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अगस्त 2026 की रचनाएँ

पीयूष वर्ष छंद
वृद्धावस्था
गीत

हाथ पैरों में ज़रा भी दम नहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

दाँत हिल-हिल साथ छोड़े जा रहे।
स्वाद रसना को नये नित भा रहे।
दर्द घुटनों का न जाने दे कहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

याद में डीमेंशिया झूला हुआ।
नाम अब हर चीज का भूला हुआ।
मौन रह कर मुस्कुराना है यहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

साथ छोड़े जा रही अब चाम भी।
बेरहम कितनी हुई ये शाम भी ?
अश्रुओं की धार आँखों से बही।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

प्यार के दो बोल सुनने के लिए।
अब तरसते प्रीत के बुझते दिए।
उम्र ने रुसवाइयाँ सबकी सहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

ललित किशोर 'ललित'

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11.08.26

सिंधु छद

खिला था आसमां में चांँद जब पूरा।
तभी चुप चाँदनी ने चाँद को घूरा।
सितारों से बहुत तुम प्यार करते हो।
कि पूनम को अनोखा रूप धरते हो।

नहीं तुम देखते हो इक नजर मुझको।
धरा की ओर धकियाते मगर मुझको।
नहीं हैं याद तुमको वो पुराने दिन।
हमारे इश्क की रातें सुहाने दिन।

ललित किशोर 'ललित'
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14.08.26

मुक्तक

फूलों का गुलशन चाहा था,शूलों की दरकार न थी।
हँस न सकें जो कागज के उन,फूलों की दरकार न थी।
माना चाहत पूरी होना,मुश्किल होता है लेकिन।
सावन की रिमझिम चाही थी,झूलों की दरकार न थी।

ललित किशोर 'ललित'

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18.08.26

मधुमालती छंद

वो चाहते हैं चुप रहो।
हर ताप हर पीड़ा सहो।
वो राज करना चाहते।
सच से मुकरना चाहते।

क्यों दर्द बाहर आ रहा ?
क्यों गर्द बढ़ता जा रहा ?
क्यों उठ रही आवाज है ?
वो हुक्मराँ नाराज है।

इस दर्द को सहते रहो।
मत हुक्मराँ से कुछ कहो।
मत आसमाँ को तुम तको।
मत स्वप्न में भी सुख चखो।

जो थम गया वो जल नहीं।
जो झुक गया वो बल नहीं।
चलते रहो बढ़ते रहो।
नव स्वप्न नित गढ़ते रहो।

ललित किशोर 'ललित'

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19.08.26

मधुमालती छंद

जो भाव इस दिल में बहें।
हर बात वो किससे कहें ?

दिल की लगी किसको पता।
क्यों कौन सुन लेगा व्यथा ?
जो घाव इस दिल पर लगे।
इक दर्द सा उनमें जगे।
हैं अनगिनत ग़म की तहें।
हर बात वो किससे कहें ?

है राह जो उलझी हुई।
कैसे कहें सुलझी हुई ?
हर मोड़ पर ही धुंध है।
ये देख कर मति कुंद है।
मथती सदा दिल को रहें।
हर बात वो किससे कहें ?

ललित किशोर 'ललित'

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20.08.2026

मधु मालती छंद

इस ज़िंदगी ने क्या दिया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखने को जो मिला।
वो कर्म का ही है सिला।
जो हाथ खाली थे मिले।
अब रिक्त हैं तो क्या गिले?
इक स्वप्न सा जीवन जिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

जो कुछ मिला संसार से।
सब छूटता वो प्यार से।
कैसे रहें पकड़े उसे ?
खुद भाग्य ही छीने जिसे।
सारी उमर भटका किया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखना पीछे नहीं।
हैं मंजिलें आगे कहीं।
अब है सहारा आस का।
उस ईश में विश्वास का।
संकल्प का प्या़ला पिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

ललित किशोर 'ललित'

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22.08.2026
मुक्तक

सनातनी होने का दावा,करता था जो नर हरदम।
धर्म-सनातन की रक्षा का,जो रखता था हर दमखम।
आज वही खुद इक मंदिर में,बन भगवान
विराजा है।
चुप हैं सारे संत महात्मा,अंध-भक्त बोलें बम-बम।

ललित किशोर 'ललित'

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मुक्तक
1.

तुम तो जीना सीख न पाए,कहते हैं वो हम से।
खा लो पी लो मौज मना लो,दूर रहो हर ग़म से।
अब उनको हम क्या बतलाएँ,अपनी राम कहानी ?
हाँ बस इतना ही कह पाए,सीखेंगें अब तुमसे।

2.

मन ही मन हम सोच रहे थे,क्यूँ थे पापड़ बेले ?
क्यों जीवन-भर झंझावातों,तूफानों से खेले ?
मन मौजी थे हम भी लेकिन,पैसों की थी
तंगी।
कैसे मौज मनाते हम जब,पास नहीं थे धेले।

ललित किशोर 'ललित'

31.08.26

विष्णु पद छंद

अनसुलझी अनबूझ पहेली,मन का चैन हरे।
चिंतित मन को क्या समझाएं,कैसे धीर धरें ?
समझ-समझ कर ये समझा है,इस पागल मन ने।
बचैनी से रिश्ता जोड़ा,है घायल मन ने।

ललित किशोर'ललित'
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गीत
31.08.26
छंद सुमेरु
1222 122,2122

तुम्हारी राधिका रो,रो पुकारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

न जाओ श्याम व्रज से,छोड़ हमको।
नहीं क्या रास आया,रास तुमको ?
यशोदा नंद बाबा,के दुलारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे बिन रहेगा,मौन व्रज में।
करेगा रास कान्हा,कौन व्रज में ?
सखा संगी तजेंगें,काज सारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे दर्श ने दुख,दर्द टाले।
तुम्हारी बाँसुरी के,सुर निराले।
बजाएगा मुरलिया,कौन प्यारे ?
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

ललित किशोर 'ललित'

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वृद्धावस्था

सिंधु छंद
4
न जाने बागबाँ वो सुस्त सा क्यों है?
बुढ़ापे में दिखे वो पस्त सा क्यों है?
कि बोए बीज थे उसने सदा जैसे।
नहीं क्यों बाग में हैं फल हुए वैसे?

ललित

जुलाई 2018

जुलाई 2018

[01/07, 12:52 PM] ललित:
हरिपद

बेटी की शादी करने की,चिन्ता में है तात।
पर दहेज का दानव कब है,बनने देता बात?
खून-पसीना बहा कमाया,जीवन भर धन खूब।
दे दहेज फिर भी जाएगा,कर्जे में वो डूब।

ललित
[02/07, 3:23 PM] ललित:
बिहारी छंद

हे नाथ जरा हाथ रखो,माथ हमारे।
सब पाप तथा कष्ट हरो,नाथ हमारे।
दो नाथ मुझे आप सिखा,छंद बिहारी।
कर जोड़ खड़ा आज ललित,शरण तिहारी।

'ललित'
[02/07, 8:00 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

यूँ प्यार हुआ आज उसे,श्याम पिया से।

है चैन मिला और गया, काम जिया से।

मिल नैन गए प्यास बुझी,आज जिया की।

वृषभानु सुता आज हुई,श्याम पिया की।

ललित
[03/07, 7:09 AM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

वृषभानुसुता नाच रही,श्याम नचाए।

सब गोप-सखा गोपिन सँग,रास रचाए।

जो कृष्ण अधर छोड़ कहीं,और न जाती।

वो बाँसुरिया प्रेम-भरे,गीत सुनाती।

ललित
[03/07, 7:19 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

ओ श्याम न जा छोड़ हमें, गोप पुकारे।

वंशी न बजेगी व्रज में, हाय सखा रे।

वृषभानुसुता की अँखियाँ ,बरस रही हैं।

मनमोहन के दर्श बिना ,तरस रही हैं।

ललित
[04/07, 4:43 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

जो भेद सुदामा न कहे , श्याम समझ लें।

जो बात न बोले शबरी, राम समझ लें।

जो भेंट न माँगे प्रभु से,भक्त वही है।

भगवान दयावान बड़े ,सत्य यही है।

ललित
[04/07, 7:35 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

'आधार' बिना आज नहीं,काम चले है।

'आधार' रहे साथ तभी ,नाम चले है।

'आधार' बिना आज बजे,साज नहीं है।

पहचान बिना आज कहीं,राज नहीं है।

ललित
[05/07, 4:14 PM] ललित:
मुक्तक 16-14

कलियाँ सब सिकुड़ी-सिमटी हैं,पवन चली हाहाकारी।

कंटक चीर रहे कोमल-तन,सिसक रही अबला नारी।

खग भी उड़ने से डरते हैं,बाज झपटते हैं ऐसे।

कैसा भारत कैसी महिमा,कैसे ये  सत्ताधारी?

ललित
[06/07, 4:21 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

ओ कृष्ण कन्हैया सुन ले,अर्ज हमारी।
ये प्रीत पुकारें कर ले,दर्ज हमारी।
इक बार दिखा दे अपने ,दर्श कन्हैया।
शुभ दर्श बिना है लगती,पार न नैया।

ललित
[07/07, 5:34 AM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122

क्या भेंट करूँ मैं प्रभु ये,सोच न पाऊँ?

हे नाथ तुम्हारे चरणों,शीश नवाऊँ।

बस एक यही है मन में,चाव कन्हैया।

भव-सिंधु नहीं ये अटके,नाव कन्हैया।

ललित
[08/07, 11:31 AM] ललित:
दोहा छंद

गरल हवा में घुल गया,जल बाँधों में कैद।
भ्रमर वासना से भरे,इसमें क्या है भेद?

ललित
[08/07, 1:35 PM] ललित:
दोहे
किटि पार्टी

नारंगी चश्मा लगा,छतरी थामे हाथ।
किटि-पार्टी मैडम चली,सहेलियों के साथ।

शांति किसे भाए वहाँ,झगड़ पड़ीं दो नार।
कर्कश वाणी से करें,इक दूजे पर वार।

साड़ी सुंदर एक की,दूजी का गलहार।
और कुटिल मुस्कान से,तीजी करती वार।

मेजबान का घर बड़ा,महँगा सोफा सेट।
चौथी कोने में खड़ी,देख रही थी गेट।

पंचम झोले में लिए,हाऊजी का गेम।
षष्ठी बोली खेल के,नियम रहेंगें सेम।

सप्तम ने बाँटे टिकट,खड़ी आठवीं मौन।
प्लेटें चम्मच आगए,सर्व करेगा कौन?

ग्यारहवीं थी गाँव की,सीधी-सादी नार।
रजपूती पौशाक में,कर सोलह श्रृंगार।

बारहवीं मॉडर्न बड़ी,जींस-टॉप में हाय।
खड़ी-खड़ी बतिया रही,हाथों को मटकाय।

तेरह चौदह पंद्रवीं,बड़ी तेज तर्रार।
सोलहवीं चंचल सखी,मुस्काती सी नार।

कुछ मीठा कुछ चरपरा,खट्मिट्ठा कुछ भोज।
चटखारे ले खा गईं,सारी ओवरडोज।

कोई जीती गेम में ,रुपए सत्तर-साठ।
हारी कोई प्रेम से,रुपए साढ़े आठ।

अंत भला सो हो भला,हँसी-ठिठोली साथ।
वापस सब घर को चलीं,दिए हाथ में हाथ।

ललित
[08/07, 2:33 PM] ललित: दोहे
प्याज रोटी

प्याज और रोटी मिले,सब बच्चों को आज।
सोच यही घर से चला,करने को वह काज।

मजदूरी दिन-भर करी,बहा पसीना-खून।
लाया रोटी प्याज वो,लेकिन था घर सून।

पूछ पड़ोसी से लिया,कहाँ गए सब आज।
कहा पुलिस है ले गई,कुछ पूछन के काज।

दौड़ा-दौड़ा वह गया,थाने में कर-जोड़।
बोला थानेदार ने,कर ले कुछ गठ-जोड़।

बच्चे तेरे जेल में,सड़ जाएँगें देख।
ले आ तू कुछ नोट तो,बदलेंगें हम लेख।

क्या ला पाऊँगा कभी,इतने सारे नोट?
सोच रहा कानून में,कैसी है यह खोट।

ललित
[08/07, 5:20 PM] ललित:
दोहा प्रतियोगिता

क्रमांक - 1
कच्ची माटी से बनी,मन की हर दीवार।
इस ढँग से ढालो उसे,हो जाओ भव-पार।

क्रमांक - 2
मत सींचो मन में कभी,राग-द्वेष की पौध।
भव तरने की राह में,यही बड़ा अवरोध।

क्रमांक - 3
चाह नहीं सुंदर दिखे , माटी की यह देह।
मन मेरा सुंदर दिखे, रखूँ सभी से नेह।

क्रमांक -4
द्वेष नहीं मन में रखो,पिओ घूँट अपमान।
अमृत सम तो प्रीत है, द्वेष गरल सम जान।

क्रमांक - 5
सपने सुंदर देखते,जीवन बीता जाय।
अंत समय सच जान के,मुख से निकले हाय।

ललित किशोर 'ललित'
[09/07, 8:56 AM] ललित: छंद सिंधु
पहला प्रयास

कहीं कलियाँ बिखरती थी हवाओं में।
कहीं भाषण दिए जाते चुनाओं में।
कहीं थी लाडली अस्मत रही खोती।
कहीं थी चैनलों पर ही बहस होती।

ललित
[09/07, 1:21 PM] ललित:
छंद सिंधु

न कलियाँ मुस्कुरा सकती कभी खुलकर।
हवा में बह  रही जब वासना घुलकर।
न फूलों में बची खुशबू वहाँ कोई।
कि मानवता जहाँ मुख फेर कर सोई।

ललित

[09/07, 2:24 PM] ललित:
छंद सिंधु

अगर है प्रेम का सागर कहीं कोई।
कन्हैया सा कहीं प्यारा नहीं कोई।
कभी मुरली बजाता सात सुर वाली।
कभी माखन चुराता देख घर खाली।

कहीं वो नाग के फन पर चढ़ा नाचे।
कहीं वो गोपियों के सँग खड़ा नाचे।
मरोड़े राधिका की वो कभी बहियाँ।
सजाए वेणियों में वो कभी कलियाँ।

ककभी वो बाँटता माखन गरीबों में।
महल लिखता सुदामा के नसीबों में।
सुदामा से गले मिलता चरण धोता।
नहीं ऐसा कहीं राजा कभी होता।

ललित
[09/07, 8:42 PM] ललित:
छंद सिंधु

सुदामा नाम का था मित्र मोहन का।
रखे दिल में सदा जो चित्र मोहन का।
नहीं की कामना उसने कभी धन की।
सदा की वंदना उस मित्र मोहन की।

ललित
[09/07, 8:45 PM] ललित:
छंद सिंधु

चुभन उस दर्द की दिल से नहीं जाए।
दिया जो दर्द अपनों ने हमें हाए।
बड़ी बेदर्द टीसें दर्द की होतीं।
न सोने दर्द को देतीं न खुद सोतीं।

ललित
[10/07, 11:37 AM] ललित:
छंद सिंधु
1

हवाओं में घुली खुशबू बताती है।

कली अब फूल बनकर मुस्कुराती है।

खुशी से बागबाँ भी मुस्कुराया है।

धरा चहकी गगन ने सिर झुकाया है।

ललित
[10/07, 11:56 AM] ललित:
छंद सिंधु
2
कृपा कर श्याम यूँ अपनी निगाहों से।

न हों हम दूर अब तेरी पनाहों से।

हमें विश्वास है तू खुश अगर होगा।

खुशी से झूमता सारा नगर होगा।

ललित
[15/07, 8:57 PM] ललित: आज एक मित्र से मिलने गया जिसे कैंसर ने निचोड़ कर रख दिया है।
तभी उपजे ये विचार

छंद सिंधु

कहीं मजबूरियाँ पथ रोक देती हैं।

कहीं तनहाइयाँ यूँ घेर लेती हैं।

न होते पास रिश्ते खास होकर भी।

न हँस पाता जहाँ दिलदार जोकर भी।

ललित
[16/07, 7:40 AM] ललित: सुप्रभात
🙏🌸🙏

सगुण छंद

चलो आज ऐसा करें कुछ धमाल।

लिखें लेखनी से 'ललित' कुछ कमाल।

'सगुण' छंद में हो मधुर कृष्ण रास।

मधुर प्रेम हो काम आवे न पास।

ललित
[16/07, 12:45 PM] ललित:
सगुण छंद

हुई है हवा आज दिल की मरीज।

न दिल आदमी का रहा क्यों पसीज?

बहारें हुई हैं नजरबंद आज।

मगर आदमी आ रहा है न बाज।

ललित
[16/07, 5:10 PM] ललित:
सगुण छंद
3

कन्हैया अलौकिक मुरलिया बजाय।

हँसे मोरपंखी मुकुट को सजाय।

मुरलिया अधर चूमती बार-बार।

हरे राधिका के जिया का करार।

ललित

[17/07, 10:00 PM] ललित: सगुण छंद
कली खूबसूरत भ्रमर को लुभाय।
कहीं दूर जाना भ्रमर को न भाय।
कली से करे प्यार वो बेशुमार।
हँसे बागबाँ  और हँसती बहार।

ललित
[18/07, 11:24 AM] ललित:
सगुण छंद
1

प्रभो जी सुनो भक्त की ये पुकार।

करो ज्ञान-वर्षा हरो सब विकार।

न जानूँ न कर मैं सकूँ यज्ञ-ध्यान।

जपूँ नाम निश-दिन नहीं वेद-ज्ञान।

ललित
[18/07, 12:49 PM] ललित:
सगुण छंद
2

कली एक नाजुक करे ये पुकार।

कि माँ तू मुझे कोख में यूँ न मार।

जगत देखना चाहती मैं बखूब।

कि नैया भँवर में नहीं जाय डूब।

ललित
[18/07, 6:05 PM] ललित:
सगुण छंद
3

न हिंदू न मुस्लिम न सिख हैं महान।

सभी जातियाँ हिंद में हैं समान।

मगर राज-नेता करें भेदभाव।

न चाहें कभी जातियों का जुड़ाव।

ललित
[18/07, 7:53 PM] ललित:
सगुण छंद

न स्वामी न नेता न मंत्री महान।
चमत्कार को पूजता है जहान।
सभी स्वार्थ में आज अंधे हजूर।
अजी मुफ्त में चाहते ये खजूर।

ललित
[18/07, 10:42 PM] ललित:
सगुण छंद

न बदली धरा ये न ही आसमान।
बदल क्यों गया आदमी का जहान?
चले है अकड़ कर फटे वस्त्र धार।
फटी जींस में आज खुश होय नार।

ललित
[19/07, 11:34 AM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

बेटी

मैया मैं दुलारी तेरी,सुनले अरज मेरी।
जग में आने दे मुझे,कभी न सताऊँगी।

कलेजे का टुकड़ा हूँ,तेरा ही तो मुखड़ा हूँ
घर में आने दे मुझे,सदा मुसकाऊँगी।

तू जो मुख मोड़ लेगी,मेरा दम तोड़ देगी।
समझ न पाऊँ तुझे,कैसे भूल पाऊँगी।

तू भी जब आई होगी,तेरी कोई माई होगी।
जैसे पाल लिया तुझे,मैं भी पल जाऊँगी।

'ललित'
[19/07, 12:18 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

चाहो जो हरि का साथ
जोड़कर दोनों हाथ।
प्रभु चरणों में आप
शीश तो झुकाइए।

नित्य कर स्नान-ध्यान
सूरज को अर्घ्य-दान।
तुलसी के बिरवा में
जल तो चढ़ाइए।

रामायण पाठ कर
भगवद गीता पढ़
नैन बन्द कर आप
ध्यान तो लगाइए।

एक उस भगवान
को ही अपना तो मान।
प्रभु दर्शनों की आप
प्यास तो जगाइए।

ललित
[20/07, 6:29 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
3

रखे पाल मन में सदा ही विकार।

नहीं जिंदगी में रखे सद्विचार।

किए पुण्य के काम क्या हैं जनाब?

यही चाहता है विधाता जवाब?

ललित
[20/07, 7:11 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
4

करे रात-दिन राधिका ये विचार।

कि उस श्याम के सँग किया क्यूँ विहार?

दिखाता रहा स्वप्न में रंग सात।

खुली नींद तो ले गया रंग साथ।

ललित
[20/07, 7:53 PM] ललित:

भरी संसदों आँख मारे कुमार।
कि उतरा नहीं है अभी भी खुमार।
गले मिल लिए ले हृदय में विकार।
नज़र है कहीं औ' कहीं है शिकार।

ललित

🙏🌹🙏

सगुण छंद
122 122 122 121

जहाँ साँस की डोर ही टूट जाय।
अधिक एक भी साँस नर ले न पाय।
दबे पाँव उस दिन चली आय मौत।
वही ज़िंदगी की बड़ी एक सौत।
ललित

सगुण छंद
122 122 122 121

रखे जो सदा पाल मन में विकार।
कहाँ से मिलेंगें वहाँ सद विचार।
किए क्या कभी पुण्य तुमने जनाब?
कभी माँग ले जो विधाता जवाब।

ललित

सगुण छंद
122 122 122 121

करे रात-दिन राधिका ये विचार।
किया श्याम के सँग कभी क्यों विहार?
दिखाता रहा स्वप्न में रँग अनेक।
खुली आँख तो ले गया एक-एक।

ललित
[21/07, 7:44 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121

कली मखमली देख सावन-बहार।

पिया से मिलन को हुई बेकरार।

घटा बादलों की घिरी देख आज।

दिली धड़कनें खोलतीं प्रीत-राज।

ललित
[22/07, 2:07 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
1

न जाने खफा क्यों हुई है बहार?

कहाँ खो गया है दिलों का करार?

नहीं प्रेम दिखता दिलों में न प्रीत।

न माटी सुगंधित हवा में न गीत।

ललित
[23/07, 10:55 AM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
1

लिखोगे तभी छंद लेगा निखार।

नहीं तो चढ़ा ही रहेगा बुखार।

सभी शारदे से लगाओ गुहार।

तभी तो पटल पर दिखेगी बहार।

ललित
[23/07, 2:40 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121

2

बनी खूब दुश्मन दिवानी बहार।

लिए जा रहे आज डोली कहार।

सजन रो रहा मल रहा आज हाथ।

चँदनिया चली जा रही  चाँद साथ।

ललित
[23/07, 7:40 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
3

नहीं पाठ पूजा नहीं ज्ञान-ध्यान।

नहीं सोच ऊँची न आचार-ज्ञान।

न ममता हृदय में न लज्जा-विचार।

नई पौध देखो बड़ी होशियार।

ललित
[24/07, 12:07 PM] ललित:
राधिका छंद

दर्शन को तेरे श्याम,भक्त हैं आए।

भव से तरने की आस,संग हैं लाए।

तू मधुर-रास की श्याम,झलक दिखला दे।

ये भव तरने की कला,हमें सिखला दे।

ललित
[24/07, 2:23 PM] ललित:
राधिका छंद

माँ के मन को संतोष,दिला कर देखो।

उसके मन से तुम तार,मिला कर देखो।

माँ की ममता की छाँव,जहाँ है होती।

फिर फूलों की बरसात,वहाँ है होती।

ललित

[25/07, 2:19 PM] ललित:
राधिका छंद

जब आँगन में दीवार,खड़ी हो जाए।

बरगद की शीतल छाँव,कहाँ मिल पाए?

कुछ दीवारें तो बोझ,उठाएँ छत का।

कुछ दीवारें उन्मान,घटाएँ छत का।

ललित
[25/07, 5:46 PM] ललित:
राधिका छंद
2

यूँ झुमके वाली नार,चले बल खाती।

जो देखे उसकी साँस,वहीं थम जाती।

वो कजरारे दो नैन,झील से गहरे।

जो भी देखे दिल थाम,वहीं पर ठहरे।

ललित
[25/07, 7:57 PM]

राधिका छंद

बिटिया है लक्ष्मी-रूप,फूल सी प्यारी।

अँगना ज्यों तुलसी छाँव,पावनी न्यारी।

सारे रिश्तों में प्यार,वही है बुनती।

है मात-तात की पीर,वही सब सुनती।

ललित
[25/07, 8:47 PM] ललित:
राधिका छंद
3--क्यों?

ढलती जीवन की शाम,दर्द क्यों लाई ?

सुख-सपनों को क्यों साँच,नहीं कर पाई?

क्यों छोड़ डूबती नाव,गई पतवारें?

क्यों पतवारें रँग-रूप,नया इक धारें?

ललित
[26/07, 11:05 AM] ललित:
तरो ताजा दो दोहे

अपनों की इस भीड़ में,बेगाना है कौन?
प्रेम भरी नजरें लिए , सब बैठे हैं मौन।

बेगानों से प्यार क्यों ,इंसाँ करता आज?
अपनों से धोखा मिले,बेगानों से ताज।

ललित
[26/07, 11:36 AM] ललित:
कुण्डलिनी ताजा

मन-चाहा सब हो यहाँ,सबकी ये ही चाह।
रब-चाहे में खुश रहो, सच्ची ये ही राह।

सच्ची ये ही राह,शीश चरणों में धर लो।
सुख-दुख जो दे राम,उसी से झोली भर लो।

ललित
[26/07, 12:00 PM] ललित:
कुण्डलिनी

करते नौटंकी सभी,नेता धोखे बाज।
भीड़-तंत्र से कर रहे,लोकतंत्र में राज।

लोकतंत्र में राज,करें ये नेता सारे।
विद्वानों की फौज,एक नेता से हारे।

ललित
[27/07, 8:50 AM] ललित:
जय गुरू देव
🙏🌸🙏

सारे रिश्तों से बड़ा,पावन रिश्ता एक।
गुरू शिष्य के बीच जो,बाँधे बंधन नेक।

बाँधे बंधन नेक,बड़ा ही निर्मल न्यारा।
गुरू-कृपा से शिष्य,करे जग में उजियारा।
ललित
[27/07, 11:51 AM] ललित: पीयूष वर्ष छंद
गुरू वन्दन

शिक्षकों से ज्ञान जो हमको मिला।
जिन्दगी है ये उसी का तो सिला।

तार देते हैं गुरू मझधार से।
ताड़ देते हैं बड़े ही प्यार से।

है गुरू औ' शिष्य का रिश्ता सरल।
घुल नहीं सकता कभी इसमें गरल।

हर गुरू को आज मैं करता नमन।
जब गुरू आशीष दें महके चमन।

'ललित'
[27/07, 11:54 AM] ललित:
आल्हा छंद रचना

गुरू मिले सौभाग्य हमारा,गुरू कृपा से हो कल्याण।

गुरु मूरत की किरपा से ही,एकलव्य सीखा संधान।

अंधकार से ले जाते हैं,वो नित-नव प्रकाश की ओर।

गुरू-शिष्य का पावन-रिश्ता,कभी न हो सकता
कमजोर।

'ललित'
[27/07, 5:36 PM] ललित:
मुक्तक

गुरु के मुख से मां शारद ही,ज्ञानसुधा बरसाती है।

उनकी आंखों से माँ ही तो, प्रेमामृत छलकाती है।

मां शारद की किरपा से ही,'राज' गुरू मिल पाए हैं।

गुरू-कृपा को याद करूं तो, 
आँखें भर-भर आती हैं।

ललित
[28/07, 5:36 PM] ललित:
राधिका छंद
श्रृंगार प्रयास

चंचल हैं उसके नैन,नशीले प्याले।

जो देख हुए बेचैन,कई दिल वाले।

केशों में लाल गुलाब,लवों पर लाली।

हँस कर देखे इक बार,मने दीवाली।

ललित
[28/07, 10:10 PM] ललित:
राधिका छंद

पावन पुष्पों की प्रीत,भ्रमर से ऐसी।
चंदा से करती प्रीत,चाँदनी जैसी।

गाता है निशि-दिन गीत,प्यार में पगला।
करता न्यौछावर जान,फूल पे अगला।

ललित
[29/07, 9:35 AM] ललित:
राधिका छंद

है कान्हा तेरा चोर,बड़ा नटखटिया।

माखन की मटकी फोड़,हँसे नटवरिया।

ओ मैया यशुदा देख ,रोक ले उसको।

वो करे बहुत उत्पात ,टोक ले उसको।

ललित
[29/07, 7:45 PM] ललित:
राधिका छंद

जब वृद्ध पिता की आस,टूटती दिखती।

तब आँसू की हर बूँद,कहानी लिखती।

क्यों स्वप्न गए सब टूट,सोचती आँखें?

क्यों अपनों ने ही आज,नोंच दी पाँखें?

ललित
.
[29/07, 9:03 PM] ललित:
राधिका छंद

जो मिले गुरू से ज्ञान,वही है सच्चा।

भूले जो छंद विधान,वही है कच्चा।

ये काव्य सृजन परिवार,अनोखी शाला।

रघुवंशी संग विवेक,जिता ही डाला।

ललित
[30/07, 1:36 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद

वानर,बालक,गोप सखा सब, संग लला बतराय रहा।

खोजत है हर रोज नया घर, गोपिन को चकराय रहा।

फोड़ दिया घट मोहन ने झट, माखन खा इतराय रहा।

बाल सखा सब माँगत माखन, माधव है बिखराय रहा।
'ललित'

जनवरी 2018

31.1.18
दोधक छंद

श्याम लला व्रज में जब डोले।
तो वृषभानु लली सँग हो ले।
सोच रही कब श्याम निहारे।
मोहन को लख नैन न हारे।

ललित

दोधक छंद
1
वार करें अँखियाँ कजरारी।
नार चले बल खा मतवारी।
घायल थाम रहे दिल ऐसे।
देख हँसे वह नार न कैसे?

ये दिल घायल होकर टूटे।
वो नयना मटका कर लूटे।
होंठ लिपिस्टिक से रँग लाए।
प्रीतम से मिलने जब आए।

प्रीत करे न डरे दुनिया से।
नैन भरे रँग फागुनिया से।
प्रीतम की सजनी नखराली।
पालिश-नेल रँगे नख वाली।

नाच रही झुमके नथ वाली।
लालम लाल हुई मतवाली।
नैन सुधा सजना जब पीते।
नैन सुधा सब रैन न बीते।

ललित

दोधक छंद

पायलिया मुँह जोर हुई है।
पाँव बजे जब भोर हुई है।
साजनवा मदहोश पड़े हैं।
आस लिए हम पास खड़े हैं।

ललित

दोधक

पैंजनियाँ चुभती सब रैना।
छीन रहे घुँघरू अब चैना।
साजन जो तुम पास न आते?
जीवन के रस रास न भाते।

दोधक

दान करे जप-ध्यान करे तू।
मन्दिर में गुण-गान करे तू।
पुण्य बढ़ें कुछ खास न तेरे।
मात पिता यदि पास न तेरे।

मात-पिता पद-पंकज छू ले।
अंत उसे घन श्याम न भूले।
जो उनको नित शीश नवाता।
वो सुत जीवन में सुख पाता।

मात-पिता सम देव न दूजा।
है जननी सम सेव्य न पूजा।
जन्म दिया सँग कंचन काया।
कौन चुका उसका ऋण पाया।

जीवन ये ऋण-दान पिता का।
भूल न तू अहसान पिता का।
ध्यान जरा उनका रख लेना।
दर्द जरा उनका चख लेना।

ललित

दोधक छंद
पूरी रचना

पावस की ऋतु रास न आवे।
साजन के बिन प्यास न जावे।
प्रीत सुधा रस साजन  संगा।
प्यास लिए जल जाय पतंगा।

सावन में हुलसे मन मेरा।
साजन आ झुलसे तन मेरा।
आग बुझा बरखा कब पाती?
बारिश की हर बूँद जलाती।

प्रीत लगाकर प्यास जगाई।
प्यास नहीं बुझ साजन पाई।
छोड़ पिया परदेस चला आ।
है अपना यह देश भला आ।

अंग लगूँ सजना मन चाहे।
काम नहीं तजना तन चाहे।
साजन मैं सज ना अब चाहूँ।
प्रीत नहीं तजना अब चाहूँ।

ललित

दोधक छंद

जीवन में मन मीत मिले जो।
प्रीत भरे सब गीत मिले जो।
आज अचानक छोड़ गए वो।
प्यार भरा दिल तोड़ गए वो।

ललित

दोधक छंद
गीत

बाँसुरिया मधु तान सुना रे।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

यूँ हम से मुख तो मत मोड़ो।
यूँ  व्रज-वासिन को मत छोड़ो।
गोप-सखा  सब राह निहारें।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

नित्य सुभोर भए बज जावे।
वो मुरली सब के मन भावे।
नंद-जसोमति के तुम प्यारे।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

माखन के घट फूट न पाते।
गोपिन-माखन लूट न पाते।
सून पड़े वन बाग बहारें।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

रास नहीं व्रज में अब होते।
नाच बिना घुँघरू अब रोते।
नैन करें कब दर्श तुम्हारे?
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

मोहन ये रज भूल गए क्या?
गैयन का व्रज भूल गए क्या?
वो वृषभानु सुता न भुला रे।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

दोधक छंद
कुछ यूँ ही मन की बात...

कौन कहाँ कब छंद लिखेगा?
भाव कहाँ किस रूप दिखेगा?
सोच कहाँ सकता अब कोई?
शारद माँ वर दे कब कोई?

ललित

बरवै छंद

आज अचानक यूँ ही,उठा विचार।
क्यों दिल में छुप बैठे,दर्द हजार?

तानों के तीरों के,घाव हजार।
देते क्यों इस दिल के,तोड़ न तार?

दिल के छालों को जो,देख न पाय।
ऐसा मानव क्यों कर,मित्र कहाय?

राहत दे जो दिल को,करे सहाय।
एक वही तो सच्चा,मीत कहाय।

ललित

बरवै छंद

समझ नहीं पाता दिल,रीत-रिवाज।
बेबस सारा जिनमें,हुआ समाज।

इक माँ के दो बेटे,रहें न साथ।
सिसके ममता कुछ क्यों,लगा न हाथ?

माँ दिल में ममता है,नयन दुलार।
ममता को भगवन भी,सकें न मार।

ममता का कर्जा जो,सकें उतार।
ऐसी संतानें  तन,सकी न धार।

ललित

बरवै छंद
ममता की छाँव तले,बसे बहार।
मैया करे प्यार की,सदा फुहार।

माता देती शिशु को,प्यार अपार।,
नेह और ममता की,हुई न हार।

ललित

बरवै छंद

कैसे कैसे दिन ये,समय दिखाय।
हरे -भरे पौधे के,पात सुखाय।

डोर समय की है ये,बड़ी अमोल।
तनी रहे सदा दे,कभी न झोल।

बरवै छंद

गोप-गोपियाँ व्रज में,रहे पुकार।
आजाओ मथुरा से,किसी प्रकार।

याद करो क्यों व्रज को,आप न श्याम?
राधा का क्यों समझो,ताप न श्याम?

विरह-पीर राधा से,सही न जाय।
राधा की हालत क्या,कही न जाय।

व्रज की धरती को हम,करें प्रणाम।
चरण श्याम के छू जो,बनी सुधाम।

ललित

25.1.18
बरवै छंद

भक्तों की हे प्रभु जी,सुनो पुकार।
काम क्रोध के मन से,हरो विकार।

दीनदयाल हमें तुम,करो निहाल।
राग द्वेष दो मन से,प्रभो निकाल।

लोभ मोह के काँटे,चुभें हजार।
आप चुभन कम कर दो,किसी प्रकार।

ध्यान-भक्ति में मन क्यों,लगे न नाथ?
केवल आप लगो क्यों,सगे न नाथ?

ललित

25.1.18

बरवै छंद
जय श्री राधा कृष्ण
जय व्रज धाम

मधुर-मधुर जो वंशी,बजे सुभोर।
करती हर गोपी को,भाव विभोर।

कान्हा की मुस्कानें,भाव प्रधान।
राधा जी को जग का,रहे न भान।

वंशी-वट यमुना-तट,शीत बयार।
राधा के सँग मोहन,करें विहार।

व्रज के जैसा सुंदर,कहीं न गाँव।
राधा नाचे छम-छम,रुकें न पाँव।

ललित किशोर 'ललित'

बरवै छंद

पाश मोह माया का,दिखे न हाय।
जकड़े कैसा मन को,कहा न जाय?

माया बाँधे मन को,खूब नचाय।
फिर भी माया में मन,खूब नहाय।

ललित

24.1.18
बरवै छंद

देखे मन ये सपने,नित्य हजार।
चकमे देकर भागे,दूर बहार।

सपनों की नौटंकी,बड़ी खराब।
कब गिर जाए पर्दा,नहीं हिसाब।

ललित

दोहा

विनती मेरी आप से,इतनी सी है श्याम।
खुशियों की तकदीर में,लिख दो मेरा नाम।

बरबै छंद

राधारानी चंचल,नयन कटार।
फँस गए श्याम सुंदर,कृष्ण मुरार।

बाँसुरी बजाए जब,नंद-कुमार।
मात यशोदा पाए,खुशी अपार।

ललित

21.1.18
मुक्तक 16:12

देखी रंग रँगीली दुनिया,देखे दुनिया वाले।
कुछ चितकबरे कुछ चिकने से,कुछ गोरे कुछ काले।
रंग सभी का ऐसा पक्का,रंग न चढ़ता दूजा।
अपने-अपने रंगों में सब,झूम रहे मतवाले।
ललित किशोर 'ललित'

शैर
2122 2122 212
मौत पर आँसू बहाता और है।
जान पर खुद खेल जाता और है।

प्यार करने का सलीका और है।
प्रीत का झूठा दिखावा और है।

क्या करोगे आजमा कर तुम उसे।
या खुदा जिसका ठिकाना और है।
ललित

21.1.18
बरवै छंद

आ जा श्याम साँवरे,नंद कुमार।
भूल मत राधिका का,प्यार अपार।

प्रीत लगा के कान्हा,हमें न भूल।
हमसे मिलेंगें तुझे,कहीं न फूल।

सारे गोप-गोपियाँ , रहे पुकार।
भूल मत राधिका का,प्यार अपार।

नटवर राजा तू जो,रास कराय।
गोपियों को आत्म का,भास कराय।

ललित किशोर 'ललित'

बरवै छंद
भोले

कान्हा सँग झूम रहे,गोप-कुमार।
शिव-भोले नाच रहे,बन कर नार।

कान्हा जी की नजरें,खूब कमाल।
भाँप लिया दिखते ही,भाल विशाल।

ललित

बरवै छंद

बाँका बिहारी लला,माखन-चोर।
मुरली-मनोहर श्याम,नंद किशोर।

राधिका का साँवरा,कर-कर वार।
फोड़े माखन-गगरी,कंकर मार।

ललित

20.1.18
बरवै छंद
12,7
12,7
अंत  121

दिल को अब धड़कन,नहीं सुहाय।
नयनों से आँसू इक, निकल न पाय।

पूजा की थाली तक,फूल न आय।
भगवन को ही ये दिल,भूल न जाय।

अरज करूँ माँ शारद,करो सहाय।
बरवै छंद लिख सकूँ,'राज' सुहाय।

बजती छम-छम-छम-छम,पायल जाय।
इठलाती गौरी कर, घायल जाय।

भिगो गयी गौरी का,श्यामल गात।
बरसी मूसलाधार,जो बरसात।

सिंधु छंद

करो कुछ देश की सेवा युवा वीरों।
कराओ 'कर' जमा अपना अरे धीरों।
तभी हो देश की सीमा सुरक्षित भी।
कमाओ तो करो कुछ देश का हित भी।

ललित

18.1.18
सिन्धु छंद
राधा श्रृंगार
1

निहारे राधिका को वो कन्हैया यों।
अनोखी हो कनक पूरित चिरैया ज्यों।
नयन झपके नहीं कान्हा पलक ठहरी।
हँसे राधा नयन में ले चमक गहरी।
2
मुकुट जो मोर पंखी शीश पर सोहे।
दिवानी राधिका का दिल वही मोहे।
मिला जब श्याम से नैना हँसी राधा।
उसी पल प्रीत में उसकी फँसी राधा।

3
न जाने कौन सा जादू चलाता है।
मटक कर श्याम जब पलकें हिलाता है।
बजाए बाँसुरी ऐसी करामाती।
किशोरी राधिका दौड़ी चली आती।

4
बिरज की ये धरा शोभित कन्हैया से।
मधुर हर भोर वंशी के बजैया से।
चुरा कर बाँसुरी ऐसे हँसे राधा।
लिया दिल चोर जैसे श्याम का आधा।
5
बजें जब राधिका की पायलें छम-छम।
कन्हैया का हृदय करने लगे धम-धम।
श्रवण पहचानते हैं पायलों की धुन।
बजें वो पायलें भी बाँसुरी को सुन।
6
नथनिया राधिका की यों अधर ढ़कती।
मुरलिया श्याम की वो ज्यों अधर ढ़कती।
बजे वो बाँसुरी जितनी मधुर जैसे।
नथनिया झूम कर छूती अधर वैसे।

सिन्धु छंद
3
महादेवा

गले में नाग है शशि भाल पर जिसके।
बजें डमरू अजब सुरताल पर जिसके।
महादेवा बड़ा भोला कहाता वो।
धतूरा भाँग पाकर मुस्कुराता वो।

सिन्धु छंद
3
अलौकिक धुन

निकाले बाँसुरी ऐसी अलौकिक धुन।
अचम्भित नार-नर होते चतुर्दिक सुन।
बजें हैं गोपियों की पायलें छम-छम।
नशे में आँख से आँसू गिरें झम-झम।

नशा उन गोपियों पर रास का छाया।
नहीं जिनको कभी छू भी सकी माया।
नशे में झूमती हैं श्याम के सँग वो।
नहीं रँगती कभी भी काम के रँग वो।

कन्हैया का चढ़ा ऐसा धवल रँग है।
खिवैया का मिला ऐसा नवल सँग है।
कि बेरँग होगए सब गोपियों के मन।
कि श्यामल होगए सब गोपियों के तन।

ललित किशोर 'ललित'

सिन्धु छंद
2
अरे ओ साँवरे

अरे ओ साँवरे मुरलीधरा प्यारे।
जरा वंशी मधुर हमको सुना जा रे।
सुना है बाँसुरी तेरी निराली है।
उसी ने नींद राधा की चुरा ली है।

किए उस राधिका ने कौन से जप थे?
किए सब गोपियों ने कौन से तप थे?
लुभाता था जिन्हें मुरली बजा कर तू।
नचाता था जिन्हें आँखें नचा कर तू।

जरा तू आज हम को भी नचा दे रे।
मधुर उस रास का हमको मजा दे रे।
चखा दे आत्म रस का स्वाद  कुछ ऐसा।
चखाया गोपियों को स्वाद था जैसा।

ललित किशोर 'ललित'

सिन्धु छंद

न चाहूँ श्याम मैं धन-धान्य या सोना।

न चाहूँ  साजना की प्रीत में खोना।

मुझे बस चाहिए मीठी नजर तेरी।

भरे जो प्रीत से हर इक डगर मेरी।

दिखा दे श्याम तेरी इक झलक मुझको।

रखूँ फिर याद मैं मरने तलक तुझको।

मरूँ जब साँस में मेरी समाना तू।

नहीं पथ में अकेला छोड़ जाना तू।

ललित किशोर 'ललित'

सिंधु छंद
बुरी आदत

न फेंको आप कचरा बीच राहों में।
गिरो मत आप औरों की निगाहों में।
कि कचरा पात्र कोई खोज लेना जी।
उसी में डाल कचरा रोज देना जी।

ललित

सिंधु छंद

करो मत बालपन में ब्याह बच्चों का।
करो भावी न जीवन स्याह बच्चों का
उन्हें दो पूर्ण अवसर तुम पनपनेका।
कली को फूल बन जग में महकने का।

ललित

सिन्धु छंद
कोख से पुकार

अरे ओ तात माँ तुमसे करूँ विनती।
जरा तुम पाप की अपने करो गिनती।
न मारो कोख में मुझको बचाओ तुम।
न अपने पाप का बोझा बढ़ाओ तुम।

कि मैं भी चाहती हूँ देखना जग को।
न रोको आप अपने ईश के मग को।
करूँगी नाम रौशन आपका ऐसे।
नहीं करता कभी सुत तात का जैसे।

ललित

सिंधु छंद
नुक्ता

नहीं सेवा करे जो सुत पिता माँ की।
सजाता है वही फिर श्राद्ध में झाँकी।
करे नुक्ता बहुत वो भोज भी देता।
खिलाकर ब्राम्हणों को नाम कर लेता।

ललित

सिन्धु छंद

चमकते चाँद को नीरद हसीं भाया।
सरक कर गोद में उसकी चला आया।
पुकारे चाँदनी वो सर्द रातों में।
गया है चाँद क्यों मग भूल बातों में?

ललित

सिन्धु छंद
प्रकृति

बिखेरे चाँदनी ने रंग मनभावन।
लताएँ झूमती ........।
करें अठखेलियाँ हर फूल सँग भँवरे।
भ्रमर का गान सुन हर इक कली सँवरे।

ललित

सिंधु छंद

कभी भी रोशनी नकली चिरागों की।
बढ़ा सकती न रौनक सब्ज बागों की।
दिया इक ज्ञान का ऐसा जलाएँ हम।
कि रौशन हो जहाँ औ' दूर भागे तम।

ललित

सिंधु छंद

धरा पर किसलिए किस काम से आया?
अरे नर याद कर जिस काम से आया।
गया तू भूल उस हरि को यहाँ आकर।
करेगा याद कान्हा को कहाँ जाकर?

ललित

सिंधु छंद

अरे ओ आसमाँ तूने किया ये क्या?
जमीं के प्यार का बदला दिया ये क्या?
कभी सूरज तपाए गर्म बाहों से।
कभी वो चाँद सींचे सर्द आहों से।

ललित

सिंधु छंद

बने इक नार भोला हास में आए।
कन्हैया राधिका के रास में आए।
सुनी जो बाँसुरी नाचे वहीं भोला।
कि छम-छम-छम बजी पायल जहाँ डोला।

ललित

सिंधु छंद
4
न जाने बागबाँ वो सुस्त सा क्यों है?
बुढ़ापे में दिखे वो पस्त सा क्यों है?
कि बोए बीज थे उसने सदा जैसे।
नहीं क्यों बाग में हैं फल हुए वैसे?

ललित

सिन्धु छंद
3

नहीं जब चाह की थी कुछ कभी हमने।
दिखाए क्यों हसीं सपने हमें तुमने?
अदाएँ जब हमारी थी तुम्हें प्यारी।
दबाई क्यों हमारी हसरतें सारी?

ललित किशोर 'ललित'

सिंधु छंद

बला की शोख मतवाली नज़र वाली।
मटक कर थी दिखाती कान की बाली।
वही दिल ले गई इस उम्र में मेरा।
अधर जिसके लिए थे गोल सा घेरा।
ललित किशोर 'ललित'

सिंधु छंद

कभी मत जल्दबाजी में लिखो रचना
पटल पर जाँच कर खुद ही रखो रचना।
समय मत व्यर्थ करना तुम समीक्षक का।
करो मत हौसला तुम कम समीक्षक का।

ललित

सिंधु छंद

अधर पर शर्म की लाली मधुर लाई।
कि राधा श्याम से मिलने चली आई।
नयन में प्रीत के उपहार हैं ऐसे।
मधुर उस बाँसुरी की तान हो जैसे।

ललित किशोर 'ललित'

सिंधु छंद

अधर पर शर्म की लाली मधुर लाई।
कि राधा श्याम से मिलने चली आई।
नयन में प्रीत के उपहार हैं ऐसे।
मधुर उस बाँसुरी की तान हो जैसे।

ललित किशोर 'ललित'

सिंधुछंद

सुनो ओ प्यार के सागर कन्हैया जी।
बजाकर बाँसुरी दो तार नैया जी।

सुना है आप हो चौंसठ कला ज्ञाता।
हमें दे दो कला की लेखनी दाता।

ललित

12.1.18
सिंधु छंद

करी जो प्रीत तो उसको निभाना था।
अरे क्या प्यार का मतलब न जाना था?
निभायी प्रीत थी तुमसे सदा हमने।
न जानी प्यार की कीमत कभी तुमने।

ललित

सिंधु छंद

वफा सपने न नैनों से कभी करते।
वफा अपने न नैनों में कभी भरते।
सभी अपने लगें अब तो पराए हैं।
सभी अपने गमों में कसमसाए हैं।

ललित

11.1.18
पूरी रचना एक साथ
सिंधु छंद
1
अलौकिक वो सुना दो बाँसुरी प्यारी।
सुना जिसको हजारों गोपियाँ तारी।
नचाते थे बिरज में गोपियों को तब।
अरे कान्हा हमें वैसे नचा दो अब।
2
बिरज की वो धरा हम को लगे प्यारी।
जहाँ तुमने मचाई धूम थी न्यारी।
जहाँ माखन चुरा कर रोज थे खाते।
जहाँ वंशी बजाने रोज थे आते।
3
किया था रास राधा संग मधुवन में।
उसी को देखने की आस है मन में।
मिला दो आत्म को परमात्म से ऐसे।
कभी मिलकर अलग वो हों न फिर जैसे।

ललित

सिंधु छंद

कन्हैया ने बजाई बाँसुरी न्यारी।
कि सुनने आगई वो राधिका प्यारी।
लगाएँ गोप औ' गोपी सभी ठुमके।
नचे जब राधिका रानी हिलें झुमके।

ललित

11.1.18
छंद सिंधु

कहीं सर्दी कहीं गर्मी कहीं ओले।
कहीं पानी बताशे हैं कहीं छोले।
कहीं पर आग है फैली कहीं हिंसा।
अरे ये आदमी है या नहीं इंसाँ?

ललित

महाश्रृंगार
3
आगया अंत समय जब पास,तभी जागी दर्शन की प्यास।
जपा तब ही उसने हरि नाम,गयी जब टूट नश्वरी आस।
जमा कुछ कर न सका वो पुण्य,गया बिलकुल ही खाली हाथ।
सुनाते थे उसको सुत-दार,भागवत गीता जी के साथ।
ललित

महाश्रृंगार छंद
2
गया वो उस नगरी की ओर,नहीं है जिसका कोई छोर।
चला जाता है जो इक बार,नहीं फिर आता वो
इस ओर।
बनी थी काया बड़ी कमाल,रहा जिसमें वो सालों-साल।
गया उस काया को ही छोड़,मचाई जिसमें बड़ी धमाल।
ललित

महाश्रृंगार
1
जीव को काया से तत्काल,ले उड़ा निर्मम काल कराल।
नहीं अब उसका कहीं निशान,निशाने पर जिसके था काल।
समझता था खुदको जो देह,उसी ने छोड़ी अपनी देह।
रहा देता सबको जो नेह,अंत में छोड़ गया वो नेह।
ललित
महा श्रृंगार छंद
जय शारद माँ
जय गुरूदेव

शीश पर शारद माँ का हाथ,रहे तो बन जाएगी बात।
लिखूँगा कड़वी-मीठी बात,रहे जो भावों की बरसात।
न हो पाए जो लेखन शुद्ध,शुद्धता ले आएँगें 'राज'।
गुरू राकेश मिले हैं 'राज',तभी मैं लिख पाया हूँ
आज।

ललित
9.1.18
महाश्रृंगार छंद
मणि जी को जन्म दिन शुभकामना


जन्मदिन ले आया है आस,
मिले यूँ शारद माँ का प्यार।

मणी सर सदा लिखें कुछ खास,
लेखनी पाए रोज निखार।

हरिक दिन हो जैसे त्यौहार,
पकोड़ी चाय भगाएँ ठण्ड।

लिखें जो कविताएँ मणि राज,
न देवें भाभी उनको दण्ड।

ललित

महाश्रृंगार छंद

1.1.18

नया साल सूँ हाड़ोती माँ,
                 मूँ लिखबा छूँ जी लाग्यो।
कान्हा-राधा और रास की,
                  बाताँ लिखबा मूँ आग्यो।
छाऊँ छूँ आशीष बड़ाँ को,
                और प्यार सब मितराँ को।
लिखबो छाऊँ छूँ ऊ कान्हो,
                 माखन ले ले  क्यूँ  भाग्यो?
'ललित'

राधा-मोहन की छब न्यारी,सुंदर मनहर छे जोड़ी।
कान्हा की वा बाँसरिया भी,नटखट छे थोड़ी-थोड़ी।
मधुर-मधुर तानाँ छेड़े छे,नन्दन वन में भोर भयाँ।
रूस गयी वा राधा भी जद,कान्हा ने बहियाँ मोड़ी।

महाश्रृंगार


बजे जब बाँसुरिया बिन बात,
करे राधा मोहन से रार।
अधर से हटा बाँसुरी दूर,
साँवरा श्याम करे मनुहार।
नहीं सीधे कर पाए श्याम,
राधिका के तिरछे दो नैन।
किए बिन कान्हा से तकरार।
नहीं आए राधा को चैन।

ललित

महाश्रृंगार छंद
राकेश जी के सुझाव से परि

प्रीत के रंगों से भरपूर,
खिली थी कलियाँ सुंदर चार।
फूल बनने से पहले हाय,
किया भ्रमरों के दल ने वार।
गए वो सारा ही रस चूस,
समझ पाती वो जब तक बात।
कली को मिल पाता कब न्याय,
करें भँवरे जब ऐसी घात।

ललित

महाश्रृंगार छंद
किटी महिमा

यही है हर नारी की चाह।
महीने में हों किटियाँ चार।

किटी में जाती है जो खूब,
बड़ी खुश रहती है वो नार।

खेलना खाना मिलता और,
हाउजी देती है उल्लास।

किटी में जाती हैं जो साथ,
मित्र हो जाती हैं वो खास।

ललित
महाश्रृंगार छंद
मेरी भांजी नीशु को जन्मदिन पर शुभाशीष...

'नीशु' तुम रहो महकती खूब।
सदा आँगन में रहे बहार,
रहें खुशियाँ घर में भरपूर,
लगे हर दिन जैसे त्यौहार।
रहें गम तुम से कोसों दूर,
अधर पर रहे सदा मुस्कान।
करो हर बाधा को तुम पार,
सदा हो जीवन में उत्थान।

ललित

महाश्रृंगार छंद
समीक्षाहेतु

करूँ मैं तुमसे कितना प्यार,
नहीं है इसका तुमको भान।

तुम्हीं से करता हूँ मैं प्रीत,
तुम्हें मैं मानूँ अपनी जान।

भरी जो मेरे दिल में प्रीत,
करो अब तो उसको स्वीकार।

हुस्न का अपने मुझको मीत,
जरा कर लेने दो दीदार।

ललित

महाश्रृंगार छंद
2

जोड़ कर हाथ विनय के साथ,
चले आए नेता जी द्वार।

कड़क थी धूप भीड़ थी खूब,
लगाते सब ही थे जयकार।

कर रहे वादों की बरसात,
माँगते थे बस हमसे वोट।

जीत कर लौट न आते देश,
यही इक थी बस उनमें खोट।

ललित

महाश्रृंगार
किया था जिससे हमने प्यार।
छुड़ा कर हाथ गयी वो आज,

ठंड में हाय छोड़ कर साथ,
गयी क्यूँ उसे न आयी लाज।

गला भी हाय न देता साथ,
कलम से किसे पुकारूँ मीत।

पड़ी है ठंड रहा मैं काँप,
रजाई में गाता हूँ गीत।

ललित

महाश्रृंगार छंद
छम-छम-छम

श्याम देखे राधा की राह,
            लिए सुंदर पुष्पों  का हार।
चली आई कान्हा के पास,
            राधिका रानी कर   श्रृंगार।
करे छम-छम-छम पायल शोर,
            बजे बाँसुरिया सारी   रात।
श्याम ने छेड़ी ऐसी तान,
            महकने लगा राधिका गात।

ललित किशोर 'ललित'

महाश्रृंगार छंद
कहे जो सब के मन की बात,वही लेता दिल सब के जीत।
दिलों को आता है जो रास,मधुर होता वो ही संगीत।

सुने जो सबके दिल की पीर,वही होता है सबका खास।
अधर पर रखे सदा मुस्कान,वही आता है सबको रास।

ललित
4:1:18
महाश्रृंगार छंद
चले हिलती-डुलती ये नाव,कन्हैया थाम जरा पतवार।
एक तेरा ही है आधार,छोड़ना मत मुझको मझधार।
हुआ मन मेरा बड़ा अधीर,जरा तू दे दे इसको धीर।
अरे ओ सबके खेवनहार,लगा दे मेरी नैया तीर।

ललित

महाश्रृंगार छंद

सुनी जब बाँसुरिया की तान,छोड़ आई हर गोपी काम।
बढ़ी उस वंशीवट की शान,खड़े जिसके नीचे घनश्याम।
मोरपंखी सुंदर वो ताज,सजा है कान्हा जी के भाल।
करे वो वंशी बड़े कमाल,दे रहे गोप-गोपियाँ ताल।

ललित

महाश्रृंगार छंद
मचाता धूम रहा है घूम,बिरज की गलियों में घनश्याम।
गोप-ग्वालों को लेकर साथ,चोरियाँ करता है निष्काम।
मधुर धुन बाँसुरिया के साथ,बिरज में होती है हर भोर।
नाचती व्रज की हर इक नार,बजाए मुरली जब चितचोर।
ललित

महाश्रृंगार छंद

जपे जा राम किए जा काम,हरें वो राम सभी की पीर।
सुनेंगें राम बनेंगें काम,ज़रा रखना प्यारे तू धीर।
भले हो देर सुनेंगें टेर,नहीं अन्याय प्रभो के द्वार।
लगेगी नाव धार के पार,प्रभो को हाथ सौंप  पतवार।

ललित

महाश्रृंगार छंद

करे मत याद पुरानी बात,नया कर काम बने तकदीर।
बड़ी मजबूत वक्त की डोर,तोड़ कब पाया कोई वीर।
नयी इक डोर वक्त की बाँध,उड़ानें भर छू ले आकाश।
समय के साथ मिला के हाथ,काट सकता है तू हर पाश।

ललित

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