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अगस्त 2018

[01/08, 5:29 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद

यौवन बीत गया सुख से अब सोच दिमाग लगा कुछ तो।

जो हरि वास करे मन में उस से अब प्रीत पगा कुछ तो।

तात सुता सुत भ्रात सखा इन साथ विराग जगा कुछ तो।

जो हरि एक रमा जग में बस वो बन जाय सगा कुछ तो।

ललित
[01/08, 8:20 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद
2
चाहत है इतनी मनमोहन,
आन बसो मन-आँगन में।

नैन करूँ जब बन्द प्रभो तव,
दर्शन हों इस सावन में।

हाथ पसार करूँ विनती प्रभु,
दाग लिए इस दामन में।

साँस रहे तन में प्रभु तो नित,
जाप चले मन पावन में।

ललित
[02/08, 1:50 PM] ललित:
आल्हा छंद

जीवन बीता समझ न पाया,
अब तक मैं सपनों की बात।

स्वप्न सुनहरे खत्म न होते,
सपनों में ही बीती रात।

रंग-बिरंगे सपने मन जो,
रहा देखता उम्र तमाम।

उन टूटे सपनों की किरचें,
अब बहलाएँ सुबहो-शाम।

ललित
[02/08, 3:14 PM] ललित:
आल्हा छंद

कान्हा के कदमों की आहट,
सुनने को तरसे हैं कान।

कानों में हर-पल गूँजे है,
मधुर बाँसुरी की वो तान।

तान बाँसुरी की ऊधौ जी,
सुन लेता है जो इक बार।

ध्यान-धारणा बिना कन्हैया,
कर देते उसको भव-पार।

ललित
[02/08, 7:29 PM] ललित:
आल्हा छंद

सावन की रिम-झिम बौछारें,
भिगो गई गोरी का गात।

गाल गुलाबी नैन शराबी,
अधरों पर अटकी कुछ बात।

पानी की कुछ चंचल बूँदें,
चूम रही   गोरी के गाल।

प्यार भरी नीली अँखियों में ,
तैर रहे हैं डोरे लाल।

ललित
[03/08, 9:55 PM] ललित:

मदिरा सवैया छंद

यौवन में इतरा कर तू अब वृद्ध हुआ पछताय रहा।

जीवन व्यर्थ गवाँय दिया अब क्यों मुँह को बिचकाय रहा?

नाम न राम जपा मुख से दिल से प्रभु को बिसराय रहा।

राम-हरे अब तो जप ले अब क्यों जग में भरमाय रहा ?

ललित

[06/08, 1:46 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
10-8-8-6

बिजुरी जब चमके,
जियरा धड़के,
खन-खन खनके,कँगना रे।

मतवारे साजन,
प्यारे राजन,
सूना सावन,अँगना रे।

सावन हरियाला,
बदरी वाला,
मथ-मथ डाला,इस मन को।

जल्दी घर आ जा,
रस बरसा जा,
भूल न राजा,विरहन को।

ललित
[06/08, 5:29 PM] ललित:

त्रिभंगी छंद

छोटा सा बाजा,बन्दर राजा,खाकर खाजा,ले आया।

कुर्ता पाजामा,बन्दर मामा,मस्जिद-जामा,
से लाया।

सुन ढोल-धमाँसे,छम-छम नाचे, भरे कुलाँचे,बन्दरिया।

बिजुरी जब चमके,नाचे जम के,लगाय ठुमके,सुंदरिया।

ललित
[06/08, 6:56 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
3

रख प्रभु से आशा,छोड़ हताशा,घोर-निराशा,तज दे रे।

जीवन क्षण-भंगुर,
होकर आतुर,
नित मुरली-धर,भज ले रे।

सुन मेरे भैया,
जीवन नैया,
कृष्ण-कन्हैया,खेवेंगें।

गहरा भव-सागर,
पार सकें कर,
हरि को जो नर,सेवेंगें।

ललित
[07/08, 6:46 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद

जय राधे-कृष्णा,जय श्री कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा,जय राधा।

जय-जय सुख सागर,जय मुरली धर,नटवर नागर,हर बाधा।

जय बाल-मुकुंदा,जय गोविंदा,यशुदा-नंदा,दुख हारी।

गोवर्धन-धारी,मुकुट-बिहारी,कृष्ण-मुरारी,सुख कारी।

ललित
[08/08, 7:30 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद

यमुना के तीरे,ढोल-मँजीरे,
धीरे-धीरे,बजते हैं।

वंशी-वट झूमे,भँवरे घूमें,मोर पंख सिर,सजते हैं।

जब नँद का लाला,मुरली-वाला,कान्हा काला,हँसता है।

राधा का मनवा,चंचल चितवा,मुस्कानों में,
फँसता है।

ललित
[10/08, 6:54 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद

लालच के मारे,नेता सारे,लगा मुखौटे,फिरते हैं।

दाढ़ी में जिनके,लाखों तिनके,सीना जोरी,करते हैं।

जनता को लूटें,नेता झूँठे,सौदागर ये,सपनों के।

कानून बनाते,फिर इतराते,नहीं सगे ये,अपनों के।

ललित
[11/08, 5:56 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद

जय श्री राधा कृष्ण

राधा की बहियाँ,पकड़ कन्हैया,यमुना तीरे जब मोड़े।

राधा शरमाए,कुछ सकुचाए,
पकड़ कन्हैया,कब छोड़े?

दिल धक-धक धड़के,
राधा भड़के,
मन ही मन में,
खुश हो ले।

नैना मटकाए,हँसता जाए,
राधा का घूँघट खोले।

ललित
[11/08, 4:36 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद

ये बाग-बगीचे,महल-गलीचे,
साथ समय पर,कब देते?

ये रिश्ते-नाते,प्यार-दिखाते,
हाथ समय पर,कब देते?

वो एक निराला,मुरली वाला,
पीर सभी की,हरता है।

बस उसको भज लो,नाम सुमिर लो,
हाथ वही सिर,धरता है।

ललित
[12/08, 7:52 PM] ललित:

ताटंक छंद

कहलाता आजाद देश ये,अंदर से टूटा-टूटा।

उलट-फेर कानूनों में कर,नेताओं ने ही लूटा।

इकहत्तर की वय में भी है,लगा रैलियों का रेला।

नेताओं की मुट्ठी में क्यों,कैद बहारों का मेला?

ललित

[14/08, 7:50 AM] ललित:
रोला छंद
पूरा गीत
1
🙏🌸🙏

मुरली वाले श्याम,सुनो गोवर्धन धारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

गोप-गोपियाँ बाल,सखा सब तुम्हें पुकारें।
राधा जी भी राह,तुम्हारी नित्य निहारें।

वंशीवट की छाँव,खड़ी है राधा प्यारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

तरसे हैं अब कान,मधुर मुरली को प्यारे।
आ जाओ इक बार,अरे ओ कान्हा कारे।

माखन मिश्री भोग,लिए यशुदा बलिहारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

सूना यमुना तीर,हुआ नंदन-वन सूना।
तुझ बिन ओ नँदलाल,राधिका का मन सूना।

बाँसुरिया की तान,सुना दो फिर से प्यारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?

ललित
🙏🌸🙏
[14/08, 10:19 AM] ललित:

रोला छंद
1

कहाँ गया सँविधान,मूल अधिकारों वाला।
लगा हुआ क्यों आज,न्याय के मुँह पर ताला?

बरगद पीपल नीम,आम का उठा जनाजा।
काँटे-दार बबूल,बना जंगल का राजा।

ललित
[14/08, 3:51 PM] ललित:
रोला छंद

देख लिया घनश्याम,तुम्हारा प्यार अनोखा।
छोड़ गए व्रजधाम,दे गए सबको धोखा।

ओ निष्ठुर मन मीत,कहो क्या थी मजबूरी।
भुला दिए सब मीत,करी राधा से दूरी।

ललित
[14/08, 4:34 PM] ललित:
रोला छंद

अँखियों से मत मार,करे मत तिरछे नैना।
तिरछे तेरे नैन,चुरा लेते हैं चैना।

चैन गया मुँह फेर,मिली हैं जब से अँखियाँ।
फिरती मैं बेचैन,हँसें हैं सारी सखियाँ।

ललित
[15/08, 8:19 PM] ललित:
रोला छंद

अपना हिन्दुस्तान,जहाँ में सबसे न्यारा।
सर्व धर्म सम्मान,हमारा पावन नारा।
देश-भक्ति की गंध,यहाँ माटी ने धारी।
तूफानों से जंग,रहे हरदम ही जारी।

ललित
[16/08, 6:41 PM] ललित:
दोहा

हंसों का रँग देखकर,काग चकित रह जाय।
चुपड़े पॉडर-क्रीम पर,कालिख छूट न पाय।

ललित
[17/08, 10:37 PM] ललित:
रोला छंद

मिलते रहते मीत,सभी को इस जीवन में।
होती सच्ची प्रीत,किसी विरले के मन में।
आदि समय से रीत,यही चलती आई है।
सच्ची जिसकी प्रीत,जीत उसने पाई है।

ललित
[18/08, 5:34 PM] ललित:
रोला छंद

बोर हुए दो यार,रेल में कविता करते।
देख रेल की चाल,आँख में आँसू भरते।

भारत की ये रेल,विश्व में सबसे प्यारी।
करवाती है सैर,पूर्ण भारत की न्यारी।

🙏🙂🙏ललित
[18/08, 5:56 PM] ललित:
रोला

जीने का अंदाज,सजन का सबसे न्यारा।
हँसी-ठिठोली-बाज,साजना मुझ
को प्यारा।
अँगना हो गुलजार,सजनवा के आने से।
तन में बजें सितार,बाँह में भर जाने से।

ललित
[18/08, 6:36 PM] ललित:
रोला छंद

नीले तेरे नैन,समन्दर से भी गहरे।
प्यारे तेरे कान,मगर क्यों इतने बहरे?
दिल की ये आवाज,नहीं क्यों सुन हैं पाते?
क्यों मेरे जज्बात,नहीं तुझको छू जाते?

ललित
[19/08, 5:40 AM] ललित: आइए सुबह की शुरुआत बिटिया रानी के साथ करते हैं...
🙏🌷🙏🙂

रोला छंद

बाबुल का घर-द्वार,छोड़ कर बिटिया रानी।
चली आज ससुराल,लिए नयनों में पानी।
ये आँगन ये गाँव,भूल कैसे पाएगी?
ममता की वो छाँव,और माँ यादाएगी।

भर आई हैं मात,पिता भाई की अँखियाँ।
क्यों जाती हो छोड़,कहें बचपन की सखियाँ?
कहें बहन अरु भ्रात,सदा खुश रहना बहना।
मोबाइल से बात,हमेशा करती रहना।

ललित
[19/08, 2:38 PM] ललित:
रोला सागर

भर ले जिसमें पीर,राधिका सागर जैसी।
कहाँ मिलेगी श्याम,बता दे गागर ऐसी।
काला था जो नीर,कन्हैया यमुना जी का।
उसका रँग भी हाय ,हुआ अँसुवन से फीका।

ललित
[20/08, 12:23 PM] ललित:
रोला छंद
जय गुरूदेव

👏👏👏👏👏👏👏

गुरूदेव का प्यार,मिला है हमको जैसा।
आज उन्हें सम्मान,मिला है बिल्कुल वैसा।
जय-जय शारद मात,आपकी कृपा निराली।
काव्यसृजन परिवार,बजाए खुश हो ताली।

ललित

👏👏👏👏👏👏👏
[21/08, 11:26 AM] ललित: 21.8.18
दोहा क्रमांक : 1

फूल नहीं हैं छोड़ते,मुस्काना दिन-रात।
चाहे कुदरत दे उन्हें,काँटों की सौगात।

ललित
[21/08, 11:46 AM] ललित:
दोहा क्रमांक : 2

मीठा-मीठा रस मिला,खुशबू की सौगात।
भौंरे ने जब फूल से,कही प्यार की बात।

ललित
[21/08, 3:01 PM] ललित:
दोहा क्रमांक : 3

छोटा सा जीवन मिला,सपनों में मत डूब।
निश-दिन हरि का नाम ले,पुण्य कमाले खूब।

ललित
[21/08, 7:12 PM] ललित:
दोहा क्रमांकः4

दुख के पी लेे घूँट जो,लेकर हरि का नाम।
सुख उसका पीछा करे,भजता जो निष्काम।

ललित
[21/08, 7:56 PM] ललित:
दोहा क्रमांक : 5

क्यों भेजा संसार में,हरि ने हमको हाय?
काम क्रोध मद लोभ से,मन जो छूट न पाय।

ललित
[23/08, 8:50 AM] ललित:
मुक्तक प्रतियोगिता
मेरा प्रयास

घाव जो तुमने दिया है क्या कभी भर पाएगा?

क्या खुशी का वो समन्दर लौटकर फिर आएगा?

कौन सा मरहम भला इस दिल को सकता जोड़ है।

दिल खिलौना तो नहीं जो टूटकर जुड़ जाएगा।

ललित
[24/08, 4:54 PM] ललित:
रोला छंद

झूम रहे हैं मोर,देख सावन का मेला।
अम्बर में है शोर,गरजते वारिद छैला।

बगिया में हर ओर,लगे सावन के झूले।
इठलाती हर नार,आज बन-ठन के झूले।

ललित
[24/08, 6:43 PM] ललित:
रोला छंद

रिम-झिम ये बरसात,देख मनवा हर्षाता।
बूँद छुए जब गात,भीग मन भी है जाता।

नदिया झूमी जाय,महकता है हर धोरा।
जोरा-जोरी आज,करे है बाँका छोरा।

ललित
[25/08, 4:11 PM] ललित:
रोला छंद

लोकतंत्र का लाभ,उठाया तुमने कैसा?
हथियाने को वोट,लुटाया कितना पैसा?

सत्ता का है शौक,पागलों तुम पर तारी।
जा-जा कर परदेश,दे रहे भाषण-भारी।

ललित
[26/08, 9:18 AM] ललित:
रोला छंद

लोकतंत्र का लाभ,उठाया तुमने कैसा?
हथियाने को वोट,लुटाया कितना पैसा?

सत्ता का है शौक,पागलों तुम पर भारी।
जा-जा कर परदेश,कर रहे भाषण जारी।

ललित
[26/08, 10:54 AM] ललित:

राखी दोहे

रक्षा बंधन की पहली प्रस्तुति
समीक्षा हेतु

भेज रही हूँ नेह की,
               इक छोटी सी डोर।
दे दे ना भैया मुझे,
                खुशियों का इक छोर।

भाई मेरा खुश रहे,
                  यही प्रभू से आस।
जीवन में देखे नहीं,
                  कभी गमों की त्रास।

वीरा तुझसे है बँधा,
                   मन का हर इक तार।
तेरे मधुर सनेह से,
                    जीतूँ सब संसार।

'ललित'
[27/08, 1:45 PM] ललित:
मनोरम छंद

उठ रहा दिल में बवंडर।
भावनाओं का समंदर।
सिर्फ जी ली जिंदगी है।
या करी कुछ बंदगी है?

ललित
[27/08, 1:51 PM] ललित:
मनोरम छंद
2
बंदगी मैं कर न पाया।
जिंदगी ने यूँ सताया।
आस पूरी हो सकी कब?
कामनाएँ खो चुकी सब।

ललित
[27/08, 2:33 PM] ललित:
मनोरम छंद

क्या कहा दिल ने न जाने?
जिंदगी ढूँढे बहाने।
प्यार यूँ गम से किया क्यों?
दूसरों का गम पिया क्यों?

ढूँढती खुशियाँ ठिकाना।
जान कब पाया जमाना?
जिंदगी जिंदादिली है।
रस तभी पीता अली है।

ललित
[27/08, 3:52 PM] ललित:
मनोरम छंद
रास

बाँसुरी बजती सुहानी।
गोपियाँ नाचें दिवानी।
पायलें छम-छम बजे हैं।
राधिका के सुर सजे हैं।

रात भर चलता रहा रे।
रास वंशी के सहा रे।
चाँद भी रुकने लगा है।
आसमाँ झुकने लगा है।

शाँत सुरभित हैं हवाएँ।
झूमती हैं सब दिशाएँ।
श्याम-राधा नैन अंदर।
प्रीत का छलके समंदर।

ललित
[27/08, 4:29 PM] ललित:
मनोरम छंद

नन्द-यशुदा की दुआ है।
जन्म लल्ला का हुआ है।
है बिरज में धूम मचती।
गोपियाँ दर्शन न तजती।

ललित
[28/08, 9:35 AM] ललित:
मनोरम छंद

राधिका रो-रो पुकारे।
आ मिलो अब श्याम प्यारे।
भूल क्यों व्रज को गए हो?
किस जहाँ में खो गए हो?

नंद-बाबा राह देखे।
क्या यही थे भाग्य-लेखे?
माँ यशोदा गोपियाँ सब।
हैं नहीं क्या याद भी अब?

इक घड़ी को दर्श दे दो।
मुस्कुरा कर हर्ष दे दो।
बाँसुरी फिर से बजा दो।
रास में हमको नचा दो।

ललित
[28/08, 8:08 PM] ललित:

मनोरम छंद

प्यार की दीवानगी थी।
क्या तुम्हारी बानगी थी?
दिल जवाँ था तब तुम्हारा।
प्यार जीवन था हमारा।

वक्त ने ये दिन दिखाए।
दो कदम तन चल न पाए।
वक्त करता क्या सितम है?
आज तन में क्यों न दम है?

ललित

।
[29/08, 9:05 AM] ललित:
मनोरम छंद
बुढापा

वक्त ने क्या दिन दिखाए?
दो कदम तन चल न पाए।
वक्त करता क्या सितम है?
आज तन में क्यों न दम है?

जो चला था हर महीना।
जिंदगी भर तान सीना।
आज वो झुक सा गया क्यों?
राह में रुक सा गया क्यों?

ये बुढ़ापा क्या बला है?
वक्त की ये क्या कला है?
आज पथराई नजर है।
और धुँधलाई डगर है।

धमनियाँ जमने लगी हैं।
साँस भी थमने लगी है।
दिल मचलता और ज्यादा।
और जीने का इरादा।

ललित
[29/08, 9:44 PM] ललित:
मनोरम छंद

बाग की नन्हीं कली थी।
शीत-छाया में पली थी।
तात की थी लाडली वो।
थी बड़ी चंचल कली वो।

अब लगी थी वो चहकने।
घर लगा उससे महकने।
तात घर वो रह न पाई।
हो गयी इक दिन पराई।

ललित
[30/08, 11:15 AM] ललित:
सार छंद
चाह

नैन नहीं कुछ चाहें कान्हा,
चाहें दर्शन तेरा।

राधा के सँग निधिवन में वो,
प्यारा नर्तन तेरा।

श्रवण चाहते सुनना अद्भुत,
वंशी-वादन तेरा।

जिव्हा मेरी चखना चाहे,
मिश्री-माखन तेरा।

'ललित'

सितम्बर 17


30.9.17

मृदुगति छंद

है तार तार दिल का,कुछ इस कदर टूटा।
लगने लगा हमें तो,सारा जहान झूठा।

कोई दवा मिले जो,हर तार जोड़ पाए।
कोई गरल मिले जो,हर भरम तोड़ जाए।

विश्वास टूटता है,हर आस छूटती है।
बस छटपटाहतों में,निःश्वास छूटती है।

ये बेवफा जमाना,कितना बदल रहा है?
हर रंग ही कलेवर,अपना बदल रहा है।

ललित

मृदुगति छंद

कुछ और क्यों न दिखता,मनमोहना सिवा अब?
क्यूँ गोपियाँ रँगी हैं,उस श्याम रंग में सब।
उद्धव तुम्हें पता क्या,कितनी मधुर बजे है?
निर्जीव बाँसुरी जब,कान्हा अधर सजे है।

दुनिया लगे न प्यारी,माखन हमें न भाता।
मनमोहना पिया ही,हर ओर नजर आता।
उद्धव हमें सुनाओ,उस श्याम की कहानी।
क्या याद रोज आतीं,हम गोपियाँ दिवानी?

ललित

मृदुगति छंद

क्या आज खत्म होगा,लंकेश वो दशानन?
यूँ तार-तार होगा,क्या अब न पाक-दामन?

क्या राम राज्य है ये,रावण विहीन ऐसा?

मृदुगति छंद

लंकेश तू बता दे,बदनाम क्यूँ हुआ है?
मिटता रहा बरस हर,बन पाप का धुँआ है?

लाखों दिलों बसा जो,रावण नहीं मरे क्यों?
कोई न फोड़ पाता,घट पाप के भरे क्यों?

'ललित'
मृदुगति छंद

क्या पा लिया जहाँ में,सोचो जरा कभी तुम?
क्या और है कमाना,सोचो जरा अभी तुम?

पर साथ क्या चलेगा,अंतिम समय तुम्हारे?
ये भी जरा विचारो,क्या तुम यहाँ न हारे?
ललित

मृदुगति छंद

क्या जीत क्या खुशी है,क्या हार क्या ग़मी है?
जो खूब खास अपना,वो कौन आदमी है?
आता समझ न हमको,क्या ज़िन्दगी जुआ है?
या सिर्फ ज़िन्दगी ये,माँ -बाप की दुआ है?

ललित

29.9.17
कुण्डलिनी छंद
आधार कार्ड

भारत का इक नागरिक,पहुँचा यम के द्वार।
पूछ लिया यमदूत ने,लाया क्या आधार?

लाया क्या आधार,बोल दे तेरा नम्बर।
अगर नहीं आधार,नहीं जाएगा अंदर।

'ललित'

28.9.17
मृदुगति छंद
भजन-गीत आगे बढाया

हे मनमोहना....!

वो प्यार का तराना,इक बार गुनगुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

हर-पल गुजर रहा है,बस इंतजार में ही।
ये दिल धड़क रहा है,बस ऐतबार में ही।

तुम ऐतबार को ही,इक बार यूँ भुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

क्या-क्या नहीं किया है,पाने झलक तुम्हारी?
इस ओर पर न उठती,प्यारी पलक तुम्हारी।

दीदार का तुम्हारे,दे मुझ को झुन-झुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

हे! श्याम दिल तुम्हारा,है प्यार का समन्दर।
दो बूँद प्यार की दो,निष्काम प्रीत मंतर।

बस प्यास को मिलन की,कर श्याम दोगुना दो।
इस बेकरार दिल को,धुन प्यार की सुना दो।

ललित

मृदुगति छंद

इक आस के सहारे,दुख-दर्द गम सहे थे।
बेदर्द जिन्दगी के,जुल्मो सितम सहे थे।

बेटा चला गया है,उल्टी किताब पढ़कर।
अब तात रो रहा है,उसके हिसाब पढ़कर।

क्या बात हो गई है,कुछ भी समझ न आए?
वो सुत चला गया क्यों,अब तात गुन न पाए?

ये चाल जिन्दगी की,शतरंज की बिसातें।
अब वृद्ध है अकेला,दिन कट रहे न रातें।

'ललित'

मृदुगति
छोटी रचना बड़ा संदेश

बारात थी रँगीली,औ' था जुलूस न्यारा।
बिंदास नाचने का,अंदाज खूब प्यारा।

औ' ट्यूब लाइटों की,थी रोशनी वहाँ तक।
सिर पर उन्हें लिए थीं,कुछ लड़कियाँ जहाँ तक।

ललित
27.9.17

मृदुगति छंद

संसार कर्म शाला,कर कर्म कुछ निराले।
ये देह धर्म-शाला,तू आत्म ज्ञान पा ले।
रिश्ते न काम आएँ,नाते न साथ जाएँ।
कर मत फिजूल बातें,बातें न साथ जाएँ।

ललित

27.9.17
मृदुगति छंद
विचारणीय

जो आज जा रहा है,अर्थी-सवार होकर।
कल तक अकड़ रहा था, तहसीलदार हो कर।
तहसील औ' जिले सब,छूटे धरे धरा पर।
वो छोड़ जा रहा है,धन-धान्य से भरा घर।

संसार कर्म-शाला,कर कर्म कुछ निराले।
ये देह धर्म-शाला,पी धर्म के पियाले।
रिश्ते न काम आएँ,नाते न साथ जाएँ।
कर मत फिजूल बातें,बातें न साथ जाएँ।

'ललित'

27.9.17
मृदुगति छंद
विचारणीय

जो आज जा रहा है,अर्थी-सवार होकर।
कल तक अकड़ रहा था, तहसीलदार हो कर।
तहसील औ' जिले सब,छूटे धरे धरा पर।
वो छोड़ जा रहा है,धन-धान्य से भरा घर।

'ललित'

26.9.17
मृदुगति छंद

ये पायलें हमारी,हैं बेजुबान तब से।
तूने किया कन्हैया,मथुरा प्रवास जब से।

जाएँ कहाँ कन्हैया,हम गोपियाँ दिवानी?
कर प्रीत पागलों सी,बोझिल हुई जवानी।

तू है बड़ा सयाना,हम जान क्यूँ न पाए?
अब तू चला गया तो,ये जान क्यूँ न जाए?

रो-रो पुकारती हैं,दिन-रात जो वनों में।
क्या खोट थी कन्हैया,राधा व जोगनों में?

'ललित'

मृदुगति
यूँ ही एक विचार

क्यों जिन्दगी गुजारी,ले आस का सहारा?
आशा बनी निराशा,कैसे मिले किनारा?

पतवार ही लगाती,हर नाव को किनारे।
पतवार छोड़ दी क्यों,विश्वास के सहारे?

ललित

स

24.9.17
मृदुगति
1
है द्वार पर खड़ा इक,अद्भुत स्वरूप जोगी।अर्धोन्मिलित नयन वो ,संसार सेे वियोगी।

वो राख सब वदन पर,आया लपेट मैया।
वो सर्प-नाग तन पर,लाया लपेट मैया।

उलझी हुई जटाएँ,दिखता मशान वासी।
मृग-चर्म का वसन ज्यों,कैलाश का निवासी।

माँगे दरश यशोदा,वो बाल-कृष्ण का माँ।
खुद को कहे पुजारी,गोपाल-कृष्ण का माँ

विकराल रूप वाला,बाबा बड़ा भयंकर।
ऐसा न हो लला पर,कर जाय जादु-मंतर।

दे दान-दक्षिणा कुछ,कर दो विदा उसे तुम।
जो नजर लग गई तो,हो जायगी खुशी गुम।

ललित
क्रमशः
22.9.17
मृदुगति

गम को गले लगाना,अब रास आ गया है।
ये दर्द का फसाना,मन को लुभा गया है।
जो रोज छोड़ भागे,है वो खुशी पराई।
प्रभु राम से निकटता,दुख-दर्द ने कराई।

'ललित'
20.9.17
मृदुगति

क्यों  सौत को कन्हैया,हरदम अधर लगाए?
क्यूँ राधिका दिवानी,तुम को नजर न आए?
कान्हा अधीर कितनी,राधा बिना तुम्हारे?
क्यूँ तुम न जान पाए,राधा किसे पुकारे?

ललित

20.9.17
मृदुगति छंद

ये ध्यान क्या बला है,हम गोपियाँ न जानें?
पूजा विधान क्या है,व्रजवासियाँ न जानें?
उद्धव हमें बताओ,मनमोहना कहाँ है?
वो बाँसुरी बजैया,भव-मोचना कहाँ है?
ललित
क्रमशः

20.9.17
मृदुगति छंद
साँवरा

देखा कहीं किसी ने,क्या साँवरा मुरारी?
वंशी रहे बजाता,जो मोर मुकुट धारी।
हैं कमल-नैन चंचल,सुंदर मुखारविंदा।
उसकी शरारतों से,रहती बहार जिंदा।

खोजे गली-गली में,वो राधिका दिवानी।
पूछे कली-कली से,राधा बता निशानी।
नटखट न गोप कोई,उस श्याम के सरीखा।
पूछा भ्रमर-भ्रमर से,पर साँवरा न दीखा।

ललित

17.9.17
मनोरम
पहचान

आदमी हूँ या कि नम्बर।
सोचता हूँ देख अम्बर।
इक हसीं किरदार हूँ मैं।
नम्बरी आधार हूँ मैं।

देह माटी का खिलौना।
कागजी नम्बर सलोना।
भूल मैं नम्बर गया था।
ट्रेन के अंदर गया था।

खो गई पहचान मेरी।
कागजी वो जान मेरी।
एक टीटी पास आया।
ट्रेन से बाहर भगाया।

'ललित'

17.9.17
मनोरम

फूल जब पूरा खिला वो।
छोड़ माली को चला वो।
भूल बचपन को गया है।
आत्म निर्भर हो गया है।

बीज बोना खाद देना।
प्यार से फिर पाल लेना।
जान उसने भी लिया है।
फर्ज माली ने किया है।

सामने जीवन पड़ा है।
नेह परियों का बड़ा है।
अलविदा कह चल दिया वो।
बागबाँ का था जिया जो।

आज मुड़कर भी न देखे।
क्या यही थे कर्म लेखे?
हो गया माली रुआँसा।
भाग्य में आया न पाँसा।

ललित

16.9.17

मनोरम छंद
व्यथा और प्रार्थना

भाव की गंगा नहीं है।
हाय दिल चंगा नहीं है।
शब्द सब सोये पड़े हैं।
शाम के साये बड़े हैं।

कौन सा अब गीत गाएँ?
सुन जिसे सब गुनगुनाएँ।
कौन से सुर हैं निराले?
जो सभी का प्यार पालें।

दिल नहीं कुछ जान पाता।
शारदे माँ ज्ञान दाता।
आप ही हम को सँभालो।
लेखनी में जान डालो।

ललित
14.9.17
मुक्तक
हिंदी के आँसू

गुड मैनर वाला बच्चा जब,बंदर को मंकी बोले।
पापा मम्मी खुश हों जब वो,तुतला कर डंकी बोले।
हनी मनी बेबी चिंकी सब,नाम रखें हैं बच्चों के।
हिंदी आँसू छलकाती जब,'डैडी' वो चंकी बोले।

'ललित'

13.9.17
मनोरम

दिल किसी गम से न घिरता।
आँख से आँसू न गिरता।
तुम हमें यदि जान पाते।
प्यार को पहचान पाते।

जिंदगी का सार क्या है?
प्यार का उपहार क्या है?
काश ये दिल जान पाता
प्यार गम का दान दाता।

प्यार में भी क्यों छलावा।
नेह है या ये भुलावा।
हँस रहा हम पर जमाना
प्यार की फितरत न जाना।

ललित

मनोरम छंद
कुछ विचार यूँ ही

आँसुओं की मौन भाषा
दूर तक छाई निराशा।
क्या समझ आई किसी को
ढूँढती आँखें उसीको।

आँख सब कुछ बोल देती
राज दिल के खोल देती।
आँख की है कौन सुनता।
मौन नेता और जनता।

सब कहें अपनी कहानी।
रोटियाँ अपनी पकानी।
दर्द दिल में आह भरता
कौन दिल के घाव भरता।

घाव दिल का फूटता है
आँख आँसू टूटता है।
पर जमाना ढोंगियों का
गम न समझे रोगियों का।
ललित

मनोरम

कौन कैसे कब कहाँ ये
छोड़ जाएगा जहाँ ये।
सोचना है बेनतीजा।
हैं दुखी चाचा भतीजा।
ललित

मनोरम छंद
रायन विभीषिका से आहत मन को
शायद शब्द ही नहीं मिल रहे दुख प्रकट करने को......थ

क्या कहीं कुछ टूटता है?
हाथ से कुछ छूटता है?
क्या हवा कुछ है कसैली?
या महज ये है पहेली?

छाँव में भी धूप क्यूँ है?
प्रेम भी विद्रूप क्यूँ है?
रंग हर बेरंग क्यूँ है?
हर खुशी में जंग क्यूँ है?

आँख में आई नमी क्यों?
हर तरफ पसरी गमी क्यों?
शाम सा है क्यूँ सवेरा?
साँप के वश में सपेरा।

आज माता रो रही क्यूँ?
पुत्र-गम में खो रही क्यूँ?
नाग क्यूँ बसते चमन में?
विष भरा क्यूँ नाग फन में?

ललित

12.9.17
मनोरम

बाँसुरी का राग जैसा।
राधिका का नाच वैसा
छम छमा छम छम छमा छम।
दस दिशा गूँजे धमा धम।

है कन्हैया या गवैया।
बाँसुरी का वो बजैया।
कर्ण मधुरस से भरे वो।
स्वर्ग धरती पर धरे वो।
ललित

11.9.17
मनोरम

क्या हुआ जो है उदासी?
बात दुख देती जरा सी।
क्यूँ हृदय है आह भरता?
क्यूँ नयन से नीर झरता?

जब दुखों का दौर आता।
मित्र हर मुख मोड़ जाता।
तब दिलासा कौन देता?
कौन जो हर पीर लेता?

घेर लेती जब निराशा।
राम से ही एक आशा।
आत्म विश्वासी जनों का।
दूर दुख होता मनों का।

ललित

मनोरम
विवाहिता माडर्न

चाल है गजगामिनी सी।
आँख उसकी दामिनी सी।
पायलों को पैर तरसें
हाथ में चूड़ी न दरसें।

माथ पर बिन्दी न दीखे।
शर्म की चिन्दी न दीखे।
देखकर ऐसा नजारा
शर्म भी है बेसहारा।

ललित

11.9.17

मनोरम

ये सजा किस को दिला दी।
साधुओं को क्यों पिला दी?
सींखचों में बन्द क्यों हैं?
साधुओं में द्वंद क्यों है?

जो समाजों को चलाते
ज्ञान का दीपक जलाते।
क्यों वही निष्ठुर हुए हैं?
कुंद ज्यों झींगुर हुए हैं।

आततायी होगए क्यों?
आज साधू खो गए क्यों?
ईश को ढूँढे जमाना।
साधु की फितरत न जाना।

ललित

11.9.17
मनोरम
राशनों में प्यार पाया
प्यार क्या बस खार पाया?
भाषणों से क्या मिला है?
राशनों से घर चला है।

प्यार की मखमल पुरानी
टाट की कीमत न जानी।
प्रीत के ही मीत हैं सब।
रीत के मन मीत हैं कब?

क्यूँ समन्दर खार देता
प्यार किस पर वार देता।
प्यार का प्यासा समन्दर
गम लिए दिखता न अन्दर।

ललित

11.9.17

मनोरम छंद

संत का चोला हमारा
बेवकूफों का सहारा।
मूरखों की कब कमी है
आँख में जिनके नमी है।

प्यार से उसको निचोड़ा
जो गधा दिखता निगोड़ा।
एक दुनिया ही बसा ली
प्यार से पगड़ी कसा ली।

आज वो ही बादशा है
जो दिलों में जा बसा है।
ठीक औ' बेठीक क्या है
कायदे की लीक क्या है?

है जमीं प्यासी यहाँ पर।
और प्यासा है समन्दर।
प्यास जो इनकी बुझाता
वो जहाँ में है पुजाता।

ललित

10.9.17
कोशिशे गजल
2122 2122 2122 212
आ
नहीं

वो गजल कैसे लिखे जो जानता लिखना नहीं।
वो किसी को क्यूँ दिखे जो जानता दिखना नहीं।

खो गया है आज हर इक शख्श अपने आप में।
क्यूँ किसी का दिल रखे जो जानता रखना नहीं।

रात सपनों में समाई दिन गुजारा ख्वाब में।
टूटते ख्वाबों तुम्हें मैं चाहता चखना नहीं।

बात करते ख्वाब की वो तोड़ते जो ख्वाब हैं।
ख्वाब के दुश्मन तुम्हें मैं चाहता सहना नहीं।

क्रमशः

ललित

10.9.17
पीयूष वर्ष

जानकी श्री राम की अनुगामिनी।
कंटकों से कब डरी वह दामिनी।
जन्म लव-कुश को दिया वनवास में।
राम की यादें रही बस पास में।

'ललित'

9.9.17
पीयूष वर्ष

जिंदगी से क्या मिला है सोचिए?
बंदगी का क्या सिला है सोचिए?
जिंदगी में बंदगी कर लीजिए।
नाव भव से पार यूँ कर लीजिए।

ललित

8.9/17
पीयूष वर्ष
पहला प्रयास
समीक्षाहेतु

आदमी से आदमी की लूट में।
सत्य लिपटा फिर रहा है झूठ में।
औ' रहीमो-राम के ही वेश में।
ठग-लुटेरे हैं बसे इस देश में।

पीयूष वर्ष

प्यार में ही जिंदगी का सार है।
प्रीत से ही जिंदगी रसदार है।
जिंदगी प्यारे रसों की खान है।
आदमी बिन प्रेम के बेजान है।

जान की बाजी लगा दे प्रेम में।
आदमी क्यों कर दगा दे प्रेम में?
प्यार तो बस ईश का उपहार है।
हाय धन बिन प्यार भी दुश्वार है।

ललित

सार छंद

बसे राधिका के नैनों में,कान्हा बनकर कजरा ।
और कभी मन में हर्षाए,बनकर उसका गजरा।
कजरा गजरा पायल वेणी,झुमका और नथनिया।
सब कान्हा के दास बनें जब,राधा बने नचनिया।

ललित

6.9.17
पीयूष वर्ष

फूल करते प्यार का इजहार हैं।
कंटकों के भी दिलों में प्यार है।
प्रीत करना कंटकों का काम है।
फूल तो इजहार का इक नाम है।

ललित

6.9.17
पीयूष वर्ष

नैन कान्हा से जहाँ जिनके मिले।
मिट गए उनके दिलों के सब गिले।
श्याम की मीठी नजर जादू भरी।
राधिका की नींद रातों की हरी।
ललित

जिन्दगी
5.9.17
पीयूष वर्ष

प्यार की दीवानगी भी देख ली।
साधुओं की बानगी भी देखली।
देखना अब और क्या बाकी रहा?
साधुओं की नात में साकी रहा।

ललित
5.9.17
पीयूष वर्ष

क्यूँ नहीं मन ये कभी वश में रहे?
कामिनी के प्यार के गश में रहे।
संत, बाबा और सारे देवता।
अप्सराओं से सदा खाते खता।

5.9.17
पीयूष वर्ष

क्या चमकती बिजलियाँ कुछ दे सकीं?
या खनकती चूड़ियाँ कुछ दे सकीं?
आदमी की ये रही दुश्मन सदा।
कौन बच पाया कहर से याखुदा?

ललित

5.9.17
पीयूष वर्ष छंद
गुरू वन्दन

शिक्षकों से ज्ञान जो हमको मिला।
जिन्दगी है ये उसी का तो सिला।
तार देते हैं गुरू मझधार से।
ताड़ देते हैं बड़े ही प्यार से।

है गुरू औ' शिष्य का रिश्ता सरल।
घुल नहीं सकता कभी इसमें गरल।
हर गुरू को आज मैं करता नमन।
जब गुरू आशीष दें महके चमन।

'ललित'

पीयूष वर्ष

जिन्दगी से जो मिला कुछ कम नहीं।
हाथ खाली ही रहे कुछ गम नहीं।
या खुदा गम बेरहम उतना हुआ।
बागबाँ निश्चल निडर जितना हुआ।

'ललित'

4.9.17
पीयूष वर्ष छंद
2
समीक्षा हेतु

राधिका की प्रीत ऐसी श्याम से।
बावरी सी घूमती है शाम से।
पूछती है श्याम का सबसे पता।
बाग उपवन वृक्ष हो या हो लता।
ललित

4.9.17
पीयूष वर्ष
प्रथम प्रयास
समीक्षा हेतु

राधिका का श्याम सुंदर साँवरा।
भोर में वंशी बजाए बावरा।

गोपियाँ सब छोड़ घर के काम को।
भागती हैं देखने घन श्याम को।
ललित

3.9.17
ताटंक
करुण रस

नाम गुरू का जपते थे जो, ईश गुरू को माने थे। उन शिष्यों ने गुरु के गहरे,राज कहां कब जाने थे।
राज खुले जब दानव जैसे,गुरू के कारनामों के। शिष्यों के सिर झुके हुए थे,गुरू थे दास दामों के।

'ललित'

3.9.17

ताटंक छंद
करुण रस
राजस्थान की सत्य घटना पर आधारित

महिला गर्भवती थी लेटी,शल्य क्रिया करवाने को।
कली कोख में पनप चुकी जो,उसको जग में लाने को।
पेट चीर उसका दो डॉक्टर,आपस में झगड़े ऐसे।
मानवता की लाश वहाँ हो,टेबल पर सोई जैसे।

आधा घंटा बीत गया यूँ,लड़ते-लड़ते दोनों को।
शर्म नहीं आयी उन पापी,कुत्तों बहुत घिनौनों को।
जन्म नहीं ले पाई बेटी,दुनिया देख नहीं पाई।
माता अपनी उस बेटी को,जीवित देख नहीं पाई।
ललित

3.9.17
ताटंक छंद
करुण रस
पिछले दिनों कोटा की एक सत्य घटना पर आधारित एक वृद्ध ने आत्म हत्या की रेल से कटकर
...................
एक वृद्ध बाबा सज्जन था,उम्र पिचासी से ज्यादा।
बेटे और बहू ने डाली,जीवन में इतनी बाधा।

कटा रेल के नीचे जाकर,इक दिन घोर निराशा में।
लोग आत्महत्या कहते हैं,इसे लोक की भाषा में।

आस लिए जिसको पाला वह,बेटा हुआ पराया क्यों?
बेटा जनने को माता ने,नीलकण्ठ को ध्याया क्यों?

सोच-सोच दुख इतना होता,क्यूँ नर पशु बन जाता है।
मात-पिता के जीवन में यह,दारुण दुख क्यूँ आता है।

'ललित'

2.9.17
ताटंक

सत्य यही हमने जाना जब, घूम लिए दुनिया सारी।

धरा नहीं है सुंदर कोई,भारत सी जग में न्यारी।

बीस कोस पर बोली बदले,तीस कोस बदले भाषा।

प्रेम-प्यार से रहते हैं सब, उन्नति की मन में आशा।

ललित

02.09.17
ताटंक छंद
ईद दिवाली होली हो या,विजयादशमी का मेला।
क्रिसमस गुड फ्राईडे हो या,कावड़ियों का  हो रेला।
मिल-जुल हर त्यौहार मना लो,छोड़ कपट-छल की छाया।
धर्म अलग हैं लेकिन सारी,एक ईश की है माया।

'ललित'

01.09.17
ताटंक छंद
2

चाँद चाँदनी इक दूजे से,दूर कहाँ रह पाते हैं?
इक दूजे की साँसों में वो,अमृत बन घुल जाते हैं।
पर दुनिया वालों ने उनका,प्यार कहाँ कब है माना?
कहें चँदनिया को दीवानी,और चाँद को दीवाना।

ललित

01.09.17
ताटंक छंद
(1)
क्यूँ होता है अक्सर ऐसा,माँ छुप-छुप कर रोती है?
बेटा नजरें फेर रहा क्यूँ,सोच दुखी वो होती है।
माँ के अरमानों का सूरज,दिन में क्यूँ ढल जाता है?
एक अँधेरे कोने में फिर,बिस्तर क्यूँ डल जाता है?
(2)
फर्ज पिता का याद रहा पर,फर्ज पुत्र का छोड़ा क्यों?
बेटे को तो गले लगाया,मुख पापा से मोड़ा क्यों?
प्यार दिया पत्नी को पूरा,दिल माता का तोड़ा क्यों?
सोच जरा वो पापा तेरा,सारा जीवन दौड़ा क्यों?
'ललित'

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जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...