारा स्नेह मन को आज भी सहला रहा।

ललित

02.08.16

हरि गीतिका
गीत

अब छोड़ ये घर आँगना ये,लाडली तेरी चली।
खुशबू बिखेरेगी सदा इस,बाग की नाजुक कली ।

क्या भूल मुझसे होगयी माँ,त्याग जो मुझको रही।
यदि प्यार करती है मुझे तू,ज्ञान दे मुझको सही।
जाने नहीं  दुख दर्द कोई, जो दुआओं से फली।
खुशबू बिखेरेगी सदा इस,बाग की नाजुक कली ।

देखा नहीं जाना नहीं है,जिंदगी के खेल को।
तू दे सहारा बेसहारा,बाग की इस बेल को।
वो जा रही अब घर पराए,नाज से जो थी पली।
खुशबू बिखेरेगी सदा इस,बाग की नाजुक कली ।

माँ तात की ये लाडली अब,क्यूँ परायी होगई?
ओ भ्रात तेरी बहन में अब,क्या बुराई होगई?
लगता यही है आज बेटी,इक गई है फिर छली।
खुशबू बिखेरेगी सदा इस,बाग की नाजुक कली ।

वन बाग उपवन वाटिका सब,आज मुझसे पूछते।
इस जिंदगी के सब सुरीले,साज मुझसे पूछते।
क्यों जा रही हो छोड़ कर यों,आज ये अपनी गली?
खुशबू बिखेरेगी सदा इस,बाग की नाजुक कली ।

'ललित'

3.8.16
दिग्पाल छंद
सम्पूर्ण गीत

कमनीय कामिनी ज्यों,दिल पे सवार हो तुम।
शीतल सहज सुहानी,सुरभित बयार हो तुम।

सारे हसीं नजारे,तुम से निखार पाएं।
ये चाँद और तारे,तुम पे निसार जाएं।
है जिंदगी तुम्हीं से,दिल का करार हो तुम।
शीतल सहज सुहानी,सुरभित बयार हो तुम।

लहरें बता रही हैं,हो प्रीत का समंदर।
गजलें बनी तुम्हीं पे,तुम शायरी निरंतर।
हो प्रीत तुम रसीली,मादक बहार हो तुम।
शीतल सहज सुहानी,सुरभित बयार हो तुम।

कायल हुआ तुम्हारे,इस हुस्न का जमाना।
घायल हुए उन्हें तुम,मत और आजमाना।
हो रात की खुमारी,दिन का सितार हो तुम।
शीतल सहज सुहानी,सुरभित बयार हो तुम।

दिल की किताब मेरी,कोरी बिना तुम्हारे।
हर दिल अजीज हो तुम,कहती यही बहारें।
जज्बात शायराना,सुंदर विचार हो तुम।
शीतल सहज सुहानी,सुरभित बयार हो तुम।

ललित
समाप्त

  04.08.16

विधाता छंद
सम्पूर्ण गीत

सुनो ओ राधिका रानी,सभी हम प्रेम में हारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।

तुम्ही हो प्रीत इक मेरी,तुम्ही हो रास की रानी।
सितारे आज हँसते हैं,करे जब चाँद मनमानी।
न बंसी को सखी माना,न कोई गोपिका जानी।
न रूठो और अब राधा,करो मत और नादानी।

बहारें पूजती तुमको,नजारे चुप हुए सारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।

नशीली आँख का तेरी,चढा मुझ पर नशा वो है।
न मुझको याद अब कुछ भी,बता मेरी खता जो है।
निराले बाँसुरी के सुर,तुम्हें भाते सभी तो हैं।
हसीं मुख पर अरी राधा,नहीं तिरछी नजर सोहे।

सितारे आसमाँ के सब,तुम्हीं पर आज हैं वारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।

तुम्हारे बिन अधूरा है,हमारा रास ओ राधा।
अरे क्यूँ भूलती हो  तुम,किया था रास का वादा।
दुखी हैं गोपियाँ सारी,न रूठो और अब ज्यादा।
सभी को राधिका मोहे,तुम्हारा रूप ये सादा।

तुम्हारे रूप पर मरते,हसीं ये चाँद औ' तारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।

ललित

-----------------समाप्त--------------------

भुजंग प्रयात
गीत

जवानी और बुढापा
जवानी दिखाए हसीं ख्वाब ऐसे।
ज़मीं पे टिकेंगे अजी पाँव कैसे।।

न मेरे सरीखा जहाँ में मिलेगा।
जवाँ फूल ऐसा कहाँ पे खिलेगा।।
जवां जिस्म में जो इरादे जवां हैं।
सुखों का वहीं पे सदा कारवां है।।

जवानी बड़ी काम की दी दिखाई।
कलाबाजियाँ आदमी को सिखाई।।
कहे चाँद को मैं जमीं पे बुला दूँ ।
हसीं वादियों में तुझे मैं सुला दूँ।।

जवानी कमाती जहाँ चार पैसे।
ज़मीं पे टिकेंगे अजी पाँव कैसे।

कहे प्यार आकाश का नूर हूँ मैं।
दिलों में बसा हूँ भले दूर हूँ मैं।
न मेरे सरीखा जहाँ मे मिलेगा।
जवाँ फूल ऐसा कहाँ पे खिलेगा।

हसीं जुल्फ की छाँव लेटा रहा वो।
कहें तात माँ खास बेटा रहा जो।
भुलाए रहा तात औ' मात को ही।
रखे याद फूलों भरी रात को ही।

रहे वासना में फँसे पाँव जैसे।
ज़मीं पे टिकेंगे अजी पाँव कैसे।।

निराली बड़ी काल की चाल होती।
बुढापा कहे आज बेकार मोती।
जवानी बिताई सुखों के सहारे।
बुढापा दिखाए दुखों के नजारे।

सभी चाहते ये बुढापा न आए।
जवानी दिवानी बुढापा दिखाए।
बुढापा किसी का भगा तो नहीं है।
बुढापा किसी का सगा जो नहीं है।

सभी चाहते ऐश आराम वैसे।
ज़मीं पे टिकेंगे अजी पाँव कैसे।।

ललित

भुजंग प्रयात
सम्पूर्ण गीत

आँख और आँसुओं की कहानी

मिला ईश से आँसुओं का खजाना।
दुखी आँसुओं को किसी ने न जाना।

बड़ी आँसुओं की जुदा है कहानी।
सुनी आँसुओं की जुबाँ है कहानी।
कभी आँख आँसू खुशी के बहाती।
कभी आँसुओं में खुशी डूब जाती।

कभी आँसुओं पे हँसेगा जमाना।
दुखी आँसुओं को किसी ने न जाना।

बहें आँख से तो दिलों को हिलाएँ।
भरें आँख में तो दिलों को मिलाएँ।
कभी आँख आँसू बहा भी न पाए।
कभी आँसुओं को सहा भी न जाए।

कभी आँसुओं से बनेगा फसाना।
दुखी आँसुओं को किसी ने न जाना।

बही आँसुओं में किसी की जवानी।
हुई आँसुओं में किसी की रवानी।
कभी तो किसी के हरो आप आँसू।
कभी तो खुशी के भरो आप आँसू ।

हरो आप आँसू बनेगा तराना।
दुखी आँसुओं को किसी ने न जाना।

'ललित'

समाप्त

सार छंद
गीत

तेरी यादों में पागल हो,राधा वन-वन डोले।
आजा कान्हा आजा अब तो,व्रज का कण-कण बोले।

पत्थर-दिल बन बैठा कान्हा,तू तो मथुरा जा के।
रख ले अपनी राधा का दिल,एक बार तो आ के।
मीठी मीठी टीस उठे है,दिल मे हौले-हौले।
आजा कान्हा आजा अब तो,व्रज का कण-कण बोले।

मोहन से क्यूँ नैन मिलाए,मन ही मन पछताती।
देश छोड़ परदेश बसा जो,लिखे न कोई पाती।
यमुना तट का वंशीवट भी, उगल रहा है शोले।
आजा कान्हा आजा अब तो,व्रज का कण-कण बोले।

वन उपवन सब सूने लगते,श्याम बिना ब्रज सूना।
सखियाँ जब ताने मारें तो,दर्द बढे ये दूना।
बैरी दुख कम करने को ये,राधा छुप छुप रो ले।
आजा कान्हा आजा अब तो,व्रज का कण-कण बोले।

'ललित'

6.8.16
सार छंद
गीत
वियोग श्रृंगार
सम्पूर्ण गीत

कैसे भूल गया साजन तू,वो कसमें वो वादे?
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

फूलों की खुशबू सा तेरा,नटखट रूप सलोना।
औरों के दिल को तू समझे,नाजुक एक खिलौना।
मैंने दिल में सँजो रखी हैं,तेरी सारी यादें।
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

सावन की बूँदों से मेरा,तन मन भीगा जाए।
तुझसे मिलने की चाहत में,नैना नीर बहाएं।
अब तो सुन ले बैरी साजन,मेरी ये फरियादें।
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

आज तुझे क्यूँ याद नहीँ हैं,वो मादक बरसातें।
सारी रात किया करते थे,जब हम प्यारी बातें।
सपनों में ही आकर मुझको,हाला वही पिलादे।
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

ललित
समाप्त

सार छंद
गीत
वियोग श्रृंगार

कैसे भूल गया साजन तू,वो कसमें वो वादे?
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

फूलों की खुशबू सा तेरा,नटखट रूप सलोना।
औरों के दिल को तू समझे,नाजुक एक खिलौना।
मैंने दिल में सँजो रखी हैं,तेरी सारी यादें।
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

सावन की बूँदों से मेरा,तन मन भीगा जाए।
तुझसे मिलने की चाहत में,नैना नीर बहाएं।
अब तो सुन ले बैरी साजन,मेरी ये फरियादें।
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

आज तुझे क्यूँ याद नहीँ हैं,वो मादक बरसातें।
सारी रात किया करते थे,जब हम प्यारी बातें।
सपनों में ही आकर मुझको,हाला वही पिलादे।
क्यों मैं पहले समझ न पायी,तेरे नेक इरादे?

ललित
समाप्त

दुर्मिल सवैया छंद
गीत

करुणा करके करुणा निधि जी,हर लो सब पीर बसो मन में।
हर पातक लो विनती सुन लो, उजियार भरो  इस जीवन में।

मन के तम को अब दूर करो,विनती करता कर जोड़ हरे।
इस जीवन में अब आस यही,कर दो मन की सब त्रास परे।
प्रभु आप अधार हो प्राणन के, जब होय कृपा हर ताप टरे।
हर लो अब घोर निशा तम को, मम जीवन में नव दीप जरे।

तुम दीनदयाल कहावत हो, भर दो खुशियाँ मन पावन में।
हर पातक लो विनती सुन लो, उजियार भरो  इस जीवन में।

30.8.16

दिग्पाल छंद
गीत
ज्ञान और प्रेम

मोहन बिना हमारा,होता नहीं गुजारा।
ऊधो तुम्हें मुबारक,ये ज्ञान ध्यान सारा।

हम प्रेम में पली हैं,औ' प्यार में ढली हैं
बस प्रीत से मिलेगा,कान्हा बड़ा छली है।
है प्रेम के बिना तो,ये व्यर्थ ज्ञान धारा।
ऊधो तुम्हें मुबारक,ये ज्ञान ध्यान सारा।

हम ज्ञान का करें क्या,कान्हा बसा हृदय में।
क्यों ज्ञान चक्षु खोलें,जब कृष्ण साँस लय में।
बस प्रीत में छिपा है,हर जीत का इशारा।
ऊधो तुम्हें मुबारक,ये ज्ञान ध्यान सारा।

बजती न आज वंशी,सुनसान ब्रज धरा है।
घनश्याम के बिना तो,सबका हृदय भरा है।
मनमोहना पिया पे,सारा जहान वारा।
ऊधो तुम्हें मुबारक,ये ज्ञान ध्यान सारा।

इस प्यार से बँधा जो,कब तक न आयगा वो।
वंशी नहीं बजाकर,कब तक सतायगा वो।
कर पायगा न कान्हा,राधा बिना गुजारा।
ऊधो तुम्हें मुबारक,ये ज्ञान ध्यान सारा।

समाप्त

ललित

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...