Showing posts with label मुक्तक. Show all posts
Showing posts with label मुक्तक. Show all posts

अगस्त 2026 की रचनाएँ

पीयूष वर्ष छंद
वृद्धावस्था
गीत

हाथ पैरों में ज़रा भी दम नहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

दाँत हिल-हिल साथ छोड़े जा रहे।
स्वाद रसना को नये नित भा रहे।
दर्द घुटनों का न जाने दे कहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

याद में डीमेंशिया झूला हुआ।
नाम अब हर चीज का भूला हुआ।
मौन रह कर मुस्कुराना है यहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

साथ छोड़े जा रही अब चाम भी।
बेरहम कितनी हुई ये शाम भी ?
अश्रुओं की धार आँखों से बही।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

प्यार के दो बोल सुनने के लिए।
अब तरसते प्रीत के बुझते दिए।
उम्र ने रुसवाइयाँ सबकी सहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

ललित किशोर 'ललित'

**************************

11.08.26

सिंधु छद

खिला था आसमां में चांँद जब पूरा।
तभी चुप चाँदनी ने चाँद को घूरा।
सितारों से बहुत तुम प्यार करते हो।
कि पूनम को अनोखा रूप धरते हो।

नहीं तुम देखते हो इक नजर मुझको।
धरा की ओर धकियाते मगर मुझको।
नहीं हैं याद तुमको वो पुराने दिन।
हमारे इश्क की रातें सुहाने दिन।

ललित किशोर 'ललित'
*************************

14.08.26

मुक्तक

फूलों का गुलशन चाहा था,शूलों की दरकार न थी।
हँस न सकें जो कागज के उन,फूलों की दरकार न थी।
माना चाहत पूरी होना,मुश्किल होता है लेकिन।
सावन की रिमझिम चाही थी,झूलों की दरकार न थी।

ललित किशोर 'ललित'

**************************
18.08.26

मधुमालती छंद

वो चाहते हैं चुप रहो।
हर ताप हर पीड़ा सहो।
वो राज करना चाहते।
सच से मुकरना चाहते।

क्यों दर्द बाहर आ रहा ?
क्यों गर्द बढ़ता जा रहा ?
क्यों उठ रही आवाज है ?
वो हुक्मराँ नाराज है।

इस दर्द को सहते रहो।
मत हुक्मराँ से कुछ कहो।
मत आसमाँ को तुम तको।
मत स्वप्न में भी सुख चखो।

जो थम गया वो जल नहीं।
जो झुक गया वो बल नहीं।
चलते रहो बढ़ते रहो।
नव स्वप्न नित गढ़ते रहो।

ललित किशोर 'ललित'

*************************

19.08.26

मधुमालती छंद

जो भाव इस दिल में बहें।
हर बात वो किससे कहें ?

दिल की लगी किसको पता।
क्यों कौन सुन लेगा व्यथा ?
जो घाव इस दिल पर लगे।
इक दर्द सा उनमें जगे।
हैं अनगिनत ग़म की तहें।
हर बात वो किससे कहें ?

है राह जो उलझी हुई।
कैसे कहें सुलझी हुई ?
हर मोड़ पर ही धुंध है।
ये देख कर मति कुंद है।
मथती सदा दिल को रहें।
हर बात वो किससे कहें ?

ललित किशोर 'ललित'

***************************

20.08.2026

मधु मालती छंद

इस ज़िंदगी ने क्या दिया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखने को जो मिला।
वो कर्म का ही है सिला।
जो हाथ खाली थे मिले।
अब रिक्त हैं तो क्या गिले?
इक स्वप्न सा जीवन जिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

जो कुछ मिला संसार से।
सब छूटता वो प्यार से।
कैसे रहें पकड़े उसे ?
खुद भाग्य ही छीने जिसे।
सारी उमर भटका किया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखना पीछे नहीं।
हैं मंजिलें आगे कहीं।
अब है सहारा आस का।
उस ईश में विश्वास का।
संकल्प का प्या़ला पिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

ललित किशोर 'ललित'

************************
22.08.2026
मुक्तक

सनातनी होने का दावा,करता था जो नर हरदम।
धर्म-सनातन की रक्षा का,जो रखता था हर दमखम।
आज वही खुद इक मंदिर में,बन भगवान
विराजा है।
चुप हैं सारे संत महात्मा,अंध-भक्त बोलें बम-बम।

ललित किशोर 'ललित'

*******************(**********

मुक्तक
1.

तुम तो जीना सीख न पाए,कहते हैं वो हम से।
खा लो पी लो मौज मना लो,दूर रहो हर ग़म से।
अब उनको हम क्या बतलाएँ,अपनी राम कहानी ?
हाँ बस इतना ही कह पाए,सीखेंगें अब तुमसे।

2.

मन ही मन हम सोच रहे थे,क्यूँ थे पापड़ बेले ?
क्यों जीवन-भर झंझावातों,तूफानों से खेले ?
मन मौजी थे हम भी लेकिन,पैसों की थी
तंगी।
कैसे मौज मनाते हम जब,पास नहीं थे धेले।

ललित किशोर 'ललित'

31.08.26

विष्णु पद छंद

अनसुलझी अनबूझ पहेली,मन का चैन हरे।
चिंतित मन को क्या समझाएं,कैसे धीर धरें ?
समझ-समझ कर ये समझा है,इस पागल मन ने।
बचैनी से रिश्ता जोड़ा,है घायल मन ने।

ललित किशोर'ललित'
^***********************
गीत
31.08.26
छंद सुमेरु
1222 122,2122

तुम्हारी राधिका रो,रो पुकारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

न जाओ श्याम व्रज से,छोड़ हमको।
नहीं क्या रास आया,रास तुमको ?
यशोदा नंद बाबा,के दुलारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे बिन रहेगा,मौन व्रज में।
करेगा रास कान्हा,कौन व्रज में ?
सखा संगी तजेंगें,काज सारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे दर्श ने दुख,दर्द टाले।
तुम्हारी बाँसुरी के,सुर निराले।
बजाएगा मुरलिया,कौन प्यारे ?
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

ललित किशोर 'ललित'

****************************

अक्टूबर 2019 की रचनाएँ

अक्टूबर 2019 की रचनाएँ


दोहा

मैया तेरे द्वार पर,है भक्तों की भीड़।
समय मिले तो आ जरा,मैया मेरे नीड़।

ललित

मुक्तक 16-14
किश्ती

डूब  गई   जब  किश्ती  मेरी,नदी  किनारे  आए वो।
दुखती  रग   को  और दुखाने,ले  पतवारें        आए  वो।
हर सुख-दुख में साथ निभाने,का जो दावा करते थे।
चाँद  छुपा  था जब  बादल में,ले कुछ तारे आए वो।

ललित

सोरठा
जय माता दी
फूलों के गलहार,लाया हूँ माँ प्यार से।
कर लेना स्वीकार,विनती है ये आप से।

चुनरी गोटेदार,काजल बिंदी चूड़ियाँ।
करने को श्रृंगार,महँदी भी है साथ माँ।

धूप दीप से मात,नित्य करूँ मैं आरती।
हर लेना हर घात,माता मेरे भाग्य से।

चना-घूघरी और,ले आया हूँ लापसी।
प्रेम-सहित हर कौर,कर लेना स्वीकर माँ।

ललित

मुक्तक
मरहम
जिसने जितना साथ निभाया,चार-पलों के
जीवन में।
वही बड़ा उपकार मान लो,उसका तुम अपने मन में।
अपने-अपने घाव सभी के,हैं अपने-अपने मरहम।
दिल के गहरे घाव भरे वो,मरहम है अपने-पन में।

ललित

02.10.19
कुण्डलिया
अम्बे माँ
माता अम्बे मैं करूँ,विनती ये कर-जोड़।
काम-क्रोध-मद-लोभ से,मेरे मन को मोड़।

मेरे मन को मोड़,ईश के ध्यान-भजन में।
मायावी संसार,न झाँके मेरे मन में।

कहे 'ललित' हे मात,न कोई तुझ सा दाता।
तुझसे ही सब ज्ञान,मिला है अम्बे माता।

ललित

समान/सनाई छंद
माँ जगदम्बा
जय-जय-जय-जय माँ जगदम्बा,
जय-जय-जय-हे मात भवानी।
जय-जय-जय-जय हे माँ दुर्गा। 
जय-जय-जय शिव की पट-रानी।

पाट दिए सारे नद-नाले।
फेरी सब वृक्षों पर आरी।
आस लिए आए दर तेरे।
पीर पड़ी भक्तों पर भारी।

प्लास्टिक-मोबाइल का जादू।
काट नहीं ये मानव पाया।
इस प्लास्टिक से पीछा छूटे।
दिखला दो कुछ ऐसी माया।

ललित

ताटंक छंद
मैया जगदम्बा
मैया जगदम्बा जगजननी,चरण-शरण मैं हूँ आया।
पूजन-अर्चन नहीं जानता,पुष्प-हार मैं हूँ लाया।
भूल हुई हो जो भी मुझसे,माफ ज़रा कर दो माता।
मेरी खाली झोली अपनी,किरपा से भर दो माता।

ललित


14.10.19
मदिरा सवैया छंद
वार्णिक छंद
7 भगण + अंत में एक गुरु वर्ण
अर्थात 211×7 + गुरु वर्ण
चार सम तुकांत
12 वें वर्ण के बाद यति दर्शाएँ।

मदिरा सवैया छंद
डोलती नाव
डोल उठे जब नाव प्रभो रहना तब आप
कृपालु हरे।
पाप विनाशक मोहन नाम जपे उसका
भव-ताप टरे। 
हो तुम एक हमार प्रभो अब कौन हमें भव-पार करे।
कृष्ण करो किरपा इतनी भव सागर से यह नाव तरे।

ललित

मदिरा सवैया छंद
शत्रु-मित्र
कौन बने कब शत्रु यहाँ अरु कौन बने कब मित्र यहाँ?
मेल बने अनमोल यहाँ कब मेल कहाय विचित्र यहाँ?
बात बड़ी असमंजस की कब मानव खोय चरित्र यहाँ?
मात-पिता तज पुत्र चले जब वो बनता खुद पितृ यहाँ?

ललित

मदिरा सवैया छंद
जग छोड़ चले
कौन कहाँ कब छोड़ चले जग,जीवन से मुख मोड़ चले?
तोड़ चले जग के सब बंधन,मित्र-सखा कब छोड़ चले?
अंध भविष्य न जान सके नर,वो सब के दिल तोड़ चले।
याद करें उसके गुण को सब,जो तज वैभव-होड़ चले।

ललित

मदिरा सवैया छंद
रवि पावन
भोर भए हरता जग का तम पावन वो रवि क्या कहना?

मोहन की मुरलीधर की मनमोहन की छवि क्या कहना?

शांति-प्रदायक शुद्धि-प्रसारक अग्नि-मयी हवि क्या कहना?

छंद नए नित जो सिखलावत 'राज' गुरू कवि क्या कहना?

ललित

ताटंक छंद
हँसते-गाते
जीवन के हर दोराहे पर,साथ सदा तुमको पाया।
हरदम मेरे साथ चली हो,तुम बनकर मेरा साया।
अब बासठ का हुआ यार मैं,उन्सठ की तुम हो प्यारी।
हँसते-गाते प्यार जताते,जीने की अब है बारी।

ललित

मदिरा सवैया छंद
मानव-जीवन
पाकर मानव जीवन धन्य हुआ यह जीव 
हँसे जग में।
यज्ञ नहीं जप-ध्यान नहीं भटके यह जीव फँसे जग में।
ईश्वर ने जब जन्म दिया धरती पर मानव के तन में।
क्यों न जपे तब नाम अहर्निश मोहन का मन ही मन में?

ललित

मदिरा सवैया छंद
तप्त-दिल
तप्त बड़ा दिल का तल है मन सोच रहा यह बात बड़ी।
बीत गए सुख-शांति भरे दिन, क्यों न कटे
यह दुःख-घड़ी?
वक्त रहा शुभ साथ नहीं तब,वक्त बुरा यह क्यों न टले?
बीत गया उजला दिन क्यों तम-घोर-घना 
दिल को कुचले?

ललित

मदिरा सवैया छंद
माँ
याद करें तुमको हम माँ घिरती जब राह घने तम से।
छाँव न हो सुख की मन में जब प्राण थकें गहरे ग़म से।
शांति न हो मन बेकल हो तब पीर तुम्हीं हरती छम से।
दूर भले कितनी तुम हो पर नेह सदा रखतीं हम से।

ललित

मदिरा सवैया छंद
वृषभानुसुता
लाल गुलाब खिले बगिया व्रज-नंदन-कानन डोल गया।

देख गुलाब सुगंध भरे वृषभानुसुता मन डोल गया।

भूल गया मुरली मुरलीधर वो मनमोहन डोल गया।

बंद हुए नयना-पट सौरभ से सगरा तन डोल गया।

ललित

मदिरा सवैया छंद
यौवन
सावन बीत चला सजना अरु,भूल गया कँगना बजना।
प्रीत बड़ी हमको तुमसे तुम, भूल गये हमको सजना।

सून पड़ा मन का अँगना हम भूल गए सजना-धजना।
यौवन के दिन चार पिया इस यौवन में हमको तज ना।

ललित

मदिरा सवैया छंद
व्यस्त-नर
व्यस्त हुआ नर मस्त हुआ अरु
यौवन में तन पस्त हुआ।

पस्त हुआ भटके  नर वो धन-वैभव
पाकर मस्त हुआ।

मस्त हुआ अपनी धुन में अपने सपनों सँग व्यस्त हुआ।

व्यस्त हुआ दिन-रात भगे नहिं फुर्सत काम-परस्त हुआ।

ललित

मुक्तक
मोबाइल
फूल-बहारों का मौसम ही,जीवन में चहुँ ओर रहे।
दीवाली खुशियाँ ले आए,हँसी-खुशी का दौर रहे।
माँ शारद की कृपा रहे औ',लक्ष्मी जी धन-धान्य भरें।
शांति रहे घर में मोबाइल,का ही केवल शोर रहे।

ललित किशोर 'ललित'


मदिरा सवैया छंद
शुभ दीपावली

मौसम फूल-बहार भरा घर-बाहर में चहुँ ओर रहे।
दीप करें घर-आँगन रौशन,और खुशी हर भोर रहे।
शारद-मातु कृपालु रहें अरु श्री घर में हर ठौर रहें।
शांति रहे मन-जीवन में नित ईश्वर-पूजन जोर   रहे।

ललित

दीपावली-शुभकामना

मंगलमय शुभकामना,के जितने संदेश।
मित्र मिले हैं आपको,दीवाली के पेश।
दीवाली के पेश,सभी शुभ-फल दे जाएँ।
रिद्धि-सद्धि गणनाथ,सहित माँ लक्ष्मी आएँ।

ललित किशोर

मुक्तक
दीवाली
कुछ यंत्रों का कुछ मंत्रों का,शोर मचाए दीवाली।
कुछ दीपक को कुछ बिजली को,नाच नचाए दीवाली।
सब मित्रों से सब रिश्तों से,स्नेह दिलाए दीवाली।
मन में नई उमंगों की इक,ज्योत जलाए दीवाली।

ललित

🍃🌹जयकारी छंद🌹🍃
शारद माँ
शारद  माँ   तैरा   दो  नाव।
लेखन  के  दे दो नव-भाव।
बुद्धि और मन हों इक ठौर।
छंद-सृजन  होवे नित भोर।

🌹🍃ललित🍃🌹

गीत का प्रयास
🍃🌹जयकारी छंद🌹🍃
उलझी डोर
जीवन की है उलझी डोर।
श्याम तुम्हीं पकड़ो इक छोर।

सुलझा दो कुछ ऐसे श्याम।
लगें सँवरने बिगड़े काम।
सुमिरन होवे आठों याम।
मन मेरा पाए विश्राम।
प्यारी सी होवे इक भोर।
श्याम तुम्हीं पकड़ो इक छोर।

श्याम करो ऐसी तदबीर।
चिंता की टूटे तस्वीर।
जय श्री कृष्णा जय श्री राम।
थके न जिव्हा जपते नाम।
मन मेरा बैठे इक ठौर।
श्याम तुम्हीं पकड़ो इक छोर।

बाधाओं की तपती धूप।
कंटक जिसमें पलें अनूप।
छाँव ज़रा सी कर दो नाथ।
रख कर मेरे सिर पर हाथ।
फिर आए खुशियों का दौर।
श्याम तुम्हीं पकड़ो इक छोर।

🌹🍃ललित🍃🌹

🍃🌹जयकारी छंद🌹🍃
राधे-श्याम
सुंदर मनहर प्यारा नाम।
राधे-कृष्णा राधे-श्याम।

जो नर जपता सुबहो-शाम।
उसका मन पाए विश्राम।
भजनों की गंगा में डूब।
मस्त हुआ वो नाचे खूब।
नटवर-नागर जप अविराम।
राधे-कृष्णा राधे-श्याम।
ललित

🍃🌹जयकारी छंद🌹🍃

खुशियाँ
मिलती जो खुशियाँ अविराम।
दुख का कहीं न होता नाम।
खुशियों का क्या रहता मोल?
थोड़े से दुख से मत डोल।

ललित


अक्टूबर 2018 रचनाएँ




[04/10, 4:35 PM] ललित:
दोहा छंद

विषय:  माँ

बचपन में था पूछता,माँ से बहुत सवाल।
अब वो माँ से बोलता,काहे करे बवाल।।

दान  किये जप भी किये,तीरथ किये हजार।
माँ को जो बिसरा दिया,सब कुछ है बेकार।।

माँ के आँचल की जिसे,मिली हुई है छाँव।
हरदम सीधे बैठते,उसके सारे दाँव।।

माँ की याद सुवास सी,मन निर्मल हो जाय।
जैसे तुलसी आँगने,हरि की याद दिलाय।।

हरि का सुमिरन जो करे,माँ चरणों में बैठ।
हरि उसको आशीष दें,माँ के उर में पैठ।।

माँ साँसों में बस रही,माँ धड़कन,माँ प्राण।
माँ से उऋण न हो सके,सुत देकर भी जान।

'ललित'
[

[11/10, 6:21 PM] ललित:
चौपाई छंद

मोर-मुकुट पीताम्बर धारी,
केशव माधव कृष्ण मुरारी।

अर्जुन जैसे शिष्य तुम्हारे।
सखा सुदामा से हैं प्यारे।

गोप-गोपियों के बनवारी।
जय-जय-जय गोवर्धन-धारी।

तुम राधा के दिल की धड़कन।
महके तुमसे व्रज का कण-कण।

दोहा

बजे सुरीली बाँसुरी,सारी-सारी रात।
कृष्ण तुम्हारे रास में,गोपी भूले गात।

ललित
[12/10, 10:10 PM] ललित:
चौपाईयाँ

ठुमक-ठुमक कर चले कन्हैया।
देख-देख हर्षित हो मैया।

छम-छम-छम पैंजनिया बजती।
अधर मधुर बाँसुरिया सजती।

बजे बाँसुरी हौले-हौले।
आलौकिक मद से व्रज डोले।

मटकी ले जब निकलें सखियाँ।
मट-मट-मट मटकाए अँखियाँ।

मार कंकरी मटकी फोड़े।
गोपी पीछे-पीछे दौड़े।

देख हो रही मटकी खाली।
ग्वाल हँसें सब दे-दे ताली।

दोहे

मनभावन लीला करे,व्रज में माखन-चोर।
गोप-गोपियाँ सब कहें,जय-जय नंदकिशोर।

ललित
[13/10, 2:34 PM] ललित:
आदर्श अतिथि स्वागत

द्वारपाल संदेशा लाया।
मित्र सुदामा द्वारे आया।

सुना कन्हैया ने जैसे ही।
छोड़ दिया आसन वैसे ही।

दौड़ पड़े दर्शन करने वो।
प्रेम-सुधा वर्षण करने वो।

देख मित्र की जर्जर काया।
श्याम नयन में जल भर आया।

तुरत मित्र को गले लगाया।
कहा नहीं क्यों पहले आया?

सिंहासन पर मीत को,बिठा द्वारिकाधीश।
चरणों को निज अश्रु से,धोते हैं जगदीश।

ललित
क्रमशः
[13/10, 7:54 PM] ललित:
चौपाइयाँ
अतिथि भाग दो

सजल नयन थे रुँधे गले थे।
बचपन में वो लौट चले थे।

बात कर रहे दोनों मन की।
रही नहीं सुधि उनको तन की।

कहा कृष्ण ने मत सकुचाओ।
भाभी जी के हाल सुनाओ।

भेजी है क्या भेंट बताओ?
और नहीं अब मुझे सताओ।

मीत सुदामा अब सकुचाए।
तंदुल की क्या भेंट बताए?

दोहा

तंदुल की वो पोटली,कान्हा ने ली छीन।
चकित नयन से देखते,रहे सुदामा दीन।

ललित
[14/10, 3:30 PM] ललित:
चौपाइयाँ

सतरंगी दुनिया को देखा।
देखी बेरंग भाग्य-रेखा।

अपनों ने वो रंग दिखाए।
दूजा कोई रंग न भाए।

रंगों से मनती है होली।
रंग हाथ में बेरँग बोली।

रंग-बिरंगी जवाँ दिवाली।
मात-पिता की झोली खाली।

बदल गए अब सबके ढँग हैं।
रुपयों ने भी बदले रँग हैं।

पार्टी-ध्वज में जैसा रँग है।
वैसा नेता जी का ढँग है।

श्वेत रोशनी सूरज देता।
प्रिज्म उसे रंगीं कर लेता।

ऐसा ही कुछ हम भी कर लें।
नए रंग जीवन में भर लें।

दोहा

धुंधला कोई रंग है,कोई है रतनार।
हर रँग में नौका चला,मत छोड़े पतवार।

ललित
[16/10, 6:00 PM] ललित:
सार छंद
भूल-भुलैया

जीवन की ये भूल-भुलैया,सबको है भटकाती।
आती-जाती साँसों को ये,हौले से अटकाती।
कौन कहाँ कैसे जाएगा,छोड़ जगत का मेला?
जान नहीं पाता है कोई,कैसा है ये खेला?

ललित
[18/10, 6:41 PM] ललित:
चौपाई
पंचतत्त्व

पंचतत्त्व की देह बनाई,
आत्मा इक उसमें बिठलाई।

दूर बैठ दाता फिर देखे।
देह लिखे कर्मों के लेखे।

वही लेख फिर भाग्य बनाते।
कर्म समय से फल दिखलाते।

पुण्य करे कितने भी मानव।
नष्ट न हों कर्मों के दानव।

पाप कर्म से आत्मा रोके।
कदम-कदम पर नर को टोके।

पंचतत्त्व की देह से,मत कर इतना प्यार।
जितने इससे कर सके,कर ले तू उपकार।

ललित
[19/10, 7:44 PM] ललित:
चौपाई

जीत सत्य की होती आई,हरी जड़ें सच ने ही पाई।

सुंदर बुरका ओढ़ बुराई,चुपके से नर मन में आई।

कलियुग में दे सत्य दुहाई,विजय झूठ की देत दिखाई।

लेकिन इक दिन बुरका फटता,तभी झूठ से परदा उठता।

सत्य सामने जब आ जाता,झूठ नहीं फिर टिकने पाता।

दोहा

दामन थामे सत्य का,बढ़ मंजिल की ओर।
नहीं झूठ से छू सके,मंजिल का तू छोर।

ललित
[20/10, 7:49 AM] ललित:

चौपाई

जीत सत्य की होती आई,हरी जड़ें सच ने ही पाई।

सुंदर बुरका ओढ़ बुराई,चुपके से नर मन में आई।

कलियुग में दे सत्य दुहाई,विजय झूठ की देत दिखाई।

लेकिन इक दिन बुरका फटता,तभी झूठ से परदा हटता।

सत्य सामने जब आ जाता,झूठ नहीं फिर टिकने पाता।

दोहा

दामन थामे सत्य का,बढ़ मंजिल की ओर।
नहीं झूठ से छू सके,मंजिल का तू छोर।

ललित
[20/10, 8:39 PM] ललित:
चौपाई
अमृतसर दुखान्तिका

मौत कहाँ कैसे आएगी,
साथ किसे कब ले जाएगी?

जान कहाँ मानव है पाता,
दबे पाँव यम है आ जाता । 

साठ जनों को मौत दिखाई,
अमृतसर कैसा वो भाई।

कहीं न कोई पत्ता खड़का,
जलता रावण ऐसा भड़का।

मौत दौड़ती सरपट आई,
कहो कौन था वहाँ कसाई?

किसकी थी ये जिम्मेदारी,
लाशें बिछी धरा पर सारी।

दोहा

रोक सको तो रोक लो,
अनहोनी को आप।
वरना मौत कहाँ कभी,
देती अपनी थाप?

ललित
[21/10, 4:21 PM] ललित:
चौपाइयाँ

नाम राधिका का यदि जपते,
जीवन के ये पथ क्यों तपते?

राधा का जो नाम सुमिरते,
वो नर भवसागर से तरते।

नाम जपे हर पल राधा का।
नहीं उसे डर भव-बाधा का।

उसी कृष्ण को प्यारी राधा।
करे दूर जो सबकी बाधा।

राधा नाम उसे है प्यारा।
जो है जग का तारण-हारा।

जय-जय श्याम-राधिका प्यारे।
ताप-व्याधि हर सब नर तारे।

दोहा

राधा-राधा जो जपे,भव-सागर तर जाय।
दर्शन कान्हा के मिलें,आत्म-ज्ञान फल पाय।

ललित
[22/10, 7:27 PM] ललित:
मुक्तक 14:14

न समझे प्यार की भाषा,न खोले प्यार का खाता।
निगाहों  से हसीं दिलवर,नशीले तीर बरसाता।
बना अंजान वो फिरता,चलाकर तीर नजरों के।
यहाँ दिल है हुआ घायल,वहाँ वो गीत है गाता।

ललित
[27/10, 10:51 AM] ललित:
हरिगीतिका छंद

करवा चौथ स्पेशल

है आज करवा चौथ का व्रत,
                 आप ही तो खास हो।
मैं प्यार करतीे आपसे ही,
                 आज तो विश्वास हो।
व्रत आज ये मैंने रखा जी,
                  आपके हित के लिए।
ला दीजिए उपहार कोई,
                  इस पुजारिन के लिए।
                   
ललित
[27/10, 6:19 PM] ललित:
हरिगीतिका छंद

पूजा करूँगी मैं तुम्हारी,
             मान लो मनुहार तुम,
जो बन पड़े तुम से वही कुछ,
              आज दो उपहार तुम।
लो सूट ये पहनो नया तुम,
               और टाई घाल दो।
सेल्फी खिंचा कर साथ मेरे,
               फेस बुक पर डाल दो।
ललित
[27/10, 7:31 PM] ललित:
आधार छंद

नाक नथनियाँ झूमती,अधरों पर मुस्कान।

हार गले में नौलखा,चितवन तीर कमान।

पायल की छम-छम करे,खुशियों की बौछार।

सजनी के इस रूप पर,साजन जी कुर्बान।

ललित
[28/10, 8:06 PM] ललित:
कुण्डल छंद

जिंदगी किताब जान,ध्यान से पढ़ो जी।
शब्दों का गूढ़ अर्थ,जान तुम बढ़ो जी।
मित्र और अमित्र का,भेद जरा जानो।
शत्रु की मिठास भरी,बात नहीं मानो।

ललित
[28/10, 8:11 PM] ललित:
कुण्डल छंद

देख दिवाली मकान,साफ कर लिया है।
फालतू कबाड़ खूब,बेच भी दिया है।
लेकिन मन का न मैल,छूट हाय पाया।
जाए न मन को छोड़ ,अंत हीन माया।

ललित

नवम्बर 2019 की रचनाएँ

नवम्बर 2019


विधाता छंद
मुस्कान पत्नी की

बड़ी शीतल बड़ी प्यारी,बड़ी शालीन मुस्कानें।

हँसे पत्नी तभी लगता,कि लेगी जान ही जाने।

जरा सा मुस्कुराएँ हम,चलें बाज़ार कहती वो।

दिला बस एक साड़ी दो,इसी को प्यार कहती वो।

ललित



विधाता छंद
मुस्कान रहित

मिली है अफसरी उनको,अजी क्या बात है उनकी?
नहीं वो मुस्कुरा सकते ,बड़ी औकात है उनकी।
नहीं वो हँस सकें ढँग से,सदा गर्दन अकड़ती है।
न जाने अफसरी की बू  ,उन्हीं को क्यूँ जकड़ती है?

ललित




विधाता छंद
सरल मुस्कान

सरल मुस्कान पोती की,बढाए शान दादू की।
मगर दादू यही सोचे,छड़ी मिल जाय जादू की।
बचाए पोतियों को जो,दरिंदों की निगाहों से।
नहीं सरकार से आशा,हटाए शूल राहों से।

ललित

 
विधाता छंद
मधुर मुस्कान
मधुर मुस्कान तो केवल,दिखे उस श्याम के मुख पर।

सदा जो मुस्कुराता है,दुखी होता नहीं दुख पर।

उसी मुस्कान की वो राधिका रानी दिवानी थी।

समाई बाँसुरी में प्रीत की ये ही कहानी थी।

ललित



विधाता छंद
सहज मुस्कान

सहज मुस्कान अधरों पर,दिखे मन-भावनी न्यारी ।
सुने जब झुन-झुने की धुन,ममा की लाडली प्यारी। 
कभी हँस दे इशारों पर,बजा 'जयकृष्ण' पर ताली।
कभी गुम-सुम दिखाई दे,
हिलाए हाथ वो खाली।

ललित

30.11.19

मुक्तक

आदमी की मुस्कुराहट खो गई जाने कहां?
हर कली की चुलबुलाहट खो गई जाने कहाँ?
हाथ मोबाइल लिए हर आदमी खुद में रमा।
वो हँसी वो खिलखिलाहट खो गई जाने कहाँ?

ललित

कुटिल मुस्कान

सरल मुस्कान मुखड़े पर,दिखे जब वोट माँगे वो।
बने मंत्री,तभी मुख पर,कुटिल मुस्कान टाँगे वो।
नहीं फिर हाथ जोड़े वो,न वादे याद ही करता।
नहीं जनता दिखे उसको,उड़ानें खूब है भरता।

ललित

29.11.19
नकली मुस्कुराहट

बाग में कुछ लोग मिलकर,नित लगाते हैं ठहाके।
गम भुलाने को सभी वो,साथ मिलकर चहचहाते।
मुस्कुराहट ओढ़ नकली,बाग में फिर हैं टहलते।
इस बहाने से सभी के, गम-भरे दिल हैं बहलते।

ललित


विधाता छंद

कभी वो मुस्कुराते हैं,कभी नज़रें झुका लेते।
कभी तिरछी निगाहों को,गगन में वो टिका देते।
न हम कुछ भी समझ पाते,हँसे हैं या फँसे हैं वो।
कि हमको ही फँसाकर बेतहाशा यूँ हँसे हैं वो।

ललित


28.11.19
विधाता छंद

तुम्हारी मुस्कुराने की,अदाएँ ही निराली हैं।
नज़र के तीर चलने दो,निगाहें क्यूँ चुराली हैं।
धरा को चूमती देखो,धवल ये चाँदनी प्यारी।
तुम्हारी मुस्कुराहट पर,हसीं ये चाँदनी वारी।

ललित


गीतिका छंद

मुस्कुराने के लिए बस इक बहाना चाहिए।
एक सुंदर सा मुबाइल साथ लाना चाहिए।
सैलफी अपनी जरा सा मुस्कुरा कर लीजिए।
और अपने मित्रगण को भेज जल्दी दीजिए।

ललित


27.11.19
मुस्कान
मुक्तक 16:14

कुछ मुस्कानें अपने भीतर,दर्द समेटे हैं होतीं।
अधर-मधुर मुस्कान बिखेरें,पलकें छुप-छुप कर रोतीं।
बुझी-बुझी सी आँखें दिल का,दर्द बयाँ हैं कर देती।
चिंता के गहरे सागर से,अँखियाँ ले आतीं मोती।

ललित



मुक्तक

मुस्कुराहट के यहाँ दिखते कईआयाम हैं।

मदभरी मुस्कान में मय के छलकते जाम हैं।

कौन सी मुस्कान अधरों पर सजानी है कहाँ?

जानता ये बात जो उसके सँवरते काम हैं।

ललित




26.11.19
गीतिका छंद

मुस्कुराते हैं कई जन,इक अलग अंदाज से।
भींच लेते हैं अधर वो,दीखते नाराज से।
अति कुटिल मुस्कान से कुछ,पातकी नर यों हँसें।
सोचने लगते सभी हम,क्यों यहाँ पर आ फँसे?

ललित


26.12.19
महाश्रृंगार छंद
श्रृंगार प्रयास

नैन शर्बतिया गोरे गाल,मटकती मटकी वाली नार।
चली पनघट से भरकर नीर,साथ में कमसिन सखियाँ चार।
सभी इठलाकर करती बात,सुनातीं-सुनतीं 
हँस-हँस राज।
राज की बातें ऐसी खास,जिन्हें सुन शर्माए खुद लाज।


'ललित'


26.11.19
गीतिका छंद

मुस्कुराने का खजाना खोजना मुश्किल हुआ।
क्यों कहाँ कब मुस्कुराएँ सोचना मुश्किल हुआ?

मुस्कुराने की अदाएँ इस कदर महँगी हुई।
आदमी में मुस्कुराहट पोसना मुश्किल हुआ।

ललित

25.11.19
महाश्रृंगार छंद

चला आ कान्हा यमुना-तीर,राह देखें सब गोपी-ग्वाल।
सुना है नन्हा सा गोपाल,बजाए वंशी बड़ी कमाल।
राधिका भी सखियों के साथ,करेगी रास आज की रात।
चाँद का भी निखरा है रूप,चाँदनी भिगो रही है गात।

ललित


24.11.19
छंदमुक्त 
चिंता

मन कहता है
चिंता मत कर चिंतन कर।
मगर दिल...
वह तो चिंतन को 
चिंता में बदल देता है।
और दिमाग...
मत पूछिए
दिन भर में चिंता के
हजारों शूल पैदा कर देता है
जो चुभ-चुभ कर 
प्राणों को घायल करते रहते हैं।
सोचिए जरा...
ये दिल,दिमाग और मन 
क्या हैं?
कहाँ रहते हैं?
इंसान के वश में क्यों नहीं आते?
प्राणों को क्यों हैं तड़पाते?
और चिंता करने से...
क्या झंझावात नहीं आते?

महाश्रृंगार छंद
आज का प्रयास
समीक्षा हेतु


प्रार्थना इतनी सी है श्याम,करो तुम सदा हृदय में वास।
बंद जब नैन करूँ गोपाल,दिखो राधा सँग करते  रास।
मुझे दिल की धड़कन में श्याम,सुनाई दे वंशी की तान।
अंत जब निकलें तन से प्राण,करे हर साँस श्याम गुण-गान।

ललित



महाश्रृंगार छंद

पुष्प से करते हैं सब प्यार,फूल के कदमों तले बहार।
बहारों का मतलब है फूल,पुष्प के पीछे चले बहार।
न हो जिसको फूलों से प्यार,उसी को तो कहते हैं शूल।
शूल को भी पनपाएँ खूब,बहारें करती भारी भूल।

ललित


गीतिका

क्यों ललित मन बावरा ये लिख ग़ज़ल सकता नहीं?
दूर लिखना तो बहुत ये कर नकल सकता नहीं।

ज़िंदगी भर जब ललित बोता रहा था आम तू।
क्यों अभी फिर आम की तू पा फसल सकता नहीं?

क्या हुआ कैसे हुआ ये ज़िंदगी की शाम में?
सोच बैठा क्यों ललित तू ,फल बदल सकता नहीं?

है अभी दम बाजुओं में,कर ज़रा तदबीर तू।
कौन कहता है अभी खिल नव-कमल सकता नहीं?

ललित

20.11.19
महाश्रृंगार छंद

बहन की प्रीत बड़ी निःस्वार्थ,प्रेम भाई का
ज्यों सौगात।
सुता-सुत की वो भोली जिद्द,लुभाती पत्नी की हर बात।
पिता के दिल में छिपा सनेह,छलकता माँ का निश्छल प्यार।
प्यार के पहियों पर ही यार,टिका है यह सारा संसार।

ललित


20.11.19
महाश्रृंगार छंद


हुई हमसे ये कमसिन भूल,कि कर बैठे हम उनसे प्यार।
नहीं है जिन्हें प्यार की कद्र,उन्हीं को पहना बैठे हार।
अटपटा इकतरफा ये प्यार,चुभे ज्यों पग में कोई शूल।
चल रही इक पहिए पर हाय,गई ये गाड़ी रस्ता भूल।

ललित



महाश्रृंगार छंद

ज़रा दे दो मुझको घनश्याम,तुम्हारे चरणों की वो धूल।
जिसे लूँ मैं अपने सिर वार,खिले फिर मेरे मन का फूल।
ज़रा मेरे नयनों में श्याम,बसेरा कर लो राधा संग।
मगन हो किया करूँ दीदार,खिले फिर मेरा हर इक अंग।

ललित


महाश्रृंगार छंद

यशोदा माँ का पकड़े हाथ,ठुमक-ठुम ठुमके नंद-कुमार।
बजे पायल छुटके के पाँव,चले जब फुदक-फुदक सुकुमार।
सुनहरी बाँसुरिया ली थाम,हिलाए छोटे-छोटे हाथ।
हिले सिर मोर-पंख का ताज,किलोलें करे जगत का नाथ।

ललित


18.11.19
महाश्रृंगार छंद

अरे ओ मुरलीधर घनश्याम,सुना दे वो वंशी इक बार।
जिसे सुनते ही नंगे पाँव,दौड़ आती थी हर व्रज-नार।
भाग्य मुरली सा दे-दे श्याम, करूँ मैं नित अधरामृत पान।
भूल कर जग के सारे काम,सुनूँ मैं बाँसुरिया की तान।

ललित

मुक्तामणि छंद

कभी ज़िंदगी के लिए,प्यार जताना सीखा। 
कभी बंदगी के लिए,फूल चढ़ाना सीखा।

निखर उठी ये ज़िंदगी,प्यार तुम्हारा पाया।
निखर उठी जब बंदगी,फूल चढ़ाना आया।

ललित

मुक्तक

राधा गोरी हुई बावरी,श्याम तुम्हारे लिए।
भूल गई कान्हा खुद का भी,नाम तुम्हारे लिए।
बैठी रहती है पनघट पर,प्यासी तव दर्शन की।
भूल गई सुबहा वो भूली,शाम तुम्हारे लिए।

ललित


मुक्तामणि छंद


पायल के घुँघरू बजें,मधुर ताल से जैसे।
इठलाती नवयौवना,चली जा रही ऐसे।

घूँघट में से झाँकते,कजरारे दो नैना।
इक पल में ही ले गए,साजन जी का चैना।

दिल की धड़कन हो गई,दिल से गायब जैसे।
चैन चुरा कर ले गयी,मतवाली वो ऐसे।

गगरी में पानी भरा,कुछ ऐसे गोरी ने।
पल्लू ढलका कर किया,दिल घायल छोरी ने।

ललित



15.11.19
कुण्डलिया छंद

चौराया जो एक है,नयापुरा में खास।
बृजटाकिज में से यहाँ,आती दूषित बास।

आती दूषित बास,यहाँ नित कचरे में से।
लगे कचोरी स्वाद, भला बदबू में कैसे?

नगर-निगम ये हाय,'ललित' कैसा बौराया?
बना नरक का द्वार,दिया है ये चौराया।

ललित

मुक्तामणि छंद

कई भाँति के लोग हैं,जीवन है इक मेला।
कुछ के मुख मुस्कान है,कुछ पर ग़म का रेला।

कुछ कड़वे-तीखे यहाँ,कुछ स्वभाव से मीठे।
कुछ निर्मल मन के धनी,कुछ चिकने अरु चीठे।

उनमें कुछ अपने लगें,सुंदर सपने जैसे।
जिनके हिय में प्यार हो,मीत मिलें कुछ ऐसे।

सबसे रीत निभाइए,प्रीत दिखा संसारी।
सबको गले लगाइए,मुस्कानें दे प्यारी।

ललित




15.11.19

मुक्तामणि छंद

चंचल मन चिंता करे,सोच-सोच मर जाए।
होनी तो होकर रहे,मनवा रोक न पाए।

होनी जब टलती नहीं,करो यत्न कितना भी।
मनवा चिंता मत करे,मत सोचे इतना भी।

ललित

मुक्तक 16-16

आज अचानक याद आ गये,गिल्ली-डण्डा,कंचे खो-खो।
रस्सा-कशी आईस-पाईस,छुपम-छुपाई हो-हो-हो-हो।
सतोलिया चौपड़ चंगा-पो,पोषम्पा भई पोषम्पा।
रस्सी-कूद कबड्डी हॉकी,धड़ी-मार-घूँसा दो-दो-दो।

ललित


मुक्तामणि छंद

दिल की धड़कन क्या कहे,मीत ज़रा सुन मेरे।
क्या होती है प्यार की,आहट दिल में तेरे?

धड़कन दिल की तेज है,साँसें रुक-रुक जाती।
दिल झूमे है प्यार से,कहे नज़र मदमाती।

ललित

11.11.19
मुक्तामणि छंद
13:12
यति पूर्व लघु गुरू
अंत दो गुरू
दो-दो समतुकांत

मुक्तामणि छंद

अनगिन स्वर्णिम रश्मियाँ,छुएँ धरा को ऐसे।
रात नहीं इक युग हुआ,मिले बिना हो जैसे।
धवल-चाँदनी रात में,धरती पर बिछ जाए।
सखी-धरा पर चाँदनी,प्यार-छटा बिखराए।

ललित


मुक्तामणि छंद

सुख-दुख की सरिता बहे,अविरल जीवन सारे।
वो पाए आनन्द जो,कभी न गोता मारे।

मन-मौजी बन कर रहो,कटी पतँग के जैसे।
संग हवा के चल पड़ो,दुख व्यापेगा कैसे?

ललित


कुण्डलिनी छंद

खेल चुका हर रंग से,हुआ वृद्ध वो आज।
अब हर रँग फीका दिखे,करें न नैना काज।
करें न नैना काज,दर्द घुटनों में होता।
माया-ममता-मोह,लगाएँ मन में गोता।

ललित



जयकारी छंद
समीक्षा हेतु

भिन्न जातियों वाला देश।
सब धर्मों का जहाँ प्रवेश।
अलग-अलग हैं भाषा-भेष।
प्रेम-प्यार का दे संदेश।

नहीं विश्व में कोई देश।
रखता भारत सा परिवेश।
ब्रम्हा-विष्णु-महेश-गणेश।
राम-कृष्ण के भक्त अशेष।

भगवदगीता और कुरान।
इनसे महके हिंदुस्तान।
गुरूग्रंथ साहिब दे ज्ञान।
सब धर्मों का हो सम्मान।

हिंदू-मुस्लिम औ सरदार।
मन्दिर-मस्जिद अरु गुरुद्वार।
गिरिजाघर में भली प्रकार। 
पूजा करते सब नर-नार।



ललित


कुण्डलिनी छंद

कान्हा तेरे प्यार की,कर दे इतनी छाँव।
जिसमें परमानन्द की,हो थोड़ी सी ठाँव।
हो थोड़ी सी ठाँव,ध्यान-जप मन को भाए।
सुख-दुख की बरसात,नहीं मन को छू पाए।

ललित


7.11.19

जयकारी छंद

स्वच्छ रखो नाली घर-द्वार।
शौचालय अरु स्नानागार।
छोटी सी ये मानो बात।
मच्छर से फिर मिले निजात।

पानी भरे न घर के पास।
साफ नीर मच्छर का वास।
उसमें डालो थोड़ा तेल।
हो जाए मच्छर को जेल।

ललित

5.11.19

गीतिका छंद

गूँजती हरदम जहाँ हैं,प्यार की शहनाइयाँ।
प्रीत की खुशबू हवा में,ले जहाँ अँगड़ाइयाँ।
आँख मींचे साथ मेरे,हमसफर तू चल वहाँ।
चल पड़ी है साथ तो मत,सोच मंजिल है कहाँ?

ललित

चौपाई

कलियों ने जब घूँघट खोले।बजी बाँसुरी हौले-हौले।
वंशी-वट यमुना के तीरे,झूमे कान्हा धीरे-धीरे।ल

अधर मुरलिया में रस घोलें।गोप-गोपियाँ धुन-सुन डोलें।
नैन कन्हैया के जब मटकें।राधा जी की पलकें अटकें।

पायलिया मुँहजोर हुई है।घुँघरूओं ने तान छुई है।
नारी बन शिव-शम्भू घूमें।घूँघट में 
कान्हा सँग झूमें।

नंदन-वन की शोभा न्यारी।छम-छम नाचें 
कृष्ण-मुरारी।
बेसुध होकर गोपी-ग्वाले,आत्म-ज्ञान के पीते प्याले।

दोहा

बजा सुरीली बाँसुरी,यमुना जी के तीर।
व्रज-वासी नर-नार की,कान्हा हरते पीर।

ललित

ताटंक छंद

जितना कोमल जितना छोटा,प्यारा दिल है सीने में।
उतना ये उत्पात मचाए,मजा न आए जीने में।
रोज़ नया इक स्वप्न दिखाए,नहीं कभी जो हो पूरा।
दिल मुश्किल कर दे जीना जब,अरमानों का हो चूरा।

ललित

चौपई छंद
बाल कविता

चाँद-चाँदनी खाकर पान।
चले घूमने हिंदुस्तान।
देख हिमालय  श्वेत विशाल।
हुई चाँदनी आज निहाल।

गंग नदी की शीतल धार।
भारत-माता का गलहार।
संगमरमरी सुंदर ताज।
चाँद-चाँदनी देखें आज।

लाल-किला दिल्ली की शान।
और स्वच्छता का अभियान।
चमक रहा नव-हिंदुस्तान।
देख चाँद की निकली जान।

ललित


मुक्तक

स्वप्नों की मायानगरी ये,कैसी 
श्याम बना डाली।
झोली भरते जीवन बीते,अंत-समय मिलती खाली।
स्वप्न-स्वप्न बस स्वप्न देखते,समय बिताता जो सारा।
अंत-समय वो मानव पाता,खुद को स्वप्नों से हारा।

ललित

जयकारी छंद

गरल हवा में डाला घोल।
क्या कर बैठा नर तू बोल?
मुश्किल में बच्चों की जान।
नहीं साँस लेना आसान।

अम्बर नीला दिखे न आज।
धूल-धुआँ का है बस राज।
कीचड़ में बदला है आब।
सूखे कूप-नदी तालाब।

लिया दानवों ने है धार।
पॉलीथिन रूपी अवतार।
नर-नारी बालक आवाम।
पॉलीथिन के सभी गुलाम।

निश्चय ग़र कर लें हम आज।
पॉलीथिन का रहे न राज।
आतिश-बाजी कर दें बंद।
रखें हवा को हम स्वच्छंद।

ललित

1.11.19
जयकारी छंद

देख लिया सारा जग घूम।
कहीं नहीं दिल पाया झूम।
सबसे प्यारा हिंदुस्तान।
प्यारी जिसकी है मुस्कान।

स्वर्णिम होती इसकी भोर।
नाच उठे जब मन का मोर।
रंगीली होती हर शाम।
साँध्य-आरती हो निष्काम।

ललित

जयकारी छंद

नारंगी केला अमरूद।
सार-तत्त्व इनमें मौजूद।
कुछ खट्टा कुछ मीठा आम।
उससे मीठा काला जाम।

काजू किशमिश और बदाम।
पिश्ता चिलगोजा के नाम।
रखना बच्चों हरदम याद।
बड़ा अनूठा इनका स्वाद।

ललित




रात की दीवार पर

मुक्तक

चाहता कुछ राज लिखना,रात की दीवार पर।
चाँद की मीठी नज़र पर,चाँदनी के प्यार पर।
प्यार के अरमान मेरे,चूर दिल में ही हुए।
कौनसी कविता लिखूँ अब,ज़िंदगी की मार पर?

ललित

विविध


शक्ति छंद
मधुर रास

सितारों भरी चाँदनी रात में,बजी पायलें खूब बरसात में।
गरजते हुए बादलों के तले,मिले राधिका से कन्हैया गले

बजे बाँसुरी चूड़ियाँ भी बजें,हँसें गोपियाँ कृष्ण राधा सजें।
कन्हैया सुनाता नये राग वो,सुनें गोपियाँ तो खुले भाग वो

दसों ही दिशाएं लगी झूमने,धरा भी गगन को लगी चूमने।
सजे मोगरा वेणियों में जहाँ,कन्हैया बजाए मुरलिया वहाँ।

बसन्ती हवाएं छूएं गात को,थिरकने लगीं गोपियाँ रात को।
नथनियाँ हिलें हास के साथ में,कि झुमके हिलें रास के साथ में।

ललित

निश्चल छंद
छलिया घनश्याम

राधा जी की रूप माधुरी,ललित ललाम।
चकित नैन कनखी से निरखे,मनहर श्याम।

अँखियों ही अँखियों से पीता, माखन चोर।
राधा के नैनों की मदिरा,वो नित भोर।

ऐसा जादू करता छलिया,वो घनश्याम।
खिंची चली आती है राधा,सुबहो शाम।

गोप-गोपियाँ हँसी उड़ायें,दे दे ताल।
वो नटखट नैना मटकाए,चूमे गाल।

कैसे कैसे नाच नचाता,नटवर श्याम।
आत्मानंदी रास रचाता,वो निष्काम।

मधुर बाँसुरी से छेड़े कुछ,ऐसी तान।
आलौकिक मद से भर देता,सबके कान।

जादू की मुरली ले आया,माखन चोर।
बजा मधुर वंशी खींचे वोे,मन की डोर।

व्रज का छोरा बरसाने की,छोरी साथ।
जोरा-जोरी करे छुड़ाए,गोरी हाथ।

सिंहावलोकन घनाक्षरी

प्रार्थना

थक गये अब नाथ,
नैया खेते मेरे हाथ।
आप ही सँभालो अब,
पतवार नाव की।

पतवार नाव की लो.
थाम करकमलों में।
झलक दिखादो जरा,
दयालु स्वभाव की।

दयालु स्वभाव की वो,
छवि तारणहार की।
दवा आज दे दो प्रभु,
मेरे हर घाव की।

मेरे हर घाव की वो,
दवा श्याम नाम की जो।
लगन लगा दो तव,
चरणों में चाव की।

ललित

गीतिका छंद

बेटियाँ

प्यार की हर इक कसौटी,पर खरी वो बेटियाँ।
तात-माता की दुलारी,हैं परी वो बेटियाँ।
हौसला दामन छुड़ाए,माँ-पिता का जब कभी।
बेटियाँ देती सहारा,हौसला रख कर तभी।

'ललित'

लावणी मुक्तक

मैं क्या जानूँ

बात कहूँ मैं अपने दिल की,औरों की मैं क्या जानूँ।

फूलों में जजबात नहीं हैं,भौंरों की मैं क्या जानूँ।
प्यार बिके अरमान बिकें हैं,आज यहाँ सब कुछ बिकता।
झरनों में आवाज नहीं है,धौरों की मैं क्या जानूँ।
'ललित'

ताटंक मुक्तक

किरचें

टूटे सपनों की कुछ किरचें,बाकी हैं अब झोली में।
कैसे कैसे रंग दिखे हैं,सपनों की इस होली में।
स्वप्न सुनहरे खो देते हैं,कब क्यूँ अपने रंगों को?
बेरंगा मन बैठा रहता,क्यूँ सपनों की डोली में?

मुक्तक
माँ 

क्यूँ होता है अक्सर ऐसा,माँ छुप-छुप कर रोती है?
बेटा नजरें फेर रहा क्यूँ,सोच दुखी वो होती है।
माँ के अरमानों का सूरज,दिन में क्यूँ ढल जाता है?
एक अँधेरे कोने में वो,बेबस सी क्यूँ  सोती है?

ताटंक छंद

नई धुनें

नये वर्ष में नयी धुनों पर,मुरली श्याम बजा देना।
मेरे अधरों पर मंगलमय,नित नव गीत सजा देना।
मनमंदिर में मूरत तेरी,संग राधिका प्यारी हो।
दिन तो दिन है कान्हा मेरी,नहीं रात भी कारी हो।
'ललित'

कुकुभ मुक्तक

पुष्प

पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,दिल ही दिल में जलते हैं।

ललित


कुकुभ मुक्तक

फूल और कााँँटे

फूल और काँटों का रिश्ता,मानव नहीं समझ पाये।
पुष्पों की रक्षा करते ये,काँटे ही हरदम आये।
कंटक से फूलों की शोभा,आजीवन हमदम काँटे।
काँटों में जो फूल खिले वो,कहीं न फिर ठोकर खाये।
ललित

मुक्तक

पहरेदारी


काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।

ललित

कुकुभ मुक्तक


प्रेम भरा हो दिल में जितना,उतना ही वो छलकेगा।
नैन झरोखे से वो शीतल,मोती बनकर ढलकेगा।
जिसके सीने में नाजुक सा,प्यार भरा इक दिल होगा।
उसकी उठती गिरती पलकों,में हरदम वो झलकेगा।
ललित

रोला छंद
गीत

दिल के रिसते घाव

दिल के रिसते घाव,छिपाकर जग में डोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

देखे सुंदर मीत,देख ली प्रीत अनोखी।
केवल अपनी जीत,लगे है सबको चोखी।
जब भी बोलो बात,जरा मन ही मन तोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

झूठा ये संसार,यहाँ की रस्में झूठी।
जो होता गमगीन,उसी से रहती रूठी।
पी लो गम के घूँट,मगर तुम मुँह मत खोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

दुनिया की है रीत,किसी के साथ न रोये।
हँसी उड़ाये और,राह में काँटे बोये।
जपलो हरि का नाम,पाप खुद अपने धोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

भगवन दयानिधान,उन्हीं से विनती करलो।
हरि को अपना मान,शीश चरणों में धरलो।
तर जाएगी नाव,प्रभू के आगे रो लो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

ललित

रोलाछंद

गीत

दे देते हैं घाव

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।

और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जिस पर है विश्वास,वही दिल को तोड़ेगा।
जो है अपना खास,वही फिर मुख मोड़ेगा।
सहलाता है घाव,नहीं शीतल सावन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जो होता फनकार,यशस्वी वो हो जाता।
दुनिया भर का प्यार,उसे फन है दिलवाता।
दिल के गहरे घाव,नही भर पाता फन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

ईश्वर से विश्वास,कभी यूँ ही उठ जाता।
जिसकी टूटी आस,नहीं फिर वो उठ पाता।
भर देता है घाव,कभी जानी दुश्मन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जीवन भर तो साथ,नहीं तन भी दे पाता।
विषम रोग में साथ,नहीं धन भी दे पाता।
भरें उसी के घाव,करे जो यहाँ भजन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

'ललित'

मनोरम छंद
वृद्धावस्था/बुजुर्गी

आँसुओं से तरबतर

आँसुओं से तर बतर था,एक बेबस वृद्ध नर था।
देह जर्जर हो गई थी,वासना भी सो गई थी।

प्यार की प्यासी निगाहें,जो खुली रहना न चाहें।
हर तरफ पसरी उदासी,दे खुशी क्यों कर जरा सी।

याद आती है जवानी,जब नसों में थी रवानी।
पाल बच्चों को लिया था,दो जहाँ का सुख दिया था।

बन गये लायक सभी वो,सुख न दे पाए कभी वो।
व्यस्त सब बच्चे हुए हैं,कान के कच्चे हुए हैं।

स्वप्न सब बिखरे सुनहरे,होगए हैं पूत बहरे।
दर्द में डूबी निगाहें,कण्ठ से निकलें कराहें।

जिन्दगी की क्या कला है?ये बुजुर्गी क्या बला है?
जान जीवन भर न पाया,बालकों ने जो दिखाया।

देह में रमता रहा था,नेह में जीवन बहा था।
स्वार्थमय जीवन जिया था,याद कब रब को किया था।

आज रब है याद आता,भूल इक पल वो न पाता।
या खुदा अब तो रहम कर,दु:ख दारुण ये खतम कर।

प्यार जो उसने दिया था,त्याग जो उसने किया था
काश बच्चे जान पाते,दर्द को पहचान पाते।

नेह से नजरें मिलाकर,दीप आशा का जलाकर।
घाव पर मरहम लगाते,बोल मीठे बोल जाते।

ललित

अगस्त 2019 की रचनाएँ

अगस्त 19

चौपाई
तन-मन-धन

बड़ा लालची मानव मन है,
हर रिश्ते में खोजे धन है।

ईश्वर को भी धन दिखलाए,
हरि को भी देना सिखलाए।

तन करता धन का  साधन है,
मन काला और गोरा तन है।

नहीं मिले जब मनचाहा धन।
बिदक-बिदक जाता है ये मन।

धनवानों को सब ही पूजें।
देख रंक को मुखड़े सूजें।

धन ने रिश्तों को बिसराया।
मन मानव का समझ न पाया।

दोहा

तन-मन-धन का खेल ये,मानव समझ न पाय।
धन के पीछे मन चले,और चले तन हाय।

ललित

कुण्डलिनी छंद
माया

इतनी उलझी डोर में,माया की भगवान।
क्यों बाँधा तूने बता,भोला ये इंसान?
भोला ये इंसान,डोर में ऐसा उलझे।
खूब लगाए जोर,नहीं फिर भी वो सुलझे।

ललित

मुक्तक 16-12
हमसफर

कुछ दूर तक तो साथ मेरे,चल जरा ओ हमसफर।
ये ज़िन्दगी है खूब छोटी,खूबसूरत है डगर।
मंजिल तलक चलती रहेंगी,प्यार की पुरवाइयाँ।
हर राह की तन्हाइयों में,साथ होगा तू अगर।

ललित

चौपाइयाँ
दिल की धड़कन

दिल की धड़कन क्या कहती है?
मन को ये चिन्ता रहती है।

क्या दिल में ममता रहती है?
या थोड़ी समता रहती है?

क्या छुप-छुप कर रोता है दिल?
या गम ओढ़े सोता है दिल?

क्या खुशियों में दिल हँसता है?
या आशा में वो  फँसता है?

क्या भूखा ही रहता है दिल?
या सूखा ही रहता है दिल?

दिल करता मन से विनती है।
क्या दिल की भी कुछ गिनती है?

दोहा

दिल गूँगा-बहरा नहीं,और न ये पाषाण।
दिल से ही इंसान है,दिल में ही हैं प्राण।

ललित



.4.08.19
चौपाइयाँ
दिल

दिल अक्सर चुप ही है रहता।
सारे ग़म खुद ही है सहता।

खुशियाँ सबसे साझा करता।
ग़म अपनी झोली में भरता।

ललित

 पीयूष वर्ष छंद
श्याम सुंदर

श्याम सुंदर साँवरे मुरलीधरा।
घूम ले कश्मीर तू भी अब ज़रा।
घाटियों में बाँसुरी कुछ यूँ बजा।
आसमाँ छूने लगे भारत-ध्वजा।

'ललित'


पीयूष वर्ष छंद
प्रीत

प्रीत में भीगा हुआ सावन जगा।
प्यार दिल में दस्तकें देने लगा।
गूँजती शहनाइयाँ ले आइए।
कुछ फुहारें प्यार की दे जाइए।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
तीन सौ सत्तर

तीन सौ सत्तर हटा ऐसे दिया।
आसमाँ में छेद कर जैसे दिया
दानवों से मुक्त कर कश्मीर को।
है सँवारा हिंद की तकदीर को।

ललित

गीतिका छंद
वादियाँ

वादियों में फूल महके,राह निष्कंटक बनी।
खिल उठे मुख हैं सभी के,और दीवाली मनी।
चाँद मुस्काने लगा है, आसमाँ भी हँस रहा।
दुश्मनों का प्राण मानो,हलक में है फँस रहा।

 ललित


गीतिका छंद
ज़िंदगी का कारवाँ

ज़िंदगी के कारवाँ में प्यार की बरसात हो।

खूबसूरत ज़िन्दगी हो प्रीत की सौगात हो।

द्वार से ही लौट जाए दुःख उल्टे पाँव से।

ज़िंदगी शीतल रहे हरदम सुखों की छाँव से।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
कश्मीर

हिंद का सरताज जो कश्मीर है।
वो सदा से हिंद की जागीर है।
नींद से अब जाग तू इमरान जा।
हिंद का कश्मीर है ये मान जा

क्या हुआ मायूस तू क्यों होगया?
तीन सौ सत्तर हवा जो हो गया।
डाल मत कश्मीर पर गंदी नज़र।
है हमें आतंक का कुछ भी न डर।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
बाँसुरी

बाँसुरी थी क्यों बजाई साँवरे?
छोड़ना था जब तुझे व्रज-गाँव रे।
गोपियों सँग रास भी था क्यों रचा?
राधिका को क्यों रहा था तू नचा?

ललित

पीयूष वर्ष छंद
बदरा

झूम कर बरसो बदरवा साँवरे।
नीर का प्यासा हमारा गाँव रे।
सुन जरा प्यासी धरा की सिसकियाँ।
प्यास से रोती धरा की हिचकियाँ।

ललित

दोहा

नौटंकी करते रहे,इतने दिन तक आप।
क्या अब तक लेते रहे,गहराई का नाप?

ललित

पीयूष वर्ष छंद
राधिका की प्रीत

राधिका की प्रीत ऐसी श्याम से।
राह में आँखें बिछाए शाम से।
श्याम जब आए चमन दिल का खिले।
माधुरी मुस्कान अधरों पर मिले।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
गीत

राधिका की प्रीत ऐसी श्याम से।
राह में आँखें बिछाए शाम से।
प्रीत राधा कृष्ण की यों पावनी।
शांत शीतल ज्यों फुहारें सावनी।
रात-रानी सी महक उठती वहाँ।
श्याम राधा का मिलन होता जहाँ।


श्याम जब आए चमन दिल का खिले।
माधुरी मुस्कान अधरों पर मिले।
हर लता खुश हो हवा में झूमती।
चाँदनी निर्मल धरा को चूमती।
चाँद भी कुछ पल ठहर जाता वहाँ।
श्याम राधा का मिलन होता जहाँ।


बाँसुरी छूती अधर जब श्याम के।
गूँजते हैं सुर हृदय विश्राम के।
बंद हों जब नैन राधा के चपल।
दल-दलों में खिल उठें सुंदर कमल।
देवता सब देखते नभ से वहाँ।
श्याम राधा का मिलन होता जहाँ।

ललित

मुक्तक
राधा

बनी घनश्याम की छाया,बिरज में घूमती 
है वो।
सुरीली बाँसुरी की धुन,सुने तो झूमती है वो।
बड़ी चंचल बड़ी भोली,दिवानी श्याम की राधा।
चिढ़े वो जिस मुरलिया से,उसी को चूमती है वो।

ललित

मुक्तक 14-14
फुहारें

फुहारें छू रही तन को,अगन में झोंकती मन को।
हवा शीतल सुहानी ये,बढ़ाती और उलझन को।
करे कल-कल नदी ऐसे,नवेली ज्यों चले छम-छम।
चले आओ सजन जल्दी,करो रंगीन सावन को।

ललित

मुक्तक 14-14
सितारे

सितारों की टिमा-टिम से,यहाँ रंगीन हैं रातें।
रजत से चाँदनी-चंदा,करें गुप-गुप मुलाकातें।
हिले वो चाँद सरवर में,चँदनिया गुन-गुनाती है।
नदी के कूल पर सजनी,करें हम प्यार की बातें।

ललित


छंद सिंधु
1222 1222 1222
दो दो समतुकांत

19.08.19
छंद सिंधु
धुन

न जाने कौन सी धुन पर थिरकता मन?
नई नित चाहतों में ये सरकता मन।

बसे मद-मोह-माया लोभ हर रग में।
न मन वश में किया तो क्या किया जग में?
ललित

छंद सिंधु
सुख-दुख

बिना दुख के किसे सुख है यहाँ मिलता?
बिना कंटक चुभे गुल है कहाँ खिलता?
निराला है यहाँ पर भाग्य का लेखा।
परिश्रम से बदलता भाग्य भी देखा।

ललित

छंद सिंधु
बहारें

बहारों का रहे मौसम सदा प्यारा।
तुम्हारी ज़िन्दगी में ग़म न हो याराँ।
मिले हर भोर ताजा इक खुशी तुमको।
भुला लेकिन न देना तुम कभी हमको।

ललित


छंद सिंधु
राधा


दिवानी श्याम की ऐसी  हुई  राधा।
लुभाए साँवरा रँग और भी ज़्यादा।
निगाहें खोजती हर-पल कन्हैया को।
बजैया  बाँसुरी के,गौ-चरैया को।

ललित
 


कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा
भानमती ने कुनबा जोड़ा।
वही बना अब जानी-दुश्मन
जोड़ा था जो थोड़ा-थोड़ा।


महाश्रृंगार छंद
मुरलीधर

सुना है मुरलीधर घनश्याम,बजाता मुरली तू हर भोर।
सुने जो उस वंशी की तान,वही हो जाता
भाव विभोर।
मोरपंखी है तेरा ताज,और तू चोरों का सिरमौर।
चुराता है माखन हर रोज,मचाता है गलियों में शोर।

ललित

पंचचामर छंद
खुशी

कभी मिले खुशी कभी पहाड़ दुःख के मिले।
कभी बहार तो कभी न एक भी कली खिले।
हसीन मोड़ ज़िन्दगी कभी दिखा गई हमें।
कभी हज़ार ठोकरें मज़ा चखा गईं हमें।

ललित

पंचचामर छंद
सुता

सुता मिली नसीब से न हो दुलार की कमी।
गले लगा रखो  उसे रहे न प्यार की 
कमी।
पढ़ा-लिखा करो जवाँ छुए न आसमान क्यों?
जहाँ सुता पले वहाँ बढ़े न आन-बान क्यों?

ललित

पंचचामर छंद
राम नाम

लिया न नाम राम का जपा न श्याम नाम ही।
न लोभ-मोह से बचा भुला सका न काम ही।
हसीन जिंदगी जिया किए न पुण्य दान ही।
चला गया जहान से बचा सका न प्राण ही।

ललित

पंचचामर छंद
श्याम

बजा रहा न बाँसुरी न एक कौर खा रहा।
न नंद-लाल ग्वाल-बाल-धेनु संग जा रहा।
न खेलता न कूदता न धूम वो मचा रहा।
कि राधिका बिना न श्याम गोपियाँ नचा रहा।

ललित

पंचचामर
देशभक्ति

खिलें वहाँ हजार फूल फौज हिंद की जहाँ।
करे हजार शूल चूर्ण फौज हिंद की वहाँ।
उठा सके न आँख शत्रु देख हिंद के जवाँ।
हरेक जंग के लिए जवान हिंद के रवाँ।

ललित
कुण्डलिनी छंद
कनटोप

कमर-बेल्ट बाँधे हुए,माथ धरे कनटोप।
नहीं चले तो दस गुना,जुर्माना तू सौंप।

जुर्माना तू सौंप,भले टूटी हैं सड़कें।
साँड लड़ें हर ओर,करम-फूटी हैं सड़कें।

ललित


जुलाई 19 की रचनाएँ


जुलाई 19

ताटंक छंद
माँ
सबसे प्यारी सबसे न्यारी,दुनिया में है होती माँ।
संतानों के जीवन में है,बीज सुखों के बोती माँ।
नित लें जो आशीष मात का,छू कर माँ के पैरों को।
धूल चटा देते हैं वो नर,अच्छे-अच्छे शेरों को।

ललित

रूबाई

छंदों की रानी रूबाई,लिखने बैठे हम भाई।
रचनाएँ सारे मित्रों की,सुंदर बहुत नज़र आईं।
नया विषय अनछुआ चुनें क्या,सोच रहे थे
हम बैठे।
गरमा-गरम पकौड़ों के सँग,आई वो लेकर चाई।

ललित

रुबाई छंद


अखियों पर नारंगी चश्मा,छतरी थी सिर पर प्यारी।
नारी सुलभ नहीं थी लज्जा,भाव-भंगिमा असुरारी।
बाल कटे सैंडल ऊँचे थे,जींस-टॉप तन चिपके से।
चंदन की सौरभ में लिपटी,क्या थी वो सुंदर नारी?
 ललित

रुबाई 


सुंदर फूल खिले बगिया में,झूमे मन ही मन माली।
रात-रात भर जाग-जाग कर,की थी उसने रखवाली।
जग में सौरभ फैलाएँगें,सुमन सदा इस बगिया के।
यही सोच कर मुस्काता है,हाथ रह गए अब खाली।

ललित

रुबाई

बात कहो जब अपने मन की,उसकी भी लो सुन थोड़ी।
जिसने अपनी बात आपका, मूड देख मन रख छोड़ी।
हँसी-खुशी-विश्वास-प्रेम से,रिश्तों में रस भर जाए।
होता सफल वही है जिसने,राह समय के सँग मोड़ी।

ललित

रुबाई छंद

रहा देखता स्वप्न सुनहरे,अब तक तो हर पल प्यारे।
जाग नींद से भोर हुई अब,छोड़ रहे अम्बर तारे।
शाम रँगीली करनी हो तो, सुबहा में तू 
हँस ले रे।
सपनों में रँग भरने हों तो,कर्मों में रँग भर
जा रे।

 ललित

शक्ति छंद
122 122,122 12

दिखे खूबसूरत उसे ज़िंदगी।
करे श्याम की जो सदा बंदगी। 
न बाधा कभी राह में आ सके।
धरे ध्यान जो श्याम को पा सके।

ललित

शक्ति छंद

न माखन भला आज क्यों खा रहा?
न गैया चराने लला जा रहा।
कहे माँ यशोदा कन्हैया बता।
रहा मात को क्यों लला तू सता?

नई बाँसुरी ये अधर से लगा।
बजा कर दिलों में उमंगें जगा।
सखा-ग्वाल सब ले रहे चुटकियाँ।
दिला श्याम माखन भरी मटकियाँ।

ललित

शक्ति छंद

नहीं ज़िंदगी से मुझे कुछ गिला।
मिला है किए कर्म का ही सिला।
नहीं है कमी कुछ मिला खूब है।
अजी कर्म का ये सिला खूब है।

ललित

शक्ति छंद

छिपी ये दुआ मात के प्यार में।
न संतान उलझे कभी खार में।
दुआ मात की जिस सुता को मिले।
सदा छू सके वो नई मंजिलें।

ललित

शक्ति छंद

कन्हैया ज़रा अर्ज सुन भक्त की।
मिटा दे निशानी बुरे वक्त की।
ज़रा देख ले इक नज़र भक्त को।
बुला दे इसी पल भले वक्त को।

ललित

मुक्तक

कुछ बूँदें बरसा कर मेघा,चले गए तुम और कहीं।
क्या तुमको भायी कोटा से,सुंदर कोई ठौर कहीं?
ताल-तलैया-पोखर-नदिया,धरती का हर-कण प्यासा।
क्या तुमको भटका बैठे हैं,सुंदर-सुंदर मोर कहीं?

ललित

शक्ति छंद

मधुर राग में बाँसुरी बज रही।
मधुर रात है राधिका सज रही।
गरजते हुए बादलों के तले।
मिले राधिका से कन्हैया गले।

ललित

शक्ति छंद

चलो आज सपने सुहाने बुनें।
नई गीत गाएँ पुराने सुनें।
नई मंजिलों के नई राह को।
चुनें मुस्कुराकर नई चाह को।

ललित

शक्ति छंद

बरसने लगे मेघ यूँ झूम कर।
तरसती धरा के अधर चूम कर।
लिए मस्त सौरभ हवा आ रही।
तटों से सटी हर लहर जा रही।

ललित

शक्ति छंद

नदी ताल झरने न दिखते जहाँ।
कलमकार कविता न लिखते वहाँ।
वनों पादपों की कमी से दुखी।
कलमकार कब हो सके है सुखी?

ललित

15.07.19
दोधक छंद
211 211 211 22
वार्णिक छंद

निष्ठुर ओ बदरा अब आजा
हर्ष भरी बुँदियाँ बरसा जा।

नीर फुहार मिले बदरों की।
प्यास बुझे मन की अधरों की।

ललित
दोधक छंद

जीवन की बस एक कहानी।
भूल करे नर ये अभिमानी।
पत्थर में भगवान तलाशे।
मन्दिर सा मन क्यों न तराशे?

ध्यान जरा मन में कर ले जो।
कृष्ण-कथा मन में भर ले जो।
श्याम-प्रभो दुख-ताप हरेंगें।
राह दिखा भव-पार करेंगें।

ललित

दोधक छंद

छोड़ गये व्रज को तुम ऐसे।
प्राण गए तन को तज जैसे।
वो वृषभानसुता बिसराई।
श्याम रही बन जो परछाई।

ये यमुना-तट राह निहारें।
गोप-सखा सब मीत पुकारें।
माखन के घट भूल गए क्या?
भा मथुरा के फूल गए क्या?

ललित

आल्हा छंद
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित

आज गुरू चरणो में मेरा,नमस्कार है बारम्बार।
छंद और लय ज्ञान दिया है,और दिया है बेहद प्यार।
शब्दों का संयोजन सीखा,उनसे ही है मैंने आज।
छंदों की रचना में खोया,भरता हूँ मैं नित परवाज

गुरू देव की इच्छा में ही,मिल जाती है
जिनकी चाह।
ऊँची फिर परवाज भरें वो,और सुगम हो जाती राह।
नियमों का पालन करने से,लेखन पाता और निखार।
माँ शारद को हैं वो प्यारे,जो नर करें गुरू से प्यार।

गुरू रूप में ईश्वर आए,देने हमें ज्ञान भण्डार।
गुरू तत्व को तुम पहचानो,इसकी महिमा अपरम्पार।
मंगल सदा शिष्य का होता,गुरू कृपा से ही तो खास।
गुरू शिष्य का बंधन ऐसा,जो आता है दिल को रास।

मात-पिता गुरु के चरणों में,जो नित अपना शीश झुकाय।
सदा विजय उसकी है होती,मनचाही मंजिल वो पाय।
एकलव्य सा शिष्य मिले तो,गुरु मूरत भी दे दे ज्ञान।
गुरू द्रोण की किरपा से ही,अर्जुन ने सीखा संधान।

'ललित'

दोधक छंद

जीवन की अनबूझ कहानी।
वृद्ध हुआ कल का अभिमानी।
छोड़ चली हर इन्द्रिय ऐसे।
साथ यहीं तक था बस जैसे।

लेकिन डोल रहा मन प्यासा।
हाय बढ़े नित काम-पिपासा।
अंत नहीं मद-मोह-निशा का।
और नहीं कुछ भान दिशा का।

ललित

दोधक छंद
सुख-दुख

जीवन में दुख वो कब पाए?
जो वृषभानुसुता गुण गाए।
नाम जपो मुख से नित राधा।
पार करो दुख में हर बाधा।

ललित 

21.07.19
लावणी छंद

हर पंछी की यही कहानी,साँझ पड़े घर आना है।
सुबह सवेरे फिर से उड़कर,दाना चुगने जाना है।
चीं-चीं करते नन्हे बच्चे,जो भूखे बैठे घर में।
उनके मुख में भी रखने हैं,चुग्गे दाने दिन-भर में।

ललित

जीवन की अनबूझ पहेली,समझ कहाँ मन है पाता।
कभी मिले खुशियों का रेला,कभी दुःख 
दारुण आता।

लावणी छंद

पुष्पों की बगिया से थोड़ी,खुशबू लेते आना तुम।
सीख साथ में आना प्यारे,फूलों से मुस्काना तुम।
चुभन सहें काँटों की फिर भी,हर-पल हैं जो मुस्काते।
उन सुमनों की सौरभ से ही,देव-मनुज सब हर्षाते।

ललित


लावणी छंद

झम-झम-झम-झम बरसे बदरा,गरज-गरज कर फिर बरसे।
भिगो दिया गोरी का लहँगा,निकली ज्यों ही वो घर से।
शर्माई सकुचाई गोरी,भीग-भीग कर फिर भागी।
साजन से मिलने की इच्छा,जाग-जाग कर फिर जागी।

ललित

लावणी छंद

प्यार छुपाए दिल ही दिल में ,चाँद भटकता  रजनी में।
प्यारा सा इक प्यार भरा दिल, ढूँढे अपनी सजनी में।
कहे चाँदनी सजना प्यारे,प्यार भरा दिल ये मेरा।
दे दूँगी इक झटके में यदि,प्यार मिले मुझको तेरा

ललित

लावणी छंद

मिलते हैं वो चाँद चँदनिया,दुनिया रोशन करने को।
अँधियारे को चीर दिलों में,प्रेम तरंगें भरने को।
रात अमावस की काली कब,दिल की प्यास बुझा पाती।
चाँद-चँदनिया की मादकता,प्रेमी जोड़ों को
भाती।

ललित

लावणी छंद

दिल चाहता था प्यार के कुछ,पल समेटूँ 
झोलियों में।
पर प्यार का प्यासा रहा दिल,खो गए पल बोलियों में।
ऐ वक्त तू इक पल ठहर जा,प्यार का अहसास कर लूँ।
मैं प्यार की गहराइयों में,चार गहरी साँस भर लूँ।

ललित

30.07.19
चौपाइयाँ

श्यामप्रिया राधा सुकुमारी,नटवर-नागर कृष्णमुरारी।
नंदनवन महका है ऐसे,चंदन-कानन महके जैसे ।

पुष्प लदी हर डाली चहके,लतिकाओं का मन भी बहके।
राधा की वेणी में जूही,महक रही मस्ती में यूँही।

नाक नथनियाँ पहने राधा,कान्हा ने वंशी-सुर साधा।
मोरपंख कान्हा ने धारा,राधा ने दिल उस पर वारा।

कान्हा की कजरारी अखियाँ,देख-देख बलिहारी सखियाँ।
रास-रचाए रस बरसाए,कान्हा सबका मन हर्षाए।

दोहा

मगन हो रहा रास में,व्रज का माखनचोर।
ठुमक-ठुमक कर नाचता,नटखट नंदकिशोर।

ललित



चौपाई

बड़ा लालची मानव मन है,
हर रिश्ते में खोजे धन है।

ईश्वर को भी धन दिखलाए,
हरि को भी देना सिखलाए।

तन करता धन का  साधन है,
मन काला और गोरा तन है।

नहीं मिले जब मनचाहा धन।
बिदक-बिदक जाता है ये मन।

ललित

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...