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अगस्त 2018

[01/08, 5:29 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद

यौवन बीत गया सुख से अब सोच दिमाग लगा कुछ तो।

जो हरि वास करे मन में उस से अब प्रीत पगा कुछ तो।

तात सुता सुत भ्रात सखा इन साथ विराग जगा कुछ तो।

जो हरि एक रमा जग में बस वो बन जाय सगा कुछ तो।

ललित
[01/08, 8:20 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद
2
चाहत है इतनी मनमोहन,
आन बसो मन-आँगन में।

नैन करूँ जब बन्द प्रभो तव,
दर्शन हों इस सावन में।

हाथ पसार करूँ विनती प्रभु,
दाग लिए इस दामन में।

साँस रहे तन में प्रभु तो नित,
जाप चले मन पावन में।

ललित
[02/08, 1:50 PM] ललित:
आल्हा छंद

जीवन बीता समझ न पाया,
अब तक मैं सपनों की बात।

स्वप्न सुनहरे खत्म न होते,
सपनों में ही बीती रात।

रंग-बिरंगे सपने मन जो,
रहा देखता उम्र तमाम।

उन टूटे सपनों की किरचें,
अब बहलाएँ सुबहो-शाम।

ललित
[02/08, 3:14 PM] ललित:
आल्हा छंद

कान्हा के कदमों की आहट,
सुनने को तरसे हैं कान।

कानों में हर-पल गूँजे है,
मधुर बाँसुरी की वो तान।

तान बाँसुरी की ऊधौ जी,
सुन लेता है जो इक बार।

ध्यान-धारणा बिना कन्हैया,
कर देते उसको भव-पार।

ललित
[02/08, 7:29 PM] ललित:
आल्हा छंद

सावन की रिम-झिम बौछारें,
भिगो गई गोरी का गात।

गाल गुलाबी नैन शराबी,
अधरों पर अटकी कुछ बात।

पानी की कुछ चंचल बूँदें,
चूम रही   गोरी के गाल।

प्यार भरी नीली अँखियों में ,
तैर रहे हैं डोरे लाल।

ललित
[03/08, 9:55 PM] ललित:

मदिरा सवैया छंद

यौवन में इतरा कर तू अब वृद्ध हुआ पछताय रहा।

जीवन व्यर्थ गवाँय दिया अब क्यों मुँह को बिचकाय रहा?

नाम न राम जपा मुख से दिल से प्रभु को बिसराय रहा।

राम-हरे अब तो जप ले अब क्यों जग में भरमाय रहा ?

ललित

[06/08, 1:46 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
10-8-8-6

बिजुरी जब चमके,
जियरा धड़के,
खन-खन खनके,कँगना रे।

मतवारे साजन,
प्यारे राजन,
सूना सावन,अँगना रे।

सावन हरियाला,
बदरी वाला,
मथ-मथ डाला,इस मन को।

जल्दी घर आ जा,
रस बरसा जा,
भूल न राजा,विरहन को।

ललित
[06/08, 5:29 PM] ललित:

त्रिभंगी छंद

छोटा सा बाजा,बन्दर राजा,खाकर खाजा,ले आया।

कुर्ता पाजामा,बन्दर मामा,मस्जिद-जामा,
से लाया।

सुन ढोल-धमाँसे,छम-छम नाचे, भरे कुलाँचे,बन्दरिया।

बिजुरी जब चमके,नाचे जम के,लगाय ठुमके,सुंदरिया।

ललित
[06/08, 6:56 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
3

रख प्रभु से आशा,छोड़ हताशा,घोर-निराशा,तज दे रे।

जीवन क्षण-भंगुर,
होकर आतुर,
नित मुरली-धर,भज ले रे।

सुन मेरे भैया,
जीवन नैया,
कृष्ण-कन्हैया,खेवेंगें।

गहरा भव-सागर,
पार सकें कर,
हरि को जो नर,सेवेंगें।

ललित
[07/08, 6:46 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद

जय राधे-कृष्णा,जय श्री कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा,जय राधा।

जय-जय सुख सागर,जय मुरली धर,नटवर नागर,हर बाधा।

जय बाल-मुकुंदा,जय गोविंदा,यशुदा-नंदा,दुख हारी।

गोवर्धन-धारी,मुकुट-बिहारी,कृष्ण-मुरारी,सुख कारी।

ललित
[08/08, 7:30 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद

यमुना के तीरे,ढोल-मँजीरे,
धीरे-धीरे,बजते हैं।

वंशी-वट झूमे,भँवरे घूमें,मोर पंख सिर,सजते हैं।

जब नँद का लाला,मुरली-वाला,कान्हा काला,हँसता है।

राधा का मनवा,चंचल चितवा,मुस्कानों में,
फँसता है।

ललित
[10/08, 6:54 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद

लालच के मारे,नेता सारे,लगा मुखौटे,फिरते हैं।

दाढ़ी में जिनके,लाखों तिनके,सीना जोरी,करते हैं।

जनता को लूटें,नेता झूँठे,सौदागर ये,सपनों के।

कानून बनाते,फिर इतराते,नहीं सगे ये,अपनों के।

ललित
[11/08, 5:56 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद

जय श्री राधा कृष्ण

राधा की बहियाँ,पकड़ कन्हैया,यमुना तीरे जब मोड़े।

राधा शरमाए,कुछ सकुचाए,
पकड़ कन्हैया,कब छोड़े?

दिल धक-धक धड़के,
राधा भड़के,
मन ही मन में,
खुश हो ले।

नैना मटकाए,हँसता जाए,
राधा का घूँघट खोले।

ललित
[11/08, 4:36 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद

ये बाग-बगीचे,महल-गलीचे,
साथ समय पर,कब देते?

ये रिश्ते-नाते,प्यार-दिखाते,
हाथ समय पर,कब देते?

वो एक निराला,मुरली वाला,
पीर सभी की,हरता है।

बस उसको भज लो,नाम सुमिर लो,
हाथ वही सिर,धरता है।

ललित
[12/08, 7:52 PM] ललित:

ताटंक छंद

कहलाता आजाद देश ये,अंदर से टूटा-टूटा।

उलट-फेर कानूनों में कर,नेताओं ने ही लूटा।

इकहत्तर की वय में भी है,लगा रैलियों का रेला।

नेताओं की मुट्ठी में क्यों,कैद बहारों का मेला?

ललित

[14/08, 7:50 AM] ललित:
रोला छंद
पूरा गीत
1
🙏🌸🙏

मुरली वाले श्याम,सुनो गोवर्धन धारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

गोप-गोपियाँ बाल,सखा सब तुम्हें पुकारें।
राधा जी भी राह,तुम्हारी नित्य निहारें।

वंशीवट की छाँव,खड़ी है राधा प्यारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

तरसे हैं अब कान,मधुर मुरली को प्यारे।
आ जाओ इक बार,अरे ओ कान्हा कारे।

माखन मिश्री भोग,लिए यशुदा बलिहारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

सूना यमुना तीर,हुआ नंदन-वन सूना।
तुझ बिन ओ नँदलाल,राधिका का मन सूना।

बाँसुरिया की तान,सुना दो फिर से प्यारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

ललित
🙏🌸🙏
[14/08, 10:19 AM] ललित:

रोला छंद
1

कहाँ गया सँविधान,मूल अधिकारों वाला।
लगा हुआ क्यों आज,न्याय के मुँह पर ताला?

बरगद पीपल नीम,आम का उठा जनाजा।
काँटे-दार बबूल,बना जंगल का राजा।

ललित
[14/08, 3:51 PM] ललित:
रोला छंद

देख लिया घनश्याम,तुम्हारा प्यार अनोखा।
छोड़ गए व्रजधाम,दे गए सबको धोखा।

ओ निष्ठुर मन मीत,कहो क्या थी मजबूरी।
भुला दिए सब मीत,करी राधा से दूरी।

ललित
[14/08, 4:34 PM] ललित:
रोला छंद

अँखियों से मत मार,करे मत तिरछे नैना।
तिरछे तेरे नैन,चुरा लेते हैं चैना।

चैन गया मुँह फेर,मिली हैं जब से अँखियाँ।
फिरती मैं बेचैन,हँसें हैं सारी सखियाँ।

ललित
[15/08, 8:19 PM] ललित:
रोला छंद

अपना हिन्दुस्तान,जहाँ में सबसे न्यारा।
सर्व धर्म सम्मान,हमारा पावन नारा।
देश-भक्ति की गंध,यहाँ माटी ने धारी।
तूफानों से जंग,रहे हरदम ही जारी।

ललित
[16/08, 6:41 PM] ललित:
दोहा

हंसों का रँग देखकर,काग चकित रह जाय।
चुपड़े पॉडर-क्रीम पर,कालिख छूट न पाय।

ललित
[17/08, 10:37 PM] ललित:
रोला छंद

मिलते रहते मीत,सभी को इस जीवन में।
होती सच्ची प्रीत,किसी विरले के मन में।
आदि समय से रीत,यही चलती आई है।
सच्ची जिसकी प्रीत,जीत उसने पाई है।

ललित
[18/08, 5:34 PM] ललित:
रोला छंद

बोर हुए दो यार,रेल में कविता करते।
देख रेल की चाल,आँख में आँसू भरते।

भारत की ये रेल,विश्व में सबसे प्यारी।
करवाती है सैर,पूर्ण भारत की न्यारी।

🙏🙂🙏ललित
[18/08, 5:56 PM] ललित:
रोला

जीने का अंदाज,सजन का सबसे न्यारा।
हँसी-ठिठोली-बाज,साजना मुझ
को प्यारा।
अँगना हो गुलजार,सजनवा के आने से।
तन में बजें सितार,बाँह में भर जाने से।

ललित
[18/08, 6:36 PM] ललित:
रोला छंद

नीले तेरे नैन,समन्दर से भी गहरे।
प्यारे तेरे कान,मगर क्यों इतने बहरे?
दिल की ये आवाज,नहीं क्यों सुन हैं पाते?
क्यों मेरे जज्बात,नहीं तुझको छू जाते?

ललित
[19/08, 5:40 AM] ललित: आइए सुबह की शुरुआत बिटिया रानी के साथ करते हैं...
🙏🌷🙏🙂

रोला छंद

बाबुल का घर-द्वार,छोड़ कर बिटिया रानी।
चली आज ससुराल,लिए नयनों में पानी।
ये आँगन ये गाँव,भूल कैसे पाएगी?
ममता की वो छाँव,और माँ यादाएगी।

भर आई हैं मात,पिता भाई की अँखियाँ।
क्यों जाती हो छोड़,कहें बचपन की सखियाँ?
कहें बहन अरु भ्रात,सदा खुश रहना बहना।
मोबाइल से बात,हमेशा करती रहना।

ललित
[19/08, 2:38 PM] ललित:
रोला सागर

भर ले जिसमें पीर,राधिका सागर जैसी।
कहाँ मिलेगी श्याम,बता दे गागर ऐसी।
काला था जो नीर,कन्हैया यमुना जी का।
उसका रँग भी हाय ,हुआ अँसुवन से फीका।

ललित
[20/08, 12:23 PM] ललित:
रोला छंद
जय गुरूदेव

👏👏👏👏👏👏👏

गुरूदेव का प्यार,मिला है हमको जैसा।
आज उन्हें सम्मान,मिला है बिल्कुल वैसा।
जय-जय शारद मात,आपकी कृपा निराली।
काव्यसृजन परिवार,बजाए खुश हो ताली।

ललित

👏👏👏👏👏👏👏
[21/08, 11:26 AM] ललित: 21.8.18
दोहा क्रमांक : 1

फूल नहीं हैं छोड़ते,मुस्काना दिन-रात।
चाहे कुदरत दे उन्हें,काँटों की सौगात।

ललित
[21/08, 11:46 AM] ललित:
दोहा क्रमांक : 2

मीठा-मीठा रस मिला,खुशबू की सौगात।
भौंरे ने जब फूल से,कही प्यार की बात।

ललित
[21/08, 3:01 PM] ललित:
दोहा क्रमांक : 3

छोटा सा जीवन मिला,सपनों में मत डूब।
निश-दिन हरि का नाम ले,पुण्य कमाले खूब।

ललित
[21/08, 7:12 PM] ललित:
दोहा क्रमांकः4

दुख के पी लेे घूँट जो,लेकर हरि का नाम।
सुख उसका पीछा करे,भजता जो निष्काम।

ललित
[21/08, 7:56 PM] ललित:
दोहा क्रमांक : 5

क्यों भेजा संसार में,हरि ने हमको हाय?
काम क्रोध मद लोभ से,मन जो छूट न पाय।

ललित
[23/08, 8:50 AM] ललित:
मुक्तक प्रतियोगिता
मेरा प्रयास

घाव जो तुमने दिया है क्या कभी भर पाएगा?

क्या खुशी का वो समन्दर लौटकर फिर आएगा?

कौन सा मरहम भला इस दिल को सकता जोड़ है।

दिल खिलौना तो नहीं जो टूटकर जुड़ जाएगा।

ललित
[24/08, 4:54 PM] ललित:
रोला छंद

झूम रहे हैं मोर,देख सावन का मेला।
अम्बर में है शोर,गरजते वारिद छैला।

बगिया में हर ओर,लगे सावन के झूले।
इठलाती हर नार,आज बन-ठन के झूले।

ललित
[24/08, 6:43 PM] ललित:
रोला छंद

रिम-झिम ये बरसात,देख मनवा हर्षाता।
बूँद छुए जब गात,भीग मन भी है जाता।

नदिया झूमी जाय,महकता है हर धोरा।
जोरा-जोरी आज,करे है बाँका छोरा।

ललित
[25/08, 4:11 PM] ललित:
रोला छंद

लोकतंत्र का लाभ,उठाया तुमने कैसा?
हथियाने को वोट,लुटाया कितना पैसा?

सत्ता का है शौक,पागलों तुम पर तारी।
जा-जा कर परदेश,दे रहे भाषण-भारी।

ललित
[26/08, 9:18 AM] ललित:
रोला छंद

लोकतंत्र का लाभ,उठाया तुमने कैसा?
हथियाने को वोट,लुटाया कितना पैसा?

सत्ता का है शौक,पागलों तुम पर भारी।
जा-जा कर परदेश,कर रहे भाषण जारी।

ललित
[26/08, 10:54 AM] ललित:

राखी दोहे

रक्षा बंधन की पहली प्रस्तुति
समीक्षा हेतु

भेज रही हूँ नेह की,
               इक छोटी सी डोर।
दे दे ना भैया मुझे,
                खुशियों का इक छोर।

भाई मेरा खुश रहे,
                  यही प्रभू से आस।
जीवन में देखे नहीं,
                  कभी गमों की त्रास।

वीरा तुझसे है बँधा,
                   मन का हर इक तार।
तेरे मधुर सनेह से,
                    जीतूँ सब संसार।

'ललित'
[27/08, 1:45 PM] ललित:
मनोरम छंद

उठ रहा दिल में बवंडर।
भावनाओं का समंदर।
सिर्फ जी ली जिंदगी है।
या करी कुछ बंदगी है?

ललित
[27/08, 1:51 PM] ललित:
मनोरम छंद
2
बंदगी मैं कर न पाया।
जिंदगी ने यूँ सताया।
आस पूरी हो सकी कब?
कामनाएँ खो चुकी सब।

ललित
[27/08, 2:33 PM] ललित:
मनोरम छंद

क्या कहा दिल ने न जाने?
जिंदगी ढूँढे बहाने।
प्यार यूँ गम से किया क्यों?
दूसरों का गम पिया क्यों?

ढूँढती खुशियाँ ठिकाना।
जान कब पाया जमाना?
जिंदगी जिंदादिली है।
रस तभी पीता अली है।

ललित
[27/08, 3:52 PM] ललित:
मनोरम छंद
रास

बाँसुरी बजती सुहानी।
गोपियाँ नाचें दिवानी।
पायलें छम-छम बजे हैं।
राधिका के सुर सजे हैं।

रात भर चलता रहा रे।
रास वंशी के सहा रे।
चाँद भी रुकने लगा है।
आसमाँ झुकने लगा है।

शाँत सुरभित हैं हवाएँ।
झूमती हैं सब दिशाएँ।
श्याम-राधा नैन अंदर।
प्रीत का छलके समंदर।

ललित
[27/08, 4:29 PM] ललित:
मनोरम छंद

नन्द-यशुदा की दुआ है।
जन्म लल्ला का हुआ है।
है बिरज में धूम मचती।
गोपियाँ दर्शन न तजती।

ललित
[28/08, 9:35 AM] ललित:
मनोरम छंद

राधिका रो-रो पुकारे।
आ मिलो अब श्याम प्यारे।
भूल क्यों व्रज को गए हो?
किस जहाँ में खो गए हो?

नंद-बाबा राह देखे।
क्या यही थे भाग्य-लेखे?
माँ यशोदा गोपियाँ सब।
हैं नहीं क्या याद भी अब?

इक घड़ी को दर्श दे दो।
मुस्कुरा कर हर्ष दे दो।
बाँसुरी फिर से बजा दो।
रास में हमको नचा दो।

ललित
[28/08, 8:08 PM] ललित:

मनोरम छंद

प्यार की दीवानगी थी।
क्या तुम्हारी बानगी थी?
दिल जवाँ था तब तुम्हारा।
प्यार जीवन था हमारा।

वक्त ने ये दिन दिखाए।
दो कदम तन चल न पाए।
वक्त करता क्या सितम है?
आज तन में क्यों न दम है?

ललित

।
[29/08, 9:05 AM] ललित:
मनोरम छंद
बुढापा

वक्त ने क्या दिन दिखाए?
दो कदम तन चल न पाए।
वक्त करता क्या सितम है?
आज तन में क्यों न दम है?

जो चला था हर महीना।
जिंदगी भर तान सीना।
आज वो झुक सा गया क्यों?
राह में रुक सा गया क्यों?

ये बुढ़ापा क्या बला है?
वक्त की ये क्या कला है?
आज पथराई नजर है।
और धुँधलाई डगर है।

धमनियाँ जमने लगी हैं।
साँस भी थमने लगी है।
दिल मचलता और ज्यादा।
और जीने का इरादा।

ललित
[29/08, 9:44 PM] ललित:
मनोरम छंद

बाग की नन्हीं कली थी।
शीत-छाया में पली थी।
तात की थी लाडली वो।
थी बड़ी चंचल कली वो।

अब लगी थी वो चहकने।
घर लगा उससे महकने।
तात घर वो रह न पाई।
हो गयी इक दिन पराई।

ललित
[30/08, 11:15 AM] ललित:
सार छंद
चाह

नैन नहीं कुछ चाहें कान्हा,
चाहें दर्शन तेरा।

राधा के सँग निधिवन में वो,
प्यारा नर्तन तेरा।

श्रवण चाहते सुनना अद्भुत,
वंशी-वादन तेरा।

जिव्हा मेरी चखना चाहे,
मिश्री-माखन तेरा।

'ललित'

मार्च 2018 ईमेल डन

ंमार्च 18 ई मेल भेजा 31.3.18
31.3.18
दोहा
जीवन में जो भी मिला,मान और अपमान।
अंत समय में सब यहीं,छोड़ चला इंसान।

27.3.18
ताटंक छंद
2

देखी कुछ सुंदर तस्वीतरें,मनहर मंजर भी देखे।
फूलों के तन में चुभते कुछ,तीखे खंजर भी देखे।
साथ समय के इंसानों के,बदले तेवर भी देखे।
बड़े-बड़े सेठों के तन पर,नकली जेवर भी देखे।

ताटंक
रास में आए भोले बाबा

छम-छम-छम बाजे पायलिया,नाच रही राधा गोरी।
बाँसुरिया की मधुर तान पे,ठुमक रही बाँकी छोरी।
भोला-बाबा ओढ़ चुनरिया,नाच रहा है मस्ती में।
शमशानों का वासी वो शिव,झूम रहा है बस्ती में।

ललित

ताटंक
कुछ मन की बात

देखी दुनियादारी हमने,देख लिए दुनिया वाले।

घाव सभी के अपने-अपने,और टीसते हैं छाले।

मिर्च मिलाकर मरहम में सब,बड़े प्यार से हैं लाते।

छालों को सहला-सहला कर,और घाव हैं दे जाते।

ललित

26.3.18

ताटंक छंद

कान्हा इतनी किरपा कर दे,पल भर भी न तुझे भूलूँ।
राधे-कृष्णा नाम स्वरूपी,झूले में मन से झूलूँ।
मन-मन्दिर में दर्शन होवें,नयनों में झाँकी तेरी।
अधरों से वो लगी बाँसुरी,चितवन वो बाँकी तेरी।

ललित

ताटंक मुक्तक
🙏🌹🙏

जो जिव्हा निशि-दिन राम रटे,उस का तो कहना क्या है?
धारण की जो तुलसी माला,उस जैसा गहना क्या है?
राम नाम नित सुमिरन करना,और हमें करना क्या है?
राम सुधा सरिता में बह कर,और कहीं बहना क्या है?

ललित

ताटंक छंद
2

चंचल मन में एक मिनट में,भाव हजारों हैं आते।
पलक झपकते ही जो मन को,मील हजारों ले जाते।
मन की गति को रोक सकें वो,मानव दुर्लभ हैं होते।
स्वप्न हजारों रंगों के इस, मानव मन में हैं सोते।
ललित

23.3.18
एक अदना प्रयास
देवहूति माता ने अपने पुत्र कपिल भगवान से निम्न प्रश्न किए
ताटंक छंद
कपिल-गीता
1
कपिल देव को सद्गुरु माने,वन्दन करती है माता।
प्रश्न पूछने हैं कुछ मुझको,आज्ञा जो दे दो दाता।
पूछो माँ वो प्रश्न आप जो,मन में उठते हैं सारे।
सच्चा सुख किसको कहते हैं,और कहाँ सुख के द्वारे?

2
देवहूति पूछे दुनिया में,सच्चा सुख होता है क्या?
अविनाशी सुख के ये मानव,बीज कहीं बोता है क्या?
ऐसा परमानंद चाहिए,जो अखण्ड अविनाशी हो।
दुख जीवन में कभी न आए,मन सुख का आभासी हो।
3

भोग सुखों का शान्ति दिलाता,सदा मानती थी ऐसा।
दुख का अंत नहीं होता पर,सुख भोगो चाहे जैसा।
सुख से थोड़ी शान्ति मिले फिर,मन चंचल हो जाता है।
हर इन्द्रिय का सुख भोगा पर,शान्ति नहीं
मन पाता है।
4

सदा रहे जो मन में कायम,जिसका नाश नहीं होता।
क्या ऐसा आनन्द प्रभो जी,प्राणाधार कहीं होता?

दुर्बल-रोगी-वृद्ध हुआ तन,नहीं छोड़ता भोगों को।
इन्द्रिय-सुख देता है तन में,नित्य बुलावा रोगों को।

5

बहुत त्रास देती है मन को,भोग और सुख की माया।
नहीं निकलती मन से क्यों ये,काम-वासना की छाया?
प्रभो वासना से मुझको अब,छुटकारा दिलवा दो जी।
दुःख मिटे आनन्द मिले वो,हाला तुम पिलवा दो जी।

ललित
23.3.18
ताटंक छंद
वंशी मधुर बजा कर कान्हा,मधु-रस कानों में घोले।
नैन-सुधा बरसाता मोहन,नैनों से हौले-हौले।
मोरपंख जो सिर पर धारा,दिल उसमें अटका मेरा।
देकर झटका तूने कान्हा,दिल नीचे पटका मेरा।

ललित
22.3.18
मुक्तक (उल्लाला आधारित)
उलझन सुलझाने चला,चंचल मन के साथ मैं।
और उलझ बैठा वहीं,अपने मन के हाथ मैं।
मन तो मन की ही करे,जोड़े हाथ विवेक है।
परिणामों को देखकर,पकड़ूँ अपना माथ मैं।

ललित किशोर 'ललित'

21.3.18

उल्लाला

उलझन सुलझाने चला,चंचल मन के साथ मैं।
और उलझ बैठा वहीं,अपने मन के हाथ मैं।

मन तो मन की ही कहे,जोड़े हाथ विवेक है।
मन की ही रहती सदा, टँगड़ी ऊँची एक है।

ललित

20.3.18
उल्लाला छंद

रंग बदल गिरगिट करे,रक्षा अपनी जान की।
नेता बदले रंग है,बलि देने को आन की।

उल्लाला छंद
केवट प्रसंग

पत्थर से नारी बनी,तव चरणों की धूल से।
नाव काठ की ये प्रभो,छू मत देना भूल से।

चरण पखारूँ आपके ,शुद्धोदक से नाथ मैं।
ले जाऊंगा पार फिर, बड़ी खुशी के साथ मैं।

गंगा पार उतारती,नैया मेरी खास है ।
तारोगे भव से मुझे,इतना तो विश्वास है।

ललित
माँ तेरे इस लाल को, कहीं न मिलती छांव है ।
पीपल बरगद सब कटे ,कंकरीट का गांव है ।
मोबाइल हावी हुआ,कल पुर्जों के देश में। अनपढ़ मोबाइल रखें ,पढ़े लिखो के वेश में।

19.3.18

उल्लाला

करें दिखावा नेह का,नाते रिश्तेदार सब।
वक्त पड़े पहनायगें,काँटों का वो हार सब।

नाव हमारे प्यार की,डूब गई मझधार में।
लहरें ही थी मौज में,खोट न थी पतवार में।

'राज' गुरू के प्यार में,कितनी मधुर मिठास है।
हुशियारों की डाकटर,आज करे आभास है।

शब्दों की जादूगरी,शब्दों का ही खेल है।
शब्द साधना से फले,काव्य सृजन की बेल है।

काव्य सृजन की बेल ये,छंदों को ले साथ में।
फूलों से लद जाय है,लय को लेकर हाथ में।

ललित

भाव उठें मन में जहाँ,और कलम चल जाय है।
सुंदर छंदों में वहीं,काव्य सृजन ढल जाय है।

'काव्य सृजन' की प्रार्थना,माँ शारद से आज है।
'राज' गुरू किरपा करें,जिन पर हमको नाज है।

ललित
18.3.18
उल्लाला

बिटिया खेले आँगना,छोटे-छोटे पाँव हैं।
लेकिन क्या माता-पिता,देते उसको छाँव हैं?

बेटे-बेटी में बड़ा,फर्क करें कुछ लोग हैं।
क्या बेटे के भेष में,कुछ सुखकर संजोग हैं?

समय बड़ा बैरी हुआ,वृद्धावस्था देख के।
अब तक पन्ने बंद थे,विधना के इस लेख के।

सपने कितने देखता,जीवन भर इंसान है।
सारे सपने तोड़ता,समय बड़ा बलवान है।

माया में उलझा रहा,जीवन भर जो शान से।
राम-कथा चाही नहीं,सुननी जिसने कान से।

पचपन का होकर वही,जपता काहे राम है?
क्यों उसको लगने लगा,सच्चा प्रभु का नाम है?

ललित

उल्लाला छंद
नव वर्ष प्रार्थना

सोचो इस नव वर्ष में,क्या करना है काम जी?
काम करोगे कुछ नया,या करना आराम जी?

माँ शारद की साधना,करनी हमको रोज है।
काव्य सृजन परिवार में,करनी हमको मौज है।

माँ शारद से प्रार्थना,आज करो कर जोड़ के।
माँ शारद मत रूठना,मत जाना मुख मोड़ के।

काव्य सृजन का ये पटल,महके नव मकरंद सा।
हर साथी लिखता रहे,नित नव सुंदर छंद सा।

ललित

17.3.18
उल्लाला

इंतजार कब तक करूँ,सजना तेरी ट्रेन का।
प्लेटफार्म की बेंच पर,भुर्ता बनता ब्रेन का।

ललित

14.3.18
चंद्रमणि छंद
1
स्वर्ण चुनरिया ओढ़ के,प्राची निखरी प्यार से।
हर्षित सब सरवर हुए,स्वर्णमयी श्रृंगार से।

15.3.18
1
चंद्र मणि छंद

बचपन छूटा हाथ से,घुसी जवानी देह में।
रूठ जवानी भी गई,भरे सावनी मेह में।

वृद्धावस्था आ घुसी,काले-काले केश में।
अपने बेगाने हुए,अब अपने ही देश में।

ललित

2
बाँसुरिया है हाथ में,छोटे से गोपाल के।
मोर मुकुट सिर सोहता,कृष्ण कन्हैया लाल के।

गैयन के पीछे चले,फुदक-फुदक वनराह में।
बाल सखा सब घेरते,शुभ-दर्शन की चाह में।

3
मात यशोदा का लला,राधा का चितचोर वो।
राधा का दिल ले गया,चोरों का सिरमोर वो।

नंदनवन पावन हुआ,नंद लला के पाँव से।
यमुना-तट शीतल हुआ,वंशी वट की छाँव से।

ललित

4
चंद्रमणि छंद

निश्छल निर्मल प्रेम की,सबको होती चाह है।
प्रेम सदा सबसे करो,ये ही सच्ची राह है।

होड़ा होड़ी मत करो,जीवन की इस राह में।
खुशियाँ छूटी जा रही,और खुशी की चाह में।
ललित

दिल की सारी धड़कनें,लेती जिसका नाम हैं।
मनमोहन घनश्याम वो,कान्हा जी सुखधाम हैं।

राधा-राधा जो जपे,कान्हा उसका दास है।
कान्हा का नाजुक जिया,राधा जी के पास है।

ललित
16.3.18
1
उल्लाला छंद

रहती हमें निहारती,खिड़की से इक नार थी।
सपने में आकर हमें,करती बेहद प्यार थी।

सपना टूटा एक दिन,नींद उड़ी मझधार में।
टूटे दिल को हम लिए,फिरते हैं बाजार में।

ललित

उल्लाला छंद
3

आया हूं कैलाश से,श्याम दर्श की आस में।
मैया तेरे लाल को, ले आ मेरे पास में ।

एक नजर मैं देख लूं,तेरे शिशु के भाल को।
ले लूँ अपनी गोद में,उस नटखट गोपाल को।

बाबा ले लो भेंट तुम,जो चाहो भंडार से। डर जाएगा लाल तो,नागों के इस हार से।

अलख निरंजन जब सुना,साँवरे नंदलाल ने।
शिव दर्शन की कामना,ठानी उस गोपाल ने।

जोर-जोर से फिर लला, करने लगा विलाप जी ।
भोले के दर्शन मुझे,करने दो माँ आप जी।

खूब जताया लाल से, प्यार यशोदा मात ने।
क्यों रोया लल्ला अभी,चौंकाया इस बात ने।

हँसकर बोले शिव तभी, मात हमारी बात सुन।
चुप हो जाएगा लला, हमें देख कर मात सुन।

ले आई मैया तभी,श्याम लला को गोद में। बाबा के दर्शन किए,श्याम हुआ चुप मोद में।

ललित

ललित
16.3.18
4
उल्लाला छंद

ढैंचू ढैंचू जो करे,पूर्ण गधा श्रीमान हो।
दोस्त उसी को लो बना,यदि उसमें कुछ जान हो।
आधा टुकड़ा दो उसे,आधा अपने पास हो।
फिर देखो बिन  कुछ किए,जनता अपनी दास हो।

ललित

13.3.18
1
रूपमाला छंद
रास में तेरे कन्हैया,क्या छुपा है राज? दौड़ आती गोपियां सब,छोड़ घर के काज।
बाँसुरी जादू भरी तू ,है बजाता खूब।
चर-अचर सब झूम उठते,आत्म रस में डूब।

नैन तेरे हैं समंदर,नील-वर्णी श्याम।
गोप-गोपी राधिका सब,डूबते निष्काम।चाँद-तारे व्रज-धरा औ',वायु जल आकाश।
कृष्ण-राधा मय हुए सब,तोड़ सारे पाश।

रूपमाला छंद
राधा विरह

राधिका हर पल निहारे राह तेरी श्याम।
भोर से तक हो न जाए,आज फिर से शाम।
चूड़ियां खनकें नहीं अब, पायलें भी मौन। राधिका के आँसुओं को,देख सकता कौन?

श्याम तेरे दर्शनों की,आस में दिन-रैन।
तू हृदय में है बसा पर,रो रहे हैं नैन।
सावनी शीतल फुहारें,भर रही हैं आग।
नींद नयनों से उड़ी हर,रैन बीते जाग।

नैन तुझ से क्यों लड़ाए,सोचती है आज?
तोड़ कर दिल को कन्हैया,क्यों न आई लाज?
प्रीत जोड़ी राधिका सँग,बाँसुरी ले हाथ।
आज वंशी और राधा,क्यों बिसारे नाथ?

माँ यशोदा गोप-गोपी,और ये व्रज-धाम।
सब पुकारें श्याम सुंदर,आज तेरा नाम।
तू जहाँ भी जा बसे बरसे,खुशी हर ओर।
आ न पाए श्याम तेरे,पास दुख का छोर।

ललित

12.3.18

1
रूपमाला छंद

फूल इक सुंदर खिला था,कंटकों के बीच।
खूँ-पसीने से रहा था,बागबाँ भी सींच।
क्यों मिली फिर बागबाँ को,एक गहरी चोट?
बागबाँ के खूँ-पसीने,में कहाँ थी खोट?

ललित

2
रूपमाला छंद

जिंदगी अनमोल कितनी,जान ले इंसान।
कब न जाने मौत आकर,छीन ले ये जान।
मौत जब चुपचाप आती,और करती घात।
तब कहीं इंसान को ये,समझ आती बात।

ललित

3
रूपमाला छंद

देश की तकदीर जिनके,हाथ में है आज।
राज-नेता दल-बदल वो,भर रहे परवाज।
मूक जनता भ्रष्ट नेता,को करे स्वीकार।
फिर कहाँ होगा भला इस,देश का उद्धार।

ललित

11.3.18
रूपमाला छंद

देवता ऋषि और मानव,और सारे संत।
दोस्त-दुश्मन मात-शारद,और सब सामंत।
दें मुझे आशीष ऐसा,हों सृजित यूँ छंद।
भाव पूरित ताल-लय में,हो सजा हर बंध

ललित

रूपमाला छंद

प्रेम की ले लो परीक्षा,ओ हसीं दिलदार।
या करो तुम मीत मेरे,प्यार को स्वीकार।
है तुम्हीं से प्यार मुझको,मान लो ये बात।
थाम लो कर आ गई है,ये सुहानी रात।

ललित

अभी अभी मन में आया
मुक्तक
✈✈✈✈✈✈

कितना भी समझालो मन को,
समझ नहीं ये पाता है।
मायावी दुनिया में निश-दिन,
और उलझता जाता है।
उस राधा का नाम न जपता,
जिसका मोहन दीवाना।
अपनी ही दारा में खोया,
राधा को बिसराता है।

ललित किशोर 'ललित'
📣📣📣📣📣📣

त्रिभंगी छंद

ओ धेनु चरैया,रास-रचैया,नाग-नथैया,
श्याम-लला।
गोवर्धन-धारी,कृष्ण-मुरारी,डोर हमारी।
थाम लला।
वन-उपवन सारे,यमुना धारे,तुझे पुकारें,आ जा रे।
बाँसुरिया वारे,गोप सखा रे,माखन- मिश्री ,खा जा रे।

ललित

त्रिभंगी छंद

नेता ही तारें,कष्ट निवारें,पार उतारें,भक्तन को।
नेता ही देवा,उनकी सेवा,देवे मेवा,हर जन को।
भगवान बिसारो,नित्य पुकारो,पाँव पखारो,नेता के।
अब सुनो भारती,करो आरती,पूर्ण स्वारथी,क्रेता के।

ललित

रूपमाला छंद 7.3.18 से प्रारम्भ

7.3.18
रूप माला छंद

प्रार्थना ये शारदा माँ,है हमारी आज।
साधना-पथ में हमारी,आप रखना लाज।
भाव जो मन में उठें वो,लिख सकें हम नित्य।
चहुँ दिशा महके हमारा,छंद मय साहित्य।

ललित

रूप माला छंद

छोटका प्यारा कन्हैया,बाँसुरी ले हाथ।
नाचता है ठुमक-ठुम्मक,राधिका के साथ।
ताल देती है यशोदा,झूमते हैं ग्वाल।
नंद बाबा श्याम के बस,चूमते हैं गाल।

'ललित'

रूपमाला छंद
क्या कुछ विचारणीय बन पाया

कामनाएँ सिर उठाती,नित नई अविराम।
हो न पाता मन हमारा,क्यों कभी निष्काम?
कामनाओं के समन्दर,में रहा मन डूब।
चाहतों ने नित निचोड़ा,मानवी मन खूब।

ललित

रूपमाला छंद

इक परी चंचल सलोनी,चाँदनी सा रूप।
खिलखिलाई आँगना में,भोर की ज्यों धूप।
नाचती है ठुमक-ठुम्मक,खूब सुबहा शाम।
शौक है कहना कहानी,और 'आद्या' नाम।

ललित

रूपमाला छंद

वो मिलन किस काम का जब,हो न दिल में प्रीत?
प्रीत भी क्या प्रीत जिसमें,सिर्फ हो बस जीत ?
धड़कनों में जो बसा हो,बन हृदय का नाथ।
चल पड़ो तुम साथ उसके,हाथ में ले हाथ।

ललित

रूपमाला छंद

चंचला नाजुक कली वो,हुस्न से भरपूर।
नयन चमकें ज्यों सितारे,चाँदनी सा नूर।
पास से जब रूप देखा,रह गया हैरान।
किस बला का रूप इसमें,भर दिया भगवान।

ललित

रूपमाला छंद

रूपसी अनुपम अनोखी,एक देखी आज।
चाँद सा मुखड़ा सलोना,ओट घूँघट लाज।
घाघरा लहँगा बढाता,राजपूती आन।
फैशनेबल युवतियों की,घट रही थी शान।

ललित

रूपमाला छंद

चाँद कुछ रूठा हुआ है,चाँदनी से आज।
बादलों का होगया है,आसमाँ में राज।
चाँदनी गुम हो गयी है,बादलों के पार।
चाँद गुमसुम सा बहाए,आँसुओं की धार।

ललित

रूपमाला छंद
दिल जलाने की अदा क्या,आप में महबूब?
बेवफाई की कला भी,आप में है खूब।
हर कदम करते रहे हम,आप पर विश्वास।
तुम उड़ाते ही रहे इस,प्यार का उपहास।

ललित

रूपमाला छंद
स्वप्न

क्या हुआ जो आज अपने,हो गए हैं दूर?
क्या हुआ जो हो गया है,तू बड़ा मजबूर?
स्वप्न की दुनिया कभी क्या,हो सकी आबाद ?
भूल जा तू स्वप्न सारे,घूम फिर आजाद।

ललित

11.3.18

पहली रचना
रूपमाला छंद

सांवरे इस ओर मुड़कर,देख ले इक बार।
डोलती है नाव मेरी,थाम ले पतवार।
नाव माया के भंवर में, फँस न जाए श्याम।
डूबते को तार देता,एक तेरा नाम।

ललित

रूपमाला छंद

भावपूरित सारगर्भित,हो सृजन हे मात!
काव्य की सुंदर लता का,हो हरित हर पात।
शब्द झंकृत कर रहे हों,हर हृदय के तार।
दें अलंकृत शब्द मेरे,काव्य को विस्तार।

ललित
11.3.18
मुक्तक
फतवा मौत का

मरहम तो दे नहीं सके नश्तर चुभा दिया।
संवेदना की लाश का तकिया बना दिया।
था जो मसीहा अब वही जल्लाद सा दिखे।
इंसानियत को मौत का फतवा सुना दिया।

ललित किशोर 'ललित'

रूपमाला छंद

आज ऐनक हाँफती सी,काँपती सी खूब।
पाल कर रंगीन चश्मा ,खुद रही है डूब।
और अब गोगल दिवाने,का हुआ है राज।
कद्र ऐनक की नहीं है,इस चमन में आज।

ललित

फरवरी 2018

त्रिभंगी छंद
श्रृंगार रस

ओ अधर रसीले,नैन नशीले,गजरे पीले,वाली रे।

ओ मीठी बोली,सुंदर चोली,अँखियन गोली,घाली रे।

आ नयन लड़ा लें,प्रीत बढ़ा लें,नींद उड़ा लें,थोड़ी सी।

ये मधुरिम रजनी,काहे तजनी,आजा सजनी, दौड़ी सी।

ललित

28.2.18

त्रिभंगी छंद
श्रृंगार रस

ओ रँग रंगीली,छैल-छबीली,
जरा हठीली,छोरी रे।

नाजुक फूलों सी,कटि कमलों सी,
छवि गजरों सी,गोरी रे।

आ पास जरा तू,लट बिखरा तू,
मत इतरा तू,ओ सजनी।

बाहों में आजा,मधु बिखराजा,
मधुर बना जा,ये रजनी।

ललित

27.2.18

त्रिभंगी छंद

होली

साजनवा हाए,रँग बरसाए,भीग न जाए,चोली रे।
मत पीकर हाला,हो मतवाला,खेले आला,होली रे।
आ प्रेम-रतन-धन,ढूँढ मगन-मन,होली साजन,खेलें रे।
तू भर ले अँग में,झूमें भँग में,सुख-दुख सँग में,झेलें रे।

ललित

त्रिभंगी छंद

यशुदा का प्यारा,राज-दुलारा,
सबसे न्यारा,श्याम कहा।

वंशीवट नियरे,यमुना-तीरे,
वंशी धीरे,बजा रहा।

गौ-गोपी ग्वाले,सब व्रज वाले,
कान्हा काले,रास करें।

नंदन-वन डोले,मुरली बोले,नारी- भोले,हास करें।

ललित

त्रिभंगी छंद

कुछ-कुछ शरमाती,कुछ इतराती,कुछ इठलाती,रूप डली।
वो नैन मिलाती,नजर झुकाती,नख सहलाती,कुसुम कली।
जो अधर न खोले,चुप-चुप डोले,मधुरस घोले,मधुवन में।
वो राधा आती,रास रचाती,नाच नचाती ,निधि वन में।

ललित

10,8,8,6
त्रिभंगी छंद
एक प्रयास
माखन चोरी का

नटखट मन मोहन,चोरे माखन,साथ देत सब,बाल सखा।
नैना मटकाएँ,हँस-हँस खाएँ,वानर सँग सब,ग्वाल सखा।
यशुदा जब देखे,कृत्य अनोखे,नटवर नागर,
के प्यारे।
हिय में हरषाए,अति सुख पाए,श्याम हरेंगें,अघ सारे।

ललित

त्रिभंगी छंद

बरसाने वाली,निपट-निराली,राधा प्यारी,जब आए।
वो नटवर नागर,श्याम सुखागर,मुरली से रस,बरसाए।
नंदनवन पावन,मनहर सावन,राधा-मोहन,को प्यारा।
वृषभानु-सुता सँग,साँवरिया रँग,लगता सबको,अति न्यारा।

ललित

त्रिभंगी छंद

इक सुंदर प्यारी,न्यारी न्यारी,बिटिया मेरे,घर आई।
शीतल पुरवाई,अति सुखदाई,अँगना खुशियाँ,भर लाई।
कहती है दादा,तुमसे वादा,करती हूँ मैं,
ये सच्चा।
शिक्षा मैं पाऊँ,नाम कमाऊँ,निर्भर होगा,ये बच्चा।

ललित

25.2.18
सभी मित्र हास्य, शांत,रस के साथ दो रचनाएँ अपने इच्छित विषय पर पियूष वर्ष छंद में लिखें..

पियूष वर्ष छंद

फूल कम, कंटक अधिक हम को मिले।
ज़िन्दगी से आज बस इतने गिले।
ज़िंदगी का ये अजब दस्तूर है।
हर खुशी बालिश्त भर ही दूर है।

ललित

पियूष वर्ष छंद

छोड़कर दुनिया गए हो तुम कहाँ?
त्याग अपनों को हुए हो गुम कहाँ?
हाय कदमों के निशाँ भी तो नहीं।
दूर दिखता आशियाँ भी तो नहीं। .........

ललित
👆🏻👆🏻😊👆🏻👆🏻

पियूष वर्ष
सादर आभार

जो मिली परिवार की सद्भावना।
जन्म दिन की प्रेम से शुभकामना।
दिल 'ललित' का आज वो सहला गई।
प्यार से अभिभूत मन बहला गई।

ललित

1. भक्ति रस
पियूष वर्ष छंद

शारदा माता कृपा इतनी करो।
काव्य-रस के ज्ञान से झोली भरो।
भाव अद्भुत भर सकूँ हर बंध में।
काव्य रचना कर सकूँ हर छंद में।

ललित

2-करुण रस
पियूष वर्ष छंद

बेटियों का कोख में करते शमन।
पुष्प कैसे अब खिलाएगा चमन।
मात को ही बेटियाँ दुश्मन लगें।
पूत से ही भाग्य क्या सबके जगें?

ललित

3-ओज
पियूष वर्ष छंद

ऐ जवानों अब नहीं देरी करो।
आग से हर शत्रु की चौकी भरो।
चीरकर रख दो जिगर शैतान का।
नाम बच पाए न पाकिस्तान का।

ललित

4-श्रृंगार रस
पियूष वर्ष छंद

गाल पर लाली लगा नाजुक कली।
तीर नजरों में भरे पथ में मिली।
थे अधर आधे खुले कुछ इस तरह।
चूम लेगी पास आकर जिस तरह।

ललित

पियूष छंद
इबारत

सिर दुपट्टे से ढके नाजुक कली।
इक नजर से तीर सौ बरसा चली।
घायलों के दिल तड़पते रह गए।
हुस्न के मारे कलपते रह गए।

सावनी शीतल फुहारों में खड़ी।
भीगती सिमटी सहे बरखा झड़ी।
जुल्फ में जो बूँद अटकी दिख गई।
प्यार की जैसे इबारत लिख गई।

पियूष वर्ष

उस इबारत को यहाँ जो पढ़ सका।
सीढियाँ वो प्यार की है चढ़ सका।
आदमी समझे जुबाँ जो प्यार की।
जीत लेता हर डगर संसार की।

ललित

पियूष वर्ष छंद
पूरी रचना
श्रृंगार रस एक अलग अंदाज में

प्यार की दीवानगी भी खूब है।
शायरी करता जहाँ महबूब है।
प्रेमिका दिखती उसे वह हूर है।
नैन में जिसके परी सा नूर है।

पायलें बजती बड़ी प्यारी लगें।
धड़कनें रुकती उसे सारी लगें।
जब सजनियाँ अंक में उसके गिरे।
यूँ लगे आकाश तारों से घिरे।

चाँदनी उसको लगे प्यारी बड़ी।
शायरी पे जो सदा भारी पड़ी।
जब सजनियाँ चाँदनी में आ मिले।
भूल जाता प्यार में वो सब गिले।

सावनी शीतल फुहारों के तले।
तन-वदन अंगार पर जैसे जले।
जब सजनियाँ झूलती है बाग में।
डाल देती घी जिगर की आग में।

शायरी करनी जिसे आती न हो।
जुल्फ की छाया जिसे भाती न हो।
कब सजनियाँ फिर उसे प्यारी लगे?
शायरी भी एक बीमारी लगे।

शायरों की शायरी में प्यार है।
शायरी से ही जवाँ संसार है।
शायरी की रूह सजनी जब बने।
खूबसूरत सी गज़ल वो तब बने।

ललित

पियूष वर्ष छंद
श्रृंगार रस एक अलग अंदाज में

प्यार की दीवानगी भी खूब है।
शायरी करता जहाँ महबूब है।
प्रेमिका दिखती उसे वह हूर है।
नैन में जिसके परी सा नूर है।

पायलें बजती बड़ी प्यारी लगें।
धड़कनें रुकती उसे सारी लगें।
जब सजनियाँ अंक में उसके गिरे।
यूँ लगे आकाश तारों से घिरे।

चाँदनी उसको लगे प्यारी बड़ी।
शायरी पे जो सदा भारी पड़ी।
जब सजनियाँ चाँदनी में आ मिले।
भूल जाता प्यार में वो सब गिले।

सावनी शीतल फुहारों के तले।
तन-वदन अंगार पर जैसे जले।
जब सजनियाँ झूलती है बाग में।
डाल देती घी जिगर की आग में।

शायरी करनी जिसे आती न हो।
जुल्फ की छाया जिसे भाती न हो।
कब सजनियाँ फिर उसे प्यारी लगे?
शायरी भी एक बीमारी लगे।

शायरों की शायरी में प्यार है।
शायरी से ही जवाँ संसार है।
शायरी की रूह सजनी जब बने।
खूबसूरत सी गज़ल वो तब बने।

ललित

त्रिभंगी छंद
एक प्रयास
माखन चोरी का

नटखट मन मोहन,चोरे माखन,
साथ देत सब,बाल सखा।

नैना मटकाएँ,हँस-हँस खाएँ,
वानर सँग सब,ग्वाल सखा।

गोपी जब देखे,कृत्य अनोखे,
नटवर नागर,के प्यारे।

हिय में हरषाए,अति सुख पाए,
श्याम हरेंगें,अघ सारे।

ललित

पीयूष वर्ष
प्यार

प्रीत बिकती क्या कभी बाजार में?
प्यार मिलता क्या कभी उपहार में?
प्रेम दिल में ही उपजता है सदा।
और होता प्यार पर ही है फिदा।

कौन किसके प्यार में कब खो गया?
प्रीत में पागल कहाँ कब हो गया?
जान पाता है नहीं संसार ये।
धड़कनों में ही समाता प्यार ये।

प्यार में दो दिल गए जब डूब हों।
ख्वाब में खोए जवाँ महबूब हों।
तब हवा संदेश देती प्यार का।
दो दिलों में उठ रहे इक ज्वार का।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
दुआ

फूल उपवन से चले मुख मोड़कर।
क्यारियों में डालियों को छोड़कर।
डालियाँ जड़ से बँधी हरदम रहीं।
और जीवन में सहा कुछ गम नहीं।

पुष्प चल पाए कदम दो चार ही।
और जड़ का पा न पाए प्यार ही।
कौन सुन पाए कभी उन की व्यथा?
भोगते जो आप ही अपनी खता।

दूर रहकर भी जड़ों को पूजते।
पुष्प वो क्यों आज गम से धूजते?
प्यार से देती जड़ें उनको दुआ।
तो हवा भी आज बन जाती दवा।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
प्रेम/प्रीत/प्यार

प्यार की दुनिया भुलावा तो नहीं?
प्रीत तेरी इक छलावा तो नहीं?
प्रेम पर विश्वास मैंने है किया।
बुझ न पाए आस का दीपक पिया।

आस पर ही ये टिका संसार है।
प्यार करना क्यूँ बना व्यापार है?
हाथ जो थामा पिया मत छोड़ना।
प्रेम का धागा पिया मत तोड़ना।

है जरूरी प्रीत जीने के लिए।
प्रेम के बिन आदमी कैसे जिए?
प्रीत के बिन है भला क्या जिन्दगी?
प्रेम ही करना सिखाता बन्दगी।

ललित

पीयूष वर्ष
कुछ यूँ ही

जिन्दगी का इक अजब अन्दाज है।
हर फसाने में छिपा इक राज है।
जिन्दगी ये गुल खिलाती है कभी।
राह में कंटक बिछाती है कभी।

दंश दे देती कभी इतने बुरे।
खवाब में सोचे न थे जितने बुरे।
और बन जाती कभी है बन्दगी।
बन्दगी से ही निखरती जिन्दगी।

कौन जिन्दा है बिना गम के यहाँ।
बस गमों से ही भरा है ये जहाँ।
ईश में विश्वास रखते जो सदा।
हो नहीं पाते कभी वो गमज़दाँ।

ललित

पीयूष वर्ष छंद
दर्द

दर्द घुटनों का हमें यह कह गया।
वक्त जीवन का बहुत कम रह गया।
जिन्दगी में भक्ति कुछ की तो नहीं।
श्याम सुंदर से लगाई लौ नहीं।

सोचते हम रह गये मन में यही।
भक्ति कर लेंगें अभी ठहरो सही।
पर जवानी ने छलावा यूँ किया।
बाल काले कर जिया बहला लिया ।

बाँटते सबको रहे थे ज्ञान हम।
अब करें कुर्सी लगा कर ध्यान हम।
हाय रे चंचल मना अब तो समझ।
ईश की आराधना अब तो न तज।

ललित📣
घुटनों के दर्द का मरीज

पीयूष वर्ष

हम सफर जो साथ मेरे थे चले।
नैन को भी जो रहे लगते भले।
खूब था जिन पर मुझे विश्वास भी।
और जिनसे थी लगाई आस भी।

छोड़ वो मुझको अचानक चल दिए।
प्रीत ने ऐसे भला क्यूँ फल दिए?
नाज था जिस प्यार पर मुझको सदा।
आज वो ही कह गया है क्यों विदा?

ललित

पीयूष वर्ष

क्या हुआ जो यार हम काले हुए।
कौन हैं हम से जिगर वाले हुए?
दिल हथेली पर लिए हम घूमते।
आँख से पी हुस्न को हम झूमते।

ललित

पीयूष वर्ष

देख लो हम को जरा तुम प्यार से।
मानते हो क्यों नहीं मनुहार से?
प्रीत के बिन जिन्दगी दुश्वार है।
जान लो हम को तुम्हीं से प्यार है।
ललित

पीयूष वर्ष छंद
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2122   2122   212
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प्यार तेरा ये दिखावा तो नहीं।
वासना का इक छलावा तो नहीं।
दूरियों में प्यार की सौरभ
बसे।
प्रीत तन की वासना में कब बसे।
ललित

चित्र आधारित
विष्णु पद छंद

चंचल हिरणी जब नैनों से,छुप-छुप वार करे।
कजरारी अँखियों का कजरा,दिल को चीर धरे।
नैन झुका कर बिन बोले वो,बात कहे मन की।
साजन से जब नैन मिले त़ो,चूड़ी भी खनकी।

मिलने को आतुर हैं सजना,गजरा महक रहा।
सजनी का दिल धक्-धक् करता,थोड़ा बहक रहा।
नैनों में सजनी के सुंदर,सपने चमक रहे।
मादक सपनों में खोए दो,नैना दमक रहे।

कुछ ही पल में मधुर-मिलन के,सच होंगें सपने।
इक दूजे के मन में घुलते,तन होंगें अपने।
सजनी की साँसों में साजन,महकेंगें गुल से।
और करेंगें मीठी-मीठी,बातें बुल-बुल से।

मधुर मिलन की हाय रात ये,छोटी है कितनी।
उम्र सावनी लघु-बूँदों की,होती है जितनी।
साजन-सजनी कहें काश ये,वक्त यहीं ठहरे।
मगर प्यार की विनती सुनकर, वक्त नहीं ठहरे।

ललित किशोर 'ललित'

आदरणीय राकेश जी व भाभीजी को
शादी की वर्ष-गाँठ पर मेरी ओर से अनन्त शुभ कामनाएँ

फूल-बहारों का मौसम ही,जीवन में चहुँ ओर रहे।
यश-माही ललिता जी में भी,प्यार सदा पुर जोर रहे।
माँ शारद की कृपा रहे औ',लक्ष्मी जी धन-धान्य भरें।
हर कवि सम्मेलन में केवल,'राज' 'राज' का शोर रहे।

ललित किशोर 'ललित'

19.2.18
ताटंक छंद गीत

ऐसी सरगम छेड़े नटखट,आलौकिक
धुन में प्यारी।
झूम उठें सब गोप-गोपियाँ,नाचें सब नर औ' नारी।

कान्हा की वंशी क्या बोले,राधा समझ नहीं पाई?
लेकिन वंशी सुनने को वो,नंगे पाँव चली आई।
मुरली की धुन ऐसी प्यारी,भूल गई दुनिया सारी।
ऐसी सरगम छेड़े नटखट,आलौकिक
धुन में प्यारी।

कान्हा की बाहों में आकर,सिमट गई गोरी-राधा।
अधर अधर से मिलना चाहें,डाल रही मुरली बाधा।
वंशी ने क्या पुण्य किये थे,अधरों पर जो है धारी?
ऐसी सरगम छेड़े नटखट,आलौकिक
धुन में प्यारी।

दुनिया में सबसे सुंदर है,राधा कान्हा की जोड़ी।
जिसने हृदय बसा ली ये छवि,प्रीत वही समझा थोड़ी।
इसीलिए राधा-मोहन की,दीवानी दुनिया सारी।
ऐसी सरगम छेड़े नटखट,आलौकिक
धुन में प्यारी।

ललित

कुण्डलिनी
तुलसी

तुलसी का पौधा रखो,घर-आँगन में आप।
शुद्ध रहे घर की हवा,मिटें सभी संताप।

मिटें सभी संताप,करें जो तुलसी पूजा।
लक्ष्मी जी का वास,नहीं तुलसी सा दूजा।

ललित

कुण्डलिनी

जरा सोच कर देखिए,अपने मन में आप।
क्यों ईश्वर ने हैं दिए,इस जीवन में ताप?
इस जीवन में ताप,और दुख इतने सारे।
खुशियों के क्यूँ हाय,नहीं चमकें हैं तारे?

ललित

कुण्डलिनी
घोषणा

जो मारेगा सेंचुरी,काव्य सृजन कर आज।
उसको ही गुरु 'राज' जी,पहना देंगें ताज।
पहना देंगें ताज,दुआएँ सुंदर देंगें।
कवियों का सरताज,उसे घोषित कर देंगें।

कुण्डलिनी
विचारणीय

मंदिर में जो बोलता,जय-जय-जय श्री राम।
बाहर आ वो ही कहे,बहुत पड़े हैं काम।
बहुत पड़े हैं काम,मुझे जल्दी निपटाने।
राम भरोसे छोड़,नहीं पूरे हो पाने।

ललित

कुण्डलिनी

दिल-दिमाग दोनों रखें,अलग-अलग जजबात।
दोनों मिल कर दे न दें,कहीं आपको मात।
कहीं आपको मात,जरा मन में भी तोलो।
जो हो सच्ची बात,उसे ही मुख से बोलो।

ललित

कुण्डलिनी
भाँग

कौन पकौड़े तल रहा,ऊँचे आसन बैठ।
कौन बैंक को लूटता,किसकी ऊँची पैठ?
किसकी ऊँची पैठ,सोचता काहे प्यारे?
आज कुएँ में भाँग,घोल बैठे हैं सारे।

ललित

कुण्डलिनी
पटल जिंदाबाद

जैसा भी है पटल ये,हम सबकी है जान।
रोक नहीं सकता हमें,कोई भी तूफान।
कोई भी तूफान,पटल को हिला न सकता।
कोटा राजस्थान,धौलपुर में ये टिकता।
ललित

कुण्डलिनी
सूर्य देव

सूर्य-देव को अर्घ्य दे,प्रात काल जो रोज।
यश-वैभव-विद्या-विनय,लेते उसको खोज।
लेते उसको खोज,बढ़े नित आभा मुख की।
सूर्य-देव भगवान,वृद्धि कर देंगें सुख की।

ललित

कुण्डलिनी
सावन और कवि

सावन की बातें मधुर,मधुर कोकिला गान।
कवियों का मन मोहती,सावन की मुस्कान।
सावन की मुस्कान,लेखनी में रस घोले।
कविता हो या शै'र,झमाझम झम-झम बोले।

ललित

कुण्डलिनी
लाईव टेलीकास्ट

सब मिल कर लिखते चलो,मन चाहे कुछ गीत।
काव्य सृजन परिवार की,ये है सुंदर रीत।
ये है सुंदर रीत,लिखो सब अपने मन की।
कुछ अनुभव की बात,और कुछ हो सावन की।

ललित

कुण्डलिनी
राज

काव्य सृजन परिवार में,सुंदर सुंदर रत्न।
निखरे सब का रूप ये,करें 'राज' जी यत्न।
करें 'राज' जी यत्न,तपाते रोज उन्हें वो।
सुंदर सुंदर छंद,सिखाते खूब जिन्हें वो।

ललित

कुण्डलिनी

बरसाने की राधिका,पकड़ प्रीत का छोर।
वंशी सुन हो बावरी,चली बिरज की ओर।
चली बिरज की ओर,बनी नयनों की दासी।
अँखियाँ हैं चितचोर,श्याम दर्शन की प्यासी।
ललित

कुण्डलिनी छंद

प्यारी होती है सुता,प्यारा उसका साथ।
हो जाती इक दिन विदा,थाम सजन का हाथ।
थाम सजन का हाथ,चली जाती है जैसे।
उसके दिल की पीर,समझ आएगी कैसे?

ललित

कुण्डलिनी
नहीं हुआ पैदा अभी,कवि-लेखक निष्णात।
शब्दों में जो लिख सके,माँ-मन के जजबात।
माँ-मन के जजबात,समन्दर से भी गहरे।
इतने शांत कि पूत,नहीं सुन सकते बहरे।

ललित

कुण्डलिनी

मटकी माखन से भरी,लटकाई है दूर।
माखन का तो नाम है,प्यार भरा भरपूर।
प्यार भरा भरपूर,कन्हैया कैसे छोड़े?
गोपी खुश हो जाय,मटकी श्याम जो फोड़े।

ललित

कुण्डलिनी

वोटों की बौछार से,भिगो दिए जब आप।
नहीं भला क्यों हर सके,जनता के संताप?
जनता के संताप,बढ़े हैं हद से ज़्यादा।
कितनी जल्दी भूल,गए हो अपना वादा।

ललित

कुण्डलिनी

दुश्मन तेरी राह में,कंटक जो बरसायँ।
किस्मत में यदि फूल हों,काँटे भी गल जायँ।
काँटे भी गल जायँ,दूर हो सारी बाधा।
भव-सागर तर जाय,जपे जा राधा-राधा।

ललित
कुण्डलिनी

प्यार तुझे यदि चाहिए,बाँट प्यार सौ बार।
बाँटे से फूले-फले,ये ऐसा व्यापार।
ये ऐसा व्यापार,नहीं जिसमें है घाटा।
जितना बाँटे प्यार,रहेगा उतना ठाटा।

ललित

कुण्डलिनी
यश

देखी यश की गायकी,और मधुर मुस्कान।
सुर औ' लय को साधकर,देता अद्भुत तान।
देता अद्भुत तान,गीत है गाता ऐसे।
बड़े मंच पर गीत,कुशल कवि गाते जैसे।

ललित

बाल कुण्डलिनी

माथन तू देती नहीं,आँख दिखाती थूब।
बलछाने की लाधिका,मुझे छकाती थूब।
मुझे छकाती थूब,बाँछुली मेली छीनी।
पप्पी मेले गाल ,छबके छामने लीनी।

ललित
माखन,खूब,बरसाने,राधिका,बाँसुरी,मेरी,मेरे,सबके,सामने।

कुण्डलिनी

एंड्रायड का एक तो,मोबाइल दो लाय।
और स्केटिंग के लिए,शूज करा दो बाय।
शूज करा दो बाय,करूँगा खूब स्केटिंग।
सब को पीछे छोड़,बनू्ँगा स्पोर्ट किंग।

ललित

रोज किटी में यूँ ममा,जाती हो क्यूँ आप?
और लेती बाल बना,काले फुग्गे छाप?
काले फुग्गे छाप,बाल चश्मा नारंगी।
छतरी लेकर चाल,चलो हो क्यूँ बेढंगी?

ललित

कुण्डलिनी

आता है क्यूँ बर्थ डे, इतने दिन के बाद?
और नहीं क्यूँ आपको,रहता है वो याद?
रहता है वो याद,बर्थ डे प्यारा प्यारा।
जब मैं काटूँ केक,चॉकलेटी वो न्यारा।

ललित
कुण्डलिनी

शादी मेरी भी ममा,करवा दो ना आप।
ला दो इक देशी परी,जरा विदेशी छाप।
जरा विदेशी छाप,कुड़ी जो इँगलिश बोले।
आँगन में दिन-रात,खुशी से नाचे डोले।

ललित

कुण्डलिनी

बन्दर की बारात में,खूब मची थी धूम।
नाच रहे सब मोर थे,शेर रहे थे झूम।
शेर रहे थे झूम,लगा डिस्को पर ठुमके।
दुल्हनियाँ ने पहन,रखे हीरे के झुमके।

ललित

मुक्तक (ताटंक आधारित)

साठ बहारें देख चुके अब,रहा देखना बाकी क्या?
खूब पी चुके हाला अब हम,पिलवाएगी साकी क्या?
छंदों से ही भर देते हैं,दिल की हसरत का प्याला।
श्वेत हो गए बाल सभी अब,क्या काला औ' खाकी क्या?

ललित

कुण्डलिनी

प्रेम दिलों का देवता,करे दिलों में वास।
जब दो प्रेमी दिल मिलें,हो जाए मधुमास।
हो जाए मधुमास,समय भी रुक जाता है।
देख धरा की प्यास,गगन भी झुक जाता है।
ललित

कुण्डलिनी

याद आज दिन आ रहे,जब थे जवाँ 'किशोर'।
नजर उठाना पाप था,तब लड़की की ओर।
तब लड़की की ओर,नजर कब उठ पाती थी।
संस्कारों की सीख,बीच में आ जाती थी।

ललित

कुण्डलिनी

प्रेम भरे मधुमास में,ले हाथों में हाथ।
कितने सपने थे बुने,सजनी तेरे साथ।
सजनी तेरे साथ,बहारों के वो झूले।
फूलों की बरसात,नहीं अब तक हम भूले।

ललित

कुण्डलिनी छंद

वैलेंटाइन डे हुआ,दुनिया में मशहूर।
हूर खोजते मर्द हैं,सुंदर औ' मगरूर।
सुंदर औ' मगरूर,मिले जो प्यारी लैला।
वैलेंटाइन मीत,बनाए उसको छैला।

ललित

कुण्डलिनी

लेखन में उत्साह हो,और भाव गंभीर।
कुण्डलिनी में बाँध दो,अपने मन की पीर।
अपने मन की पीर,छंद में गाकर भर दो।
सुंदर लय के साथ,पटल पर उसको धर दो।

ललित

13.2.18

कुण्डलिनी छंद
वैलेंटाइन डे विशेष

हो जाते यदि हम कभी,थोड़े से मशहूर।
हसरत से कहती पिया,हसीं परी मगरूर।
हसीं परी मगरूर,गले से हमें लगाती।
वैलेंटाइन मीत,कहकर हमें बुलाती।

ललित

सिंंहावलोकन घनाक्षरी

शिव-शिव-शिव-शिव
भोला-भोला-भोला-भोला।
बम-बम-बम-बम
जपते ही रहिए।

जपते ही रहिए जी
निशि-दिन प्यारा नाम।
एक लोटा जल चढ़ा
शिव-शिव कहिए।

शिव-शिव कहिए जी
राम जी का प्यारा नाम।
शिव जी सुखों के धाम
काहे दुख सहिए।

काहे दुख सहिए यूँ
शिव जी के होते हुए।
नाम जप धार में ही
आठों याम बहिए।

ललित

सुप्रभात
सिंहावलोकन
राधे-राधे जी

राधे-राधे जपो नाम
निशि-दिन अविराम।
राधे-राधे जपमें ही
मन को लगाइए।

मन को लगाइए जी
राधे जी के चरणों में।
कान्हा की दुलारी राधा
मन में बसाइए।

मन में बसाइए यूँ
प्यारी-प्यारी राधिका को।
श्याम दौड़े आएँ पीछे
राधे राधे गाइए।

राधे राधे गाइए तो
खुशियों की बरसात।
जीवन में दिन-रात
होती हुई पाइए।

ललित

12.2.18
सिंहावलोकन घनाक्षरी

साँवरा सलोना श्याम
गोप-गोपियों के साथ।
तान पे बाँसुरिया की
नाचे सारी रात है।

नाचे सारी रात झूम
बिरज का नन्दलाल
राधा जी के सँग करे
प्यारी प्यारी बात है।

प्यारी प्यारी बात करे
अँखियों से वार करे।
राधा जी दीवानी हुई
कैसी करामात है।

कैसी करामात करे,
बाँसुरी में भर प्यार,
चौसठ कलाएँ देखो,
साँवरे के हाथ है।

ललित

सार
जीवन का सार

आज फैमिली की परिभाषा,का आधार यही है।
मैं,मेरी बीवी और बच्चे,बस परिवार यही है।
काश फैमिली में बच्चों के,दादा-दादी होते।
तो क्यों अम्मा-बाबा घर-घर ,यूँ फरियादी होते।

ललित

सार सपने
कैसे-कैसे सपने हमको,दिखलाए थे तुमने?
और उन्हीं सपनों में सुंदर,रंग भरे थे हमने।
आज उन्हीं रंगों में घुलकर,बिखरे सारे सपने।
सपने तो टूटे जो टूटे,रूठ गए सब अपने।

ललित

सार

फूल बिछाए थे हमने जिन,बच्चों की राहों में।
और झुलाया झूला जिनको,था अपनी बाहों में।
आज वही क्यूँ राह बदलकर,भूल गए हैं हम को?
अपने दामन में थे लेते, भर हम जिनके गम को।
ललित

सार

कितनी दूर चले आए हैं,हम अपनी मंजिल से।
टूट गए हैं स्वप्न सुनहरे,नहीं मिलें दिल दिल से।
हर दिल में थी आजादी की,हमने अलख जगाई।दुरुपयोग कर आजादी का,घर में आग लगाई।

ललित
सार सार सार
👏👏👏👏👏👏

काव्य सृजन का पटल महकता,मणि जैसे कवियों से।

दिल्ली में जा चमक बिखेरी,ज्यादा सौ रवियों से।

राज ललित अणु सत्य विवेकी,और पटल की बहनें।

सबको आज खुशी है जितनी,
उसके हैं क्या कहने?

ललित
👏👏👏👏👏👏

सार छंद

चंचल हिरणी से दो नयनों,वाली वो मतवाली।
चाल देख जिसकी झुक जाती,थी फूलों की डाली।
जींस-टॉप नारंगी चश्मे,में खोई कुछ ऐसे।
बिन छंदों की कविता में हों,छंद खो गए जैसे।

'ललित'

सार छंद
क्या ये सही है?

कोई तो है अगम अगोचर,हम सब का रखवाला।
खम्भे से भी निकल पड़े बन,सिंह बड़े नखवाला।
शिव भोला भंडारी बन जो,गंग-धार सिर धारे।
शेष-नाग शैया पर बैठा,सब के दुख हरता रे।
ललित

सार छंद
रिश्ते

रिश्तों की अद्भुत डोरी में,मन कुछ ऐसा उलझा।
उलझ-उलझ कर ऐसा उलझा,नहीं सका मैं सुलझा।

भगवन मेरी इस डोरी को,सुलझा दो कुछ ऐसा।
रिश्तों के पावन बन्धन को,तोड़ न पाए पैसा।

ललित

सार छंद
वाद-विवाद

रोज निहारूँ राह श्याम कब,दर्शन तेरा होगा?
तेरी एक झलक से शीतल,कब मन मेरा होगा?

नटखट मोहन श्याम साँवरे,चोरी-चोरी आजा।
मेरी कुटिया पावन कर जा,माखन थोड़ा खाजा।

गोप-ग्वाल औ' बाल सखा को,साथ लिए तू आना।
वानर सेना को भी मेरा,माखन तू खिलवाना।

मात यशोदा से मैं भी फिर,जा फरियाद करूँगी।
किसने फोड़ी मटकी मेरी,वाद-विवाद करूँगी।
ललित

सार छंद

बगिया-बगिया में भी देखो,कितना अंतर होता।
एक बाग में तो फूलों का, सुंदर मंजर होता।
दूजे के सब पुष्प बाग के ,माली को तड़पाते।
और लगे कुछ कंटक भी जो,फूलों को भड़काते।

ललित

सार छंद
विचार

किस-किस को दिखलाऊँ अब मैं,अपने दिल के छाले?
कौन लगाएगा मरहम जब,सब हैं हँसने वाले?
अपने मन में सोच रहा हूँ,मैं भी क्या कुछ कम था?
कब उसको ढाढस बँधवाया,जिसके दिल में गम था?

सार में सार

बच्चे के मन की सब बातें,हम मूरख कब मानें?
क्यों रूठा वो और मनेगा,कैसे हम क्या जानें?
इक पल को बच्चा बनकर जो,सोच सही पाएँगें।
बच्चे के मन की सच्चाई,जान वही पाएँगें।

ललित

सार छंद

पीते ही इक घूँट चाय का,कविता बनने लगती।
मन में कुछ उत्तम भावों की,सरिता बहने लगती।
माँ शारद की अनुकम्पा से,गुरू 'राज' हैं मिलते।
टूटी-फूटी कविताओं को,जो ढँग से हैं सिलते।

ललित
सार
जीवन सार

जिसका सारा जीवन बीता,खूब कमाई करते।
आज उसी की सेवा उसके,पूत न भाई करते।
एक अँधेरे कोने में वो,पड़ा हुआ मरने को।
लेकिन पास नहीं है कोई,पानी भी भरने को।

ललित

सार
कुछ यूँ ही

इस जीवन की राम-कहानी,नहीं समझ में आई।
पढ़े-लिखों के सिर को झुकवा,देता अनपढ़ नाई।
देखे सीना ताने चलते,बिना मूँछ वाले भी।
मूँछों वालों के मुँह लगते,देखे हैं ताले भी।

ललित

सार छंद

ओल्ड डिमांड

माँ मुझको इक शर्ट सिला दो,नेकर भी हो काला।
और साइकल एक दिला दो,हो जिसमें इक ताला।

माडर्न डिमांड

मम्मा मुझको बर्गर-पिज्जा,होटल में है खाना।
मोबाइल भी मुझे चाहिए,एंड्रॉयड दिलवाना।

ललित

लिए हाथ में बेलन आई,पत्नी हमें डराने।
हमने भी फिर नए-पुराने,छेड़े कई तराने।
बातों में उलझा कर उनको,इक सैल्फी ले डाली।
और डाल दी मुख पोथी पे,सैल्फी बेलन वाली।

ललित

सार

फूल चढें कुछ हरि मस्तक पर,कुछ को भँवरे चूमें।
कुछ मुस्कान बिखेरें जग में,डाली पर जब झूमें।
कुछ माला में बँध जाते हैं,कुछ हारों में सजते।
पहनें नेता विजय-हार तब, ढोल-नगाड़े बजते

ललित

सार छंद
5-6

फूल खिले बगिया में सुंदर, झूमे खुश हो माली।
लेकिन माली की वो खुशियाँ,कब थीं टिकने वाली।
पुष्पों ने बगिया से सुंदर,इक उपवन था देखा।
सोचा वहीं खुलेगी उनकी,किस्मत की हर रेखा।

सारे फूलों ने बगिया से,जाने की फिर ठानी।
माली के सौ आँसू से भी,नहीं रुकी मनमानी।
चले गए सब सुमन छोड़कर,बगिया और झमेला।
सूनी-सूनी है अब बगिया,उपवन में अब मेला।

ललित

सार4

किसका ध्यान करें हम ऊधो,थोड़ा तो समझाओ।
खुली आँख से मोहन दिखता, क्यूँ आखें मिचवाओ?
नैन बंद करने से कान्हा,नजर नहीं आएगा।
है विश्वास कभी वह हमको,छोड़ नहीं जाएगा।

ललित

सार छंद
3
केवल प्रीत यहाँ है उद्धव,यहाँ न कोई ज्ञानी।
खास मीत हो कान्हा के तुम,बात तुम्हारी मानी।
मतवाला मोहन है बैठा,दिल में डेरा डाले।
ज्ञान-ध्यान पूजा समझेंगें,क्या हम गोपी-ग्वाले?

सार-रास
2
कान्हा जैसा मीत मिले तो,राधा मैं बन जाऊँ।
अधर लगाए मोहन तो मैं,बाँसुरिया बन गाऊँ।
रास करे मुरलीधर तो मैं,पायल बनना चाहूँ।
पायलिया क्या मैं तो घुँघरू,बनकर बजना चाहूँ।

ललित

8.2.18
सार छंद
1
कुछ अपनों में कुछ सपनों में,जीवन के दिन बीते।
अपनों ने अब तेवर बदले,सपने निकले रीते।
मानव-मन कितना पागल है,सोच नहीं जो पाए।
दोपहरी में गायब होते ,खुद अपने ही साए।

ललित

सार छंद
2
दिल कितना नाजुक होता है,ये हमने अब जाना।
वो ही तोड़ गया इस दिल को,जिसको था रब माना।
दिल के टूटी किरचों की भी,देखी खूब रवानी।
टूट-टूट कर और टूटती,जुड़ने की कब ठानी।

ललित

सार छंद

कौन कहाँ कब दे जाएगा,दर्दे दिल दर्दीला?
जान नहीं पाता है कोई,ये विधना की लीला।
गरज-गरज जो बादल नभ में,झूम-झूम छाते हैं।
बिन बरसे ही जाने क्यों वो,दूर चले जाते हैं?

ललित

सार
8

नभ में काले बादल साजन,और इधर तुम काले।
तुम से तो अच्छे हैं गोरे,चार तुम्हारे साले।
काश तुम्हारा रँग भी साजन,मेरे जैसा होता।
सुंदर सेल्फी हम ले लेते ,बादल नभ में रोता।

ललित

सार
7

साजन तेरी इस सजनी का,जियरा धक-धक करता।
मिलन-प्यास अति बढ़ जाती जब,सावन झर-झर झरता।
क्या तेरे सीने में जालिम,दिल का नाम नहीं है?
या मुझको बाहों में भरना ,तेरा काम नहीं है?

ललित

सार
6

साजन तू क्यों समझ न पाए,उस बादल की बातें?
छोड़ देश परदेश बसा है,सूनी करके रातें।
क्या पैसा ही है सब कुछ ओ,पागल साजन मेरे।
कब तू उसको समझेगा जो,प्रीत बसी मन मेरे?

ललित

सार सार

काले-काले बादल नभ में,उमड़-घुमड़ कर छाएँ।
सावन के झूलों में झूलें,सखियाँ सब इठलाएँ।
कोई चुनरी पहन नाचती,ओढ़ दुपट्टा कोई।
अँखियों में साजन की मूरत,लिए हुए सब खोईं।

ललित

सार
1
सावन बादल और झमाझम,बारिश का यह रैला।
भिगो गया गौरी को नीरद,खेले अद्भुत खेला।
शीतल मंद समीर बिखेरे,खुशबू माटी वाली।
मदहोशी छाई गौरी पर,बढ़ी गाल की लाली।

साजन नजर चुराकर देखे,भीगा तन गौरी का।
कैसे चिपक गया है तन से,चुस्त वसन गौरी का।
शरमा कर फिर नजरें नीची,कर सजनी सकुचाई।
भीगे गालों पर सजना ने,अँगुली एक  नचाई।

अँगुली से छूकर साजन ने,कैसी अगन लगा दी?
प्रणय-प्यास सजनी के मन में,एकाएक जगा दी।
उलझ गईं मोती-सी बूँदें,गौरी के बालों में।
कुछ बूँदें चम-चम-चम चमकें,गौरी के गालों में।

सिकुड़ी-सिमटी पगली-सी वो,झूम उठी कुछ ऐसे।
आलिंगन में ले साजन ने,चूम लिया हो जैसे।
बदरा भी अब नील-गगन में,दूर कहीं छितराए।
बलखाती सजनी सजना की,बाहों में छिप जाए।

ललित
सार
5

कहने से पहले कुछ सोचें,ऐसे नेता होते।
सच कहता हूँ अच्छे दिन के,बीज आज वो बोते।
बात पकौड़े की बोली है,जिसने आसानी से।
काश सीख लेता तलना वो,खुद अपनी नानी से।

ललित

सार
4

बटन दबाते ही वो मिक्सी,शोर बहुत करती है।
टी वी में आती नौटंकी,बोर बहुत करती है।
पानी की मोटर से मोटी,टंकी भर जाती है।
गंदे कपड़े पत्नी मेरे,आगे धर जाती है।

ललित

सार छंद

टिक-टिक-टिक-टिक करती घड़ियाँ,समय नापती जाती।
अच्छे बुरे पलों की सारी,खबर छापती जाती।
कैसा भी हो समय घड़ी को,फर्क कहाँ है पड़ता।
चलती रहती घड़ियाँ सूरज,गिरता चाहे चढ़ता।

ललित

औ
सार छंद
कविता

कविताओं की भाषा-शैली,सबको ही है भाती।
छंद-बद्ध कविताएँ अद्भुत,ताल-बद्ध हो जाती।
कविताएँ सुनने गाने में,खूब मजा है आता।
काव्य सृजन जो करता वो कवि,आनन्दित हो जाता।

ललित

6.2.18
सार छंद

हर दर्पण में दिखती मुझको,कान्हा सूरत तेरी।
बंद करूँ नैना तो दिखती,प्यारी मूरत तेरी।
दिल में मेरे बैठा कान्हा,जब तू मुस्काता है।
तेरे सिवा नजर जग में कुछ,और नहीं आता है।

ललित
5.2.18
सार छंद

देख तुम्हारे चंचल नैना,धड़कन है बढ़ जाती।
मधुर-मधुर मादकता मेरी,साँसों में चढ़ जाती।
जब रिम-झिम बूँदों से भीगे,वसन गात को चूमें।
मस्त पवन के झोंकों के सँग,नीरद भी तब झूमें।

यौवन के मद में इठलाई,मस्त परी मतवाली।
मस्त-मदन करता है जिसके,यौवन की रखवाली।
धवल चाँदनी शरमा जाए,जब भी तुमको देखे।
बाहों में मेरी आओ ये,नहीं भाग्य के लेखे।

ललित

कर-कर कर-कर कर करे,कर-कर करता राज।
मर-मर मर-मर मर मरे,मर-मर मानव आज।
'ललित'

दोधक

कंटक वार वहाँ करते हैं।
पुष्प विहार जहाँ करते हैं।
फूल खिलें खुशबू बिखराते।
बाग-बहार वहाँ इतराते।

ललित

3.2.18

दोधक छंद

मात-पिता सुत बाँधव दारा।
और सुता सँग जीवन सारा।
केवल बीत गया ममता में।
क्यों न रखा मन को समता में?

बाँध जरा मन को समता में।
डूब नहीं अब तू ममता में।
जीवन है बहती इक धारा।
सागर है वह ईश्वर प्यारा।

प्रेम-सुधा रस जो बरसाता।
मोहन है वह भाग्य-विधाता।
प्रीत उसी सँग तू कर ले रे।
जीवन में रस तू भर ले रे।

नाम यहाँ दिन रात जपे जा।
ये तन है विष-बेल तपे जा।
सार न जीवन में कुछ देखा।
पुण्य किए बदले हर रेखा।

कौन सुता,सुत कौन यहाँ है?
जीवन में कुछ सार कहाँ है?
अंत चले सब छोड़ अकेला।
साथ चले जग का कब मेला?

सोच जरा मन में यह बातें।
जीवन है कुछ ही दिन-रातें।
तोड़ अभी सब बंधन प्यारे।
एक उसी सँग नेह लगा रे।

ललित

2.2.18
दोहा
देखा राजा रंक का,बड़ा अनोखा मेल।
रंकों के कंधों चढ़ा,राजा खेले खेल।

दोधक

काँप रही धरती कुछ ऐसे।
अंतस घायल हो कुछ जैसे।
मानव ने  बरबाद किया यूँ।
पूर्ण धरा तल चीर दिया यूँ।

पाट दिए नदियाँ अरु नाले।
खूब किए धरती पर छाले।
मानव के सब काम अनोखे।
हैं पशु भी इनसे सब चोखे।

ताल नदी सब सूख गए हैं।
बादल हो अब मूक गए हैं।
पेड़-पहाड़ न फूल सुहाते।
मानव को वन-बाग न भाते।

ललित
2.2.18
दोधक छंद

जय माँ शारदे

शारद माँ किरपा कर देना।
भाव जरा मन में भर देना।
भाव उठें मन में जितने ही।
सुंदर छंद रचूँ उतने ही।

मंदिर-मंदिर मूरत तेरी।
सुंदर शोभित सूरत तेरी।
मात करूँ नित वंदन तेरा।
भाव रहे अब मंद न मेरा।

ललित

फरवरी 2018

हैं करताल बजावत ग्वाले।
झूम रहे सब हैं व्रज वाले।
बाँसुरिया घनश्याम बजावे।
प्रेम-सुधा-रस वो बरसावे।

ग्वालिन नाच रहीं कुछ ऐसे।
भूल गईं तन की सुध जैसे।
चाँद निहार नहीं थकता है।
मोहन का मुख वो तकता है।

दोधक
2

भक्त-पुकार जरा सुन कान्हा।
दीन-दयाल सुनाम सुजाना।

गोपिन के तुम एक सहारे।
नंद-लला तुम राज दुलारे।
बाँसुरिया अधरों पर सोहे।
जो वृषभानु-सुता मन मोहे।
भूल गई अब वो बरसाना।
भक्त पुकार जरा सुन कान्हा।

रास रचा सब ग्वाल नचाते।
गोपिन के घर माखन खाते।
माखन के घट फोड़ दिए हैं।
गोकुल का घर छोड़ दिए हैं।
भक्तन को मत यूँ तरसाना।
भक्त पुकार जरा सुन कान्हा।

1.2.18
दोधक छंद
प्रार्थना

राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो गलती कितनी है।

मोह-मयी ममता छलती है।
काम-क्षुधा मन में पलती है।
लोभ दिनों दिन खूब बढ़े है।
क्रोध नसों में खूब चढ़े है।
कंचन देह यहीं गलनी है।
राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो...

रैन-दिना बस राम जपूँ मैं।
चाह नहीं अब काम खपूँ मैं।
दूर करो मन का सब मैला।
देख लिया तन का सब खेला।
प्यास नहीं इसकी बुझनी है।
राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो...

पूजन-पाठ-विधान न जानूँ।
शास्त्र -विचार पुरान न जानूँ।
भक्ति-प्रभो मन में भर देना।
पार मुझे भव से कर देना।
पीर हरो मरजी जितनी है।
राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो....

ललित

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