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नवम्बर 2019 की रचनाएँ

नवम्बर 2019


विधाता छंद
मुस्कान पत्नी की

बड़ी शीतल बड़ी प्यारी,बड़ी शालीन मुस्कानें।

हँसे पत्नी तभी लगता,कि लेगी जान ही जाने।

जरा सा मुस्कुराएँ हम,चलें बाज़ार कहती वो।

दिला बस एक साड़ी दो,इसी को प्यार कहती वो।

ललित



विधाता छंद
मुस्कान रहित

मिली है अफसरी उनको,अजी क्या बात है उनकी?
नहीं वो मुस्कुरा सकते ,बड़ी औकात है उनकी।
नहीं वो हँस सकें ढँग से,सदा गर्दन अकड़ती है।
न जाने अफसरी की बू  ,उन्हीं को क्यूँ जकड़ती है?

ललित




विधाता छंद
सरल मुस्कान

सरल मुस्कान पोती की,बढाए शान दादू की।
मगर दादू यही सोचे,छड़ी मिल जाय जादू की।
बचाए पोतियों को जो,दरिंदों की निगाहों से।
नहीं सरकार से आशा,हटाए शूल राहों से।

ललित

 
विधाता छंद
मधुर मुस्कान
मधुर मुस्कान तो केवल,दिखे उस श्याम के मुख पर।

सदा जो मुस्कुराता है,दुखी होता नहीं दुख पर।

उसी मुस्कान की वो राधिका रानी दिवानी थी।

समाई बाँसुरी में प्रीत की ये ही कहानी थी।

ललित



विधाता छंद
सहज मुस्कान

सहज मुस्कान अधरों पर,दिखे मन-भावनी न्यारी ।
सुने जब झुन-झुने की धुन,ममा की लाडली प्यारी। 
कभी हँस दे इशारों पर,बजा 'जयकृष्ण' पर ताली।
कभी गुम-सुम दिखाई दे,
हिलाए हाथ वो खाली।

ललित

30.11.19

मुक्तक

आदमी की मुस्कुराहट खो गई जाने कहां?
हर कली की चुलबुलाहट खो गई जाने कहाँ?
हाथ मोबाइल लिए हर आदमी खुद में रमा।
वो हँसी वो खिलखिलाहट खो गई जाने कहाँ?

ललित

कुटिल मुस्कान

सरल मुस्कान मुखड़े पर,दिखे जब वोट माँगे वो।
बने मंत्री,तभी मुख पर,कुटिल मुस्कान टाँगे वो।
नहीं फिर हाथ जोड़े वो,न वादे याद ही करता।
नहीं जनता दिखे उसको,उड़ानें खूब है भरता।

ललित

29.11.19
नकली मुस्कुराहट

बाग में कुछ लोग मिलकर,नित लगाते हैं ठहाके।
गम भुलाने को सभी वो,साथ मिलकर चहचहाते।
मुस्कुराहट ओढ़ नकली,बाग में फिर हैं टहलते।
इस बहाने से सभी के, गम-भरे दिल हैं बहलते।

ललित


विधाता छंद

कभी वो मुस्कुराते हैं,कभी नज़रें झुका लेते।
कभी तिरछी निगाहों को,गगन में वो टिका देते।
न हम कुछ भी समझ पाते,हँसे हैं या फँसे हैं वो।
कि हमको ही फँसाकर बेतहाशा यूँ हँसे हैं वो।

ललित


28.11.19
विधाता छंद

तुम्हारी मुस्कुराने की,अदाएँ ही निराली हैं।
नज़र के तीर चलने दो,निगाहें क्यूँ चुराली हैं।
धरा को चूमती देखो,धवल ये चाँदनी प्यारी।
तुम्हारी मुस्कुराहट पर,हसीं ये चाँदनी वारी।

ललित


गीतिका छंद

मुस्कुराने के लिए बस इक बहाना चाहिए।
एक सुंदर सा मुबाइल साथ लाना चाहिए।
सैलफी अपनी जरा सा मुस्कुरा कर लीजिए।
और अपने मित्रगण को भेज जल्दी दीजिए।

ललित


27.11.19
मुस्कान
मुक्तक 16:14

कुछ मुस्कानें अपने भीतर,दर्द समेटे हैं होतीं।
अधर-मधुर मुस्कान बिखेरें,पलकें छुप-छुप कर रोतीं।
बुझी-बुझी सी आँखें दिल का,दर्द बयाँ हैं कर देती।
चिंता के गहरे सागर से,अँखियाँ ले आतीं मोती।

ललित



मुक्तक

मुस्कुराहट के यहाँ दिखते कईआयाम हैं।

मदभरी मुस्कान में मय के छलकते जाम हैं।

कौन सी मुस्कान अधरों पर सजानी है कहाँ?

जानता ये बात जो उसके सँवरते काम हैं।

ललित




26.11.19
गीतिका छंद

मुस्कुराते हैं कई जन,इक अलग अंदाज से।
भींच लेते हैं अधर वो,दीखते नाराज से।
अति कुटिल मुस्कान से कुछ,पातकी नर यों हँसें।
सोचने लगते सभी हम,क्यों यहाँ पर आ फँसे?

ललित


26.12.19
महाश्रृंगार छंद
श्रृंगार प्रयास

नैन शर्बतिया गोरे गाल,मटकती मटकी वाली नार।
चली पनघट से भरकर नीर,साथ में कमसिन सखियाँ चार।
सभी इठलाकर करती बात,सुनातीं-सुनतीं 
हँस-हँस राज।
राज की बातें ऐसी खास,जिन्हें सुन शर्माए खुद लाज।


'ललित'


26.11.19
गीतिका छंद

मुस्कुराने का खजाना खोजना मुश्किल हुआ।
क्यों कहाँ कब मुस्कुराएँ सोचना मुश्किल हुआ?

मुस्कुराने की अदाएँ इस कदर महँगी हुई।
आदमी में मुस्कुराहट पोसना मुश्किल हुआ।

ललित

25.11.19
महाश्रृंगार छंद

चला आ कान्हा यमुना-तीर,राह देखें सब गोपी-ग्वाल।
सुना है नन्हा सा गोपाल,बजाए वंशी बड़ी कमाल।
राधिका भी सखियों के साथ,करेगी रास आज की रात।
चाँद का भी निखरा है रूप,चाँदनी भिगो रही है गात।

ललित


24.11.19
छंदमुक्त 
चिंता

मन कहता है
चिंता मत कर चिंतन कर।
मगर दिल...
वह तो चिंतन को 
चिंता में बदल देता है।
और दिमाग...
मत पूछिए
दिन भर में चिंता के
हजारों शूल पैदा कर देता है
जो चुभ-चुभ कर 
प्राणों को घायल करते रहते हैं।
सोचिए जरा...
ये दिल,दिमाग और मन 
क्या हैं?
कहाँ रहते हैं?
इंसान के वश में क्यों नहीं आते?
प्राणों को क्यों हैं तड़पाते?
और चिंता करने से...
क्या झंझावात नहीं आते?

महाश्रृंगार छंद
आज का प्रयास
समीक्षा हेतु


प्रार्थना इतनी सी है श्याम,करो तुम सदा हृदय में वास।
बंद जब नैन करूँ गोपाल,दिखो राधा सँग करते  रास।
मुझे दिल की धड़कन में श्याम,सुनाई दे वंशी की तान।
अंत जब निकलें तन से प्राण,करे हर साँस श्याम गुण-गान।

ललित



महाश्रृंगार छंद

पुष्प से करते हैं सब प्यार,फूल के कदमों तले बहार।
बहारों का मतलब है फूल,पुष्प के पीछे चले बहार।
न हो जिसको फूलों से प्यार,उसी को तो कहते हैं शूल।
शूल को भी पनपाएँ खूब,बहारें करती भारी भूल।

ललित


गीतिका

क्यों ललित मन बावरा ये लिख ग़ज़ल सकता नहीं?
दूर लिखना तो बहुत ये कर नकल सकता नहीं।

ज़िंदगी भर जब ललित बोता रहा था आम तू।
क्यों अभी फिर आम की तू पा फसल सकता नहीं?

क्या हुआ कैसे हुआ ये ज़िंदगी की शाम में?
सोच बैठा क्यों ललित तू ,फल बदल सकता नहीं?

है अभी दम बाजुओं में,कर ज़रा तदबीर तू।
कौन कहता है अभी खिल नव-कमल सकता नहीं?

ललित

20.11.19
महाश्रृंगार छंद

बहन की प्रीत बड़ी निःस्वार्थ,प्रेम भाई का
ज्यों सौगात।
सुता-सुत की वो भोली जिद्द,लुभाती पत्नी की हर बात।
पिता के दिल में छिपा सनेह,छलकता माँ का निश्छल प्यार।
प्यार के पहियों पर ही यार,टिका है यह सारा संसार।

ललित


20.11.19
महाश्रृंगार छंद


हुई हमसे ये कमसिन भूल,कि कर बैठे हम उनसे प्यार।
नहीं है जिन्हें प्यार की कद्र,उन्हीं को पहना बैठे हार।
अटपटा इकतरफा ये प्यार,चुभे ज्यों पग में कोई शूल।
चल रही इक पहिए पर हाय,गई ये गाड़ी रस्ता भूल।

ललित



महाश्रृंगार छंद

ज़रा दे दो मुझको घनश्याम,तुम्हारे चरणों की वो धूल।
जिसे लूँ मैं अपने सिर वार,खिले फिर मेरे मन का फूल।
ज़रा मेरे नयनों में श्याम,बसेरा कर लो राधा संग।
मगन हो किया करूँ दीदार,खिले फिर मेरा हर इक अंग।

ललित


महाश्रृंगार छंद

यशोदा माँ का पकड़े हाथ,ठुमक-ठुम ठुमके नंद-कुमार।
बजे पायल छुटके के पाँव,चले जब फुदक-फुदक सुकुमार।
सुनहरी बाँसुरिया ली थाम,हिलाए छोटे-छोटे हाथ।
हिले सिर मोर-पंख का ताज,किलोलें करे जगत का नाथ।

ललित


18.11.19
महाश्रृंगार छंद

अरे ओ मुरलीधर घनश्याम,सुना दे वो वंशी इक बार।
जिसे सुनते ही नंगे पाँव,दौड़ आती थी हर व्रज-नार।
भाग्य मुरली सा दे-दे श्याम, करूँ मैं नित अधरामृत पान।
भूल कर जग के सारे काम,सुनूँ मैं बाँसुरिया की तान।

ललित

मुक्तामणि छंद

कभी ज़िंदगी के लिए,प्यार जताना सीखा। 
कभी बंदगी के लिए,फूल चढ़ाना सीखा।

निखर उठी ये ज़िंदगी,प्यार तुम्हारा पाया।
निखर उठी जब बंदगी,फूल चढ़ाना आया।

ललित

मुक्तक

राधा गोरी हुई बावरी,श्याम तुम्हारे लिए।
भूल गई कान्हा खुद का भी,नाम तुम्हारे लिए।
बैठी रहती है पनघट पर,प्यासी तव दर्शन की।
भूल गई सुबहा वो भूली,शाम तुम्हारे लिए।

ललित


मुक्तामणि छंद


पायल के घुँघरू बजें,मधुर ताल से जैसे।
इठलाती नवयौवना,चली जा रही ऐसे।

घूँघट में से झाँकते,कजरारे दो नैना।
इक पल में ही ले गए,साजन जी का चैना।

दिल की धड़कन हो गई,दिल से गायब जैसे।
चैन चुरा कर ले गयी,मतवाली वो ऐसे।

गगरी में पानी भरा,कुछ ऐसे गोरी ने।
पल्लू ढलका कर किया,दिल घायल छोरी ने।

ललित



15.11.19
कुण्डलिया छंद

चौराया जो एक है,नयापुरा में खास।
बृजटाकिज में से यहाँ,आती दूषित बास।

आती दूषित बास,यहाँ नित कचरे में से।
लगे कचोरी स्वाद, भला बदबू में कैसे?

नगर-निगम ये हाय,'ललित' कैसा बौराया?
बना नरक का द्वार,दिया है ये चौराया।

ललित

मुक्तामणि छंद

कई भाँति के लोग हैं,जीवन है इक मेला।
कुछ के मुख मुस्कान है,कुछ पर ग़म का रेला।

कुछ कड़वे-तीखे यहाँ,कुछ स्वभाव से मीठे।
कुछ निर्मल मन के धनी,कुछ चिकने अरु चीठे।

उनमें कुछ अपने लगें,सुंदर सपने जैसे।
जिनके हिय में प्यार हो,मीत मिलें कुछ ऐसे।

सबसे रीत निभाइए,प्रीत दिखा संसारी।
सबको गले लगाइए,मुस्कानें दे प्यारी।

ललित




15.11.19

मुक्तामणि छंद

चंचल मन चिंता करे,सोच-सोच मर जाए।
होनी तो होकर रहे,मनवा रोक न पाए।

होनी जब टलती नहीं,करो यत्न कितना भी।
मनवा चिंता मत करे,मत सोचे इतना भी।

ललित

मुक्तक 16-16

आज अचानक याद आ गये,गिल्ली-डण्डा,कंचे खो-खो।
रस्सा-कशी आईस-पाईस,छुपम-छुपाई हो-हो-हो-हो।
सतोलिया चौपड़ चंगा-पो,पोषम्पा भई पोषम्पा।
रस्सी-कूद कबड्डी हॉकी,धड़ी-मार-घूँसा दो-दो-दो।

ललित


मुक्तामणि छंद

दिल की धड़कन क्या कहे,मीत ज़रा सुन मेरे।
क्या होती है प्यार की,आहट दिल में तेरे?

धड़कन दिल की तेज है,साँसें रुक-रुक जाती।
दिल झूमे है प्यार से,कहे नज़र मदमाती।

ललित

11.11.19
मुक्तामणि छंद
13:12
यति पूर्व लघु गुरू
अंत दो गुरू
दो-दो समतुकांत

मुक्तामणि छंद

अनगिन स्वर्णिम रश्मियाँ,छुएँ धरा को ऐसे।
रात नहीं इक युग हुआ,मिले बिना हो जैसे।
धवल-चाँदनी रात में,धरती पर बिछ जाए।
सखी-धरा पर चाँदनी,प्यार-छटा बिखराए।

ललित


मुक्तामणि छंद

सुख-दुख की सरिता बहे,अविरल जीवन सारे।
वो पाए आनन्द जो,कभी न गोता मारे।

मन-मौजी बन कर रहो,कटी पतँग के जैसे।
संग हवा के चल पड़ो,दुख व्यापेगा कैसे?

ललित


कुण्डलिनी छंद

खेल चुका हर रंग से,हुआ वृद्ध वो आज।
अब हर रँग फीका दिखे,करें न नैना काज।
करें न नैना काज,दर्द घुटनों में होता।
माया-ममता-मोह,लगाएँ मन में गोता।

ललित



जयकारी छंद
समीक्षा हेतु

भिन्न जातियों वाला देश।
सब धर्मों का जहाँ प्रवेश।
अलग-अलग हैं भाषा-भेष।
प्रेम-प्यार का दे संदेश।

नहीं विश्व में कोई देश।
रखता भारत सा परिवेश।
ब्रम्हा-विष्णु-महेश-गणेश।
राम-कृष्ण के भक्त अशेष।

भगवदगीता और कुरान।
इनसे महके हिंदुस्तान।
गुरूग्रंथ साहिब दे ज्ञान।
सब धर्मों का हो सम्मान।

हिंदू-मुस्लिम औ सरदार।
मन्दिर-मस्जिद अरु गुरुद्वार।
गिरिजाघर में भली प्रकार। 
पूजा करते सब नर-नार।



ललित


कुण्डलिनी छंद

कान्हा तेरे प्यार की,कर दे इतनी छाँव।
जिसमें परमानन्द की,हो थोड़ी सी ठाँव।
हो थोड़ी सी ठाँव,ध्यान-जप मन को भाए।
सुख-दुख की बरसात,नहीं मन को छू पाए।

ललित


7.11.19

जयकारी छंद

स्वच्छ रखो नाली घर-द्वार।
शौचालय अरु स्नानागार।
छोटी सी ये मानो बात।
मच्छर से फिर मिले निजात।

पानी भरे न घर के पास।
साफ नीर मच्छर का वास।
उसमें डालो थोड़ा तेल।
हो जाए मच्छर को जेल।

ललित

5.11.19

गीतिका छंद

गूँजती हरदम जहाँ हैं,प्यार की शहनाइयाँ।
प्रीत की खुशबू हवा में,ले जहाँ अँगड़ाइयाँ।
आँख मींचे साथ मेरे,हमसफर तू चल वहाँ।
चल पड़ी है साथ तो मत,सोच मंजिल है कहाँ?

ललित

चौपाई

कलियों ने जब घूँघट खोले।बजी बाँसुरी हौले-हौले।
वंशी-वट यमुना के तीरे,झूमे कान्हा धीरे-धीरे।ल

अधर मुरलिया में रस घोलें।गोप-गोपियाँ धुन-सुन डोलें।
नैन कन्हैया के जब मटकें।राधा जी की पलकें अटकें।

पायलिया मुँहजोर हुई है।घुँघरूओं ने तान छुई है।
नारी बन शिव-शम्भू घूमें।घूँघट में 
कान्हा सँग झूमें।

नंदन-वन की शोभा न्यारी।छम-छम नाचें 
कृष्ण-मुरारी।
बेसुध होकर गोपी-ग्वाले,आत्म-ज्ञान के पीते प्याले।

दोहा

बजा सुरीली बाँसुरी,यमुना जी के तीर।
व्रज-वासी नर-नार की,कान्हा हरते पीर।

ललित

ताटंक छंद

जितना कोमल जितना छोटा,प्यारा दिल है सीने में।
उतना ये उत्पात मचाए,मजा न आए जीने में।
रोज़ नया इक स्वप्न दिखाए,नहीं कभी जो हो पूरा।
दिल मुश्किल कर दे जीना जब,अरमानों का हो चूरा।

ललित

चौपई छंद
बाल कविता

चाँद-चाँदनी खाकर पान।
चले घूमने हिंदुस्तान।
देख हिमालय  श्वेत विशाल।
हुई चाँदनी आज निहाल।

गंग नदी की शीतल धार।
भारत-माता का गलहार।
संगमरमरी सुंदर ताज।
चाँद-चाँदनी देखें आज।

लाल-किला दिल्ली की शान।
और स्वच्छता का अभियान।
चमक रहा नव-हिंदुस्तान।
देख चाँद की निकली जान।

ललित


मुक्तक

स्वप्नों की मायानगरी ये,कैसी 
श्याम बना डाली।
झोली भरते जीवन बीते,अंत-समय मिलती खाली।
स्वप्न-स्वप्न बस स्वप्न देखते,समय बिताता जो सारा।
अंत-समय वो मानव पाता,खुद को स्वप्नों से हारा।

ललित

जयकारी छंद

गरल हवा में डाला घोल।
क्या कर बैठा नर तू बोल?
मुश्किल में बच्चों की जान।
नहीं साँस लेना आसान।

अम्बर नीला दिखे न आज।
धूल-धुआँ का है बस राज।
कीचड़ में बदला है आब।
सूखे कूप-नदी तालाब।

लिया दानवों ने है धार।
पॉलीथिन रूपी अवतार।
नर-नारी बालक आवाम।
पॉलीथिन के सभी गुलाम।

निश्चय ग़र कर लें हम आज।
पॉलीथिन का रहे न राज।
आतिश-बाजी कर दें बंद।
रखें हवा को हम स्वच्छंद।

ललित

1.11.19
जयकारी छंद

देख लिया सारा जग घूम।
कहीं नहीं दिल पाया झूम।
सबसे प्यारा हिंदुस्तान।
प्यारी जिसकी है मुस्कान।

स्वर्णिम होती इसकी भोर।
नाच उठे जब मन का मोर।
रंगीली होती हर शाम।
साँध्य-आरती हो निष्काम।

ललित

जयकारी छंद

नारंगी केला अमरूद।
सार-तत्त्व इनमें मौजूद।
कुछ खट्टा कुछ मीठा आम।
उससे मीठा काला जाम।

काजू किशमिश और बदाम।
पिश्ता चिलगोजा के नाम।
रखना बच्चों हरदम याद।
बड़ा अनूठा इनका स्वाद।

ललित




विधाता छंद विधान एवँ रचनाएँ 19.08.15


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     -------विधाता छंद विधान-----

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1. सम मात्रिक छन्द,कुल चार चरण।

2. हर चरण में 14-14 की यति से कुल 28 मात्रा।

3. प्रत्येक चरण में 1 , 8 ,15 , व 22 वीं मात्रा अनिवार्यतः लघु ही (1) होती है ।

4..दो अथवा चार चरणों में समतुकांत।

5. मापनी- 1222/1222/1222/1222

6. धुन- लगागागा लगागागा लगागागा लगागागा

नोट :- चरण में गुरु की जगह दो लघु (1 1) को विकल्प के रूप में एक गुरु ( 2 ) माना जा सकता है 

             **** उदाहरण ****

                    विधाता छंद

            *****************


बजे जब बाँसुरी प्यारी,कहाँ कुछ होश रहता है।

चली सब गोपियाँ आएँ,अजब सा जोश रहता है।

नज़र भर कृष्ण को देखें,यही इक सोच रहती है।

कन्हैया की निगाहों से,अलौकिक प्रीत बहती है

**********रचनाकार*************

          ललित किशोर 'ललित'

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विधाता छंद रचनाएँ



1

विधाता छंद

तुम्ही हो प्रीत इक मेरी,तुम्ही हो रास की रानी।
सितारे आज हँसते हैं,करे जब चाँद मनमानी।
न बंसी को सखी माना,न कोई गोपिका जानी।
न रूठो और अब राधा,करो ना और नादानी।

2
चित्र आधारित विधाता छंद

सुनो ओ राधिका रानी,सभी हम प्रेम में हारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।
नशीली आँख का तेरी,चढा मुझ पर नशा वो है।
न मुझको याद अब कुछ भी,बता मेरी खता जो है।
३
चित्रा धारित विधाता छंद

बिठालो माँ हमें अपनी,निगाहों की पनाहों में।
न जानें हम किसी रब को,छुपालो आज बाहों में।
तुम्हारी सब करें पूजा,जगत ये जानता है माँ।
हमारी हर खुशी तुम से,तुम्हीं से है हमारी जाँ।
.......................................................
4
चित्र आधारित विधाता छंद

माँ से शुरु होकर वतन को छूती ये पंक्तियाँ

दुआ माँ साथ हो तेरी,सितारे तोड लाऊँगा।
जहाँ होंगें सितम तुझ पर,वहीं मैं दौड आऊँगा।
न कोई भी सितमगर अब ,तुझे आँखें दिखा पाये।
नहीं पैदा हुआ कोई ,नजर तुझसे मिला पाये।

'ललित'

5.
21.08.15
विधाता छंद

बहारें आज गुलशन में,बिखेरें प्यार के मोती।
चले आओ सजन मेरे ,तुम्हारी राह मैं जोती।

पडे हैं बाग में झूले,मुदित मन मोर भी झूमे।
सितारों के लगे मेले,लताओं पे भ्रमर घूमे।

6.
21.08.15
तुम्हारे नाम की मेहंदी,रचाई आज हाथों में।
तुम्हारे प्यार की मारी,लजाई आज रातों में।
कहे पायल न ठुकराओ,कहे कँगना न बिसराओ।
कहे बिंदिया न तरसाओ,तडपते हैं चले आओ।

7 -  ( 22.08.15)

मिली है रोशनी उनको,लडे जम कर तमों
से जो।
डिगे डर कर तमों से जो,तमों में खो गये हैं वो।
उजाला है उसी घर में,जहाँ बेटी चहकती है।
हवायें गुन गुनाती हैं,दिशायें सब महकती हैं



विधाता छंद

8
हवाओं को बदल देंगें,बता दो आसमानों को।
किसी तूफान से कम मत,समझना हम जवानों को।
असंभव को हमें संभव,यहाँ अब कर दिखाना है।
न रोकेंगें कदम अपने,सितमगर को मिटाना है।
9
विधाता छंद
काव्योदय 27.08.15
न करते जो जमाने में,कदर माता पिताओं की।
जरा वो सोच लें खुद ही,सजा अपनी खताओं की।
बुजुर्गों की दुआओं का ,असर जो देखना चाहो।
करो सम्मान सब उनका,महर जो देखना चाहो।
10
27-08-15 काव्योदय
विधाता छंद

हमारी चाहतों का तुम,जनाजा यूँ निकालोगे।
न सोचा था कभी हमने ,हमें दिल से निकालोगे।
हमें तुम ही कभी ऐसा, पराया पन दिखाओगे।
न दोगे फोन पे घंटी,न ही कुछ बोल पाओगे।

ललित
18.08.15
विधाता छंद
11
हमारी आरजू का ये, फकत इतना इशारा है
जमीं अपनी हवा अपनी, समंदर भी हमारा है।
नया इतिहास लिखने का, इरादा आज न्यारा है।

07.03.16
12
विधाता छंद

जटाओं में बसी गंगा,गले में नाग की माला।
अघोरी सा दिखाई दे,निगाहों में लिए ज्वाला।।
शिवा भोला लगे तू तो,मुझे बस नाम का भोला।
चढाये तू सदा रहता,धतूरे भांग का गोला।।

ललित
13
विधाता छंद

न जानूँ मैं कहाँ खोई,निराली वो हँसी मेरी।
चुरा कर ले गई मुझसे,मुझी को वो हँसी तेरी।।
तुम्हारी कातिलाना वो,अदा कब भूल पायेंगें।
भुलाना जो कभी चाहा,खुदी को भूल जायेंगें।।

'ललित'
14
विधाता छंद

जहाँ माता पिता सुत से,दुखी हो रोज रोएंगें।
वहाँ कैसे कभी बेटे,सुखों के बीज बोेएंगे।

कदर माता पिता की जो,करे यदि पूत हो ऐसा।
करे सेवा बना घर वो,प्रभू के धाम के जैसा।।

'ललित'
15
विधाता छंद

कभी जालिम कभी भोली,कभी नादान वो
दिखती।
नशीली आँख से खुद की,बड़ी अनजान वो दिखती।
न जाने क्यूँ हमें उसकी,अदा पे प्यार आया है?
हमारा दिल चुरा उसने,कहाँ जाने छिपाया है?

'ललित'
16
विधाता छंद

जहाँ पुजती सदा नारी,उसी घर में उजाला है।
सजाती है जिसे बेटी,उसी घर में शिवाला है।।

जहाँ पुजती सदा माता,उसी घर में निवाला
है।
जहाँ आती नहीं लक्ष्मी,उसी घर में दिवाला है।।

'ललित'
17
विधाता छंद

कभी वो वोट हैं माँगें,कभी शासन चलाते हैं।
कभी लगते हमें अपने,कभी वो बरगलाते हैं।।
सुना था वो बड़े नेता,मसीहा हैं गरीबों के।
दिखाई अब मगर देते,भिखारी वो नसीबों के।।

'ललित'
18
विधाता छंद

पुकारे चाँद भी नभ से,सुनो ओ चाँदनी रानी।
न जाओ रूठकर हम से,करो मत आज मनमानी।।
तुम्हारे रूप पर मरते,जमीं औ'आसमाँ तारे।
सदा से ही दिवाने हैं,रजत से रूप के सारे।।

'ललित'
19
विधाता छंद

नहीं है हाथ में चूड़ी,नहीं कँगना नहीं पायल।
बता ऐ चाँदनी तूने,किए कैसे सभी घायल।।
वही है साजना तेरा,लिए है दाग जो मुख पे।
बता दे राज ये गहरा,अनोखा तेज क्यों रुख पे।।

'ललित'
20
विधाता छंद

सजा कर फूल बालों में,लगाकर गाल पर लाली।
चली वो खूब इतरा कर,पहन कर कान में बाली।।
बड़ी तीखी नजर वाले,मियाँ इक झूम कर बोले।
इमारत ये पुरानी सी,हसीना सी सजी डोले।।

'ललित'
21
विधाता छंद

लुभाते हैं,रिझाते हैं,हँसीं सपने बहारों के।
न जाने क्यूँ हमें ठगते,नजारे रहगुजारों के।।
नजर भगवान पर रखकर,सफर अपना शुरू कर लो।
नहीं मिलता अगर रस्ता,किसी को तुम गुरू करलो।।

'ललित'
22

कभी बहना कभी बेटी,कभी भार्या कभी पोती।
कभी वो माँ हमारी बन,खुशी के बीज है बोती।
पिला कर दूध बच्चों को,बड़े अरमान से पाले।
मगर बच्चे उसे देते,बड़े ही दुख भरे छाले।

'ललित'
23

सुखों को भोगने में ही,जवानी तू बिताता क्यूँ।
बुढापे के दुखों का डर,नहीं तुझको सताता क्यूँ।।
जवानी के दिनों में ही,प्रभू का नाम चख ले रे।
बुढापे के सुखों की तू,अभी से नींव रख ले रे।।
'ललित'

वाहह्ह्ह ललित जी.....लाज़वाब सृजन...सर्वकालिक...श्रेष्ठ रचना...हार्दिक बधाई....
24
विधाता छंद

भला क्या है बुरा क्या है,नहीं तू जो समझ पाये।
लगा ले आत्म में गोता,वहीं से ज्ञान ये आये।।
जरा तू मौन रहने की,अदा भी सीख ले प्यारे।
जमीं,आकाश औ' तारे,सदा से मौन हैं सारे।
'
ललित'
25
विधाता छंद

नया संदेश लेकर फिर,नई इक भोर है आई।
प्रभू का नाम लेकर तुम,करो कुछ प्रार्थना भाई।।
बढे बरकत मिले ताकत,किसी के काम हम आयें।
दुखी जन को हँसाने के,तराने रोज हम गायें।।

'ललित'
26
विधाता छंद

चलो इक दूसरे से हम,जरा कुछ बात ही कर लें।
कहें कुछ पीर मन की औ',किसी के घाव
हम भर लें।।
लुटा दें हर खुशी अपनी,किसी के गम मिटाने में।
यही बस सोच हो मन में ,नहीं सुख दूर जाने में।।

27
विधाता छंद

नया इक नीड़ बुनने को,चली बुलबुल महारानी।
नहीं जंगल दिखा कोई,भरा तब आँख में पानी।।
जरा सी छाँव पाने को,तरसते आज ये प्राणी।
भरी दारुण दुखों से अब,सुनेगा कौन ये वाणी।।

'ललित'

28
विधाता छंद

उसी गुलशन उसी घर से,विदा वो मात है होती।
सँवारा था कभी जिसको,जड़े थे प्यार के मोती।
नहीं वो पूछ पाती है,गई क्यों आज मैं ताड़ी।
जरा बेटे बता दे तू  ,उजाड़ी आज क्यूँ बाड़ी।।

'ललित'

29

कहीं झोली भरी तूने,कहीं फाके बताता है।
किसी के नाम खुशियाँ हैं,किसी को गम सताता है।
30

तुम्हारे नाम के चर्चे,सुने भगवन हजारों से।
तुम्हारे नाम के पत्थर,मिला देते किनारों से।।
हजारों दीपकों की लौ,सजायी है कतारों में।
प्रभू के दीद की खबरें,सुनाई जब नजारों ने।।
ललित

31
विधाता छंद

न समझे प्रेम की भाषा,दिवानी श्याम की राधा।
छुड़ाकर बाँसुरी पूछे,किया है प्रेम क्यूँ आधा।।
अधर मुरली लगाते हो,मुझे दिल में बसाते हो।
यही मुरली बजाकर तुम,मुझे पागल बनाते हो।।
'ललित'

32
विधाता छंद

अनाड़ी एक ऐसा था,जिसे लिखना न आता था।
यहीं पर छंद कविताएं,तथा लय ज्ञान पाता था।।
तराशा प्यार से सादर,सुधारी वर्तनी सारी।
गुरू राकेश जी का मैं,हृदय से आज आभारी।।

'ललित'

22.03.16

26.07.16
किसी की आँख मे पानी,किसी के नैन हैं सूखे।
हँसा देता हमें कोई,किसी के बोल हैं रूखे।
चलो सबसे निभालें हम,सभी के साथ है जीना।
खुशी को बाँट दें सब में,गमों को है हमें पीना।

'ललित'

सुनो ओ राधिका रानी,सभी हम प्रेम में हारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।

तुम्ही हो प्रीत इक मेरी,तुम्ही हो रास की रानी।
सितारे आज हँसते हैं,करे जब चाँद मनमानी।
न बंसी को सखी माना,न कोई गोपिका जानी।
न रूठो और अब राधा,करो मत और नादानी।

बहारें पूजती तुमको,नजारे चुप हुए सारे।
चली क्यूँ फेर कर नजरें,नजर के तीर क्यूँ मारे।

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दिसम्बर 2019 की रचनाएँ

विधाता छंद

बुढ़ापा झूमकर आए,जवानी सिमटती जाए।
सफेदी रंग दिखलाए,कि एड़ी घिसटती जाए।
वही नदिया वही धारा,वही तालाब है प्यारा।
लगे मीठा नहीं पानी,समंदर की तरह खारा।

ललित


विधाता छंद

सुना मझधार से हमने,कि झरने खूबसूरत हैं।
महकते हैं चहकते हैं,नज़ारों की ज़रूरत हैं।
छलाँगे मारते आते,फुदक-कर झील से मिलते।
मिलन से झील-झरने के,नवल-गुल प्यार के खिलते।

ललित

06.12.19

विधाता छंद

किनारों में बँधी नदिया,चली है झूमती गाती।
मिलूँ जल्दी समन्दर से,सुनाऊँ प्रेम की पाती।
लगाए हर लहर ठुमके,छनन-छन-छन बजे पायल।
नदी की इन अदाओं का,समंदर भी हुआ कायल।

ललित

विधाता छंद
मुस्कान/खिड़की/झरोखा

लिए मुस्कान अधरों पर,बड़ी दिलकश मनोहारी।
हँसे बिंदास खिड़की में,पड़ोसन हूर सी प्यारी।
न जाने कौन सी मदिरा,झरे नैना-झरोखे से।
नहीं कुछ होश है रहता,मिलें जब नैन धोखे से।

ललित


04.12.19
विधाता छंद

ज़रा दिल के झरोखे से,हमारी ओर तो देखो।
नयन की खोलकर खिड़की,गगन का छोर तो देखो।
हवा में प्यार की खुशबू,ज़रा महसूस तुम कर लो।
खुली बाहें हमारी हैं,हमें आगोश में  भर लो।

ललित


जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...