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फरवरी 2023 की रचनाएँ

 मुक्तामणि छंद,लावणी छंद,राधिका छंद,आल्हा छंद


01.02.23


मुक्तामणि छंद


चिंता की चिंगारियाँ,मन को नित सुलगाएँ।

चिंता की हर गाँठ को,कब तक हम सुलझाएँ ?

बिन जल ही फूले-फले,चिंता की फुलवारी।

चंचल मन हर पल करे,चिंताओं से यारी।


संत कहें चिंता नहीं,चिंतन से कर यारी।

कथा-श्रवण सत्संग से,धीरज मिलता भारी।

चालीसा-हनुमान का,पाठ करो नित मन से।

हर लेंगें हनुमान जी,हर चिंता चित-मन से।


ललित किशोर 'ललित'

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मुक्तामणि छंद


भँवरों की अठखेलियाँ,पुष्पों के मन भायीं।

गुन-गुन जब गुँजन सुना ,कलियाँ सब मुस्कायीं।

सुरभित सुंदर हर कली,भ्रमरों के तन काले।

अलि कलियों की प्रीत से,जले गौर रँग  वाले।


ललित किशोर 'ललित'

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05.02.23

मुक्तामणि छंद


राधा का दिल ले गया,नटखट नंद-दुलारा।

सखियों से राधा कहे,छलिया था वह कारा।

जादूगर उस श्याम ने,वंशी मधुर बजाई।

वंशी ने पागल किया,सुध-बुध सब बिसराई।


मटकाता था नैन वो,देख मुझे कुछ ऐसे।

मेरे सुंदर रूप पर,मोहित हो वो जैसे।

मुझको भी थे भा गये,कजरारे वो नैना।

चैन चुरा कर ले गया,अब तड़पूँ दिन-रैना।


ललित किशोर 'ललित'

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लावणी छंद


पुष्पों की मधुरिम सौरभ से,महक रहा था जब उपवन।

कृष्ण विरह में दहक रहा था,तब राधा जी का तन-मन।

राधा के नैनों से आँसू ,बह-बह कर जो बहते थे।

हमें खोजने दो कान्हा को,रह-रह कर वो कहते थे।


ललित किशोर 'ललित'

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07.02.23

लावणी छंद


जीवन की पथरीली राहें,कब कोमल हो पायी हैं ?

फूल बिछी राहें भी अक्सर,शूलों से घिर आयी हैं।

प्रभो राम के राजतिलक को,सजी अयोध्या फूलों से।

कौन जानता था भविष्य की,राह भरी थी शूलों से ?


ललित किशोर 'ललित'

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08.02.23

लावणी छंद


महलों की रानी माँ सीता,निःसंकोच चली वन को।

कितनी आसानी से अंगीकार किया वन- जीवन को।

मुख-मुस्कान सहज रहती थी,जिन पथरीली राहों में ?

कितने कंटक चुभते होंगें,उन कँटकीली राहों में ?


कितना धीरज और समर्पण,कितना जीवट था मन में ?

चौदह वर्षों तक खुश रहना,सहज नहीं था उस वन में।

कैसी तपस्विनी माँ सीता,कैसा उसका तप होगा ?

रावण नजरें मिला न पाया,कैसा उसका जप होगा?


ललित किशोर 'ललित'

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लावणी छंद


जनकराज ने जिस बेटी को,पलकों पर रख कर पाला।

नहीं जानती थी जो बेटी,क्या होता पग का छाला ?

वही जानकी पति सेवा-हित,राज-महल को छोड़ चली।

प्रभो राम के पदचिन्हों में,पग-छालों को फोड़ चली।


ललित किशोर 'ललित'


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लावणी छंद

नेता


राजाओं से पीछा छूटा,नेताओं ने आ पकड़ा।

हर नेता सपना देखे बस,मेरा हो जाए छकड़ा।

कोई आगे खींच रहा है,कोई खींचे पीछे से।

कोई भाग रहा तो कोई,टाँगें खींचे नीचे से।


कोई सच्चा कोई झूठा,दागी कोई बेदागी।

कोई परिवारी तो कोई,कर्मठ सेवा-अनुरागी।

संविधान का पोषक कोई,कोई कागज फाड़ रहा।

कीच उछाल रहा है कोई,कोई कीचड़ झाड़ रहा।


किसको सच्चा माने जनता,किस पर कुछ विश्वास करे?

किस चोले में कौन छिपा है,किस से जनता आस करे ?

सकल मीड़िया बिका हुआ है,सत्य न बाहर आ पाए।

असमंजस में रहती जनता,किसको वोट दिया जाए ?


ललित किशोर 'ललित'

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लावणी छंद


कैसे भूल गए मुझको तुम ,क्यों कर मुझसे दूर गए ?

मेरे दिल का दर्द न समझा,क्यों हो इतने क्रूर गए ?

याद नहीं क्या आते तुमको,साथ बिताए पल थे जो ?

क्या अब भी तुम वही श्याम हो,प्रियतम मेरे कल थे जो ?


ललित किशोर 'ललित'

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लावणी छंद


मेरे नैनों की राहों से,दिल में आन बसे थे तुम।

दिल की इन गलियों से मोहन,बोलो कहाँ हुए  हो गुम ?

रसना हर पल रटती रहती,नाम तुम्हारा कुछ ऐसे।

खटमिट्ठे और मधुर रसों से,भरे हुए हो तुम जैसे।


ललित किशोर 'ललित'

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लावणी छंद


वर्ष बयालिस साथ बिताए,संग-संग सुख-दुख झेले।

दिल की दीवारों पर अंकित,अनगिन यादों के मेले।

कभी रूठते कभी मनाते,कभी चुप्प ही खींच रहे ।

प्यार भरे अंकुर इक दूजे,के दिल में हम सींच रहे।


ललित किशोर 'ललित' 

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कबीर छंद

शुभकामनाएं राकेश जी व भाभी जी


सूर्य किरण सी आभा मुख पर,नैनों में विश्वास।

अधरों पर मुस्कान लिए वो,आई सजना पास।

नैन झुकाए हँस कर बोली,ओ प्रियतम राकेश।

आज दिला दो कुछ आभूषण,और नए कुछ वेश।


ललित किशोर 'ललित'

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19.02.23

कबीर छंद


बूँद-बूँद ज्यों रिमझिम-रिमझिम,बरसे नभ से नीर।

उसी भाँति पल-पल-पल पकती,रहे नेह की खीर।

ललिता जी माही यश के सँग,चहकें नित राकेश।

काव्य सृजन परिवार दुआ दे,रहे न घर में क्लेश।


ललित किशोर 'ललित'

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20.02.23

राधिका छंद


सिया-राम  या कृष्ण,राधिका बोलो।

शिव-शंकर भोले-नाथ,अंबिका बोलो।

वो पवन-पुत्र हनुमान,चले आएँगें।

सब संकट पीड़ा दूर,चले जाएँगें।


ललित किशोर 'ललित'


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राधिका छंद


यूँ बैठे ठाले आज,हो गया झगड़ा।

मैडम जी बोलीं सूप,बना है तगड़ा।

मैं बोला इसमें मिर्च,पड़ी है तगड़ी।

अब नहीं रही कुछ बोल,न ही वो झगड़ी।


ललित किशोर 'ललित'

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राधिका छंद


जब पति-पत्नी का साथ,अचानक छूटे।

उन दोनों में से साँस,एक की टूटे।

तब होता है अहसास,गुणों का उसके।

बस अवगुण ही दिन-रात,दिखे थे जिसके।


ललित किशोर 'ललित'


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राधिका छंद


यों माफी माँगी खूब,प्यार से उससे।

पर नहीं रही वो मान,कहूँ मैं किससे?

यों कहाँ किसी ने मिर्च,पचाई होगी ?

जो कहूँ किसी से खूब,हँसाई होगी।


ललित किशोर 'ललित'

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राधिका छंद


कल हम पत्नी के साथ,गये थे मेले।

पर भूल गये घर पर्स,नहीं थे धेले।

जब खाने को कुछ हाथ,जेब में डाला।

फिर बतलाऊँ क्या मित्र,छनी जो हाला।


ललित किशोर 'ललित'

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21.02.23

राधिका छंद


जब उड़ते हैं मकरंद,हुए मतवाले।

तब हो जाते ज़ूकाम,अलर्जी वाले।

सुड़-सुड़ करती है नाक,नहीं कुछ सूझे।

पत्नी भी रहती दूर,रहें मुख सूजे।


ललित किशोर 'ललित'

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राधिका छंद


बजरंग बली हनुमान,पवनसुत नामा।

हर लें उसके संताप,जपे जो रामा। 

जो चालीसा-हनुमान,नियम से पढ़ता।

उस नर का पुण्य प्रताप,नित्य है बढ़ता।


ललित किशोर 'ललित'

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राधिका छंद

होली

वो हौले-हौले लाल,गुलाल लगाए।

गोरी के गोरे गाल,खूब सहलाए।

गीले गालों पर हाथ,फिराए ऐसे।

होली की ये सौगात,मिली हो जैसे।


ललित किशोर 'ललित'

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राधिका छंद

होली

मतवाला वो घनश्याम,बाँसुरी वाला।

पीछे से आया और, गाल रँग डाला।

इस रँग में घोली प्रीत,राधिका प्यारी।

है ये घुली हुई प्रीत,जगत से न्यारी।


ललित किशोर 'ललित'

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सार छंद


कुछ सीधी कुछ टेढ़ी राहें,कुछ बेहद पथरीली।

डेड एंड से बंद हुई कुछ,कुछ सूखी कुछ गीली।

पार किया उन सब राहों को,जिसने हँसते-गाते।

मंजिल पाई हर झंझट से,बचते और बचाते।


ललित किशोर 'ललित'

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राधिका छंद


हे भगवन दीनदयाल,दया के सागर।

सुख से भर दो नाथ,हमारी गागर।

हम आए लेकर आस,तुम्हारे द्वारे।

दुख हर लोगे हनुमान,हमारे सारे।


ललित किशोर 'ललित'


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27.02.23

आल्हा छंद


कुछ समझाया मात-पिता ने,गुरु ने दी कुछ सुंदर सीख।

कुछ अनुभव से कुछ ठोकर से,पाया जीवन मार्ग सटीक।

दिखलाई कुछ संत जनों ने,भक्ति-मार्ग की अनुपम राह। 

तब जाकर वृद्धावस्था में,जागी ध्यान-भजन की चाह।


ललित किशोर 'ललित'


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01.03.2023

आल्हा छंद


मोहन की दीवानी राधा,राधा का दीवाना श्याम।

बाँसुरिया की मधुर धुनों में,गूँजे केवल राधा नाम।

राधा-राधा रटे कन्हैया,राधा करती दिल में वास।

राधा के दिल में रहती बस,कान्हा से मिलने की आस।


ललित किशोर 'ललित'

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01.03.2023

आल्हा छंद


मोहन की दीवानी राधा,राधा का दीवाना श्याम।

बाँसुरिया की मधुर धुनों में,गूँजे केवल राधा नाम।

राधा-राधा रटे कन्हैया,राधा करती दिल में वास।

राधा के दिल में रहती बस,कान्हा से मिलने की आस।


ललित किशोर 'ललित'

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04.03.2023

आल्हा छंद


हाथों में रँग ले कर कान्हा,राधा से करता मनुहार।

एक बार बाहों में आजा,कर दूँ रंगों की बौछार।

हरे-लाल-पीले रंगों से,रँग दूँ तेरे गोरे गाल।

या मैं मार-मार पिचकारी,कर दूँगा तुझको बेहाल।


सखियाँ बोल रहीं राधा से,आ छुप जाएँ 

हम उस ओर।

नंदन-वन के बरगद पीछे,श्याम नहीं जाता जिस ओर।

हमें खोजता जब आएगा,लेंगीं हम सब उसको घेर।

ऐसा रँग डालेंगें उसको,दीखेगा रंगों का ढेर।


ललित किशोर 'ललित'


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मई 2019 रचनाएँ

मई 2019
कर्मठ नारी
मुक्तक

नयनों में हैं सुंदर सपने,सिर पर बोझ तगारी का।

भाल पसीने में है भीगा,ऐसी कर्मठ नारी का।

मजदूरी कर पेट पालना,और पढ़ाना बच्चों को।

मुश्किल काम बड़ा है पर ये,जीवन है खुद्दारी का।

ललित किशोर 'ललित'

साजन-सजनी
प्रदीप छंद
16-13

मधुर-मधुर कल-कल लहरों की,कर्णों में रस घोलती।
पतवारों के दम पर बढ़ती,नैया ढुल-मुल डोलती।
शीतल सुरभित पवन सुहानी,सहलाती जब गात को।
साजन अँखियों में ही कहता,समझो सजनी बात को।

ललित

गोरी के अँगना
प्रदीप छंद
16-13

गोल-गोल मोती सी बूँदें,लेकर बदरा आ
गए।
गोरी के अँगना में रिम-झिम,वो बूँदें बरसा गए।
भिगो दिया गोरी का तन-मन,रंग-रँगीली शाम में।
भीगे वसनों में लिपटी वो,खोई घर के काम में।

ललित

नन्हा कान्हा
प्रदीप छंद
16-13

मैया इक मुरली मँगवा दे,नन्हा कान्हा मचल गया।
मोर-पंख का मुकुट लगाया,नन्हा मोहन बहल गया।
गैया के सँग वन जाऊँगा,लेकर लकुटी साथ में।
ग्वाल-बाल सँग नृत्य करूँगा,लिए बाँसुरी हाथ में।


ललित

05.05.19
दोहा

जीवन की इस दौड़ का,पकड़ न आए छोर।
मन चाहे कुछ और है, मिलता है कुछ और।

' ललित '

मुस्कान
छंद प्रदीप

कुछ बन्दे अंजाने भी हैं,हँसी और मुस्कान से।

कमा न पाए मुस्कानें जो,जीवन की दूकान से।

मन्द-मधुर मुस्कानों की जो,नर हैं कीमत जानते।

अधरों पर मुस्कानें रखने,की वो मन में ठानते।

ललित

मुस्कान
छंद प्रदीप

चुरा न पाए मुस्कानें जो,जीवन की दूकान से।
कुछ बन्दे अंजाने भी हैं,हँसी और मुस्कान से।
मन्द-मधुर मुस्कानों की जो,नर हैं कीमत जानते।
अधरों पर मुस्कानें रखने,की वो मन में ठानते।

ललित

मुस्कान
मुक्तक 

कुछ मुस्कानें ऐसी होती,जादू सब पर जो करें।
कुछ मुस्कानें दीन-दुखी के,दुःख और चिन्ता हरें।
कुछ मुस्कानें पगी प्रीत में,प्रियतम को करती सुखी।
होयँ कुटिल कुछ मुस्कानें जो,नेता नित मुख पर धरें।

ललित 

मुस्कान
हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

अधरों पर मुस्कान,गाल पर लाली।
मदिर-गुलाबी नैन,चाल मतवाली।

मस्त नज़र के तीर,चला कर गोरी।
गयी चली वो हाय,गाँव की छोरी।

ललित

श्रृंगार रस
हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

कल-कल बहती जाय,नदी दीवानी।
सागर के सँग प्यार,करेगी रानी।
मिलने की है चाह,बला की मन में।
लगी अजब सी आग,मचलते तन में।

खारी हो जल-धार,भले साजन की।
लेगी बहियाँ थाम,करेगी मन की।
लग सागर के अंग, नदी बहकेगी।
तन-मन होंगें एक,प्रीत महकेगी।

ललित

आपा-धापी

आपा-धापी में बीता जो,जीवन वो क्या जीवन है?
वो घर भी क्या घर है जिसमें,नहीं लगा तुलसी-वन है?

हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

माँ

माँ है जिसके पास,वही बड़-भागी।
माँ चरणों का खूब,रहे अनुरागी।

करता है जो पूत,मात की सेवा।
बन जाए हर काम,चखे वो मेवा।

ललित

हंस गति छंद
आनंद लीजिए

वृन्दावन सरताज,कन्हैया प्यारा।
बाँका वो नँद-लाल,जगत से न्यारा।

पल में करे कमाल,मटकियाँ फोड़े।
हाथ न आए श्याम ,गोपियाँ दौड़ें।

ललित

14.05.19
कान्हा
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

माखन-मिश्री हाथ में,लेकर कान्हा भागा।
लीला जिसने देख ली,भाग्य उसी का जागा।

छोटा सा नँद-लाल ये,माखन-चोर निराला।
माखन जिसको दे वही, हो जाता मतवाला।

ललित

स्वप्न सुनहरे
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

स्वप्न सुनहरे देखते,जीवन सब का बीते।
कुछ की भरती झोलियाँ,कुछ रह जाते रीते।

धर्म-राज की पोथियाँ,रखतीं सब का लेखा।
पाप-पुण्य जो भी किया,देखा या अनदेखा।

ललित

16.05.19
मन पागल
मुक्तक

मन पागल क्यों मचल रहा है?
क्या भीतर कुछ उबल रहा है?
क्या कोई कविता लिखने को
मन में लेखक टहल रहा है?

अपना जिसको मान रहा था
जिसको अपनी  जान कहा था
मृगमरीचिका सम वो निकली
दिल में जिसका प्यार बहा था।

क्यों अक्सर ऐसा है होता ?
ये दिल जिसके प्यार में खोता
प्यार नहीं उसको है पचता
तब बेबस दिल प्यार है ढोता।

ललित

15.05.19
दिल की बातें
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत


कौन सुने किससे कहूँ,दिल की बातें सारी?
किसने नैया दी डुबो,अरु किसने है तारी?

बेगाने अपने हुए,मीत हुए बेगाने।
नहीं मिला वो मीत जो,दिल की पीड़ा जाने।

ललित

तुलसी
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत


फूलों की हों क्यारियाँ,मनहर सौरभ वाली।
सुंदर फूलों से लदी,हर गुलाब की डाली।

उस घर की तुलना भला,किस मंदिर से होगी।
तुलसी की सेवा जहाँ,करता हो इक योगी।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

वाम नैन के पास जो,छोटा-सा तिल  काला।
गोरी उसने ही मुझे,यूँ पागल कर डाला।

उस पर बाँकी चाल ये,और महकता गजरा।
दिल को घायल कर गया,नैनों का ये कजरा।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद

चाँद चाँदनी से रहे,हरदम कुछ शरमाता।
गोरी सुंदर चाँदनी,रूप बड़ा मदमाता।

टिम-टिम-टिम तारे करें,देख चाँदनी चम-चम।
मधुर-रास में नाचती, राधा-रानी छम-छम।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद

नैना ऐसे मद भरे,जैसे मदिरा प्याले।
अधर मधुर रस से भरे,तरसें पीने वाले।

नखरों की क्या बात है,मटक-मटक वो चलती।
नैनों से जादू चला,दीवानों को छलती।

ललित

मुक्तामणि छंद

कैसा होगा रास वो,कैसी होंगीं बातें?
विश्व-नियंता नाचता,था जब सारी रातें।

व्रज-रज का हर कण जहाँ,गीत प्रीत के गाता।
राधा के सँग गोपियाँ,करती थीं जगराता?

ललित

18.05.19
मुक्तामणि छंद आधारित गीतिका

छोटे से इक गाँव में,नानी जी का घर था।
छोटी सी थी झोंपड़ी,ऊपर इक छप्पर था।

मन्दिर था इक पास में,ठाकुर जी का प्यारा।
ठाकुर जी के बाग में,तुलसी-वन सुंदर था।

मीठे पानी का कुआँ,वहीं एक था गहरा।
मनहर सौरभ से भरा,मन्दिर का परिसर था।

होती थी नित आरती,साँझ ढले मंदिर में।
लगता मुझको तो बड़ा,सुंदर वो मंजर था।

कुल चार बैलगाड़ियाँ,थी नानी के घर में।
पहियों में जिनके कभी,नहीं हुआ पंचर था।

ललित

मुक्तामणि छंद

मैया में श्री राम का,दूत नाम हनुमंता।
ढूँढन आया आपको,दिल में हैं भगवंता।

राम-नाम की मुद्रिका,भेजी है रघुवर ने।
देख मुद्रिका नैन में,लगे अश्रु थे भरने।

ललित


20.05.19
शंकर छंद

वो मुस्कुराकर देख लेना,आपका इक बार।
था जान लेवा ही कसम से,आपका दीदार।
अब रात-दिन मैं देखता हूँ,आपकी तस्वीर।
फिर कर सकूँ दीदार ऐसी,है कहाँ तकदीर।

ललित

20.05.19
शंकर छंद


ऐसी  दिखायी ज़िन्दगी ने,प्यार की तासीर।
अब आगयी है समझ में हर,बागबाँ की पीर।
जो प्यार का गुलशन सजाए,सींच कर दिन-रात।
उस बाग के कब सुमन मानें,बागबाँ
की बात?

ललित 

शंकर छंद

सुन राधिका अब ध्यान से तू,सार की ये बात।
व्रज-गोपियों सँग मैं करूँगा,रास सारी रात।
जब छम-छमा-छम पायलें सब,की बजेंगीं 
खूब।
परमात्म रस बरसात में हर,जीव जाए डूब।

ललित

16:11

चुनाव बीते खत्म हुआ सब,नेताओं का जोश।
इ वी एम में भाग्य बंद कर,जनता है खामोश।
झूठे-सच्चे चैनल खोलें,एग्ज़िट वाली पोल।
जनता के क्या कहने जो अब,हँसती है दिल खोल।

ललित


22.05.19
शब्द युग्म समारोह 258
चयनित युग्म"फटाफट'
स. अ. आ.श्री रवींद्र वर्माजी,सं.आ.कांति शुक्लाजी,
आ.उमा प्रसादजी एवं मंच को निवेदित
दो मुक्तक
1 मुक्तक

फिसल रहा है समय फटाफट,हाथों से अपने।
लेकिन देखे ये चंचल मन,नित्य नए सपने।
सपनों में डूबा मानव मन,भूल गया हरि को।
सुबह-सवेरे निकल पड़े वो,इस जग में खपने।

2 मुक्तक

करना है हर काम फटाफट,नहीं समय है पास।
भाग-दौड़ मानव जीवन का,हिस्सा है अब खास।
दो पल रुककर नहीं करे वो,प्रभु का थोड़ा ध्यान।
धन-दौलत-माया-ममता का,हर मानव है दास।

ललित

22.05.19

शंकर छंद

लव पर लिए मुस्कान ताजा,और स्वर में साज।

पा ले हजारों दर्द दिल में,घूमता नर आज।

जिससे कहे वो पीर दिल की,है कहाँ वो मीत?

डूबा हुए निज दर्द में भी,गारहा वो गीत।

ललित

मुक्तक
अपने दिल को ज़िंदा रख

यश-अपयश सुख-दुख जो आएँ,सबको थोड़ा-थोड़ा चख।
मीत मिलें या दुश्मन सबको,एक नज़र से ही तू लख।
जीवन की नैया तो भैया,डोलेगी डगमग-डगमग।
ज़िंदादिल हो कर जी प्यारे, अपने दिल को ज़िंदा रख।

ललित

शंकर छंद

नदिया ओढ़ चुकी है चुप्पी,आज झरने मौन।
सागर की लहरें चुप-चुप हैं,जिम्मेदार कौन?
बाँध बना छीनी मानव ने,नदी की आवाज़।
मानव ने दानव बन कर दी,बंजर धरा आज।

ललित
23.05.19
दोहे
हाथों के तोते उड़े, हुए शर्म से लाल।
धोती-कुर्ता कर सका,नहीं कोई कमाल।


वो  चिल्लाते रह गए,  चोर है चौकीदार।
दिखा अँगूठा बन गई, चोरों की सरकार।


24.05.19

शंकर छंद

मनमोहना तेरे सिवा है,और मेरा कौन?
यूँ मोह-माया ने छला मैं,हो गया हूँ मौन।
कर दे कृपा घनश्याम ऐसी,आत्म का हो ज्ञान।
अपने-पराए सब भुला निशि,दिन करूँ मैं ध्यान।

ललित

शंकर छंद

जो बात मन को मथ रही वो,क्यों न कह दूँ आज?
क्यों ज़िन्दगी हर-पल दिखाती,इक नया अंदाज़?
इक पल सुनहरापन लिए तो,दूसरा रँग हीन।
इक क्षण भरा आनंद से तो,दूसरा ग़मगीन।

ललित 
शंकर छंद

ये ज़िंदगी इक खेल ही है,मानलो ये बात।
हर पल यहाँ मिलती नए इक,दर्द की सौगात।
हँसकर सहे हर दर्द को जो,है वही जाँबाज।
वो है सफल इंसान पहने ,दर्द का जो ताज।

ललित

शंकर छंद

यह भोर की बेला सुहानी,दे रही संदेश।
है मुस्कुराहट से भरा हर,प्रात का परिवेश।
मुस्कान कुछ उससे चुरा तुम,मुस्कुराओ मीत।
फिर चहचहाहट में परिंदों,की सुनो संगीत।

ललित


दिल पर लगा जो घाव वो है,सालता दिन- रात।

शंकर छंद
कुछ यूँ ही

जो चाँद धरती पर बिखेरे,
चाँदनी का नूर।
है वो धरा का चंद्रमा क्यों,
आज इतना दूर?
जिस चाँदनी से है चमकता,चाँद का  संसार।
वो चाँदनी निश्छल करे क्या,
चाँद से है प्यार?

ललित

शंकर छंद
ट्रेन में से

जो आँसुओं का दर्द समझें,वो कहाँ नर खास।
सब सेल्फियों में भूल जाते,दर्द का अहसास।
मरती न मानवता अगर यूँ,कैमरे में आज।
तो जान बच जाती किसी की,मौत आती बाज।

ललित


शंकर छंद
ट्रेन में से


जितना करो अभ्यास उतनी, लय पकड़ में आय।
माँ शारदे फिर लेखनी को,शब्द देती जाय।
हो छंद कोई भी मगर हो ,लेखनी में जोश।
रचना बने फिर खूबसूरत,बद्ध-लय बिन दोष।

ललित


जो घोंसला है नित बनाती,जोड़ तिनके बेशुमार।
है होगये हमतो उसी की,चहचहाहट पे निसार।


28.5.19

बाँसुरी
कुण्डल छंद

बाँसुरी की मनुहार,राधिका न माने।
छूती क्यों श्याम-अधर,जिया को जलाने।

राधा का कृष्ण-प्यार,जलन को बढ़ाए।
बाँसुरिया अधर धरे,श्याम मुस्कुराए।

ललित

बाँके बिहारी
कुण्डल छंद

बाँके-बिहारी सुनो,भक्त ये पुकारे।
चार कदम चलो साथ,दीन के सखा रे।

भक्त-माथ धरो हाथ,मोर-मुकुट धारी।
ले चलना श्याम जहाँ,चाह हो तुम्हारी।

ललित

भाव
कुण्डल छंद

मन में जो भाव उठें,शब्द में पिरोना।
कुण्डल है खास छंद,ताल-लय भरोना।
एकदंत दयावंत ,चार भुजा धारी।
इसी छंद लिखी गयी,आरती उतारी।

ललित

30.5.19

प्यार का पुजारी
कुण्डल छंद

अँखियों में प्रीत लिए,प्यार का पुजारी।
सजनी की राह तके,रात-रात सारी।

शशी ओर हाथ उठा,माँगता दुआ ये।
रुके रहो चाँद जरा,भोर हो न जाए।

ललित

जून 2026 की रचनाएँ

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