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अक्टूबर 2018 रचनाएँ




[04/10, 4:35 PM] ललित:
दोहा छंद

विषय:  माँ

बचपन में था पूछता,माँ से बहुत सवाल।
अब वो माँ से बोलता,काहे करे बवाल।।

दान  किये जप भी किये,तीरथ किये हजार।
माँ को जो बिसरा दिया,सब कुछ है बेकार।।

माँ के आँचल की जिसे,मिली हुई है छाँव।
हरदम सीधे बैठते,उसके सारे दाँव।।

माँ की याद सुवास सी,मन निर्मल हो जाय।
जैसे तुलसी आँगने,हरि की याद दिलाय।।

हरि का सुमिरन जो करे,माँ चरणों में बैठ।
हरि उसको आशीष दें,माँ के उर में पैठ।।

माँ साँसों में बस रही,माँ धड़कन,माँ प्राण।
माँ से उऋण न हो सके,सुत देकर भी जान।

'ललित'
[

[11/10, 6:21 PM] ललित:
चौपाई छंद

मोर-मुकुट पीताम्बर धारी,
केशव माधव कृष्ण मुरारी।

अर्जुन जैसे शिष्य तुम्हारे।
सखा सुदामा से हैं प्यारे।

गोप-गोपियों के बनवारी।
जय-जय-जय गोवर्धन-धारी।

तुम राधा के दिल की धड़कन।
महके तुमसे व्रज का कण-कण।

दोहा

बजे सुरीली बाँसुरी,सारी-सारी रात।
कृष्ण तुम्हारे रास में,गोपी भूले गात।

ललित
[12/10, 10:10 PM] ललित:
चौपाईयाँ

ठुमक-ठुमक कर चले कन्हैया।
देख-देख हर्षित हो मैया।

छम-छम-छम पैंजनिया बजती।
अधर मधुर बाँसुरिया सजती।

बजे बाँसुरी हौले-हौले।
आलौकिक मद से व्रज डोले।

मटकी ले जब निकलें सखियाँ।
मट-मट-मट मटकाए अँखियाँ।

मार कंकरी मटकी फोड़े।
गोपी पीछे-पीछे दौड़े।

देख हो रही मटकी खाली।
ग्वाल हँसें सब दे-दे ताली।

दोहे

मनभावन लीला करे,व्रज में माखन-चोर।
गोप-गोपियाँ सब कहें,जय-जय नंदकिशोर।

ललित
[13/10, 2:34 PM] ललित:
आदर्श अतिथि स्वागत

द्वारपाल संदेशा लाया।
मित्र सुदामा द्वारे आया।

सुना कन्हैया ने जैसे ही।
छोड़ दिया आसन वैसे ही।

दौड़ पड़े दर्शन करने वो।
प्रेम-सुधा वर्षण करने वो।

देख मित्र की जर्जर काया।
श्याम नयन में जल भर आया।

तुरत मित्र को गले लगाया।
कहा नहीं क्यों पहले आया?

सिंहासन पर मीत को,बिठा द्वारिकाधीश।
चरणों को निज अश्रु से,धोते हैं जगदीश।

ललित
क्रमशः
[13/10, 7:54 PM] ललित:
चौपाइयाँ
अतिथि भाग दो

सजल नयन थे रुँधे गले थे।
बचपन में वो लौट चले थे।

बात कर रहे दोनों मन की।
रही नहीं सुधि उनको तन की।

कहा कृष्ण ने मत सकुचाओ।
भाभी जी के हाल सुनाओ।

भेजी है क्या भेंट बताओ?
और नहीं अब मुझे सताओ।

मीत सुदामा अब सकुचाए।
तंदुल की क्या भेंट बताए?

दोहा

तंदुल की वो पोटली,कान्हा ने ली छीन।
चकित नयन से देखते,रहे सुदामा दीन।

ललित
[14/10, 3:30 PM] ललित:
चौपाइयाँ

सतरंगी दुनिया को देखा।
देखी बेरंग भाग्य-रेखा।

अपनों ने वो रंग दिखाए।
दूजा कोई रंग न भाए।

रंगों से मनती है होली।
रंग हाथ में बेरँग बोली।

रंग-बिरंगी जवाँ दिवाली।
मात-पिता की झोली खाली।

बदल गए अब सबके ढँग हैं।
रुपयों ने भी बदले रँग हैं।

पार्टी-ध्वज में जैसा रँग है।
वैसा नेता जी का ढँग है।

श्वेत रोशनी सूरज देता।
प्रिज्म उसे रंगीं कर लेता।

ऐसा ही कुछ हम भी कर लें।
नए रंग जीवन में भर लें।

दोहा

धुंधला कोई रंग है,कोई है रतनार।
हर रँग में नौका चला,मत छोड़े पतवार।

ललित
[16/10, 6:00 PM] ललित:
सार छंद
भूल-भुलैया

जीवन की ये भूल-भुलैया,सबको है भटकाती।
आती-जाती साँसों को ये,हौले से अटकाती।
कौन कहाँ कैसे जाएगा,छोड़ जगत का मेला?
जान नहीं पाता है कोई,कैसा है ये खेला?

ललित
[18/10, 6:41 PM] ललित:
चौपाई
पंचतत्त्व

पंचतत्त्व की देह बनाई,
आत्मा इक उसमें बिठलाई।

दूर बैठ दाता फिर देखे।
देह लिखे कर्मों के लेखे।

वही लेख फिर भाग्य बनाते।
कर्म समय से फल दिखलाते।

पुण्य करे कितने भी मानव।
नष्ट न हों कर्मों के दानव।

पाप कर्म से आत्मा रोके।
कदम-कदम पर नर को टोके।

पंचतत्त्व की देह से,मत कर इतना प्यार।
जितने इससे कर सके,कर ले तू उपकार।

ललित
[19/10, 7:44 PM] ललित:
चौपाई

जीत सत्य की होती आई,हरी जड़ें सच ने ही पाई।

सुंदर बुरका ओढ़ बुराई,चुपके से नर मन में आई।

कलियुग में दे सत्य दुहाई,विजय झूठ की देत दिखाई।

लेकिन इक दिन बुरका फटता,तभी झूठ से परदा उठता।

सत्य सामने जब आ जाता,झूठ नहीं फिर टिकने पाता।

दोहा

दामन थामे सत्य का,बढ़ मंजिल की ओर।
नहीं झूठ से छू सके,मंजिल का तू छोर।

ललित
[20/10, 7:49 AM] ललित:

चौपाई

जीत सत्य की होती आई,हरी जड़ें सच ने ही पाई।

सुंदर बुरका ओढ़ बुराई,चुपके से नर मन में आई।

कलियुग में दे सत्य दुहाई,विजय झूठ की देत दिखाई।

लेकिन इक दिन बुरका फटता,तभी झूठ से परदा हटता।

सत्य सामने जब आ जाता,झूठ नहीं फिर टिकने पाता।

दोहा

दामन थामे सत्य का,बढ़ मंजिल की ओर।
नहीं झूठ से छू सके,मंजिल का तू छोर।

ललित
[20/10, 8:39 PM] ललित:
चौपाई
अमृतसर दुखान्तिका

मौत कहाँ कैसे आएगी,
साथ किसे कब ले जाएगी?

जान कहाँ मानव है पाता,
दबे पाँव यम है आ जाता । 

साठ जनों को मौत दिखाई,
अमृतसर कैसा वो भाई।

कहीं न कोई पत्ता खड़का,
जलता रावण ऐसा भड़का।

मौत दौड़ती सरपट आई,
कहो कौन था वहाँ कसाई?

किसकी थी ये जिम्मेदारी,
लाशें बिछी धरा पर सारी।

दोहा

रोक सको तो रोक लो,
अनहोनी को आप।
वरना मौत कहाँ कभी,
देती अपनी थाप?

ललित
[21/10, 4:21 PM] ललित:
चौपाइयाँ

नाम राधिका का यदि जपते,
जीवन के ये पथ क्यों तपते?

राधा का जो नाम सुमिरते,
वो नर भवसागर से तरते।

नाम जपे हर पल राधा का।
नहीं उसे डर भव-बाधा का।

उसी कृष्ण को प्यारी राधा।
करे दूर जो सबकी बाधा।

राधा नाम उसे है प्यारा।
जो है जग का तारण-हारा।

जय-जय श्याम-राधिका प्यारे।
ताप-व्याधि हर सब नर तारे।

दोहा

राधा-राधा जो जपे,भव-सागर तर जाय।
दर्शन कान्हा के मिलें,आत्म-ज्ञान फल पाय।

ललित
[22/10, 7:27 PM] ललित:
मुक्तक 14:14

न समझे प्यार की भाषा,न खोले प्यार का खाता।
निगाहों  से हसीं दिलवर,नशीले तीर बरसाता।
बना अंजान वो फिरता,चलाकर तीर नजरों के।
यहाँ दिल है हुआ घायल,वहाँ वो गीत है गाता।

ललित
[27/10, 10:51 AM] ललित:
हरिगीतिका छंद

करवा चौथ स्पेशल

है आज करवा चौथ का व्रत,
                 आप ही तो खास हो।
मैं प्यार करतीे आपसे ही,
                 आज तो विश्वास हो।
व्रत आज ये मैंने रखा जी,
                  आपके हित के लिए।
ला दीजिए उपहार कोई,
                  इस पुजारिन के लिए।
                   
ललित
[27/10, 6:19 PM] ललित:
हरिगीतिका छंद

पूजा करूँगी मैं तुम्हारी,
             मान लो मनुहार तुम,
जो बन पड़े तुम से वही कुछ,
              आज दो उपहार तुम।
लो सूट ये पहनो नया तुम,
               और टाई घाल दो।
सेल्फी खिंचा कर साथ मेरे,
               फेस बुक पर डाल दो।
ललित
[27/10, 7:31 PM] ललित:
आधार छंद

नाक नथनियाँ झूमती,अधरों पर मुस्कान।

हार गले में नौलखा,चितवन तीर कमान।

पायल की छम-छम करे,खुशियों की बौछार।

सजनी के इस रूप पर,साजन जी कुर्बान।

ललित
[28/10, 8:06 PM] ललित:
कुण्डल छंद

जिंदगी किताब जान,ध्यान से पढ़ो जी।
शब्दों का गूढ़ अर्थ,जान तुम बढ़ो जी।
मित्र और अमित्र का,भेद जरा जानो।
शत्रु की मिठास भरी,बात नहीं मानो।

ललित
[28/10, 8:11 PM] ललित:
कुण्डल छंद

देख दिवाली मकान,साफ कर लिया है।
फालतू कबाड़ खूब,बेच भी दिया है।
लेकिन मन का न मैल,छूट हाय पाया।
जाए न मन को छोड़ ,अंत हीन माया।

ललित

अक्टूबर 2018 रचनाएँ

[01/10, 7:26 PM] ललित:
एक नया समसामयिक

🙏🙂🙏
मनहरण घनाक्षरी

कैसी ये हवाएँ चली।
भूले सब गाँव गली।
शहर की आबोहवा
रास बड़ी आ रही।

कंकरीट के ये जाल।
अँधियारे ये विशाल।
आड़ में जिनकी शर्मो
हया खोती जा रही।

द्वार द्वार के है पास।
जानकारी नहीं खास।
पड़ोसी न आए रास।
प्राईवेसी खा रही।

पूरी हुई अब साध।
पाप नहीं अपराध।
पापों की नगरिया ये।
सबको लुभा रही।

ललित
[02/10, 12:45 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

राधा जी का प्यारा नाम।
जपे जा तू आठों याम।
कभी न कभी तो श्याम।
तेरे पीछे आएगा।

राधा जी सुखों का धाम।
पीछे-पीछे चले श्याम।
राधा जी का नाम तुझे।
श्याम से मिलाएगा।

दुनिया से मिले घाव।
भँवर में फँसी नाव।
राधा-राधा जप तुझे।
दुख न सताएगा।

राधा का गुलाम श्याम।
उसे प्यारा राधा नाम।
राधा-राधा जपे जा तू।
भव तर जाएगा।

ललित
[02/10, 3:28 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी
भ्रूण हत्या

मैया तू है एक नारी।
फिर काहे मैं बिसारी।
जग में आने दे मुझे।
कच्ची हूँ अभी कली।

तेरे जैसे नैन-नक्श।
और पापा जैसा अक्स।
सुंदर परी मैं ऐसी।
जैसे साँचे में ढली।

देखना है जग मुझे।
चढ़ने हैं नग मुझे।
जरा पकने दे अभी।
पकी नहीं ये फली।

काम बड़े करूँगी मैं।
देश-हित लड़ूँगी मैं।
सिद्ध कर दूँगी बेटे
से है बिटिया भली।

ललित

मनहरण घनाक्षरी
भ्रूण हत्या

मैया तू है एक नारी।
मुझे काहे को बिसारी।
जग में आने दे मुझे।
कच्ची हूँ अभी कली।

तेरे जैसे नैन-नक्श।
और पापा जैसा अक्स।
सुंदर परी मैं ऐसी।
जैसे साँचे में ढली।

देखना है जग मुझे।
चढ़ने हैं नग मुझे।
जरा पकने दे अभी।
पकी नहीं ये फली।

काम बड़े करूँगी मैं।
देश-हित लड़ूँगी मैं।
सिद्ध कर दूँगी बेटे
से है बिटिया भली।

ललित
[02/10, 8:00 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

रूप रंग का खुमार
उतरेगा कब यार।
वृद्धावस्था जिंदगी में
घुसी चली आ रही।

हो रहे सफेद बाल
खिंचने लगी है खाल।
नौजवानी खूब तेरे
दिल पे है छा रही।

धुँधला गई है आँख
मन को लगे हैं पाँख।
कामनाएँ नित नई
मन को लुभा रही।

अब तो समझ यार
जिंदगी के दिन चार।
कर ले भजन वर्ना
नाव डूबी जा रही।

ललित
[04/10, 4:35 PM] ललित:
दोहा छंद

विषय:  माँ

बचपन में था पूछता,माँ से बहुत सवाल।
अब वो माँ से बोलता,काहे करे बवाल।।

दान  किये जप भी किये,तीरथ किये हजार।
माँ को जो बिसरा दिया,सब कुछ है बेकार।।

माँ के आँचल की जिसे,मिली हुई है छाँव।
हरदम सीधे बैठते,उसके सारे दाँव।।

माँ की याद सुवास सी,मन निर्मल हो जाय।
जैसे तुलसी आँगने,हरि की याद दिलाय।।

हरि का सुमिरन जो करे,माँ चरणों में बैठ।
हरि उसको आशीष दें,माँ के उर में पैठ।।

माँ साँसों में बस रही,माँ धड़कन,माँ प्राण।
माँ से उऋण न हो सके,सुत देकर भी जान।

'ललित'
[07/10, 12:39 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

दिल में अशांतिवास
शांति क्यों नहीं है पास?
गली-गली खोजता हूँ
शांति नहीं मिलती।

तांडव है चारों ओर।
दानव मचाएँ शोर।
खूब सींचूँ दिल की ये
कली नहीं खिलती।

नैन बंद कर देखा
टेढी मिली भाग्य-रेखा।
लाख करूँ जतन ये
रेखा नहीं हिलती।

पड़ गई एक बार
यदि दिल में दरार।
किसी सुई-धागे से वो
कभी नहीं सिलती।

ललित
[07/10, 5:38 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

माली को पुष्पों से प्यार
फूलों से ही है बहार।
रानियों का ये श्रृंगार
सुमनों से जिन्दगी।

सौरभ फूलों का सार
खुशबू बढ़ाए प्यार।
सुमनों से हार जाती
काँटों की दरिंदगी।

सब की यही है चाह।
फूलों से भरी हो राह।
सुमन हैं दुनिया में।
सबकी पसन्दगी।

वन-उपवन बाग
बाँसुरी के सब राग।
करते हैं फूलों से ही
कान्हा जी की बन्दगी।

ललित
[07/10, 7:41 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी
3
भूलकर भूख-प्यास।
छोड़कर रंग-रास।
बागबाँ रहा था सदा
बाग को सँवारता।

कलियों पे था निखार
बागबाँ हुआ निसार।
प्यार भरी अँखियों से
बाग को निहारता।

कलियाँ जो बनी फूल।
बागबाँ को गई भूल।
बाग और बागबाँ से
दिल में न प्यार था।

सूना हुआ सारा बाग।
फूल सब गए भाग।
बागबाँ तो सुमनों की
खुशी पे निसार था।

ललित
[08/10, 6:20 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी

चाहे जपो राम नाम।
चाहे कहो सीताराम।
राम जी का ध्यान धर
सारे काम करिए।

चाहे जपो राधा नाम।
चाहे कहो राधेश्याम।
राधा-कृष्ण चरणों में
ध्यान नित धरिए।

नारायण जपो नाम
धन-धान्य-लक्ष्मी धाम।
आती-जाती साँस सँग
पुण्य-झोली भरिए।

दुखागर मृत्युलोक
प्रभु चरणों में ढोक।
विनती प्रभु से करो।
सारे दुख हरिए।

ललित
[11/10, 6:21 PM] ललित:
चौपाई छंद

मोर-मुकुट पीताम्बर धारी,
केशव माधव कृष्ण मुरारी।

अर्जुन जैसे शिष्य तुम्हारे।
सखा सुदामा से हैं प्यारे।

गोप-गोपियों के बनवारी।
जय-जय-जय गोवर्धन-धारी।

तुम राधा के दिल की धड़कन।
महके तुमसे व्रज का कण-कण।

दोहा

बजे सुरीली बाँसुरी,सारी-सारी रात।
कृष्ण तुम्हारे रास में,गोपी भूले गात।

ललित
[12/10, 10:10 PM] ललित:
चौपाईयाँ

ठुमक-ठुमक कर चले कन्हैया।
देख-देख हर्षित हो मैया।

छम-छम-छम पैंजनिया बजती।
अधर मधुर बाँसुरिया सजती।

बजे बाँसुरी हौले-हौले।
आलौकिक मद से व्रज डोले।

मटकी ले जब निकलें सखियाँ।
मट-मट-मट मटकाए अँखियाँ।

मार कंकरी मटकी फोड़े।
गोपी पीछे-पीछे दौड़े।

देख हो रही मटकी खाली।
ग्वाल हँसें सब दे-दे ताली।

दोहे

मनभावन लीला करे,व्रज में माखन-चोर।
गोप-गोपियाँ सब कहें,जय-जय नंदकिशोर।

ललित
[13/10, 2:34 PM] ललित:
आदर्श अतिथि स्वागत

द्वारपाल संदेशा लाया।
मित्र सुदामा द्वारे आया।

सुना कन्हैया ने जैसे ही।
छोड़ दिया आसन वैसे ही।

दौड़ पड़े दर्शन करने वो।
प्रेम-सुधा वर्षण करने वो।

देख मित्र की जर्जर काया।
श्याम नयन में जल भर आया।

तुरत मित्र को गले लगाया।
कहा नहीं क्यों पहले आया?

सिंहासन पर मीत को,बिठा द्वारिकाधीश।
चरणों को निज अश्रु से,धोते हैं जगदीश।

ललित
क्रमशः
[13/10, 7:54 PM] ललित:
चौपाइयाँ
अतिथि भाग दो

सजल नयन थे रुँधे गले थे।
बचपन में वो लौट चले थे।

बात कर रहे दोनों मन की।
रही नहीं सुधि उनको तन की।

कहा कृष्ण ने मत सकुचाओ।
भाभी जी के हाल सुनाओ।

भेजी है क्या भेंट बताओ?
और नहीं अब मुझे सताओ।

मीत सुदामा अब सकुचाए।
तंदुल की क्या भेंट बताए?

दोहा

तंदुल की वो पोटली,कान्हा ने ली छीन।
चकित नयन से देखते,रहे सुदामा दीन।

ललित
[14/10, 3:30 PM] ललित:
चौपाइयाँ

सतरंगी दुनिया को देखा।
देखी बेरंग भाग्य-रेखा।

अपनों ने वो रंग दिखाए।
दूजा कोई रंग न भाए।

रंगों से मनती है होली।
रंग हाथ में बेरँग बोली।

रंग-बिरंगी जवाँ दिवाली।
मात-पिता की झोली खाली।

बदल गए अब सबके ढँग हैं।
रुपयों ने भी बदले रँग हैं।

पार्टी-ध्वज में जैसा रँग है।
वैसा नेता जी का ढँग है।

श्वेत रोशनी सूरज देता।
प्रिज्म उसे रंगीं कर लेता।

ऐसा ही कुछ हम भी कर लें।
नए रंग जीवन में भर लें।

दोहा

धुंधला कोई रंग है,कोई है रतनार।
हर रँग में नौका चला,मत छोड़े पतवार।

ललित
[16/10, 6:00 PM] ललित:
सार छंद
भूल-भुलैया

जीवन की ये भूल-भुलैया,सबको है भटकाती।
आती-जाती साँसों को ये,हौले से अटकाती।
कौन कहाँ कैसे जाएगा,छोड़ जगत का मेला?
जान नहीं पाता है कोई,कैसा है ये खेला?

ललित
[18/10, 6:41 PM] ललित:
चौपाई
पंचतत्त्व

पंचतत्त्व की देह बनाई,
आत्मा इक उसमें बिठलाई।

दूर बैठ दाता फिर देखे।
देह लिखे कर्मों के लेखे।

वही लेख फिर भाग्य बनाते।
कर्म समय से फल दिखलाते।

पुण्य करे कितने भी मानव।
नष्ट न हों कर्मों के दानव।

पाप कर्म से आत्मा रोके।
कदम-कदम पर नर को टोके।

पंचतत्त्व की देह से,मत कर इतना प्यार।
जितने इससे कर सके,कर ले तू उपकार।

ललित
[19/10, 7:44 PM] ललित:
चौपाई

जीत सत्य की होती आई,हरी जड़ें सच ने ही पाई।

सुंदर बुरका ओढ़ बुराई,चुपके से नर मन में आई।

कलियुग में दे सत्य दुहाई,विजय झूठ की देत दिखाई।

लेकिन इक दिन बुरका फटता,तभी झूठ से परदा उठता।

सत्य सामने जब आ जाता,झूठ नहीं फिर टिकने पाता।

दोहा

दामन थामे सत्य का,बढ़ मंजिल की ओर।
नहीं झूठ से छू सके,मंजिल का तू छोर।

ललित
[20/10, 7:49 AM] ललित:

चौपाई

जीत सत्य की होती आई,हरी जड़ें सच ने ही पाई।

सुंदर बुरका ओढ़ बुराई,चुपके से नर मन में आई।

कलियुग में दे सत्य दुहाई,विजय झूठ की देत दिखाई।

लेकिन इक दिन बुरका फटता,तभी झूठ से परदा हटता।

सत्य सामने जब आ जाता,झूठ नहीं फिर टिकने पाता।

दोहा

दामन थामे सत्य का,बढ़ मंजिल की ओर।
नहीं झूठ से छू सके,मंजिल का तू छोर।

ललित
[20/10, 8:39 PM] ललित:
चौपाई
अमृतसर दुखान्तिका

मौत कहाँ कैसे आएगी,
साथ किसे कब ले जाएगी?

जान कहाँ मानव है पाता,
दबे पाँव यम है आ जाता । 

साठ जनों को मौत दिखाई,
अमृतसर कैसा वो भाई।

कहीं न कोई पत्ता खड़का,
जलता रावण ऐसा भड़का।

मौत दौड़ती सरपट आई,
कहो कौन था वहाँ कसाई?

किसकी थी ये जिम्मेदारी,
लाशें बिछी धरा पर सारी।

दोहा

रोक सको तो रोक लो,
अनहोनी को आप।
वरना मौत कहाँ कभी,
देती अपनी थाप?

ललित
[21/10, 4:21 PM] ललित:
चौपाइयाँ

नाम राधिका का यदि जपते,
जीवन के ये पथ क्यों तपते?

राधा का जो नाम सुमिरते,
वो नर भवसागर से तरते।

नाम जपे हर पल राधा का।
नहीं उसे डर भव-बाधा का।

उसी कृष्ण को प्यारी राधा।
करे दूर जो सबकी बाधा।

राधा नाम उसे है प्यारा।
जो है जग का तारण-हारा।

जय-जय श्याम-राधिका प्यारे।
ताप-व्याधि हर सब नर तारे।

दोहा

राधा-राधा जो जपे,भव-सागर तर जाय।
दर्शन कान्हा के मिलें,आत्म-ज्ञान फल पाय।

ललित
[22/10, 7:27 PM] ललित:
मुक्तक 14:14

न समझे प्यार की भाषा,न खोले प्यार का खाता।
निगाहों  से हसीं दिलवर,नशीले तीर बरसाता।
बना अंजान वो फिरता,चलाकर तीर नजरों के।
यहाँ दिल है हुआ घायल,वहाँ वो गीत है गाता।

ललित
[27/10, 10:51 AM] ललित:
हरिगीतिका छंद

करवा चौथ स्पेशल

है आज करवा चौथ का व्रत,
                 आप ही तो खास हो।
मैं प्यार करतीे आपसे ही,
                 आज तो विश्वास हो।
व्रत आज ये मैंने रखा जी,
                  आपके हित के लिए।
ला दीजिए उपहार कोई,
                  इस पुजारिन के लिए।
                   
ललित
[27/10, 6:19 PM] ललित:
हरिगीतिका छंद

पूजा करूँगी मैं तुम्हारी,
             मान लो मनुहार तुम,
जो बन पड़े तुम से वही कुछ,
              आज दो उपहार तुम।
लो सूट ये पहनो नया तुम,
               और टाई घाल दो।
सेल्फी खिंचा कर साथ मेरे,
               फेस बुक पर डाल दो।
ललित
[27/10, 7:31 PM] ललित:
आधार छंद

नाक नथनियाँ झूमती,अधरों पर मुस्कान।

हार गले में नौलखा,चितवन तीर कमान।

पायल की छम-छम करे,खुशियों की बौछार।

सजनी के इस रूप पर,साजन जी कुर्बान।

ललित
[28/10, 8:06 PM] ललित:
कुण्डल छंद

जिंदगी किताब जान,ध्यान से पढ़ो जी।
शब्दों का गूढ़ अर्थ,जान तुम बढ़ो जी।
मित्र और अमित्र का,भेद जरा जानो।
शत्रु की मिठास भरी,बात नहीं मानो।

ललित
[28/10, 8:11 PM] ललित:
कुण्डल छंद

देख दिवाली मकान,साफ कर लिया है।
फालतू कबाड़ खूब,बेच भी दिया है।
लेकिन मन का न मैल,छूट हाय पाया।
जाए न मन को छोड़ ,अंत हीन माया।

ललित

सितम्बर 2018


मनोरम छंद

जय श्री राधेकृष्णा...!

~~~~💝~~~~💝~~~~💝~~~

बाँसुरी सौतन सरीखी,फिर अधर पर आज दीखी।

राधिका ने रार ठानी,श्याम की लीला न जानी।

वेणु वो क्यों कर बजाता,नैन क्यों नटखट नचाता ?

जान ये राधा न पाए,फेरकर मुख बैठ जाए।

पुष्प ले फिर श्याम आता,केश राधा के सजाता।

मुस्कुरा बहियाँ मरोड़े,हाथ राधा का न छोड़े।

राधिका कुछ सकपकाई,श्याम सम्मुख मुस्कुराई।

नैन कान्हा से मिलाए,बाँसुरी खुद ही बजाए।

~~~~💝~~~~💝~~~~💝~~~~

ललित किशोर 'ललित'



मनोरम छंद
प्रकृति

चाँदनी ऐसी दिवानी।
पूर्णमासी की जवानी।
चाँद भी है शीत सुंदर।
प्रीत का प्यासा समंदर।

चाँदनी जो हो गई गुम।
होगया वो चाँद गुमसुम।
हाय धोखा दे गई क्यों?
चैन दिल का ले गई क्यों?

ललित
[02/09, 1:03 PM] ललित:
मनोरम छंद

आ गया व्रजधाम में वो।
गोपियों के ग्राम में वो।
बाँसुरीधर ग्वाल छुटका।
नंद का गोपाल छुटका।

माँ यशोदा का दुलारा।
गोपियों का श्याम कारा।
राधिका का बावरा वो।
गोपियों का साँवरा वो।

गोप-ग्वालों का कन्हैया।
रास का नटखट नचैया।
बाँसुरी जब भी बजाए।
प्रीत के ही सुर सजाए।

चोर माखन का निराला।
बाँट देता हर निवाला।
मोर पंखी मुकुट धारी।
प्रेम का पक्का पुजारी।

क्रमशः
ललित
[02/09, 5:03 PM] ललित: 2
मनोरम छंद

मुस्कुराहट का खजाना।
गम उदासी को न जाना।
हर दुखी की पीर हरता।
नाव सब की पार करता।

ललित
[03/09, 8:18 AM] ललित:
मनोरम छंद

जन्म दिन शुभकामना है
साँवरे   मनमोहना     हे!
माँ यशोदा को बधाई
नंद बाबा  दें    दुहाई।

धन्य राधा धन्य व्रज है।
धन्य गोकुलधाम-रज है।
धन्य हैं सब गोप-ग्वाले।
धन्य माखन के निवाले।

धन्य भारत की धरा है।
धन्य यमुना को करा है।
धन्य वंशी गुंज माला।
मोरपंखी ताज वाला।

रास अब दिन-रात करना।
आत्म-रस बरसात करना।
हर असुर का नाश हो अब।
नष्ट दुख का पाश हो अब।

ललित
[03/09, 3:36 PM] ललित:
छलिया घनश्याम
निश्चल छंद

राधा जी की रूप माधुरी,ललित ललाम।
चकित नैन कनखी से निरखे,मनहर श्याम।

अँखियों ही अँखियों से पीता, माखन चोर।
राधा के नैनों की मदिरा,वो नित भोर।

ऐसा जादू करता छलिया,वो घनश्याम।
खिंची चली आती है राधा,सुबहो शाम।

गोप-गोपियाँ हँसी उड़ायें,दे दे ताल।
वो नटखट नैना मटकाए,चूमे गाल।

कैसे कैसे नाच नचाता,नटवर श्याम।
आत्मानंदी रास रचाता,वो निष्काम।

मधुर बाँसुरी से छेड़े कुछ,ऐसी तान।
आलौकिक मद से भर देता,सबके कान।

जादू की मुरली ले आया,माखन चोर।
बजा मधुर वंशी खींचे वोे,मन की डोर।

व्रज का छोरा बरसाने की,छोरी साथ।
जोरा-जोरी करे छुड़ाए,गोरी हाथ।

ललित
[03/09, 5:54 PM] ललित:

मेरी एक रचना
२१२२ २१२२ २१२२ २१२

आज घड़ियां नन्द घर आनंद की हैं छा रही ,
बावरी बनकर यशोदा आज है हरखा रही  ।

कृष्ण आने की ख़ुशी दिल में उभर कर आ गई ,
गाँव गोकुल की सभी गलियाँ दिए सजवा रही ।

माँ यशोदा पारणा में लाल को झूला रही ,
गीत , हालरडा बहुत अरमान से है गा रही ।

[03/09, 8:03 PM] ललित:
मनोरम छंद

श्याम मथुरा चल दिया क्यों?
राधिका से छल किया क्यों?
साथ छोड़ा बाँसुरी का।
रुख किया मथुरा पुरी का।

हो गया क्यों श्याम ऐसा?
रास के बिन चैन कैसा?
गोपियों से दूर जाकर।
क्या मिला व्रज को भुलाकर?

ललित
[04/09, 10:15 AM] ललित:
मनोरम छंद

पायलों की छम-छमा-छम।
बाँसुरी की मस्त सरगम।
बादलों की गड़-गड़ाहट।
जन्म की हर द्वार आहट।

काँपते सारे असुर हैं।
जन्मते कान्हा चतुर हैं।
ढोल-बजते हर गली में।
ख्वाब सजते हर कली में।

माँ यशोदा नंद बाबा।
गोपियों की कांंति आभा।
चाँद तारों सी बढ़ी है।
आ गयी प्यारी घड़ी है।

क्रमशः
ललित
[04/09, 2:21 PM] ललित: मनोरम छंद
2

झूमते हैं गोप-ग्वाले।
आगए मोहन निराले।
भोग माखन का लगेगा।
रास में अब व्रज जगेगा।

दूर होंगें कष्ट सारे।
मित्र सबके श्याम प्यारे।
पीर सब की ही हरेंगें।
पार हर नैया करेंगें।

ललित
[05/09, 5:21 PM] ललित: मनोरम छंद
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित रचना

ज्ञान का दीपक जलाकर।
शिष्य का हर-पल भलाकर।
'राज' गुरुवर मुस्कुराते।
शिष्य को दर्पण दिखाते।

छंद-लय का ज्ञान देते।
मूल्य विद्या का न लेते।
'राज' से शिक्षक जहाँ हों।
क्यों न शारद माँ वहाँ हों?

कर रहे साहित्य सेवा।
चाहिए उनको न मेवा।
'राज' अब डॉक्टर बने हैं।
मूँछ अरु भौंहें तने हैं।

है 'ललित' का कोटि वंदन।
ये गुरू हैं या कि चंदन?
फैलती सौरभ दिशा-दस।
शीश चरणों में धरूँ बस।

ललित
[06/09, 2:15 PM] ललित: मनोरम छंद

रंग गिरगिट सा बदलते।
छातियों पर मूँग दलते।
आपकी दुर्भावनाएँ।
वोट की ये कामनाएँ।

अब सहन होती नहीं हैं।
काँच वो मोती नहीं हैं।
मोतियों का मूल्य जानो।
काँच को मोती न मानो।

ललित
[06/09, 6:13 PM] ललित:
मनोरम छंद

आदमी से आदमी को।
बाँट डाला इस जमीं को।
दुष्टता की लाँघ सीमा।
मुस्कुराते आप धीमा।

क्यों नहीं हो सोच पाते?
जब नए कानून लाते।
क्या गलत है क्या सही है?
गंग उल्टी क्यों बही है?

ललित
[07/09, 8:30 AM] ललित:
मुक्तक

फूल एक दिन मुख मोड़ेंगें,माली ने ये था माना ।
फूलों की फितरत से माली,नहीं रहा था अंजाना।
अपना फर्ज मान कर उसने,सींचा था फुलवारी को।
फूलों की दुनिया से नाता,तोड़ चला वो दीवाना।

ललित
[07/09, 10:35 AM] ललित: घोड़ों के पैरों को बाँधा,दिए गधों के पंख लगा।
माटी के सब पुतले हैं क्यों,एक पराया एक सगा ?
वोटों के चक्कर में कैसी,दगा आप हो कर बैठे ?
बहुत देर से जागा लेकिन,अब है सारा देश जगा।

ललित
[07/09, 6:47 PM] ललित:
लावणी मुक्तक

कान्हा के सिर मोरपंख जब,धीरे-धीरे हिलता है।
राधा के कोमल दिल में तब,सुमन प्यार का खिलता है।
पुण्य किए क्या मोरपंख ने,जो उसको सिर धार लिया?
सोचे राधा मोरपंख ये,इतराता क्यूँ मिलता है?

ललित
[07/09, 7:59 PM] ललित:

लावणी मुक्तक

मोरपंख कान्हा के सिर जब,धीरे-धीरे हिलता है।
राधा के कोमल दिल में तब,सुमन प्यार का खिलता है।
पुण्य किए क्या मोरपंख ने,जो उसको सिर धार लिया?
सोचे राधा मोरपंख ये,इतराता क्यूँ मिलता है?

ललित
[08/09, 7:11 PM] ललित:
मनोरम छंद

जो निराली नार है ये।
जिंदगी का सार है ये।
जन्म नर को नार देती।
और उसको प्यार देती।

है खुशी का ये खजाना।
हारना इसने न जाना।
प्यार का उपहार देती।
दो कुलों को तार देती।

ललित

[09/09, 11:57 AM] ललित:
मुक्तक क्रमाँक -1
16:12

क्योंं रे कान्हा यमुनातट पर,काहे धूम मचाई?

गोप-गोपियों के सँग कमसिन,राधा खूब नचाई।

सारी रात रास करने से,मिला तुझे क्या कान्हा?

मुरली की सब धुनें बजा दी,या दो-चार बचाई?

ललित
[09/09, 1:14 PM] ललित:
मुक्तक क्रमाँक -2
16:12

जितना रगड़ो उतना जैसे,स्वर्ण चमकता जाता।

रूप सवर्णों का भी वैसे,और दमकता जाता।

इनको और दबाना अब है,मुश्किल ओ मोदी जी।

इनकी आँखों में गुस्सा नित,और धमकता जाता।

ललित
[09/09, 7:56 PM] ललित:
मुक्तक -3
16:12

छोटी सी ये आद्या रानी,कितनी प्यारी- प्यारी?
है दादू की राज-दुलारी,दुनिया भर से न्यारी।
घर भर में फुदकी फिरती है,इक पल चैन न लेती।
मुस्कानें हैं ऐसी जैसे,हो फूलों की क्यारी।

ललित

मेरी पोती को समर्पित
[10/09, 6:22 PM] ललित:
आल्हा छंद
1
गोरी राधा श्यामल कान्हा,
रंग-रँगीला है व्रजधाम।

व्रज के कण-कण में है राधा,
और बसे हर कण में श्याम।

कान्हा के उर में बसती है,
राधा बरसाने की शान।

राधा का जो नाम जपेगा,
श्याम रखेंगें उसकी आन।

ललित
[10/09, 9:27 PM] ललित:
आल्हा छंद
2
जला दिया हर उस टायर को,
जिससे महँगा था पेट्रोल।

तोड़े शीशे उन कारों के,
जिनका महँगाई में रोल।

बीच सड़क पर पीटा उनको,
जिनकी थी कुछ सस्ती जान।

सस्ताई अब हो जाएगी,सोच  रहा है हिंदुस्तान।

ललित
[11/09, 2:44 PM] ललित:
आल्हा छंद
1
बदल गई सब परिभाषाएँ,
बदले सब आचार-विचार।

निर्विकार वो कहलाते हैं,
जिनके मन में भरे विकार।

फटे वस्त्र से बढ़ती शोभा,
धनवानों की वैसे आज।

साजों का पारंगत जैसे,
बजा रहा हो बिगड़े साज।

ललित
[11/09, 6:15 PM] ललित:
आज के समाचार पर

आल्हा छंद
2

घूँघट खुलते ही कलियों की,
छिन जाती हो जब मुस्कान।

कैसे मानें आजादी की,
साँस ले रहा हिंदुस्तान?

नारों और चुनावों में ही,
खोए हों जो पक्ष-विपक्ष।

नारी की रक्षा करने में,
क्यों कर होंगें वो सब दक्ष?

ललित
[13/09, 7:50 AM] ललित:
कुण्डलिया छंद
गजानन

राजा महा गजानना,आये तेरे द्वार।
हाथ जोड़ विनती करे,कायसृजन परिवार।

काव्यसृजन परिवार,विनायक आस लगाये।
कर दो ये उपकार,कभी भी विघ्न न आये।

'ललित' सहित कविराज, रचें नित रचना ताजा।
प्रथम पूज्य हो आप,गजानना महा राजा।

ललित

2
[14/09, 10:27 AM] ललित:
कुछ दोहे

हिंदी में ही बोलिए,अंग्रेजी को भूल।
हिंदी की सुरताल से,झड़ें लबों से फूल।।

हिंदी में जो शान है,उसको तू पहचान।
इतना निश्चय जान ले,हिंदी तेरी जान।।

हिंदी में जो लिख सके,वो है बड़ा अमीर।
हिंदी को जो पढ़ सके,खुल जाए तकदीर।।

राधे-राधे बोलता,हिंदी में जो आज।
उसके पीछे डोलता,कान्हा करता नाज।।

हिंदी में जो मान है,हिंदी में जो प्यार।
दूजी भाषा में नहीं,देखा सब संसार।।

'ललित'
[14/09, 3:01 PM] ललित:
कुण्डलिनी छंद
हिंदी

हिंदी में ही बोलिए,अपने मन की बात।
अपनों से होगी तभी,अपनेपन की बात।

अपनेपन की बात,बनाए सबको अपना।
वरना तो संसार,सदा लगता है सपना।

ललित
[14/09, 4:35 PM] ललित:
आल्हा छंद

मधुर-मधुर कविताएँ लिख दो,
मधुर-मधुर छंदों के साथ।

झूम रहे हैं साजन-सजनी,
लिए हुए हाथों में हाथ।

हिंदी भाषा में छंदों की,
पाओगे नित नई बहार।

हिंदी में कुछ ऐसा लिख दो,
झूम उठें पढ़कर नर-नार।

ललित
[14/09, 6:43 PM] ललित:
आल्हा छंद

भारत की जो प्यारी भाषा,
करती है हर दिल पर राज।

माँ शारद के मुख से निकली,
भाषाओं की वो सरताज।

रंग-रँगीली छैल-छबीली,
रहती सबके दिल के पास।

शब्द-शब्द महके है जिसका,
हिंदी है वो भाषा खास।

ललित
[15/09, 9:20 PM] ललित:
आल्हा छंद

हिंद देश की जनता अब तो,
गहरी नींदों से तू जाग।

जला रहे हैं कुछ अपने ही,
तेरे सपनों का ये बाग।

लोकतंत्र का गला घोंटकर,
वोटतंत्र में डूबा राज।

नहीं अगर अब रोक लगाई ,
बढ़ती जाएगी ये खाज।

ललित

[[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद
1

ओ कान्हा कारे,मत तरसा रे,
दर्शन दे इक बार।

गोवर्धन-धारी,कृष्ण-मुरारी,
मान जरा मनुहार।

ओ रास रचैया,धेनु चरैया,
आ जा नंदकुमार।

वृषभानु-दुलारी,राधा प्यारी,
भूली सब संसार।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद

3

नाचो ओ राधा,क्या है बाधा,
सुनो मुरलिया तान।

मनमोहन ग्वाला,मुरली वाला, वारे तुझ पर जान।

करताल बजाएँ,धूम मचाएँ,
ग्वाले कर गुणगान।

ये मुरली प्यारी,सौतन न्यारी,
मधुरस की है खान।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद
2

जग से है न्यारा,सबसे प्यारा,
कान्हा नंदकुमार।

वृषभानु-दुलारी,राधा प्यारी,
करती जिससे प्यार।

नैना मटकावे,मधुर बजावे,
वंशी कृष्ण-मुरार।

यमुना के तीरे,धीरे-धीरे,
झूमें सब नर-नार।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:

मरहटा छंद

नाचो ओ राधा,क्या है बाधा,
सुनो मुरलिया तान।

मनमोहन ग्वाला,मुरली वाला, वारे तुझ पर जान।

करताल बजाएँ,धूम मचाएँ,
ग्वाल करें गुणगान।

ये मुरली प्यारी,सौतन न्यारी,
मधुरस की है खान।
ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित: मरहटा छंद
विरह

ओ बदरा कारे,सुनता जारे,आज हृदय की पीर।

परदेश गए रे,साजन मेरे,
रखा न जाए धीर।

अब मिले न चैना,कटे न रैना,
विरह रहा दिल चीर।

कहना रसिया से,मन-बसिया से,
नैन बहाएँ नीर।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित: आज उज्जैन में महाकाल के दर्शन का लाभ मिला और यह छंद बना.....

🙏🌷👏
मरहटा छंद
जय महाकाल

शिवशंकर भोले,बम-बम बोले,जीवन के आधार।

उज्जयनी नगरेे,ज्योतिर्लिँग रे,
कर दे बेड़ा पार।

गल सर्प भयंकर,तू अभयंकर,
गले मुण्ड की माल।

भोले अविनाशी,हे कैलाशी, महाकाल बन ढ़ाल।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद
जय महाकाल

इक लोटा जल मैं,कनकी फल मैं,
नित्य चढ़ाऊँ नाथ।

फल-फूल चढ़ाऊँ,बेल चढ़ाऊँ,
धरूँ चरण में माथ।

करुणाकर भोले,नैया डोले,
बीच भँवर दे साथ।

शिव पार करा ये,नाव जरा ये,
थाम भक्त का हाथ।

ललित

[18/11, 3:26 PM] ललित:
रस बरसा दो~~~~💝~~~~~~

वृषभानु-दुलारी,   राधा  प्यारी,
                      कर   आई    श्रृंगार।
तुम बाँसुरिया से,धुन बढ़िया से,
                      बरसा  दो  ना  प्यार।
मुरली जब बाजे,  राधा     नाचे,
                      हिलें  पुष्प गल-हार।
नैना मटका कर,रस  बरसा कर,
                      हँस दो कृष्ण-मुरार।

ललित किशोर 'ललित'~~~~💝~~
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद

फूलों की दुनिया,देखे मुनिया,
लिए अधर मुस्कान।

दुष्टों से बचना,बचकर चलना,
नहीं रहा आसान।

काँटों से लड़ना,आगे बढ़ना,
फूलों से ले जान।

फिर बढ़ते जाना,चढ़ते जाना,
नित्य नए सोपान।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मुक्तक कोशिश
गोरी

दीवाना कर देती हम को,पायल की छम-छम।

दिल की धड़कन बढ़ जाती है,साँस चले धम-धम।

घूँघट लम्बा ताने गोरी,आए जब पनघट।

एक झलक पाने को उसकी,निकला जाए दम।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद
विषय से इतर

ये खाँसी वाला,जुकाम ढाला,आया तेज बुखार।
जब नब्ज टटोली,डाक्टर बोली,मौसम की है मार।
अब और न अकड़ो,बिस्तर पकड़ो,गोली लेलो चार।
अब गोली खाकर,पानी पीकर,सोया हूँ मन मार।
ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:

मरहटा छंद
माँ

मृदु यादें तेरी,ओ माँ मेरी,रहतीं दिल के पास।

तेरी ममता का,पावनता का,अब तक है अहसास।

वो नेह फुहारें, वो मनुहारें,थी माँ कितनी खास।

जो राह दिखाईं ,तूने माई,सब आती हैं रास।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद क्रमांक 1
श्रृंगार रस

बारिश को लाई ,बदरी आई,कर सोलह श्रृंगार।

बूँदें छम-छम-छम,करती सरगम,बरसें सजनी द्वार।

भीगा जब तन-मन,चंचल चितवन,ठण्डी चली बयार।

साजन बौराया,नियरे आया,लिए अधर में प्यार।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद क्रमांक 2
श्रृंगार रस

साजन जब आया,मन मुस्काया,कहे सजनिया झूम।

ओ साजन प्यारे,मुझे दिखा रे,रंगीं दुनिया घूम।

कैसी है ऊटी,और अनूठी ,गोवा की वो धूम।

रीज़ोर्ट जहाँ हो,प्यार वहाँ हो,लूँ मैं तुझको चूम।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद क्रमांक 3
श्रृंगार रस

राधा प्यारी का,सखि न्यारी का,कृष्ण करें श्रृंगार।

वो नंदन-वन से, चुन कर मन से,लाए पुष्प हजार।

हाथों में गजरा,नैना कजरा,वेणी जूही दार।

सपनों सा सुंदर,प्रीत समंदर,पहनाया गलहार।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद

प्रकृति रस में श्रृंगार घुस गया
मैं कुछ न कर सका
🙏

ओ सुंदर सजनी,महके रजनी,बात दिलों की मान।

चमके है चंदा,रजनीगंधा,
खुशबू दे वरदान।

ये उपवन सुंदर,शीतल सरवर,
नौका आलीशान।

मत झपका अँखियाँ,
दिल की बतियाँ,सुन ले मेरी जान।

ललित🙂
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मुक्तक

इस जीवन की धूप-छाँव से,हमने  इतना जाना है।

जीवन में सब  बाधाओं से,पार अकेले  पाना है।

साथ नहीं देती है जग में,अपनी सुंदर काया भी।

हाय बड़ी जालिम ये दुनिया,औ' बेदर्द जमाना है ।                   ****ललित                                                                                                                                               
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद

तू मात-पिता की,सज्जनता की,बात सदा ही मान।

पथ जगमग होगा,रहे निरोगा,चढे नए सोपान।

निकले जो मन से,आशिष बरसे,नित होगा उत्थान।

ये जीवन खेला,दो दिन मेला,बन जाए वरदान।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित:
मरहटा छंद

चल हँसते गाते,साथ निभाते,जीवन के दिन चार।

तू चलता जा रे,सोच न प्यारे,चिंता है बेकार।

ये सफर सुहाना,भूल न जाना,अपनों को तू यार।

दिल खोल हँसाना,सदा लुटाना,जीवन में तू प्यार।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित: रचना क्रमांक -1
मनहरण घनाक्षरी

बीत रहे पल-छिन,रात-दिन नोट गिन।
जिंदगी की डोर तेरी,छोटी होती जा रही।।

साँसों का खजाना मिला,पर तू ये भूल चला।
राम-नाम बिना हर,साँस रोती जा रही।।

कर ले जतन कुछ,हरि का भजन कुछ।
गीत गाने में ही तेरी,साँस खोती जा रही।।

नर जो भजन करे,सात-सात कुल तरें।
जनमों के पाप हर,साँस धोती जा रही।।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित: रचना क्रमांक -2
मनहरण घनाक्षरी

गुप-चुप कर वार,वक्त करे ऐसी मार।
लखपति आदमी को,खाकपति करता।

वक्त करे ऐसी पैठ,कल तक था जो सेठ।
दूसरों के घर में है,पानी वही भरता।

वक्त से गया जो हार,शिवजी से करे प्यार।
भोले जी के चरणों में,शीश वही धरता।

एक राम जी का नाम,जपता जो आठों याम।
शिव-भोला उसके है,ताप सारे हरता।

ललित
[18/11, 3:26 PM] ललित: रचना क्रमांक -3
मनहरण घनाक्षरी

अँखियाँ तेरी कटार,गर्दन सुराहीदार।
सेब जैसे लाल गाल,गोरी तू कमाल है।

चले तू जो इठलाती,कमर ये बल खाती।
शहर की सड़कों पे,मचाती धमाल है।

हरदम साथ रहे,छूता तेरे हाथ रहे।
किसमत वाला गोरी,तेरा वो रुमाल है।

काश मैं रुमाल होता,रंग मेरा लाल होता।
पर मेरे पास गोरी,रंग है न माल है।

ललित

अगस्त 17

30.8.17
ताटंक

निगुरा मानव मोक्ष न पाए,धर्मग्रंथ बतलाते हैं।
सद्गुरु ही तो नर-नारी को,मोक्ष-मार्ग दिखलाते हैं।
आत्म-शांति पाने को मानव,संतों के दर जाता है।
संत कलयुगी चमत्कार कर,मानव को फुसलाता है।

ललित

30.8.17

ताटंक आधारित मुक्तक

कपट और छल छिद्र भरे जो,इंसाँ गुरु कहलाते थे।
खुद गहरे दल-दल में धँस कर,शिष्यों को नहलाते थे।
शिष्य जिन्हें पूजा करते थे,ख्वाबों और खयालों में।
खुद वो पूजा के फूलों से,जुल्फों को सहलाते थे।
'ललित'

29.8.17
आल्हा छंद
रास लीला
भाग 2

पलक नहीं झपके राधा की,कान्हा है ऐसा चितचोर।
बिन बोले सब कुछ कह देता,साँवरिया वो नंदकिशोर।
झूम-झूम कर बरसें बदरा,झूम-झूम कर नाचें गोप।
राधा की सौतन होने का,वंशी पर लगता आरोप।

वंशी की धुन सुन-सुन डोलें,व्रज रज औ' यमुना की धार।
थिर-थिर-थिर-थिर थिरक रहे हैं,कृष्ण-राधिका के गल-हार।
घुँघरू बजें पायलों के ज्यों,शब्द-ब्रम्ह का हों अवतार।
पहुँच रही धुन रुन-झुन-रुन-झुन,यमुना की लहरों के पार।

भरे बाँसुरी हौले हौले,कर्णों में मधु-रस की धार।
गोप-गोपियाँ सारे बोलें,जय-जय-जय-जय कृष्ण मुरार।
दर्शन करने को लालायित,सूर्य उदित हो करे प्रणाम।
धन्य-धन्य हैं कृष्ण-राधिका,धन्य गोपियाँ औ' व्रजधाम।
ललित

27.8.17
आल्हा
2

राम कृष्ण नारायण शिव को,भूल धियाया बाबा खास।
खीज उतारें अब दुनिया पर,होता है जग में उपहास।
अरे बंधुओं भगवद्गीता,को लो अपना गुरू बनाय।
ध्यान करो उस नारायण का,घर में लो मंदिर बनवाय।
'ललित'

27.8.17
आल्हा
रास लीला
3
नंदन-वन में राह निहारे,मुरलीधर राधा का दास।
कर सुंदर श्रृंगार राधिका,आई है कान्हा के पास।
कृष्णप्रिया राधा सुकुमारी,चपल नैन हिरणी सी चाल।
वंशी वादक कृष्ण मुरारी, मुरली सुन राधा बेहाल।

रूप निरखकर हुआ अचम्भित,मुरली को दी ऐसी तान।
वंशी की धुन में यूँ खोई,रहा नहीं जग का कुछ भान।
गोप-गोपियां ताल बजाएं, मटकें ज्यों कान्हा के नैन।
उगते ही चंदा छुप जाए, कितनी छोटी है ये रैन।
।
बदल-बदल कर रूप कन्हैया,नाचे हर गोपी के साथ।
चाहेे गोपी हाथ पकड़ना,मगर न आए कान्हा हाथ।
इक पल दिखे बजाता मुरली,दूजे पल वो करता
रास।
इक पल दिखे बगल में कान्हा,दूजे पल राधा के पास।

ललित
26.8.17
आल्हा
4
सावन की रिम-झिम बौछारें,छतरी में सजनी थी साथ।
और सजनवा भी मतवाला,दबा रहा हाथों से हाथ।
उलझ गईं कुछ चंचल बूँदें,सजनी के केशों के बीच।
टिम-टिम तारे चमक रहे ज्यों,बदरा के रेशों के बीच।
ललित

26.8.17
आल्हा

तीव्र लालसा लिए मिलन की,मन में सुंदर स्वप्न हजार।
दूल्हा राजा जा ही पहुँचा,इक दिन तो सजनी के द्वार।
दुल्हन बोली दूल्हे राजा,कार लक्जरी लाओ साथ।
तभी देखना ख्वाब सुनहरे,और पकड़ना मेरा हाथ।
ललित

26.8.17
आल्हा छंद

रूप-माधुरी निखरी-निखरी,भरे गुलाबी डोरे नैन।
कुछ इठलाती कुछ बल खाती,बोल गई वो मीठे बैन।
मुख देखा मैंने शीशे में,लगा सोचने फिर ये बात।
निश्छल प्रेम प्रकट करती थी,या करती थी कोई घात।
'ललित'

26.8.17
आल्हा छंद

नंदन-वन में राह निहारे,मुरलीधर राधा का दास।
कर सुंदर श्रृंगार राधिका,आई है कान्हा के पास।
रूप निरखकर हुआ अचम्भित,मुरली को दी ऐसी तान।
वंशी की धुन में यूँ खोई,रहा नहीं जग का कुछ भान।

'ललित'

26.8.17
ताटंक मुक्तक 16:14

कान्हा के दर्शन को तरसे,बरसाने की वो राधा।
बन्द नैन से दर्शन होते,खुले नैन डालें बाधा।
कान्हा के चिन्तन में राधा,रहती हर पल यूँ डूबी।
साँसे चलें न दिल ही धड़के,वदन रह गया है आधा।
'ललित'

23 8 17
मुक्तक

बांसुरिया की मधुर तान पर,नैना क्यों मटकाता है?
बहियाँ पकड़ मरोड़ी मेरी,उँगली क्यों चटकाता है?
मटकी फोड़ चुका ओ कान्हा,अब क्यों कंकर तू मारे?
मोर मुकुट सिर पर सोहे क्यों,लट मुख पर लटकाता है?

'ललित'

22 817
आल्हा छंद रचना

गया शहर में शिक्षा पाने,माता का बालक सुकुमार।
सीख न पाया मात-पिता से,वो कोई आचार-विचार।
और उच्च शिक्षा पाने वो,चला गया इकदिन परदेश।
मिले नये परदेशी साथी,भूल गया अपना परिवेश।

अंग्रेजी में गिट-पिट बोले,माता को बोले अब मोम।
और पिता बेचारे को तो,'डेड' बोलता है अब ओम।
हाय बुढापे की लाठी तो,भूल गयी अब वो दो हाथ।
जिन हाथों ने पाला पोसा,और दिया था हरदम साथ।
'ललित'

22 817
आल्हा छंद रचना

गुरू मिले सौभाग्य हमारा,गुरू कृपा से हो कल्याण।
गुरु मूरत की किरपा से ही,एकलव्य सीखा संधान।
अंधकार से ले जाते हैं,वो नित-नव प्रकाश की ओर।
गुरू-शिष्य का पावन-रिश्ता,कभी न हो सकता
कमजोर।

'ललित'

22 817
आल्हा छंद रचना

सुंदर फूल खिलें बगिया में,लिए लबों पर नव मुस्कान।
चहुँ दिशि सौरभ फैला कर वो,देते हैं सबको ये ज्ञान।
सदा रहो जग में मुस्काते,चाहे कंटक चुभें हजार।
खुद के गम को भूल सभी में, बाँटो खुशियाँ अपरम्पार।

'ललित'
दिनांक 21 8 17
आल्हा छंद रचना

चिंतन कब कैसे ले लेता,है भारी चिंता का रूप?
नर के मन को छाया में भी, क्यों छूती चिंता की धूप?
मानव मन पर भय अनदेखा,क्यों फैलाता अपना जाल?
प्राणी को पटकी दे दे क्यों,हँसता रहता काल -कराल?
ललित

दिनांक 21 8 17
आल्हा छंद

कान्हा सुन लो अर्जी मेरी,एक बार तो दे दो ध्यान।
राधा राधा नाम जपूँ मैं,रहता कोटा राजस्थान।
सब कहते हैं राधा जी के, पीछे पीछे चलते श्याम।
आ जाओ फिर घर में मेरे,संग राधिका के अविराम।
'ललित'

21.8.17
आल्हा छंद रचना
कैसे कैसे व्यवधानों से,होना पड़ता है दो चार।
जीवन नैया ऐसी डोले,पार न कर पाए पतवार।
पतवारों से नाव चलाना,मुझको सिखला दो भगवान।
भवसागर तरने की राहें,मुझको दिखला दो भगवान।
ललित

21.8.17
आल्हा छंद रचना

प्रातकाल ले लेते हैं जो,राम-राम अति पावन नाम।
उन के दुखड़े हर लेते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम राम।
दीनबंधु दुखहर्ता उसको, सुख-वैभव देते हैं खूब।
राम नाम सुमिरन में जिसका,मन पूरा जाता है डूब।
ललित

21.8.17
आल्हा छंद रचना

छप्पन इंची सीने का तो,हरदम करते रहे बखान। सीने से बाहर निकलो जी,सीमा पर आया तूफान।
बड़ा ढीठ है दुश्मन अपना , नहीं बदल सकता जो चाल।
छलनी कर दो सीना उसका , जो बनता दुश्मन की ढाल।

'ललित'

20.8.17

नेता जी की टेढ़ी चाल

19.8.17
मनहरण
सुविचार

दुखी है सारा जहान
सुखी एक भगवान
सुख की किरण एक
बच्चों को दिखाइए।

पूजा करना न आए
ध्यान करना न भाए।
गीता और रामायण
पढ़ना सिखाइए।

भूल गए संसकार
करें रूखा व्यवहार।
राम-नाम बार-बार
उनसे लिखाइए।

खाएँ पीजा बरगर
रोकना चाहो अगर।
होटलों में भोज रोज
आप भी न खाइए।

'ललित'

19.8.17
मनहरण

कैसे कह दूँ ये हाल
जीना है हुआ मुहाल।
मैके चली गई बीवी
निंदिया न आय है।

रोटी कैसे बने गोल
चकला जहाँ चौकोर।
गैस भी तो कह गई
मुझे बाय-बाय है।

आलू प्याज और दाल
कैसे देते हैं बघार।
बिना सब्जियों के रोटी
कैसे खाई जाय है।

कॉफी कड़वी हो जाए
चाय न बनानी आए।
दे दो कोई सही राय
अब क्या उपाय है।

'ललित'

19.8.17
मनहरण
मोह का ये माया जाल
काल से भी है कराल।
काटना जो चाहे इसे
मानव है हारता।

लोभ की नदी विशाल
चले ऐसी टेढी चाल।
इसमें जो डूबा उसे
कोई नहीं तारता।

कामदेव की कमाल
मोहक वो सुरताल।
सुनने लगे जो उसे
पटकी दे मारता।

क्रोध आए चुपचाप
बिना किए पदचाप।
मूरख मानव इसे
नाक पर धारता।

ललित

17.8.17

मनहरण

छोड़ सारे काम काज
लिखो सभी छंद आज
मन की व्यथा को जरा
प्रकट भी कीजिए।

देख गुरु आए 'राज'
सभी दौड़े आए आज
पटल को अब जरा
रंग भी दे दीजिए।

बिछुड़े मिले हैं आज
कई महीनों के बाद
बिखरे भावों को जरा
बाँध भी तो लीजिए।

हवा महँगी है आज
बच्चे हुए मोहताज
मौन बैठे योगीराज
कुछ तो पसीजिए।

ललित

मनहरण

कान्हा के हजार नाम
सबसे है प्यारा श्याम।
मुरली मनोहर का
ध्यान कर लीजिए।

राधा को है प्यारा श्याम
और प्यारा व्रजधाम।
राधा जी के नाम पर
कान धर लीजिए।

मुरली मधुर सुन
राधा नाचे रुन-झुन।
राधा नाम सुरमे से
नैन भर लीजिए।

सुमिरन आठों याम
चलता रहे निष्काम ।
कान्हा जी से हो सके
तो ऐसा वर लीजिए।

ललित

15.8.17
मुक्तक लावणी

क्यों तू हर गोपी के दिल में ,आस जगा कर चला गया।
क्यों तू राधा के नैनो में ,प्यास जगा कर चला गया।
नंदनवन का पत्ता पत्ता ,कृष्ण कृष्ण क्यों है  जपता।
क्यों तू ब्रज के कण-कण में यूं ,रास जगा कर चला गया।
'ललित'
15.8.17

मन हरण घनाक्षरी

बिरज का कण-कण
रास करे क्षण-क्षण।
साँवरा सलोना कान्हा
बाँसुरी बजा रहा।

यमुना की कल-कल
बढ़ रही पल-पल।
गोपियों का प्यारा कान्हा
वेणियाँ सजा रहा।

बाँसुरी की धुन सुन
चाँदनी हुई मगन।
रास का रचैया कान्हा
चाँद को लजा रहा।

पायलों की छम-छम
बढ़ रही छन-छन।
गोपी संग नाच कान्हा
राधा को खिजा रहा।

'ललित'

14.8.17

मुक्तक 14:12

आवाज ही गुम होगई,हर आदमी खामोश है।
काला धुआँ छाया हुआ,वो आसमाँ निर्दोष है।
बागबाँ खुद ही चमन का,
आज दुश्मन होगया है।
सिमटी सभी हरियालियाँ,
परजीवियों में जोश है।

ललित

11.8.17
मुक्तक 16:14
कुछ अपनों ने कुछ सपनों ने,सिखा दिया हमको जीना।
कुछ रिश्तों ने कुछ नातों ने,सिखा दिया आँसू पीना।
अपने-सपने-रिश्ते-नाते,अब सब हैं लगते फीके।
हमने भी इन सबके ऊपर,डाल दिया पर्दा झीना।

'ललित'

्10.8.17
मुक्तक 16;12

जीवन के कुछ रंग सुनहरे,रोज बिखर हैं जाते।
और सुनहरे रंगों पर कुछ,मानव हैं इतराते।
कैसी केसी चालें चलते,रंगीं दुनिया वाले।
रंगों से ही तोलें हरदम,सारे रिश्ते नाते।
'ललित'

9.8.17
मुक्तक
पुण्य किए क्या मोरपंख ने,जिसको सिर पर धार लिया?
उसकी मटकी फोड़ी जिसने,तप था वर्ष हजार किया।
क्या वो कान्हा माखन के इक,लौंदे का ही था भूखा?
या उसने माखन चोरी कर,निज-भक्तों को तार दिया?

9.8.17
मुक्तक

बहार ही बहार की,नकाब ओढ़ते रहे।
कभी फिजाँ दिखी नहीं,सितम कभी नहीं सहे।
न प्यार मिल सका कभी,न प्यार खुद ही कर सके।
खुदा बने रहे खुदी,न बोल प्यार के कहे।

ललित

9.8.17
कुकुभ आधारित मुक्तक

चरण बाद में छुए धरा के,पायल पहले बज जाए।
भोर भये मुरली सुनने को,राधा रानी जब आए।
बाँसुरिया की न्यारी धुन सुन,शरमा जाते सुर सातों।
बदरा भूलें जल बरसाना,जब वंशी रस बरसाए।

'ललित'
8.8.17

सरसी छंद

हाथों की रेखाएँ बदलें,चाल समय के साथ।
इतराता मानव फिर खाता,मार समय के हाथ।
मार समय के हाथों खाकर,सीधी होती चाल।
सीधा चलने से भी लेकिन,गले न उसकी दाल।
ललित

8.8.17

सरसी छंद

हो जाएगी कब अनहोनी,मानव जान न पाय।
तोड़ कर नाता पिंजरे से, पंछी कब उड़ जाय।
गिनती की साँसों की संख्या,गिन पाता है कौन?
अच्छा भला बोलता मानव,हो जाता हे मौन।

ललित
[08/08/17
सरसी छंद

मौन हुए मानव का मन भी,कब रह पाया मौन?
मन की हर उलझी गुत्थी को,सुलझा पाया कौन?
जितनी चाबी भरकर भेजे,मानव को भगवान।
उतनी ही साँसें ले पाए,
धरती पर इंसान।
ललित
[08/08/17
सरसी छंद

इंसानों की इस दुनिया की,बड़ी निराली रीत।
उसके ही गुण दिखते जिसकी,साँसें जाती बीत।
साँस-साँस में प्राण बसा है,मानव जान न पाय।
साँस-साँस में नाम जपे जो,वो ही संत कहाय।
ललित

[08/08/17
सरसी छंद

संतों की वाणी पर मानव,करता है विश्वास।
लेकिन ऐसी बातें मन को,
कब आती हैं रास?
रास करे मानव का मन तो,कामदेव के साथ।
अंत समय मानव मलता ही,रह जाता है हाथ।

ललित

8.8.17

सरसी छंद

हाथों की रेखाएँ बदलें,चाल समय के साथ।
इतराता मानव फिर खाता,मार समय के हाथ।
मार समय के हाथों खाकर,सीधी होती चाल।
सीधा चलने से भी लेकिन,गले न उसकी दाल।
ललित

6.8.17
सरसी छंद

मिला मित्र ऐसा हमको जो,गुरुवर 'राज' कहाय।
नये-नये छंदों की निर्मल,सरिता रोज बहाय।
स्नेह पूर्ण व्यवहार समादर,आनन्दित कर देत।
निश्छल औ' निस्वार्थ भाव से,सेवा कर हँस लेत।
ललित
काव्यसृजन परिवार
5-8-17

सरसी छंद

करदो ऐसी किरपा कान्हा,मन संतोष समाय।
राधा-राधा जाप करूँ मैं,मन में काम न आय।
सब कहते हैं राधा जी के,पीछे चलते श्याम।
राधा-राधा नाम जपूँ तो,आ जाना अविराम।
'ललित'
5.8.17
सरसी छंद नये कलेवर में
शिव प्रार्थना

केवल इतनी अरज करूँ मैं,शिव हे!भोला नाथ।
कृपा दृष्टि मुझ पर रखना तुम,नित-नित जोड़ूँ हाथ।
नित-नित जोड़ूँ हाथ सदाशिव,रखना मेरी लाज।
जैसी मरजी होय तुम्हारी,वैसा करना काज।

वैसा करना काज त्रिनेत्री,राह मुझे दिखलाय।
खोले मन की आँखें मेरी,जीना भी सिखलाय।
जीना भी सिखलाय बबम बम,भव बाधा हो दूर।
बड़ी तुम्हारी दया दृष्टि है,किरपा है भरपूर।

'ललित'

5.8.17
सरसी छंद

केशव माधव मुरलीधर हे!मनमोहन  घनश्याम।
मन मन्दिर में बसों करूँ मैं,दर्शन आठों याम।
बस इतना वरदान मुझे दो,भगवन कृपानिधान।
निशि-दिन मन ही मन मैं गाऊँ,मधुर नाम का गान।

हिलती-डुलती जीवन नैया,करती है मनुहार।
वंशीधर हे! नाग नचैया,आप बनो पतवार।
मति कुछ ऐसी मुझको दे दो,करूँ तुम्हारा ध्यान।
ईश लगन मन में यूँ जागे,हो जाए कल्याण।

ललित
4.8.17

जन्म दिवस की देत बधाई,काव्य सृजन परिवार।
यश का यश चहुँ दिशि यूँ फैले,होवे जग उजियार।

2.8.17
सरसी छंद

छोटी पायल छोटे पैयाँ,छुटका नंदकिशोर।
छम-छम-छम-छम बाजे पायल,मैया भाव-विभोर।
छोटी मुरली छोटा कंबल,छुटका सुंदर श्याम।
दर्शन करने आया बाबा,शिव-भोला व्रजधाम।

नाग गले शशि शीश विराजे,गात भभूत रमाय।
सुन डमरू की डम-डम-डम-डम,मात रही घबराय।
नजर उतारेंगें लल्ला की,करके मैया धूप।
एक बार दिखला दे मैया,हरि का बाल-स्वरूप।

'ललित'

1.8.17
सरसी छंद

रोज-रोज थी चख-चख होती,रोज-रोज तकरार।
कौए जी जब इक कोयल से,कर बैठे थे प्यार।
काँव-काँव से कौए की थी,कोयल जाती काँप।
सच्ची प्रीत नहीं कर सकते,कभी नेवला साँप।
ललित

1.8.17
सरसी छंद

कैसा प्यारा वो पागल-पन,कैसी होती प्रीत।
जीवन बीत गया लेकिन तुम,जान न पाए मीत।
साजन की सजनी से बाँधे,कितनी प्यारी डोर।
संध्या उलझे तो सुलझाते,हो जाती है भोर।

ललित
1.8.17
सरसी छंद

कभी बजाऐ मुरली मोहन,कभी खड़ा मुस्काय।
कभी निहारे राधा का मुख,कभी नैन मटकाय।
कभी राह मेंं राधा की वो,बहियाँ देता  मोड़।
कभी राधिका की कंकर से,मटकी देता फोड़।

'ललित'

1.8.17

सरसी छंद

अब आगए सुरताल में सब,काव्य सृजन के वीर।
सुंदर रचनाएँ लिख दो सब,सुनो कलम की पीर।
'राज' जैसे गुरू का पावन,पाया है जब साथ।
क्यों बैठे हो मित्रों फिर तुम,रखे हाथ पर हाथ।

ललित

1.8.17
सरसी छंद

सावन झूमे पात-पात में,कली-कली मुस्काय।
बदरा झूमें गाँव-गाँव में,हृदय कली खिल जाय।
बिजुरी चमके राधा चिहुँके,कान्हा करे ठिठोर।
बुँदियाँ बरसें मनवा हरषे,हुई चंचला भोर।

'ललित'

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...