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अगस्त 2026 की रचनाएँ

पीयूष वर्ष छंद
वृद्धावस्था
गीत

हाथ पैरों में ज़रा भी दम नहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

दाँत हिल-हिल साथ छोड़े जा रहे।
स्वाद रसना को नये नित भा रहे।
दर्द घुटनों का न जाने दे कहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

याद में डीमेंशिया झूला हुआ।
नाम अब हर चीज का भूला हुआ।
मौन रह कर मुस्कुराना है यहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

साथ छोड़े जा रही अब चाम भी।
बेरहम कितनी हुई ये शाम भी ?
अश्रुओं की धार आँखों से बही।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

प्यार के दो बोल सुनने के लिए।
अब तरसते प्रीत के बुझते दिए।
उम्र ने रुसवाइयाँ सबकी सहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।

ललित किशोर 'ललित'

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11.08.26

सिंधु छद

खिला था आसमां में चांँद जब पूरा।
तभी चुप चाँदनी ने चाँद को घूरा।
सितारों से बहुत तुम प्यार करते हो।
कि पूनम को अनोखा रूप धरते हो।

नहीं तुम देखते हो इक नजर मुझको।
धरा की ओर धकियाते मगर मुझको।
नहीं हैं याद तुमको वो पुराने दिन।
हमारे इश्क की रातें सुहाने दिन।

ललित किशोर 'ललित'
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14.08.26

मुक्तक

फूलों का गुलशन चाहा था,शूलों की दरकार न थी।
हँस न सकें जो कागज के उन,फूलों की दरकार न थी।
माना चाहत पूरी होना,मुश्किल होता है लेकिन।
सावन की रिमझिम चाही थी,झूलों की दरकार न थी।

ललित किशोर 'ललित'

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18.08.26

मधुमालती छंद

वो चाहते हैं चुप रहो।
हर ताप हर पीड़ा सहो।
वो राज करना चाहते।
सच से मुकरना चाहते।

क्यों दर्द बाहर आ रहा ?
क्यों गर्द बढ़ता जा रहा ?
क्यों उठ रही आवाज है ?
वो हुक्मराँ नाराज है।

इस दर्द को सहते रहो।
मत हुक्मराँ से कुछ कहो।
मत आसमाँ को तुम तको।
मत स्वप्न में भी सुख चखो।

जो थम गया वो जल नहीं।
जो झुक गया वो बल नहीं।
चलते रहो बढ़ते रहो।
नव स्वप्न नित गढ़ते रहो।

ललित किशोर 'ललित'

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19.08.26

मधुमालती छंद

जो भाव इस दिल में बहें।
हर बात वो किससे कहें ?

दिल की लगी किसको पता।
क्यों कौन सुन लेगा व्यथा ?
जो घाव इस दिल पर लगे।
इक दर्द सा उनमें जगे।
हैं अनगिनत ग़म की तहें।
हर बात वो किससे कहें ?

है राह जो उलझी हुई।
कैसे कहें सुलझी हुई ?
हर मोड़ पर ही धुंध है।
ये देख कर मति कुंद है।
मथती सदा दिल को रहें।
हर बात वो किससे कहें ?

ललित किशोर 'ललित'

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20.08.2026

मधु मालती छंद

इस ज़िंदगी ने क्या दिया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखने को जो मिला।
वो कर्म का ही है सिला।
जो हाथ खाली थे मिले।
अब रिक्त हैं तो क्या गिले?
इक स्वप्न सा जीवन जिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

जो कुछ मिला संसार से।
सब छूटता वो प्यार से।
कैसे रहें पकड़े उसे ?
खुद भाग्य ही छीने जिसे।
सारी उमर भटका किया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

अब देखना पीछे नहीं।
हैं मंजिलें आगे कहीं।
अब है सहारा आस का।
उस ईश में विश्वास का।
संकल्प का प्या़ला पिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।

ललित किशोर 'ललित'

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22.08.2026
मुक्तक

सनातनी होने का दावा,करता था जो नर हरदम।
धर्म-सनातन की रक्षा का,जो रखता था हर दमखम।
आज वही खुद इक मंदिर में,बन भगवान
विराजा है।
चुप हैं सारे संत महात्मा,अंध-भक्त बोलें बम-बम।

ललित किशोर 'ललित'

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मुक्तक
1.

तुम तो जीना सीख न पाए,कहते हैं वो हम से।
खा लो पी लो मौज मना लो,दूर रहो हर ग़म से।
अब उनको हम क्या बतलाएँ,अपनी राम कहानी ?
हाँ बस इतना ही कह पाए,सीखेंगें अब तुमसे।

2.

मन ही मन हम सोच रहे थे,क्यूँ थे पापड़ बेले ?
क्यों जीवन-भर झंझावातों,तूफानों से खेले ?
मन मौजी थे हम भी लेकिन,पैसों की थी
तंगी।
कैसे मौज मनाते हम जब,पास नहीं थे धेले।

ललित किशोर 'ललित'

31.08.26

विष्णु पद छंद

अनसुलझी अनबूझ पहेली,मन का चैन हरे।
चिंतित मन को क्या समझाएं,कैसे धीर धरें ?
समझ-समझ कर ये समझा है,इस पागल मन ने।
बचैनी से रिश्ता जोड़ा,है घायल मन ने।

ललित किशोर'ललित'
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गीत
31.08.26
छंद सुमेरु
1222 122,2122

तुम्हारी राधिका रो,रो पुकारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

न जाओ श्याम व्रज से,छोड़ हमको।
नहीं क्या रास आया,रास तुमको ?
यशोदा नंद बाबा,के दुलारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे बिन रहेगा,मौन व्रज में।
करेगा रास कान्हा,कौन व्रज में ?
सखा संगी तजेंगें,काज सारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

तुम्हारे दर्श ने दुख,दर्द टाले।
तुम्हारी बाँसुरी के,सुर निराले।
बजाएगा मुरलिया,कौन प्यारे ?
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।

ललित किशोर 'ललित'

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पीयूष वर्ष छंद

पीयूष वर्ष छंद

1
जवानी

ए जवानी दो घड़ी तो रुक जरा।
काँपते बूढे कहें तू  झुक जरा।
गौर से सुन ले जरा उनकी सदा।
सीख उनसे जिन्दगी की हर अदा।

'ललित'
2
बागबाँ

बागबाँ भूला यहाँ खुद का पता।
आँख से आँसू हुए हैं लापता।
फूल डाली से हुए हैं सब जुदा।
आसमाँ से देखता है वो खुदा।

काँपती काया कहानी कह गयी।
सींचने में वो जवानी बह गयी।
हर खुशी सपने दिखा कर खो गई।
जिन्दगी सुनसान पथ पर सो गई।

बाग सूना और सूनी राह है।
हर घड़ी दिल से निकलती आह है।
बीज बोया था सदा ही प्यार का।
पेड़ क्यों पैदा हुआ फिर खार का।

'ललित'

3
जिंदगी

प्यार के दो पल चुराने के लिए।
दो घड़ी को मुस्कुराने के लिए।
दीप आशा के जलाए थे कभी।
गीत मैने गुनगुनाए थे कभी।

जिंदगी ने जो दिखाए थे कभी।
चूर वो सपने हुए हैं अब सभी।
प्यार की ठण्डी हवाएं खो गई।
जिंदगी की शाम ही अब हो गई।

दिल मगर कुछ भी समझ पाता नहीं।
छोर आशा का नजर आता नहीं।
वो जिन्हें हमने चुना था हमसफर।
छोड़ हमको चल पड़े अपनी डगर।

ललित

4
दिल

किस हसीं पर आपका दिल आ गया।
इस उमर में कौन दिल को भा गया।
कौन थी वो हूर जो दिल ले गयी।
आपको गम का समन्दर दे गयी।

ललित

5
कागजी फूल

कागज़ी फूलों जरा मेरी सुनो।
प्यार की खुशबू चमन से तुम चुनो।
फिर ज़रा सा मुस्कुरा दो प्यार से।
खिल उठेगा बाग इस उपहार से।

ललित

6
जिन्दगी

जिन्दगी से क्या मिला है सोचिए।
जिन्दगी से क्या गिला है सोचिए।
जिन्दगी इक घाव से कमतर नहीं।
जिंदगी इक चाव से कमतर नहीं।

ललित

7
प्यार

साथ झूले थे कभी जो प्यार में।
छोड़ बैठे आज वो मझधार में।
भूलने का है हमें कुछ गम नहीं।
प्यार में ऐसे मगर कुछ दम नहीं।

ललित

8
पाक

आसमानों को बता दो तुम जरा।
बादलों में हो न जाएँ गुम जरा।
दुश्मनों की वो तबाही देख लें।
दें हवाएं भी गवाही देख लें।

पाक तू ले बात ये मोटी समझ।
जूझना हमसे नहीं इतना सहज।
फड़कती हैं अब भुजाएं देश की।
खोल देंगी पोल तेरे वेश की।

'ललित'

9
रावण

रावणों से है भरा संसार ये।
काँच के मोती जड़ा है हार ये।
सींप मोती को नहीं अब पोषती।
साँप की है नेवले से दोसती।

मुफ्त में रावण हुआ बदनाम है।
आदमी के मन बसा बस काम है।
एक रावण को जला जिसने दिया।
राम को कब जन्म है उसने दिया

'ललित

10
आदमी

आदमी से आदमी की लूट में।
सत्य लिपटा फिर रहा है झूठ में।
झूठ की यों चाशनी सच पर चढ़ी।
सत्य सस्ता झूठ की कीमत बढ़ी।

'ललित'

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जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...