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मार्च 2018 ईमेल डन

ंमार्च 18 ई मेल भेजा 31.3.18
31.3.18
दोहा
जीवन में जो भी मिला,मान और अपमान।
अंत समय में सब यहीं,छोड़ चला इंसान।

27.3.18
ताटंक छंद
2

देखी कुछ सुंदर तस्वीतरें,मनहर मंजर भी देखे।
फूलों के तन में चुभते कुछ,तीखे खंजर भी देखे।
साथ समय के इंसानों के,बदले तेवर भी देखे।
बड़े-बड़े सेठों के तन पर,नकली जेवर भी देखे।

ताटंक
रास में आए भोले बाबा

छम-छम-छम बाजे पायलिया,नाच रही राधा गोरी।
बाँसुरिया की मधुर तान पे,ठुमक रही बाँकी छोरी।
भोला-बाबा ओढ़ चुनरिया,नाच रहा है मस्ती में।
शमशानों का वासी वो शिव,झूम रहा है बस्ती में।

ललित

ताटंक
कुछ मन की बात

देखी दुनियादारी हमने,देख लिए दुनिया वाले।

घाव सभी के अपने-अपने,और टीसते हैं छाले।

मिर्च मिलाकर मरहम में सब,बड़े प्यार से हैं लाते।

छालों को सहला-सहला कर,और घाव हैं दे जाते।

ललित

26.3.18

ताटंक छंद

कान्हा इतनी किरपा कर दे,पल भर भी न तुझे भूलूँ।
राधे-कृष्णा नाम स्वरूपी,झूले में मन से झूलूँ।
मन-मन्दिर में दर्शन होवें,नयनों में झाँकी तेरी।
अधरों से वो लगी बाँसुरी,चितवन वो बाँकी तेरी।

ललित

ताटंक मुक्तक
🙏🌹🙏

जो जिव्हा निशि-दिन राम रटे,उस का तो कहना क्या है?
धारण की जो तुलसी माला,उस जैसा गहना क्या है?
राम नाम नित सुमिरन करना,और हमें करना क्या है?
राम सुधा सरिता में बह कर,और कहीं बहना क्या है?

ललित

ताटंक छंद
2

चंचल मन में एक मिनट में,भाव हजारों हैं आते।
पलक झपकते ही जो मन को,मील हजारों ले जाते।
मन की गति को रोक सकें वो,मानव दुर्लभ हैं होते।
स्वप्न हजारों रंगों के इस, मानव मन में हैं सोते।
ललित

23.3.18
एक अदना प्रयास
देवहूति माता ने अपने पुत्र कपिल भगवान से निम्न प्रश्न किए
ताटंक छंद
कपिल-गीता
1
कपिल देव को सद्गुरु माने,वन्दन करती है माता।
प्रश्न पूछने हैं कुछ मुझको,आज्ञा जो दे दो दाता।
पूछो माँ वो प्रश्न आप जो,मन में उठते हैं सारे।
सच्चा सुख किसको कहते हैं,और कहाँ सुख के द्वारे?

2
देवहूति पूछे दुनिया में,सच्चा सुख होता है क्या?
अविनाशी सुख के ये मानव,बीज कहीं बोता है क्या?
ऐसा परमानंद चाहिए,जो अखण्ड अविनाशी हो।
दुख जीवन में कभी न आए,मन सुख का आभासी हो।
3

भोग सुखों का शान्ति दिलाता,सदा मानती थी ऐसा।
दुख का अंत नहीं होता पर,सुख भोगो चाहे जैसा।
सुख से थोड़ी शान्ति मिले फिर,मन चंचल हो जाता है।
हर इन्द्रिय का सुख भोगा पर,शान्ति नहीं
मन पाता है।
4

सदा रहे जो मन में कायम,जिसका नाश नहीं होता।
क्या ऐसा आनन्द प्रभो जी,प्राणाधार कहीं होता?

दुर्बल-रोगी-वृद्ध हुआ तन,नहीं छोड़ता भोगों को।
इन्द्रिय-सुख देता है तन में,नित्य बुलावा रोगों को।

5

बहुत त्रास देती है मन को,भोग और सुख की माया।
नहीं निकलती मन से क्यों ये,काम-वासना की छाया?
प्रभो वासना से मुझको अब,छुटकारा दिलवा दो जी।
दुःख मिटे आनन्द मिले वो,हाला तुम पिलवा दो जी।

ललित
23.3.18
ताटंक छंद
वंशी मधुर बजा कर कान्हा,मधु-रस कानों में घोले।
नैन-सुधा बरसाता मोहन,नैनों से हौले-हौले।
मोरपंख जो सिर पर धारा,दिल उसमें अटका मेरा।
देकर झटका तूने कान्हा,दिल नीचे पटका मेरा।

ललित
22.3.18
मुक्तक (उल्लाला आधारित)
उलझन सुलझाने चला,चंचल मन के साथ मैं।
और उलझ बैठा वहीं,अपने मन के हाथ मैं।
मन तो मन की ही करे,जोड़े हाथ विवेक है।
परिणामों को देखकर,पकड़ूँ अपना माथ मैं।

ललित किशोर 'ललित'

21.3.18

उल्लाला

उलझन सुलझाने चला,चंचल मन के साथ मैं।
और उलझ बैठा वहीं,अपने मन के हाथ मैं।

मन तो मन की ही कहे,जोड़े हाथ विवेक है।
मन की ही रहती सदा, टँगड़ी ऊँची एक है।

ललित

20.3.18
उल्लाला छंद

रंग बदल गिरगिट करे,रक्षा अपनी जान की।
नेता बदले रंग है,बलि देने को आन की।

उल्लाला छंद
केवट प्रसंग

पत्थर से नारी बनी,तव चरणों की धूल से।
नाव काठ की ये प्रभो,छू मत देना भूल से।

चरण पखारूँ आपके ,शुद्धोदक से नाथ मैं।
ले जाऊंगा पार फिर, बड़ी खुशी के साथ मैं।

गंगा पार उतारती,नैया मेरी खास है ।
तारोगे भव से मुझे,इतना तो विश्वास है।

ललित
माँ तेरे इस लाल को, कहीं न मिलती छांव है ।
पीपल बरगद सब कटे ,कंकरीट का गांव है ।
मोबाइल हावी हुआ,कल पुर्जों के देश में। अनपढ़ मोबाइल रखें ,पढ़े लिखो के वेश में।

19.3.18

उल्लाला

करें दिखावा नेह का,नाते रिश्तेदार सब।
वक्त पड़े पहनायगें,काँटों का वो हार सब।

नाव हमारे प्यार की,डूब गई मझधार में।
लहरें ही थी मौज में,खोट न थी पतवार में।

'राज' गुरू के प्यार में,कितनी मधुर मिठास है।
हुशियारों की डाकटर,आज करे आभास है।

शब्दों की जादूगरी,शब्दों का ही खेल है।
शब्द साधना से फले,काव्य सृजन की बेल है।

काव्य सृजन की बेल ये,छंदों को ले साथ में।
फूलों से लद जाय है,लय को लेकर हाथ में।

ललित

भाव उठें मन में जहाँ,और कलम चल जाय है।
सुंदर छंदों में वहीं,काव्य सृजन ढल जाय है।

'काव्य सृजन' की प्रार्थना,माँ शारद से आज है।
'राज' गुरू किरपा करें,जिन पर हमको नाज है।

ललित
18.3.18
उल्लाला

बिटिया खेले आँगना,छोटे-छोटे पाँव हैं।
लेकिन क्या माता-पिता,देते उसको छाँव हैं?

बेटे-बेटी में बड़ा,फर्क करें कुछ लोग हैं।
क्या बेटे के भेष में,कुछ सुखकर संजोग हैं?

समय बड़ा बैरी हुआ,वृद्धावस्था देख के।
अब तक पन्ने बंद थे,विधना के इस लेख के।

सपने कितने देखता,जीवन भर इंसान है।
सारे सपने तोड़ता,समय बड़ा बलवान है।

माया में उलझा रहा,जीवन भर जो शान से।
राम-कथा चाही नहीं,सुननी जिसने कान से।

पचपन का होकर वही,जपता काहे राम है?
क्यों उसको लगने लगा,सच्चा प्रभु का नाम है?

ललित

उल्लाला छंद
नव वर्ष प्रार्थना

सोचो इस नव वर्ष में,क्या करना है काम जी?
काम करोगे कुछ नया,या करना आराम जी?

माँ शारद की साधना,करनी हमको रोज है।
काव्य सृजन परिवार में,करनी हमको मौज है।

माँ शारद से प्रार्थना,आज करो कर जोड़ के।
माँ शारद मत रूठना,मत जाना मुख मोड़ के।

काव्य सृजन का ये पटल,महके नव मकरंद सा।
हर साथी लिखता रहे,नित नव सुंदर छंद सा।

ललित

17.3.18
उल्लाला

इंतजार कब तक करूँ,सजना तेरी ट्रेन का।
प्लेटफार्म की बेंच पर,भुर्ता बनता ब्रेन का।

ललित

14.3.18
चंद्रमणि छंद
1
स्वर्ण चुनरिया ओढ़ के,प्राची निखरी प्यार से।
हर्षित सब सरवर हुए,स्वर्णमयी श्रृंगार से।

15.3.18
1
चंद्र मणि छंद

बचपन छूटा हाथ से,घुसी जवानी देह में।
रूठ जवानी भी गई,भरे सावनी मेह में।

वृद्धावस्था आ घुसी,काले-काले केश में।
अपने बेगाने हुए,अब अपने ही देश में।

ललित

2
बाँसुरिया है हाथ में,छोटे से गोपाल के।
मोर मुकुट सिर सोहता,कृष्ण कन्हैया लाल के।

गैयन के पीछे चले,फुदक-फुदक वनराह में।
बाल सखा सब घेरते,शुभ-दर्शन की चाह में।

3
मात यशोदा का लला,राधा का चितचोर वो।
राधा का दिल ले गया,चोरों का सिरमोर वो।

नंदनवन पावन हुआ,नंद लला के पाँव से।
यमुना-तट शीतल हुआ,वंशी वट की छाँव से।

ललित

4
चंद्रमणि छंद

निश्छल निर्मल प्रेम की,सबको होती चाह है।
प्रेम सदा सबसे करो,ये ही सच्ची राह है।

होड़ा होड़ी मत करो,जीवन की इस राह में।
खुशियाँ छूटी जा रही,और खुशी की चाह में।
ललित

दिल की सारी धड़कनें,लेती जिसका नाम हैं।
मनमोहन घनश्याम वो,कान्हा जी सुखधाम हैं।

राधा-राधा जो जपे,कान्हा उसका दास है।
कान्हा का नाजुक जिया,राधा जी के पास है।

ललित
16.3.18
1
उल्लाला छंद

रहती हमें निहारती,खिड़की से इक नार थी।
सपने में आकर हमें,करती बेहद प्यार थी।

सपना टूटा एक दिन,नींद उड़ी मझधार में।
टूटे दिल को हम लिए,फिरते हैं बाजार में।

ललित

उल्लाला छंद
3

आया हूं कैलाश से,श्याम दर्श की आस में।
मैया तेरे लाल को, ले आ मेरे पास में ।

एक नजर मैं देख लूं,तेरे शिशु के भाल को।
ले लूँ अपनी गोद में,उस नटखट गोपाल को।

बाबा ले लो भेंट तुम,जो चाहो भंडार से। डर जाएगा लाल तो,नागों के इस हार से।

अलख निरंजन जब सुना,साँवरे नंदलाल ने।
शिव दर्शन की कामना,ठानी उस गोपाल ने।

जोर-जोर से फिर लला, करने लगा विलाप जी ।
भोले के दर्शन मुझे,करने दो माँ आप जी।

खूब जताया लाल से, प्यार यशोदा मात ने।
क्यों रोया लल्ला अभी,चौंकाया इस बात ने।

हँसकर बोले शिव तभी, मात हमारी बात सुन।
चुप हो जाएगा लला, हमें देख कर मात सुन।

ले आई मैया तभी,श्याम लला को गोद में। बाबा के दर्शन किए,श्याम हुआ चुप मोद में।

ललित

ललित
16.3.18
4
उल्लाला छंद

ढैंचू ढैंचू जो करे,पूर्ण गधा श्रीमान हो।
दोस्त उसी को लो बना,यदि उसमें कुछ जान हो।
आधा टुकड़ा दो उसे,आधा अपने पास हो।
फिर देखो बिन  कुछ किए,जनता अपनी दास हो।

ललित

13.3.18
1
रूपमाला छंद
रास में तेरे कन्हैया,क्या छुपा है राज? दौड़ आती गोपियां सब,छोड़ घर के काज।
बाँसुरी जादू भरी तू ,है बजाता खूब।
चर-अचर सब झूम उठते,आत्म रस में डूब।

नैन तेरे हैं समंदर,नील-वर्णी श्याम।
गोप-गोपी राधिका सब,डूबते निष्काम।चाँद-तारे व्रज-धरा औ',वायु जल आकाश।
कृष्ण-राधा मय हुए सब,तोड़ सारे पाश।

रूपमाला छंद
राधा विरह

राधिका हर पल निहारे राह तेरी श्याम।
भोर से तक हो न जाए,आज फिर से शाम।
चूड़ियां खनकें नहीं अब, पायलें भी मौन। राधिका के आँसुओं को,देख सकता कौन?

श्याम तेरे दर्शनों की,आस में दिन-रैन।
तू हृदय में है बसा पर,रो रहे हैं नैन।
सावनी शीतल फुहारें,भर रही हैं आग।
नींद नयनों से उड़ी हर,रैन बीते जाग।

नैन तुझ से क्यों लड़ाए,सोचती है आज?
तोड़ कर दिल को कन्हैया,क्यों न आई लाज?
प्रीत जोड़ी राधिका सँग,बाँसुरी ले हाथ।
आज वंशी और राधा,क्यों बिसारे नाथ?

माँ यशोदा गोप-गोपी,और ये व्रज-धाम।
सब पुकारें श्याम सुंदर,आज तेरा नाम।
तू जहाँ भी जा बसे बरसे,खुशी हर ओर।
आ न पाए श्याम तेरे,पास दुख का छोर।

ललित

12.3.18

1
रूपमाला छंद

फूल इक सुंदर खिला था,कंटकों के बीच।
खूँ-पसीने से रहा था,बागबाँ भी सींच।
क्यों मिली फिर बागबाँ को,एक गहरी चोट?
बागबाँ के खूँ-पसीने,में कहाँ थी खोट?

ललित

2
रूपमाला छंद

जिंदगी अनमोल कितनी,जान ले इंसान।
कब न जाने मौत आकर,छीन ले ये जान।
मौत जब चुपचाप आती,और करती घात।
तब कहीं इंसान को ये,समझ आती बात।

ललित

3
रूपमाला छंद

देश की तकदीर जिनके,हाथ में है आज।
राज-नेता दल-बदल वो,भर रहे परवाज।
मूक जनता भ्रष्ट नेता,को करे स्वीकार।
फिर कहाँ होगा भला इस,देश का उद्धार।

ललित

11.3.18
रूपमाला छंद

देवता ऋषि और मानव,और सारे संत।
दोस्त-दुश्मन मात-शारद,और सब सामंत।
दें मुझे आशीष ऐसा,हों सृजित यूँ छंद।
भाव पूरित ताल-लय में,हो सजा हर बंध

ललित

रूपमाला छंद

प्रेम की ले लो परीक्षा,ओ हसीं दिलदार।
या करो तुम मीत मेरे,प्यार को स्वीकार।
है तुम्हीं से प्यार मुझको,मान लो ये बात।
थाम लो कर आ गई है,ये सुहानी रात।

ललित

अभी अभी मन में आया
मुक्तक
✈✈✈✈✈✈

कितना भी समझालो मन को,
समझ नहीं ये पाता है।
मायावी दुनिया में निश-दिन,
और उलझता जाता है।
उस राधा का नाम न जपता,
जिसका मोहन दीवाना।
अपनी ही दारा में खोया,
राधा को बिसराता है।

ललित किशोर 'ललित'
📣📣📣📣📣📣

त्रिभंगी छंद

ओ धेनु चरैया,रास-रचैया,नाग-नथैया,
श्याम-लला।
गोवर्धन-धारी,कृष्ण-मुरारी,डोर हमारी।
थाम लला।
वन-उपवन सारे,यमुना धारे,तुझे पुकारें,आ जा रे।
बाँसुरिया वारे,गोप सखा रे,माखन- मिश्री ,खा जा रे।

ललित

त्रिभंगी छंद

नेता ही तारें,कष्ट निवारें,पार उतारें,भक्तन को।
नेता ही देवा,उनकी सेवा,देवे मेवा,हर जन को।
भगवान बिसारो,नित्य पुकारो,पाँव पखारो,नेता के।
अब सुनो भारती,करो आरती,पूर्ण स्वारथी,क्रेता के।

ललित

रूपमाला छंद 7.3.18 से प्रारम्भ

7.3.18
रूप माला छंद

प्रार्थना ये शारदा माँ,है हमारी आज।
साधना-पथ में हमारी,आप रखना लाज।
भाव जो मन में उठें वो,लिख सकें हम नित्य।
चहुँ दिशा महके हमारा,छंद मय साहित्य।

ललित

रूप माला छंद

छोटका प्यारा कन्हैया,बाँसुरी ले हाथ।
नाचता है ठुमक-ठुम्मक,राधिका के साथ।
ताल देती है यशोदा,झूमते हैं ग्वाल।
नंद बाबा श्याम के बस,चूमते हैं गाल।

'ललित'

रूपमाला छंद
क्या कुछ विचारणीय बन पाया

कामनाएँ सिर उठाती,नित नई अविराम।
हो न पाता मन हमारा,क्यों कभी निष्काम?
कामनाओं के समन्दर,में रहा मन डूब।
चाहतों ने नित निचोड़ा,मानवी मन खूब।

ललित

रूपमाला छंद

इक परी चंचल सलोनी,चाँदनी सा रूप।
खिलखिलाई आँगना में,भोर की ज्यों धूप।
नाचती है ठुमक-ठुम्मक,खूब सुबहा शाम।
शौक है कहना कहानी,और 'आद्या' नाम।

ललित

रूपमाला छंद

वो मिलन किस काम का जब,हो न दिल में प्रीत?
प्रीत भी क्या प्रीत जिसमें,सिर्फ हो बस जीत ?
धड़कनों में जो बसा हो,बन हृदय का नाथ।
चल पड़ो तुम साथ उसके,हाथ में ले हाथ।

ललित

रूपमाला छंद

चंचला नाजुक कली वो,हुस्न से भरपूर।
नयन चमकें ज्यों सितारे,चाँदनी सा नूर।
पास से जब रूप देखा,रह गया हैरान।
किस बला का रूप इसमें,भर दिया भगवान।

ललित

रूपमाला छंद

रूपसी अनुपम अनोखी,एक देखी आज।
चाँद सा मुखड़ा सलोना,ओट घूँघट लाज।
घाघरा लहँगा बढाता,राजपूती आन।
फैशनेबल युवतियों की,घट रही थी शान।

ललित

रूपमाला छंद

चाँद कुछ रूठा हुआ है,चाँदनी से आज।
बादलों का होगया है,आसमाँ में राज।
चाँदनी गुम हो गयी है,बादलों के पार।
चाँद गुमसुम सा बहाए,आँसुओं की धार।

ललित

रूपमाला छंद
दिल जलाने की अदा क्या,आप में महबूब?
बेवफाई की कला भी,आप में है खूब।
हर कदम करते रहे हम,आप पर विश्वास।
तुम उड़ाते ही रहे इस,प्यार का उपहास।

ललित

रूपमाला छंद
स्वप्न

क्या हुआ जो आज अपने,हो गए हैं दूर?
क्या हुआ जो हो गया है,तू बड़ा मजबूर?
स्वप्न की दुनिया कभी क्या,हो सकी आबाद ?
भूल जा तू स्वप्न सारे,घूम फिर आजाद।

ललित

11.3.18

पहली रचना
रूपमाला छंद

सांवरे इस ओर मुड़कर,देख ले इक बार।
डोलती है नाव मेरी,थाम ले पतवार।
नाव माया के भंवर में, फँस न जाए श्याम।
डूबते को तार देता,एक तेरा नाम।

ललित

रूपमाला छंद

भावपूरित सारगर्भित,हो सृजन हे मात!
काव्य की सुंदर लता का,हो हरित हर पात।
शब्द झंकृत कर रहे हों,हर हृदय के तार।
दें अलंकृत शब्द मेरे,काव्य को विस्तार।

ललित
11.3.18
मुक्तक
फतवा मौत का

मरहम तो दे नहीं सके नश्तर चुभा दिया।
संवेदना की लाश का तकिया बना दिया।
था जो मसीहा अब वही जल्लाद सा दिखे।
इंसानियत को मौत का फतवा सुना दिया।

ललित किशोर 'ललित'

रूपमाला छंद

आज ऐनक हाँफती सी,काँपती सी खूब।
पाल कर रंगीन चश्मा ,खुद रही है डूब।
और अब गोगल दिवाने,का हुआ है राज।
कद्र ऐनक की नहीं है,इस चमन में आज।

ललित

सितम्बर 17


30.9.17

मृदुगति छंद

है तार तार दिल का,कुछ इस कदर टूटा।
लगने लगा हमें तो,सारा जहान झूठा।

कोई दवा मिले जो,हर तार जोड़ पाए।
कोई गरल मिले जो,हर भरम तोड़ जाए।

विश्वास टूटता है,हर आस छूटती है।
बस छटपटाहतों में,निःश्वास छूटती है।

ये बेवफा जमाना,कितना बदल रहा है?
हर रंग ही कलेवर,अपना बदल रहा है।

ललित

मृदुगति छंद

कुछ और क्यों न दिखता,मनमोहना सिवा अब?
क्यूँ गोपियाँ रँगी हैं,उस श्याम रंग में सब।
उद्धव तुम्हें पता क्या,कितनी मधुर बजे है?
निर्जीव बाँसुरी जब,कान्हा अधर सजे है।

दुनिया लगे न प्यारी,माखन हमें न भाता।
मनमोहना पिया ही,हर ओर नजर आता।
उद्धव हमें सुनाओ,उस श्याम की कहानी।
क्या याद रोज आतीं,हम गोपियाँ दिवानी?

ललित

मृदुगति छंद

क्या आज खत्म होगा,लंकेश वो दशानन?
यूँ तार-तार होगा,क्या अब न पाक-दामन?

क्या राम राज्य है ये,रावण विहीन ऐसा?

मृदुगति छंद

लंकेश तू बता दे,बदनाम क्यूँ हुआ है?
मिटता रहा बरस हर,बन पाप का धुँआ है?

लाखों दिलों बसा जो,रावण नहीं मरे क्यों?
कोई न फोड़ पाता,घट पाप के भरे क्यों?

'ललित'
मृदुगति छंद

क्या पा लिया जहाँ में,सोचो जरा कभी तुम?
क्या और है कमाना,सोचो जरा अभी तुम?

पर साथ क्या चलेगा,अंतिम समय तुम्हारे?
ये भी जरा विचारो,क्या तुम यहाँ न हारे?
ललित

मृदुगति छंद

क्या जीत क्या खुशी है,क्या हार क्या ग़मी है?
जो खूब खास अपना,वो कौन आदमी है?
आता समझ न हमको,क्या ज़िन्दगी जुआ है?
या सिर्फ ज़िन्दगी ये,माँ -बाप की दुआ है?

ललित

29.9.17
कुण्डलिनी छंद
आधार कार्ड

भारत का इक नागरिक,पहुँचा यम के द्वार।
पूछ लिया यमदूत ने,लाया क्या आधार?

लाया क्या आधार,बोल दे तेरा नम्बर।
अगर नहीं आधार,नहीं जाएगा अंदर।

'ललित'

28.9.17
मृदुगति छंद
भजन-गीत आगे बढाया

हे मनमोहना....!

वो प्यार का तराना,इक बार गुनगुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

हर-पल गुजर रहा है,बस इंतजार में ही।
ये दिल धड़क रहा है,बस ऐतबार में ही।

तुम ऐतबार को ही,इक बार यूँ भुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

क्या-क्या नहीं किया है,पाने झलक तुम्हारी?
इस ओर पर न उठती,प्यारी पलक तुम्हारी।

दीदार का तुम्हारे,दे मुझ को झुन-झुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

हे! श्याम दिल तुम्हारा,है प्यार का समन्दर।
दो बूँद प्यार की दो,निष्काम प्रीत मंतर।

बस प्यास को मिलन की,कर श्याम दोगुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

ललित

मृदुगति छंद

इक आस के सहारे,दुख-दर्द गम सहे थे।
बेदर्द जिन्दगी के,जुल्मो सितम सहे थे।

बेटा चला गया है,उल्टी किताब पढ़कर।
अब तात रो रहा है,उसके हिसाब पढ़कर।

क्या बात हो गई है,कुछ भी समझ न आए?
वो सुत चला गया क्यों,अब तात गुन न पाए?

ये चाल जिन्दगी की,शतरंज की बिसातें।
अब वृद्ध है अकेला,दिन कट रहे न रातें।

'ललित'

मृदुगति
छोटी रचना बड़ा संदेश

बारात थी रँगीली,औ' था जुलूस न्यारा।
बिंदास नाचने का,अंदाज खूब प्यारा।

औ' ट्यूब लाइटों की,थी रोशनी वहाँ तक।
सिर पर उन्हें लिए थीं,कुछ लड़कियाँ जहाँ तक।

ललित
27.9.17

मृदुगति छंद

संसार कर्म शाला,कर कर्म कुछ निराले।
ये देह धर्म-शाला,तू आत्म ज्ञान पा ले।
रिश्ते न काम आएँ,नाते न साथ जाएँ।
कर मत फिजूल बातें,बातें न साथ जाएँ।

ललित

27.9.17
मृदुगति छंद
विचारणीय

जो आज जा रहा है,अर्थी-सवार होकर।
कल तक अकड़ रहा था, तहसीलदार हो कर।
तहसील औ' जिले सब,छूटे धरे धरा पर।
वो छोड़ जा रहा है,धन-धान्य से भरा घर।

संसार कर्म-शाला,कर कर्म कुछ निराले।
ये देह धर्म-शाला,पी धर्म के पियाले।
रिश्ते न काम आएँ,नाते न साथ जाएँ।
कर मत फिजूल बातें,बातें न साथ जाएँ।

'ललित'

27.9.17
मृदुगति छंद
विचारणीय

जो आज जा रहा है,अर्थी-सवार होकर।
कल तक अकड़ रहा था, तहसीलदार हो कर।
तहसील औ' जिले सब,छूटे धरे धरा पर।
वो छोड़ जा रहा है,धन-धान्य से भरा घर।

'ललित'

26.9.17
मृदुगति छंद

ये पायलें हमारी,हैं बेजुबान तब से।
तूने किया कन्हैया,मथुरा प्रवास जब से।

जाएँ कहाँ कन्हैया,हम गोपियाँ दिवानी?
कर प्रीत पागलों सी,बोझिल हुई जवानी।

तू है बड़ा सयाना,हम जान क्यूँ न पाए?
अब तू चला गया तो,ये जान क्यूँ न जाए?

रो-रो पुकारती हैं,दिन-रात जो वनों में।
क्या खोट थी कन्हैया,राधा व जोगनों में?

'ललित'

मृदुगति
यूँ ही एक विचार

क्यों जिन्दगी गुजारी,ले आस का सहारा?
आशा बनी निराशा,कैसे मिले किनारा?

पतवार ही लगाती,हर नाव को किनारे।
पतवार छोड़ दी क्यों,विश्वास के सहारे?

ललित

स

24.9.17
मृदुगति
1
है द्वार पर खड़ा इक,अद्भुत स्वरूप जोगी।अर्धोन्मिलित नयन वो ,संसार सेे वियोगी।

वो राख सब वदन पर,आया लपेट मैया।
वो सर्प-नाग तन पर,लाया लपेट मैया।

उलझी हुई जटाएँ,दिखता मशान वासी।
मृग-चर्म का वसन ज्यों,कैलाश का निवासी।

माँगे दरश यशोदा,वो बाल-कृष्ण का माँ।
खुद को कहे पुजारी,गोपाल-कृष्ण का माँ

विकराल रूप वाला,बाबा बड़ा भयंकर।
ऐसा न हो लला पर,कर जाय जादु-मंतर।

दे दान-दक्षिणा कुछ,कर दो विदा उसे तुम।
जो नजर लग गई तो,हो जायगी खुशी गुम।

ललित
क्रमशः
22.9.17
मृदुगति

गम को गले लगाना,अब रास आ गया है।
ये दर्द का फसाना,मन को लुभा गया है।
जो रोज छोड़ भागे,है वो खुशी पराई।
प्रभु राम से निकटता,दुख-दर्द ने कराई।

'ललित'
20.9.17
मृदुगति

क्यों  सौत को कन्हैया,हरदम अधर लगाए?
क्यूँ राधिका दिवानी,तुम को नजर न आए?
कान्हा अधीर कितनी,राधा बिना तुम्हारे?
क्यूँ तुम न जान पाए,राधा किसे पुकारे?

ललित

20.9.17
मृदुगति छंद

ये ध्यान क्या बला है,हम गोपियाँ न जानें?
पूजा विधान क्या है,व्रजवासियाँ न जानें?
उद्धव हमें बताओ,मनमोहना कहाँ है?
वो बाँसुरी बजैया,भव-मोचना कहाँ है?
ललित
क्रमशः

20.9.17
मृदुगति छंद
साँवरा

देखा कहीं किसी ने,क्या साँवरा मुरारी?
वंशी रहे बजाता,जो मोर मुकुट धारी।
हैं कमल-नैन चंचल,सुंदर मुखारविंदा।
उसकी शरारतों से,रहती बहार जिंदा।

खोजे गली-गली में,वो राधिका दिवानी।
पूछे कली-कली से,राधा बता निशानी।
नटखट न गोप कोई,उस श्याम के सरीखा।
पूछा भ्रमर-भ्रमर से,पर साँवरा न दीखा।

ललित

17.9.17
मनोरम
पहचान

आदमी हूँ या कि नम्बर।
सोचता हूँ देख अम्बर।
इक हसीं किरदार हूँ मैं।
नम्बरी आधार हूँ मैं।

देह माटी का खिलौना।
कागजी नम्बर सलोना।
भूल मैं नम्बर गया था।
ट्रेन के अंदर गया था।

खो गई पहचान मेरी।
कागजी वो जान मेरी।
एक टीटी पास आया।
ट्रेन से बाहर भगाया।

'ललित'

17.9.17
मनोरम

फूल जब पूरा खिला वो।
छोड़ माली को चला वो।
भूल बचपन को गया है।
आत्म निर्भर हो गया है।

बीज बोना खाद देना।
प्यार से फिर पाल लेना।
जान उसने भी लिया है।
फर्ज माली ने किया है।

सामने जीवन पड़ा है।
नेह परियों का बड़ा है।
अलविदा कह चल दिया वो।
बागबाँ का था जिया जो।

आज मुड़कर भी न देखे।
क्या यही थे कर्म लेखे?
हो गया माली रुआँसा।
भाग्य में आया न पाँसा।

ललित

16.9.17

मनोरम छंद
व्यथा और प्रार्थना

भाव की गंगा नहीं है।
हाय दिल चंगा नहीं है।
शब्द सब सोये पड़े हैं।
शाम के साये बड़े हैं।

कौन सा अब गीत गाएँ?
सुन जिसे सब गुनगुनाएँ।
कौन से सुर हैं निराले?
जो सभी का प्यार पालें।

दिल नहीं कुछ जान पाता।
शारदे माँ ज्ञान दाता।
आप ही हम को सँभालो।
लेखनी में जान डालो।

ललित
14.9.17
मुक्तक
हिंदी के आँसू

गुड मैनर वाला बच्चा जब,बंदर को मंकी बोले।
पापा मम्मी खुश हों जब वो,तुतला कर डंकी बोले।
हनी मनी बेबी चिंकी सब,नाम रखें हैं बच्चों के।
हिंदी आँसू छलकाती जब,'डैडी' वो चंकी बोले।

'ललित'

13.9.17
मनोरम

दिल किसी गम से न घिरता।
आँख से आँसू न गिरता।
तुम हमें यदि जान पाते।
प्यार को पहचान पाते।

जिंदगी का सार क्या है?
प्यार का उपहार क्या है?
काश ये दिल जान पाता
प्यार गम का दान दाता।

प्यार में भी क्यों छलावा।
नेह है या ये भुलावा।
हँस रहा हम पर जमाना
प्यार की फितरत न जाना।

ललित

मनोरम छंद
कुछ विचार यूँ ही

आँसुओं की मौन भाषा
दूर तक छाई निराशा।
क्या समझ आई किसी को
ढूँढती आँखें उसीको।

आँख सब कुछ बोल देती
राज दिल के खोल देती।
आँख की है कौन सुनता।
मौन नेता और जनता।

सब कहें अपनी कहानी।
रोटियाँ अपनी पकानी।
दर्द दिल में आह भरता
कौन दिल के घाव भरता।

घाव दिल का फूटता है
आँख आँसू टूटता है।
पर जमाना ढोंगियों का
गम न समझे रोगियों का।
ललित

मनोरम

कौन कैसे कब कहाँ ये
छोड़ जाएगा जहाँ ये।
सोचना है बेनतीजा।
हैं दुखी चाचा भतीजा।
ललित

मनोरम छंद
रायन विभीषिका से आहत मन को
शायद शब्द ही नहीं मिल रहे दुख प्रकट करने को......थ

क्या कहीं कुछ टूटता है?
हाथ से कुछ छूटता है?
क्या हवा कुछ है कसैली?
या महज ये है पहेली?

छाँव में भी धूप क्यूँ है?
प्रेम भी विद्रूप क्यूँ है?
रंग हर बेरंग क्यूँ है?
हर खुशी में जंग क्यूँ है?

आँख में आई नमी क्यों?
हर तरफ पसरी गमी क्यों?
शाम सा है क्यूँ सवेरा?
साँप के वश में सपेरा।

आज माता रो रही क्यूँ?
पुत्र-गम में खो रही क्यूँ?
नाग क्यूँ बसते चमन में?
विष भरा क्यूँ नाग फन में?

ललित

12.9.17
मनोरम

बाँसुरी का राग जैसा।
राधिका का नाच वैसा
छम छमा छम छम छमा छम।
दस दिशा गूँजे धमा धम।

है कन्हैया या गवैया।
बाँसुरी का वो बजैया।
कर्ण मधुरस से भरे वो।
स्वर्ग धरती पर धरे वो।
ललित

11.9.17
मनोरम

क्या हुआ जो है उदासी?
बात दुख देती जरा सी।
क्यूँ हृदय है आह भरता?
क्यूँ नयन से नीर झरता?

जब दुखों का दौर आता।
मित्र हर मुख मोड़ जाता।
तब दिलासा कौन देता?
कौन जो हर पीर लेता?

घेर लेती जब निराशा।
राम से ही एक आशा।
आत्म विश्वासी जनों का।
दूर दुख होता मनों का।

ललित

मनोरम
विवाहिता माडर्न

चाल है गजगामिनी सी।
आँख उसकी दामिनी सी।
पायलों को पैर तरसें
हाथ में चूड़ी न दरसें।

माथ पर बिन्दी न दीखे।
शर्म की चिन्दी न दीखे।
देखकर ऐसा नजारा
शर्म भी है बेसहारा।

ललित

11.9.17

मनोरम

ये सजा किस को दिला दी।
साधुओं को क्यों पिला दी?
सींखचों में बन्द क्यों हैं?
साधुओं में द्वंद क्यों है?

जो समाजों को चलाते
ज्ञान का दीपक जलाते।
क्यों वही निष्ठुर हुए हैं?
कुंद ज्यों झींगुर हुए हैं।

आततायी होगए क्यों?
आज साधू खो गए क्यों?
ईश को ढूँढे जमाना।
साधु की फितरत न जाना।

ललित

11.9.17
मनोरम
राशनों में प्यार पाया
प्यार क्या बस खार पाया?
भाषणों से क्या मिला है?
राशनों से घर चला है।

प्यार की मखमल पुरानी
टाट की कीमत न जानी।
प्रीत के ही मीत हैं सब।
रीत के मन मीत हैं कब?

क्यूँ समन्दर खार देता
प्यार किस पर वार देता।
प्यार का प्यासा समन्दर
गम लिए दिखता न अन्दर।

ललित

11.9.17

मनोरम छंद

संत का चोला हमारा
बेवकूफों का सहारा।
मूरखों की कब कमी है
आँख में जिनके नमी है।

प्यार से उसको निचोड़ा
जो गधा दिखता निगोड़ा।
एक दुनिया ही बसा ली
प्यार से पगड़ी कसा ली।

आज वो ही बादशा है
जो दिलों में जा बसा है।
ठीक औ' बेठीक क्या है
कायदे की लीक क्या है?

है जमीं प्यासी यहाँ पर।
और प्यासा है समन्दर।
प्यास जो इनकी बुझाता
वो जहाँ में है पुजाता।

ललित

10.9.17
कोशिशे गजल
2122 2122 2122 212
आ
नहीं

वो गजल कैसे लिखे जो जानता लिखना नहीं।
वो किसी को क्यूँ दिखे जो जानता दिखना नहीं।

खो गया है आज हर इक शख्श अपने आप में।
क्यूँ किसी का दिल रखे जो जानता रखना नहीं।

रात सपनों में समाई दिन गुजारा ख्वाब में।
टूटते ख्वाबों तुम्हें मैं चाहता चखना नहीं।

बात करते ख्वाब की वो तोड़ते जो ख्वाब हैं।
ख्वाब के दुश्मन तुम्हें मैं चाहता सहना नहीं।

क्रमशः

ललित

10.9.17
पीयूष वर्ष

जानकी श्री राम की अनुगामिनी।
कंटकों से कब डरी वह दामिनी।
जन्म लव-कुश को दिया वनवास में।
राम की यादें रही बस पास में।

'ललित'

9.9.17
पीयूष वर्ष

जिंदगी से क्या मिला है सोचिए?
बंदगी का क्या सिला है सोचिए?
जिंदगी में बंदगी कर लीजिए।
नाव भव से पार यूँ कर लीजिए।

ललित

8.9/17
पीयूष वर्ष
पहला प्रयास
समीक्षाहेतु

आदमी से आदमी की लूट में।
सत्य लिपटा फिर रहा है झूठ में।
औ' रहीमो-राम के ही वेश में।
ठग-लुटेरे हैं बसे इस देश में।

पीयूष वर्ष

प्यार में ही जिंदगी का सार है।
प्रीत से ही जिंदगी रसदार है।
जिंदगी प्यारे रसों की खान है।
आदमी बिन प्रेम के बेजान है।

जान की बाजी लगा दे प्रेम में।
आदमी क्यों कर दगा दे प्रेम में?
प्यार तो बस ईश का उपहार है।
हाय धन बिन प्यार भी दुश्वार है।

ललित

सार छंद

बसे राधिका के नैनों में,कान्हा बनकर कजरा ।
और कभी मन में हर्षाए,बनकर उसका गजरा।
कजरा गजरा पायल वेणी,झुमका और नथनिया।
सब कान्हा के दास बनें जब,राधा बने नचनिया।

ललित

6.9.17
पीयूष वर्ष

फूल करते प्यार का इजहार हैं।
कंटकों के भी दिलों में प्यार है।
प्रीत करना कंटकों का काम है।
फूल तो इजहार का इक नाम है।

ललित

6.9.17
पीयूष वर्ष

नैन कान्हा से जहाँ जिनके मिले।
मिट गए उनके दिलों के सब गिले।
श्याम की मीठी नजर जादू भरी।
राधिका की नींद रातों की हरी।
ललित

जिन्दगी
5.9.17
पीयूष वर्ष

प्यार की दीवानगी भी देख ली।
साधुओं की बानगी भी देखली।
देखना अब और क्या बाकी रहा?
साधुओं की नात में साकी रहा।

ललित
5.9.17
पीयूष वर्ष

क्यूँ नहीं मन ये कभी वश में रहे?
कामिनी के प्यार के गश में रहे।
संत, बाबा और सारे देवता।
अप्सराओं से सदा खाते खता।

5.9.17
पीयूष वर्ष

क्या चमकती बिजलियाँ कुछ दे सकीं?
या खनकती चूड़ियाँ कुछ दे सकीं?
आदमी की ये रही दुश्मन सदा।
कौन बच पाया कहर से याखुदा?

ललित

5.9.17
पीयूष वर्ष छंद
गुरू वन्दन

शिक्षकों से ज्ञान जो हमको मिला।
जिन्दगी है ये उसी का तो सिला।
तार देते हैं गुरू मझधार से।
ताड़ देते हैं बड़े ही प्यार से।

है गुरू औ' शिष्य का रिश्ता सरल।
घुल नहीं सकता कभी इसमें गरल।
हर गुरू को आज मैं करता नमन।
जब गुरू आशीष दें महके चमन।

'ललित'

पीयूष वर्ष

जिन्दगी से जो मिला कुछ कम नहीं।
हाथ खाली ही रहे कुछ गम नहीं।
या खुदा गम बेरहम उतना हुआ।
बागबाँ निश्चल निडर जितना हुआ।

'ललित'

4.9.17
पीयूष वर्ष छंद
2
समीक्षा हेतु

राधिका की प्रीत ऐसी श्याम से।
बावरी सी घूमती है शाम से।
पूछती है श्याम का सबसे पता।
बाग उपवन वृक्ष हो या हो लता।
ललित

4.9.17
पीयूष वर्ष
प्रथम प्रयास
समीक्षा हेतु

राधिका का श्याम सुंदर साँवरा।
भोर में वंशी बजाए बावरा।

गोपियाँ सब छोड़ घर के काम को।
भागती हैं देखने घन श्याम को।
ललित

3.9.17
ताटंक
करुण रस

नाम गुरू का जपते थे जो, ईश गुरू को माने थे। उन शिष्यों ने गुरु के गहरे,राज कहां कब जाने थे।
राज खुले जब दानव जैसे,गुरू के कारनामों के। शिष्यों के सिर झुके हुए थे,गुरू थे दास दामों के।

'ललित'

3.9.17

ताटंक छंद
करुण रस
राजस्थान की सत्य घटना पर आधारित

महिला गर्भवती थी लेटी,शल्य क्रिया करवाने को।
कली कोख में पनप चुकी जो,उसको जग में लाने को।
पेट चीर उसका दो डॉक्टर,आपस में झगड़े ऐसे।
मानवता की लाश वहाँ हो,टेबल पर सोई जैसे।

आधा घंटा बीत गया यूँ,लड़ते-लड़ते दोनों को।
शर्म नहीं आयी उन पापी,कुत्तों बहुत घिनौनों को।
जन्म नहीं ले पाई बेटी,दुनिया देख नहीं पाई।
माता अपनी उस बेटी को,जीवित देख नहीं पाई।
ललित

3.9.17
ताटंक छंद
करुण रस
पिछले दिनों कोटा की एक सत्य घटना पर आधारित एक वृद्ध ने आत्म हत्या की रेल से कटकर
...................
एक वृद्ध बाबा सज्जन था,उम्र पिचासी से ज्यादा।
बेटे और बहू ने डाली,जीवन में इतनी बाधा।

कटा रेल के नीचे जाकर,इक दिन घोर निराशा में।
लोग आत्महत्या कहते हैं,इसे लोक की भाषा में।

आस लिए जिसको पाला वह,बेटा हुआ पराया क्यों?
बेटा जनने को माता ने,नीलकण्ठ को ध्याया क्यों?

सोच-सोच दुख इतना होता,क्यूँ नर पशु बन जाता है।
मात-पिता के जीवन में यह,दारुण दुख क्यूँ आता है।

'ललित'

2.9.17
ताटंक

सत्य यही हमने जाना जब, घूम लिए दुनिया सारी।

धरा नहीं है सुंदर कोई,भारत सी जग में न्यारी।

बीस कोस पर बोली बदले,तीस कोस बदले भाषा।

प्रेम-प्यार से रहते हैं सब, उन्नति की मन में आशा।

ललित

02.09.17
ताटंक छंद
ईद दिवाली होली हो या,विजयादशमी का मेला।
क्रिसमस गुड फ्राईडे हो या,कावड़ियों का  हो रेला।
मिल-जुल हर त्यौहार मना लो,छोड़ कपट-छल की छाया।
धर्म अलग हैं लेकिन सारी,एक ईश की है माया।

'ललित'

01.09.17
ताटंक छंद
2

चाँद चाँदनी इक दूजे से,दूर कहाँ रह पाते हैं?
इक दूजे की साँसों में वो,अमृत बन घुल जाते हैं।
पर दुनिया वालों ने उनका,प्यार कहाँ कब है माना?
कहें चँदनिया को दीवानी,और चाँद को दीवाना।

ललित

01.09.17
ताटंक छंद
(1)
क्यूँ होता है अक्सर ऐसा,माँ छुप-छुप कर रोती है?
बेटा नजरें फेर रहा क्यूँ,सोच दुखी वो होती है।
माँ के अरमानों का सूरज,दिन में क्यूँ ढल जाता है?
एक अँधेरे कोने में फिर,बिस्तर क्यूँ डल जाता है?
(2)
फर्ज पिता का याद रहा पर,फर्ज पुत्र का छोड़ा क्यों?
बेटे को तो गले लगाया,मुख पापा से मोड़ा क्यों?
प्यार दिया पत्नी को पूरा,दिल माता का तोड़ा क्यों?
सोच जरा वो पापा तेरा,सारा जीवन दौड़ा क्यों?
'ललित'

अगस्त 17

30.8.17
ताटंक

निगुरा मानव मोक्ष न पाए,धर्मग्रंथ बतलाते हैं।
सद्गुरु ही तो नर-नारी को,मोक्ष-मार्ग दिखलाते हैं।
आत्म-शांति पाने को मानव,संतों के दर जाता है।
संत कलयुगी चमत्कार कर,मानव को फुसलाता है।

ललित

30.8.17

ताटंक आधारित मुक्तक

कपट और छल छिद्र भरे जो,इंसाँ गुरु कहलाते थे।
खुद गहरे दल-दल में धँस कर,शिष्यों को नहलाते थे।
शिष्य जिन्हें पूजा करते थे,ख्वाबों और खयालों में।
खुद वो पूजा के फूलों से,जुल्फों को सहलाते थे।
'ललित'

29.8.17
आल्हा छंद
रास लीला
भाग 2

पलक नहीं झपके राधा की,कान्हा है ऐसा चितचोर।
बिन बोले सब कुछ कह देता,साँवरिया वो नंदकिशोर।
झूम-झूम कर बरसें बदरा,झूम-झूम कर नाचें गोप।
राधा की सौतन होने का,वंशी पर लगता आरोप।

वंशी की धुन सुन-सुन डोलें,व्रज रज औ' यमुना की धार।
थिर-थिर-थिर-थिर थिरक रहे हैं,कृष्ण-राधिका के गल-हार।
घुँघरू बजें पायलों के ज्यों,शब्द-ब्रम्ह का हों अवतार।
पहुँच रही धुन रुन-झुन-रुन-झुन,यमुना की लहरों के पार।

भरे बाँसुरी हौले हौले,कर्णों में मधु-रस की धार।
गोप-गोपियाँ सारे बोलें,जय-जय-जय-जय कृष्ण मुरार।
दर्शन करने को लालायित,सूर्य उदित हो करे प्रणाम।
धन्य-धन्य हैं कृष्ण-राधिका,धन्य गोपियाँ औ' व्रजधाम।
ललित

27.8.17
आल्हा
2

राम कृष्ण नारायण शिव को,भूल धियाया बाबा खास।
खीज उतारें अब दुनिया पर,होता है जग में उपहास।
अरे बंधुओं भगवद्गीता,को लो अपना गुरू बनाय।
ध्यान करो उस नारायण का,घर में लो मंदिर बनवाय।
'ललित'

27.8.17
आल्हा
रास लीला
3
नंदन-वन में राह निहारे,मुरलीधर राधा का दास।
कर सुंदर श्रृंगार राधिका,आई है कान्हा के पास।
कृष्णप्रिया राधा सुकुमारी,चपल नैन हिरणी सी चाल।
वंशी वादक कृष्ण मुरारी, मुरली सुन राधा बेहाल।

रूप निरखकर हुआ अचम्भित,मुरली को दी ऐसी तान।
वंशी की धुन में यूँ खोई,रहा नहीं जग का कुछ भान।
गोप-गोपियां ताल बजाएं, मटकें ज्यों कान्हा के नैन।
उगते ही चंदा छुप जाए, कितनी छोटी है ये रैन।
।
बदल-बदल कर रूप कन्हैया,नाचे हर गोपी के साथ।
चाहेे गोपी हाथ पकड़ना,मगर न आए कान्हा हाथ।
इक पल दिखे बजाता मुरली,दूजे पल वो करता
रास।
इक पल दिखे बगल में कान्हा,दूजे पल राधा के पास।

ललित
26.8.17
आल्हा
4
सावन की रिम-झिम बौछारें,छतरी में सजनी थी साथ।
और सजनवा भी मतवाला,दबा रहा हाथों से हाथ।
उलझ गईं कुछ चंचल बूँदें,सजनी के केशों के बीच।
टिम-टिम तारे चमक रहे ज्यों,बदरा के रेशों के बीच।
ललित

26.8.17
आल्हा

तीव्र लालसा लिए मिलन की,मन में सुंदर स्वप्न हजार।
दूल्हा राजा जा ही पहुँचा,इक दिन तो सजनी के द्वार।
दुल्हन बोली दूल्हे राजा,कार लक्जरी लाओ साथ।
तभी देखना ख्वाब सुनहरे,और पकड़ना मेरा हाथ।
ललित

26.8.17
आल्हा छंद

रूप-माधुरी निखरी-निखरी,भरे गुलाबी डोरे नैन।
कुछ इठलाती कुछ बल खाती,बोल गई वो मीठे बैन।
मुख देखा मैंने शीशे में,लगा सोचने फिर ये बात।
निश्छल प्रेम प्रकट करती थी,या करती थी कोई घात।
'ललित'

26.8.17
आल्हा छंद

नंदन-वन में राह निहारे,मुरलीधर राधा का दास।
कर सुंदर श्रृंगार राधिका,आई है कान्हा के पास।
रूप निरखकर हुआ अचम्भित,मुरली को दी ऐसी तान।
वंशी की धुन में यूँ खोई,रहा नहीं जग का कुछ भान।

'ललित'

26.8.17
ताटंक मुक्तक 16:14

कान्हा के दर्शन को तरसे,बरसाने की वो राधा।
बन्द नैन से दर्शन होते,खुले नैन डालें बाधा।
कान्हा के चिन्तन में राधा,रहती हर पल यूँ डूबी।
साँसे चलें न दिल ही धड़के,वदन रह गया है आधा।
'ललित'

23 8 17
मुक्तक

बांसुरिया की मधुर तान पर,नैना क्यों मटकाता है?
बहियाँ पकड़ मरोड़ी मेरी,उँगली क्यों चटकाता है?
मटकी फोड़ चुका ओ कान्हा,अब क्यों कंकर तू मारे?
मोर मुकुट सिर पर सोहे क्यों,लट मुख पर लटकाता है?

'ललित'

22 817
आल्हा छंद रचना

गया शहर में शिक्षा पाने,माता का बालक सुकुमार।
सीख न पाया मात-पिता से,वो कोई आचार-विचार।
और उच्च शिक्षा पाने वो,चला गया इकदिन परदेश।
मिले नये परदेशी साथी,भूल गया अपना परिवेश।

अंग्रेजी में गिट-पिट बोले,माता को बोले अब मोम।
और पिता बेचारे को तो,'डेड' बोलता है अब ओम।
हाय बुढापे की लाठी तो,भूल गयी अब वो दो हाथ।
जिन हाथों ने पाला पोसा,और दिया था हरदम साथ।
'ललित'

22 817
आल्हा छंद रचना

गुरू मिले सौभाग्य हमारा,गुरू कृपा से हो कल्याण।
गुरु मूरत की किरपा से ही,एकलव्य सीखा संधान।
अंधकार से ले जाते हैं,वो नित-नव प्रकाश की ओर।
गुरू-शिष्य का पावन-रिश्ता,कभी न हो सकता
कमजोर।

'ललित'

22 817
आल्हा छंद रचना

सुंदर फूल खिलें बगिया में,लिए लबों पर नव मुस्कान।
चहुँ दिशि सौरभ फैला कर वो,देते हैं सबको ये ज्ञान।
सदा रहो जग में मुस्काते,चाहे कंटक चुभें हजार।
खुद के गम को भूल सभी में, बाँटो खुशियाँ अपरम्पार।

'ललित'
दिनांक 21 8 17
आल्हा छंद रचना

चिंतन कब कैसे ले लेता,है भारी चिंता का रूप?
नर के मन को छाया में भी, क्यों छूती चिंता की धूप?
मानव मन पर भय अनदेखा,क्यों फैलाता अपना जाल?
प्राणी को पटकी दे दे क्यों,हँसता रहता काल -कराल?
ललित

दिनांक 21 8 17
आल्हा छंद

कान्हा सुन लो अर्जी मेरी,एक बार तो दे दो ध्यान।
राधा राधा नाम जपूँ मैं,रहता कोटा राजस्थान।
सब कहते हैं राधा जी के, पीछे पीछे चलते श्याम।
आ जाओ फिर घर में मेरे,संग राधिका के अविराम।
'ललित'

21.8.17
आल्हा छंद रचना
कैसे कैसे व्यवधानों से,होना पड़ता है दो चार।
जीवन नैया ऐसी डोले,पार न कर पाए पतवार।
पतवारों से नाव चलाना,मुझको सिखला दो भगवान।
भवसागर तरने की राहें,मुझको दिखला दो भगवान।
ललित

21.8.17
आल्हा छंद रचना

प्रातकाल ले लेते हैं जो,राम-राम अति पावन नाम।
उन के दुखड़े हर लेते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम राम।
दीनबंधु दुखहर्ता उसको, सुख-वैभव देते हैं खूब।
राम नाम सुमिरन में जिसका,मन पूरा जाता है डूब।
ललित

21.8.17
आल्हा छंद रचना

छप्पन इंची सीने का तो,हरदम करते रहे बखान। सीने से बाहर निकलो जी,सीमा पर आया तूफान।
बड़ा ढीठ है दुश्मन अपना , नहीं बदल सकता जो चाल।
छलनी कर दो सीना उसका , जो बनता दुश्मन की ढाल।

'ललित'

20.8.17

नेता जी की टेढ़ी चाल

19.8.17
मनहरण
सुविचार

दुखी है सारा जहान
सुखी एक भगवान
सुख की किरण एक
बच्चों को दिखाइए।

पूजा करना न आए
ध्यान करना न भाए।
गीता और रामायण
पढ़ना सिखाइए।

भूल गए संसकार
करें रूखा व्यवहार।
राम-नाम बार-बार
उनसे लिखाइए।

खाएँ पीजा बरगर
रोकना चाहो अगर।
होटलों में भोज रोज
आप भी न खाइए।

'ललित'

19.8.17
मनहरण

कैसे कह दूँ ये हाल
जीना है हुआ मुहाल।
मैके चली गई बीवी
निंदिया न आय है।

रोटी कैसे बने गोल
चकला जहाँ चौकोर।
गैस भी तो कह गई
मुझे बाय-बाय है।

आलू प्याज और दाल
कैसे देते हैं बघार।
बिना सब्जियों के रोटी
कैसे खाई जाय है।

कॉफी कड़वी हो जाए
चाय न बनानी आए।
दे दो कोई सही राय
अब क्या उपाय है।

'ललित'

19.8.17
मनहरण
मोह का ये माया जाल
काल से भी है कराल।
काटना जो चाहे इसे
मानव है हारता।

लोभ की नदी विशाल
चले ऐसी टेढी चाल।
इसमें जो डूबा उसे
कोई नहीं तारता।

कामदेव की कमाल
मोहक वो सुरताल।
सुनने लगे जो उसे
पटकी दे मारता।

क्रोध आए चुपचाप
बिना किए पदचाप।
मूरख मानव इसे
नाक पर धारता।

ललित

17.8.17

मनहरण

छोड़ सारे काम काज
लिखो सभी छंद आज
मन की व्यथा को जरा
प्रकट भी कीजिए।

देख गुरु आए 'राज'
सभी दौड़े आए आज
पटल को अब जरा
रंग भी दे दीजिए।

बिछुड़े मिले हैं आज
कई महीनों के बाद
बिखरे भावों को जरा
बाँध भी तो लीजिए।

हवा महँगी है आज
बच्चे हुए मोहताज
मौन बैठे योगीराज
कुछ तो पसीजिए।

ललित

मनहरण

कान्हा के हजार नाम
सबसे है प्यारा श्याम।
मुरली मनोहर का
ध्यान कर लीजिए।

राधा को है प्यारा श्याम
और प्यारा व्रजधाम।
राधा जी के नाम पर
कान धर लीजिए।

मुरली मधुर सुन
राधा नाचे रुन-झुन।
राधा नाम सुरमे से
नैन भर लीजिए।

सुमिरन आठों याम
चलता रहे निष्काम ।
कान्हा जी से हो सके
तो ऐसा वर लीजिए।

ललित

15.8.17
मुक्तक लावणी

क्यों तू हर गोपी के दिल में ,आस जगा कर चला गया।
क्यों तू राधा के नैनो में ,प्यास जगा कर चला गया।
नंदनवन का पत्ता पत्ता ,कृष्ण कृष्ण क्यों है  जपता।
क्यों तू ब्रज के कण-कण में यूं ,रास जगा कर चला गया।
'ललित'
15.8.17

मन हरण घनाक्षरी

बिरज का कण-कण
रास करे क्षण-क्षण।
साँवरा सलोना कान्हा
बाँसुरी बजा रहा।

यमुना की कल-कल
बढ़ रही पल-पल।
गोपियों का प्यारा कान्हा
वेणियाँ सजा रहा।

बाँसुरी की धुन सुन
चाँदनी हुई मगन।
रास का रचैया कान्हा
चाँद को लजा रहा।

पायलों की छम-छम
बढ़ रही छन-छन।
गोपी संग नाच कान्हा
राधा को खिजा रहा।

'ललित'

14.8.17

मुक्तक 14:12

आवाज ही गुम होगई,हर आदमी खामोश है।
काला धुआँ छाया हुआ,वो आसमाँ निर्दोष है।
बागबाँ खुद ही चमन का,
आज दुश्मन होगया है।
सिमटी सभी हरियालियाँ,
परजीवियों में जोश है।

ललित

11.8.17
मुक्तक 16:14
कुछ अपनों ने कुछ सपनों ने,सिखा दिया हमको जीना।
कुछ रिश्तों ने कुछ नातों ने,सिखा दिया आँसू पीना।
अपने-सपने-रिश्ते-नाते,अब सब हैं लगते फीके।
हमने भी इन सबके ऊपर,डाल दिया पर्दा झीना।

'ललित'

्10.8.17
मुक्तक 16;12

जीवन के कुछ रंग सुनहरे,रोज बिखर हैं जाते।
और सुनहरे रंगों पर कुछ,मानव हैं इतराते।
कैसी केसी चालें चलते,रंगीं दुनिया वाले।
रंगों से ही तोलें हरदम,सारे रिश्ते नाते।
'ललित'

9.8.17
मुक्तक
पुण्य किए क्या मोरपंख ने,जिसको सिर पर धार लिया?
उसकी मटकी फोड़ी जिसने,तप था वर्ष हजार किया।
क्या वो कान्हा माखन के इक,लौंदे का ही था भूखा?
या उसने माखन चोरी कर,निज-भक्तों को तार दिया?

9.8.17
मुक्तक

बहार ही बहार की,नकाब ओढ़ते रहे।
कभी फिजाँ दिखी नहीं,सितम कभी नहीं सहे।
न प्यार मिल सका कभी,न प्यार खुद ही कर सके।
खुदा बने रहे खुदी,न बोल प्यार के कहे।

ललित

9.8.17
कुकुभ आधारित मुक्तक

चरण बाद में छुए धरा के,पायल पहले बज जाए।
भोर भये मुरली सुनने को,राधा रानी जब आए।
बाँसुरिया की न्यारी धुन सुन,शरमा जाते सुर सातों।
बदरा भूलें जल बरसाना,जब वंशी रस बरसाए।

'ललित'
8.8.17

सरसी छंद

हाथों की रेखाएँ बदलें,चाल समय के साथ।
इतराता मानव फिर खाता,मार समय के हाथ।
मार समय के हाथों खाकर,सीधी होती चाल।
सीधा चलने से भी लेकिन,गले न उसकी दाल।
ललित

8.8.17

सरसी छंद

हो जाएगी कब अनहोनी,मानव जान न पाय।
तोड़ कर नाता पिंजरे से, पंछी कब उड़ जाय।
गिनती की साँसों की संख्या,गिन पाता है कौन?
अच्छा भला बोलता मानव,हो जाता हे मौन।

ललित
[08/08/17
सरसी छंद

मौन हुए मानव का मन भी,कब रह पाया मौन?
मन की हर उलझी गुत्थी को,सुलझा पाया कौन?
जितनी चाबी भरकर भेजे,मानव को भगवान।
उतनी ही साँसें ले पाए,
धरती पर इंसान।
ललित
[08/08/17
सरसी छंद

इंसानों की इस दुनिया की,बड़ी निराली रीत।
उसके ही गुण दिखते जिसकी,साँसें जाती बीत।
साँस-साँस में प्राण बसा है,मानव जान न पाय।
साँस-साँस में नाम जपे जो,वो ही संत कहाय।
ललित

[08/08/17
सरसी छंद

संतों की वाणी पर मानव,करता है विश्वास।
लेकिन ऐसी बातें मन को,
कब आती हैं रास?
रास करे मानव का मन तो,कामदेव के साथ।
अंत समय मानव मलता ही,रह जाता है हाथ।

ललित

8.8.17

सरसी छंद

हाथों की रेखाएँ बदलें,चाल समय के साथ।
इतराता मानव फिर खाता,मार समय के हाथ।
मार समय के हाथों खाकर,सीधी होती चाल।
सीधा चलने से भी लेकिन,गले न उसकी दाल।
ललित

6.8.17
सरसी छंद

मिला मित्र ऐसा हमको जो,गुरुवर 'राज' कहाय।
नये-नये छंदों की निर्मल,सरिता रोज बहाय।
स्नेह पूर्ण व्यवहार समादर,आनन्दित कर देत।
निश्छल औ' निस्वार्थ भाव से,सेवा कर हँस लेत।
ललित
काव्यसृजन परिवार
5-8-17

सरसी छंद

करदो ऐसी किरपा कान्हा,मन संतोष समाय।
राधा-राधा जाप करूँ मैं,मन में काम न आय।
सब कहते हैं राधा जी के,पीछे चलते श्याम।
राधा-राधा नाम जपूँ तो,आ जाना अविराम।
'ललित'
5.8.17
सरसी छंद नये कलेवर में
शिव प्रार्थना

केवल इतनी अरज करूँ मैं,शिव हे!भोला नाथ।
कृपा दृष्टि मुझ पर रखना तुम,नित-नित जोड़ूँ हाथ।
नित-नित जोड़ूँ हाथ सदाशिव,रखना मेरी लाज।
जैसी मरजी होय तुम्हारी,वैसा करना काज।

वैसा करना काज त्रिनेत्री,राह मुझे दिखलाय।
खोले मन की आँखें मेरी,जीना भी सिखलाय।
जीना भी सिखलाय बबम बम,भव बाधा हो दूर।
बड़ी तुम्हारी दया दृष्टि है,किरपा है भरपूर।

'ललित'

5.8.17
सरसी छंद

केशव माधव मुरलीधर हे!मनमोहन  घनश्याम।
मन मन्दिर में बसों करूँ मैं,दर्शन आठों याम।
बस इतना वरदान मुझे दो,भगवन कृपानिधान।
निशि-दिन मन ही मन मैं गाऊँ,मधुर नाम का गान।

हिलती-डुलती जीवन नैया,करती है मनुहार।
वंशीधर हे! नाग नचैया,आप बनो पतवार।
मति कुछ ऐसी मुझको दे दो,करूँ तुम्हारा ध्यान।
ईश लगन मन में यूँ जागे,हो जाए कल्याण।

ललित
4.8.17

जन्म दिवस की देत बधाई,काव्य सृजन परिवार।
यश का यश चहुँ दिशि यूँ फैले,होवे जग उजियार।

2.8.17
सरसी छंद

छोटी पायल छोटे पैयाँ,छुटका नंदकिशोर।
छम-छम-छम-छम बाजे पायल,मैया भाव-विभोर।
छोटी मुरली छोटा कंबल,छुटका सुंदर श्याम।
दर्शन करने आया बाबा,शिव-भोला व्रजधाम।

नाग गले शशि शीश विराजे,गात भभूत रमाय।
सुन डमरू की डम-डम-डम-डम,मात रही घबराय।
नजर उतारेंगें लल्ला की,करके मैया धूप।
एक बार दिखला दे मैया,हरि का बाल-स्वरूप।

'ललित'

1.8.17
सरसी छंद

रोज-रोज थी चख-चख होती,रोज-रोज तकरार।
कौए जी जब इक कोयल से,कर बैठे थे प्यार।
काँव-काँव से कौए की थी,कोयल जाती काँप।
सच्ची प्रीत नहीं कर सकते,कभी नेवला साँप।
ललित

1.8.17
सरसी छंद

कैसा प्यारा वो पागल-पन,कैसी होती प्रीत।
जीवन बीत गया लेकिन तुम,जान न पाए मीत।
साजन की सजनी से बाँधे,कितनी प्यारी डोर।
संध्या उलझे तो सुलझाते,हो जाती है भोर।

ललित
1.8.17
सरसी छंद

कभी बजाऐ मुरली मोहन,कभी खड़ा मुस्काय।
कभी निहारे राधा का मुख,कभी नैन मटकाय।
कभी राह मेंं राधा की वो,बहियाँ देता  मोड़।
कभी राधिका की कंकर से,मटकी देता फोड़।

'ललित'

1.8.17

सरसी छंद

अब आगए सुरताल में सब,काव्य सृजन के वीर।
सुंदर रचनाएँ लिख दो सब,सुनो कलम की पीर।
'राज' जैसे गुरू का पावन,पाया है जब साथ।
क्यों बैठे हो मित्रों फिर तुम,रखे हाथ पर हाथ।

ललित

1.8.17
सरसी छंद

सावन झूमे पात-पात में,कली-कली मुस्काय।
बदरा झूमें गाँव-गाँव में,हृदय कली खिल जाय।
बिजुरी चमके राधा चिहुँके,कान्हा करे ठिठोर।
बुँदियाँ बरसें मनवा हरषे,हुई चंचला भोर।

'ललित'

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