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जुलाई 19 की रचनाएँ


जुलाई 19

ताटंक छंद
माँ
सबसे प्यारी सबसे न्यारी,दुनिया में है होती माँ।
संतानों के जीवन में है,बीज सुखों के बोती माँ।
नित लें जो आशीष मात का,छू कर माँ के पैरों को।
धूल चटा देते हैं वो नर,अच्छे-अच्छे शेरों को।

ललित

रूबाई

छंदों की रानी रूबाई,लिखने बैठे हम भाई।
रचनाएँ सारे मित्रों की,सुंदर बहुत नज़र आईं।
नया विषय अनछुआ चुनें क्या,सोच रहे थे
हम बैठे।
गरमा-गरम पकौड़ों के सँग,आई वो लेकर चाई।

ललित

रुबाई छंद


अखियों पर नारंगी चश्मा,छतरी थी सिर पर प्यारी।
नारी सुलभ नहीं थी लज्जा,भाव-भंगिमा असुरारी।
बाल कटे सैंडल ऊँचे थे,जींस-टॉप तन चिपके से।
चंदन की सौरभ में लिपटी,क्या थी वो सुंदर नारी?
 ललित

रुबाई 


सुंदर फूल खिले बगिया में,झूमे मन ही मन माली।
रात-रात भर जाग-जाग कर,की थी उसने रखवाली।
जग में सौरभ फैलाएँगें,सुमन सदा इस बगिया के।
यही सोच कर मुस्काता है,हाथ रह गए अब खाली।

ललित

रुबाई

बात कहो जब अपने मन की,उसकी भी लो सुन थोड़ी।
जिसने अपनी बात आपका, मूड देख मन रख छोड़ी।
हँसी-खुशी-विश्वास-प्रेम से,रिश्तों में रस भर जाए।
होता सफल वही है जिसने,राह समय के सँग मोड़ी।

ललित

रुबाई छंद

रहा देखता स्वप्न सुनहरे,अब तक तो हर पल प्यारे।
जाग नींद से भोर हुई अब,छोड़ रहे अम्बर तारे।
शाम रँगीली करनी हो तो, सुबहा में तू 
हँस ले रे।
सपनों में रँग भरने हों तो,कर्मों में रँग भर
जा रे।

 ललित

शक्ति छंद
122 122,122 12

दिखे खूबसूरत उसे ज़िंदगी।
करे श्याम की जो सदा बंदगी। 
न बाधा कभी राह में आ सके।
धरे ध्यान जो श्याम को पा सके।

ललित

शक्ति छंद

न माखन भला आज क्यों खा रहा?
न गैया चराने लला जा रहा।
कहे माँ यशोदा कन्हैया बता।
रहा मात को क्यों लला तू सता?

नई बाँसुरी ये अधर से लगा।
बजा कर दिलों में उमंगें जगा।
सखा-ग्वाल सब ले रहे चुटकियाँ।
दिला श्याम माखन भरी मटकियाँ।

ललित

शक्ति छंद

नहीं ज़िंदगी से मुझे कुछ गिला।
मिला है किए कर्म का ही सिला।
नहीं है कमी कुछ मिला खूब है।
अजी कर्म का ये सिला खूब है।

ललित

शक्ति छंद

छिपी ये दुआ मात के प्यार में।
न संतान उलझे कभी खार में।
दुआ मात की जिस सुता को मिले।
सदा छू सके वो नई मंजिलें।

ललित

शक्ति छंद

कन्हैया ज़रा अर्ज सुन भक्त की।
मिटा दे निशानी बुरे वक्त की।
ज़रा देख ले इक नज़र भक्त को।
बुला दे इसी पल भले वक्त को।

ललित

मुक्तक

कुछ बूँदें बरसा कर मेघा,चले गए तुम और कहीं।
क्या तुमको भायी कोटा से,सुंदर कोई ठौर कहीं?
ताल-तलैया-पोखर-नदिया,धरती का हर-कण प्यासा।
क्या तुमको भटका बैठे हैं,सुंदर-सुंदर मोर कहीं?

ललित

शक्ति छंद

मधुर राग में बाँसुरी बज रही।
मधुर रात है राधिका सज रही।
गरजते हुए बादलों के तले।
मिले राधिका से कन्हैया गले।

ललित

शक्ति छंद

चलो आज सपने सुहाने बुनें।
नई गीत गाएँ पुराने सुनें।
नई मंजिलों के नई राह को।
चुनें मुस्कुराकर नई चाह को।

ललित

शक्ति छंद

बरसने लगे मेघ यूँ झूम कर।
तरसती धरा के अधर चूम कर।
लिए मस्त सौरभ हवा आ रही।
तटों से सटी हर लहर जा रही।

ललित

शक्ति छंद

नदी ताल झरने न दिखते जहाँ।
कलमकार कविता न लिखते वहाँ।
वनों पादपों की कमी से दुखी।
कलमकार कब हो सके है सुखी?

ललित

15.07.19
दोधक छंद
211 211 211 22
वार्णिक छंद

निष्ठुर ओ बदरा अब आजा
हर्ष भरी बुँदियाँ बरसा जा।

नीर फुहार मिले बदरों की।
प्यास बुझे मन की अधरों की।

ललित
दोधक छंद

जीवन की बस एक कहानी।
भूल करे नर ये अभिमानी।
पत्थर में भगवान तलाशे।
मन्दिर सा मन क्यों न तराशे?

ध्यान जरा मन में कर ले जो।
कृष्ण-कथा मन में भर ले जो।
श्याम-प्रभो दुख-ताप हरेंगें।
राह दिखा भव-पार करेंगें।

ललित

दोधक छंद

छोड़ गये व्रज को तुम ऐसे।
प्राण गए तन को तज जैसे।
वो वृषभानसुता बिसराई।
श्याम रही बन जो परछाई।

ये यमुना-तट राह निहारें।
गोप-सखा सब मीत पुकारें।
माखन के घट भूल गए क्या?
भा मथुरा के फूल गए क्या?

ललित

आल्हा छंद
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित

आज गुरू चरणो में मेरा,नमस्कार है बारम्बार।
छंद और लय ज्ञान दिया है,और दिया है बेहद प्यार।
शब्दों का संयोजन सीखा,उनसे ही है मैंने आज।
छंदों की रचना में खोया,भरता हूँ मैं नित परवाज

गुरू देव की इच्छा में ही,मिल जाती है
जिनकी चाह।
ऊँची फिर परवाज भरें वो,और सुगम हो जाती राह।
नियमों का पालन करने से,लेखन पाता और निखार।
माँ शारद को हैं वो प्यारे,जो नर करें गुरू से प्यार।

गुरू रूप में ईश्वर आए,देने हमें ज्ञान भण्डार।
गुरू तत्व को तुम पहचानो,इसकी महिमा अपरम्पार।
मंगल सदा शिष्य का होता,गुरू कृपा से ही तो खास।
गुरू शिष्य का बंधन ऐसा,जो आता है दिल को रास।

मात-पिता गुरु के चरणों में,जो नित अपना शीश झुकाय।
सदा विजय उसकी है होती,मनचाही मंजिल वो पाय।
एकलव्य सा शिष्य मिले तो,गुरु मूरत भी दे दे ज्ञान।
गुरू द्रोण की किरपा से ही,अर्जुन ने सीखा संधान।

'ललित'

दोधक छंद

जीवन की अनबूझ कहानी।
वृद्ध हुआ कल का अभिमानी।
छोड़ चली हर इन्द्रिय ऐसे।
साथ यहीं तक था बस जैसे।

लेकिन डोल रहा मन प्यासा।
हाय बढ़े नित काम-पिपासा।
अंत नहीं मद-मोह-निशा का।
और नहीं कुछ भान दिशा का।

ललित

दोधक छंद
सुख-दुख

जीवन में दुख वो कब पाए?
जो वृषभानुसुता गुण गाए।
नाम जपो मुख से नित राधा।
पार करो दुख में हर बाधा।

ललित 

21.07.19
लावणी छंद

हर पंछी की यही कहानी,साँझ पड़े घर आना है।
सुबह सवेरे फिर से उड़कर,दाना चुगने जाना है।
चीं-चीं करते नन्हे बच्चे,जो भूखे बैठे घर में।
उनके मुख में भी रखने हैं,चुग्गे दाने दिन-भर में।

ललित

जीवन की अनबूझ पहेली,समझ कहाँ मन है पाता।
कभी मिले खुशियों का रेला,कभी दुःख 
दारुण आता।

लावणी छंद

पुष्पों की बगिया से थोड़ी,खुशबू लेते आना तुम।
सीख साथ में आना प्यारे,फूलों से मुस्काना तुम।
चुभन सहें काँटों की फिर भी,हर-पल हैं जो मुस्काते।
उन सुमनों की सौरभ से ही,देव-मनुज सब हर्षाते।

ललित


लावणी छंद

झम-झम-झम-झम बरसे बदरा,गरज-गरज कर फिर बरसे।
भिगो दिया गोरी का लहँगा,निकली ज्यों ही वो घर से।
शर्माई सकुचाई गोरी,भीग-भीग कर फिर भागी।
साजन से मिलने की इच्छा,जाग-जाग कर फिर जागी।

ललित

लावणी छंद

प्यार छुपाए दिल ही दिल में ,चाँद भटकता  रजनी में।
प्यारा सा इक प्यार भरा दिल, ढूँढे अपनी सजनी में।
कहे चाँदनी सजना प्यारे,प्यार भरा दिल ये मेरा।
दे दूँगी इक झटके में यदि,प्यार मिले मुझको तेरा

ललित

लावणी छंद

मिलते हैं वो चाँद चँदनिया,दुनिया रोशन करने को।
अँधियारे को चीर दिलों में,प्रेम तरंगें भरने को।
रात अमावस की काली कब,दिल की प्यास बुझा पाती।
चाँद-चँदनिया की मादकता,प्रेमी जोड़ों को
भाती।

ललित

लावणी छंद

दिल चाहता था प्यार के कुछ,पल समेटूँ 
झोलियों में।
पर प्यार का प्यासा रहा दिल,खो गए पल बोलियों में।
ऐ वक्त तू इक पल ठहर जा,प्यार का अहसास कर लूँ।
मैं प्यार की गहराइयों में,चार गहरी साँस भर लूँ।

ललित

30.07.19
चौपाइयाँ

श्यामप्रिया राधा सुकुमारी,नटवर-नागर कृष्णमुरारी।
नंदनवन महका है ऐसे,चंदन-कानन महके जैसे ।

पुष्प लदी हर डाली चहके,लतिकाओं का मन भी बहके।
राधा की वेणी में जूही,महक रही मस्ती में यूँही।

नाक नथनियाँ पहने राधा,कान्हा ने वंशी-सुर साधा।
मोरपंख कान्हा ने धारा,राधा ने दिल उस पर वारा।

कान्हा की कजरारी अखियाँ,देख-देख बलिहारी सखियाँ।
रास-रचाए रस बरसाए,कान्हा सबका मन हर्षाए।

दोहा

मगन हो रहा रास में,व्रज का माखनचोर।
ठुमक-ठुमक कर नाचता,नटखट नंदकिशोर।

ललित



चौपाई

बड़ा लालची मानव मन है,
हर रिश्ते में खोजे धन है।

ईश्वर को भी धन दिखलाए,
हरि को भी देना सिखलाए।

तन करता धन का  साधन है,
मन काला और गोरा तन है।

नहीं मिले जब मनचाहा धन।
बिदक-बिदक जाता है ये मन।

ललित

अप्रेल 18 ई मेल

अप्रेल 18

सोरठा छंद

बाँसुरिया की तान,छेड़ रहा घनश्याम यों।
भगवद्गीता ज्ञान,भरा हुआ हर तान में।

उद्धव करके ध्यान,नहीं कभी जो पा सका।
गोपी को वो ज्ञान,मधुर मुरलिया दे गई।

ललित

30.4.18
सोरठा छंद

हो जाना है मौन,इक दिन हर इंसान को।
बच पाया है कौन,उस अनदेखी मौत से।

जीवन में ये काम,कर लेना इंसान तू।
निशि-दिन जपना राम,भव से होगा पार तू।

ललित

सोरठा

इतना है विश्वास,कान्हा राधा पर मुझे।
पूरी होगी आस,भजनों की पुस्तक छपे।

माँ शारद से आज,इतनी है मेरी अरज।
करें 'राज' भी नाज,छंद सृजन ऐसा करूँ।

ललित

कुण्डलिनी छंद

मोबाइल प्यारा लगे,मानव को यूँ आज।
जैसे होती दाद में,मीठी-मीठी खाज।

मीठी-मीठी खाज,शुरू में मन को भाती।
खुजलाने से हाय,और बढ़ती ही जाती।

ललित

रुबाई

गलती से दीवानी राधा,ऐसी गलती कर बैठी।
श्याम साँवरे की सुंदर छवि,नैनों में वो भर बैठी।
चला गया मथुरा मनमोहन,अँखियों को देकर धोखा।
छैल-छबीले की वो मूरत,चैन हिया का हर बैठी।

ललित
27.4.18
रुबाई

दिल में बसकर कैसे कोई,दिल के टुकड़े करता है?
सोच-सोच कर टूटा दिल ये,निशि-दिन आहें भरता है।
दिल के टुकड़े रोते हैं पर,चीख़ नहीं बाहर आती।
बन्द हुए नैनोंं में से इक,शीतल मोती झरता है।

ललित
रुबाई

शबरी के झूठे बैरों को,बड़े चाव से जब खाया।
प्रीत भरी थी उन बैरों में,लक्ष्मण नहीं समझ पाया।
चुटकी की सेवा हनुमत ने,सिया राम से जब माँगी ।
राज छुपा था क्या चुटकी में, समझ किसी को कब आया?

ललित

रुबाई

1
प्यारी-प्यारी बातें करना,मधु लपेट कर
मुस्काना।
छल औ' कपट भरे हों दिल में,
पर अपना पन जतलाना।
जान गए हम अच्छे से अब,तेरी बड़ी अदाकारी।
अपनी शोख अदाओं से ही,सबको पागल कर जाना।
ललित

ललित

रुबाई

सागर से गहरे नैनों में,ऐसी हाला भर लाई।
पीने को सब मचल उठें वो,ऐसा प्याला भर लाई।
चोरी-चोरी नजरों से ही,पी बैठे सब परवाने।
अपनी आँखो में ऐसा मधु,वो मधुबाला भर लाई।

ललित

24.4.18
रुबाई

सुंदर-सुंदर तस्वीरों से,दीवारें मनहर होतीं।

लेकिन घर में रहने वालों,की वो नफरत पर रोतीं।

आपस में जब गहन प्रेम हो,तो घर सुंदर बन पाए।

वरना तो वो तस्वीरें भी,सुंदरता अक्सर  खोतीं।

ललित
रुबाई छंद

धक-धक करना भूल गया दिल,कविताएं अब लिखता है।

हरदम ये भावों की भँवरों,में ही फँसता दिखता है।

खुश रखना हर दिल को यारों,हरदम ही ये दिल चाहे।

बदले में खुद दीवानों सा,गम के हाथों बिकता है।

ललित
24.4.18
दोहा
कैसा तेरा न्याय है,ओ राजा मुस्तैद।
फाँसी देता एक को,दूजे को बस कैद।

सनाई छंद

इस जीवन से ये सीख मिली,जीवन इक सुंदर सपना है।
अपना दिखता है जो हमको,वो रहता कब तक अपना है?
बस आशा और निराशा में,ये जीवन बीता जाता है।
क्या ले जाता है दुनिया से,क्या ले कर ये नर आता है?

ललित

22.4.18
सनाई छंद

बड़ी अनोखी है प्रभु जी ये,लख-चौरासी भूल-भुलैया।
अंध कूप भी हैं कुछ इसमें,जिनमें अटकी मेरी नैया।
सुमिरन आठों याम करूँ मैं,मन में ऐसी अलख जगा दो।
नाम रूप पतवार थमा दो,नैया मेरी पार लगा दो।

ललित
21.4.18

सनाई छंद

धवल चाँदनी में मृगनयनी,चली जा रही
है इठलाती।
साजन से मिलने को आतुर,नैनों में ले दिल की पाती।
नैन कहेंगें दिल की बतियाँ,मौन रहेंगें साजन सजनी।
दिल की बातें कहने-सुनने,को कम पड़ जाएगी रजनी।

ललित

20.4.18
सनाई

कल-कल कल-कल बहती अविरल,
पावन शीतल गंगा धारा।

चम-चम चम-चम चमके ऊँचे,
हिम-शिखरों में भारत प्यारा।

वन उपवन झरने मनभावन,
बागों में सावन के झूले।

वो घाटी फूल-बहारों की,
कश्मीर न भारत का भूले।

ललित

20.4.18

सनाई छंद

जय-जय जय-जय कृष्ण-राधिका,जय-जय-जय सिया-राम प्यारे।

बरसे जिस पर कृपा तुम्हारी,होते उसके वारे-न्यारे।

मैं भी आया द्वार तुम्हारे,लेकर इक छोटी सी आशा।

भव सागर में नाव न अटके , नाथ न देखूँ और तमाशा।

ललित

17.4.18
सनाई छंद

श्याम साँवरे नटवर नागर,कृष्ण कन्हैया
मुरली वाले।
बिसराए क्यों रात-रात भर,रास रचाते गोपी-ग्वाले?
नंदन-वन को भूल गए क्यों,बाल-सखा क्यों याद न आएँ?
राधा-रानी मात-यशोदा,तुझ बिन कान्हा कौर न खाएँ।

ललित

दोहा
हो जाएगा फैसला,अब दिन में दो-चार।
हर चैनल पर चल रही,है जूतम-पैजार।

मल्लिका छंद

काल यों करे प्रहार।
साथ छोड़ दे बहार।
वक्त की हसीन चाल।
दे बिगाड़ चाल-ढाल।

मल्लिका छंद

दानवी हुई बहार।
वायु ही करे प्रहार।
है कली-कली उदास।
राज से रही न आस।

रक्ष माम रक्ष माम।
बेटियाँ कहें तमाम।
राज की दिखे न रास।
न्याय की रही न आस।

पंख नोंच चाल-बाज।
धौंस दे रहा कुराज।
दो दलीय राज नीति।
वोट तंत्र की अनीति।

अंध कूप सा स्वराज।
स्वप्न ही रहा सुराज।
हाय स्लोगनी विकास।
और बेटियाँ उदास।

ललित

मल्लिका छंद

श्याम बाँसुरी बजाय।
राधिका न पास आय।
बाँसुरी बजाय मीत।
प्यार का सुनाय गीत।

राधिका खड़ी उदास।
बाँसुरी न आय रास।
कृष्ण के करीब आय।
बाँसुरी लई छुड़ाय।

ललित

बिना गेंद के गोल किया है,
गरल हवा में घोल दिया है।
नेता अपनी रोटी सेकें,
बीच सड़क पर बोटी फेंकें।

जनता को तो पिसना ही है,
घावों मरहम घिसना ही है।
वोटों की ये माया देखी,
लहू सनी हर काया देखी।

नेता खेल-तमाशा देखें,
ज्ञानी आज हताशा देखें।
बीज कभी बोए थे जैसे,
आज फसल काटेंगें वैसे।

नेताओं की फौज ये,ले डूबेगी देश को।
करने को खुद मौज ये,बदलें हर परिवेश
को।
ललित

आँखें बोलती हैं
छंद मुक्त रचना

आँखें बोलती हैं
जी हाँ...
बहुत कुछ बोलती हैं आँखें..
मगर
पिछले दस सालों में
बहुत बदल गई है....आँखों की भाषा
पहले
आदमी की आँखों में दिखता था
एक अपनत्व का भाव
एक उत्कंठा....
सामने वाले के बारे में जानने की.
बस,गाड़ी,धर्म शाला में...
मिले सहयात्री के बारे में जानने की
एक ललक होती थी बात करने की
लेकिन अब...
अब उसकी नजरें..
होती हैं...अपने मोबाइल में
ये कहती हुई कि....
तू जो कोई भी तीसमारखाँ हो ...
मुझे मतलब नहीं तुझ से...
सही भी तो है.....
उसे एक अलग ही आभासी
दुनिया अपनी ओर खींच रही होती है
मोबाइल में......
मोबाइल में.....
मोबाइल में.....

ललित

11.4.18

मल्लिका छंद

लोक तंत्र में स्वराज।
है बना मजाक आज।
वोटतंत्र भीड़ तंत्र।
मात्र एक मूल मंत्र।

देश-बंद तोड़-फोड़।
राजनीति का निचोड़।
शर्म का उड़े मखौल।
धर्म का रहा न मोल।

ललित

मल्लिका छंद

जाति देख नाम धाम।
रक्ष माम् रक्ष माम्।
अल्प बुद्धि मोहि मान।
जाति से गरीब जान।

देश का नसीब आज।
जाति के करीब आज।
जाति बद्ध लोकतंत्र।
ये विकास का न मंत्र।

ललित

मल्लिका छंद

तात पुस्तकें उधार।
ला रहा करे विचार।
ज्ञान से भरी किताब।
मूल्य का नहीं हिसाब।

लाल ढो रहा किताब।
बोझ आज बेहिसाब।
पुत्र से उठे न भार।
मात ये करे विचार।

स्कूल फीस दे रुलाय।
ड्रेस चार दी सिलाय।
शूज़ बैग और कोट।
खर्च खूब होय नोट।

खेल फीस फील्ड फीस।
तात है नहीं रईस।
क्या करे भला गरीब?
क्या पढ़े लला गरीब?

ललित

10.4.18

मल्लिका छंद

भूख से निढाल वृद्ध।
भूल से न होय क्रुद्ध।
आसमान पे निगाह।
क्यों खुदा सुने न आह?

याद आ रहा मकान।
और वो भरी दुकान।
जिंदगी बड़ी हसीन।
नौजवान पुत्र तीन।

देखते हसीन ख्वाब।
पुत्र हो गए नवाब।
वक्त से बना नसीब।
होगया फना नसीब।

खून में रही न आँच।
प्यार में रही न साँच।
वक्त आ गया खराब।
पुत्र पी रहे शराब।

वृद्ध तात-मात आज।
जो करें न काम-काज।
पुत्र को नहीं सुहायँ।
अश्रु नैन हैं बहायँ।

ललित

दोस्त यार मीत-वीत
स्वार्थ साधते न प्रीत।
स्वार्थ के हजार हाथ।
स्वार्थ के बिना न साथ।

ललित
9.4.18

मल्लिका छंद
वार्णिक छंद
चार चरण
दो दो समतुकांत
21 21 21 21
1
तात मात और भ्रात
दे सुता न दार साथ।
एक श्याम है सहाय।
दीन बंधु जो कहाय।

श्याम-श्याम तू उचार।
प्रेम से उसे पुकार।
वासुदेव वासुदेव।
नाम जो हरे कुटेव।

ललित

2
मल्लिका छंद

श्याम बाँसुरी बजाय।
गोपियाँ रहा नचाय।
प्रीत के सुनाय गीत।
रात क्यों न जाय बीत?

भोर को करे सुभोर।
बाँसुरी बजाय चोर।
राधिका रही निहार।
बाँसुरी हरे करार।

ललित

मल्लिका छंद

गोप संग नंद-लाल।
साँवरा करे धमाल।
गोपियाँ रही नहाय।
वस्त्र चोर भाग जाय।

श्याम वस्त्र दे हमार।
गोपियाँ रही पुकार।
देख ये न ठीक काज।
छोड़ यूँ न लोक-लाज।

ललित

मल्लिका छंद

ऊँच जात नीच जात।
छोड़ आज छूत-छात।
हो रही बड़ी उदास।
राज नीति आस-पास।

देश का रुका विकास।
वोट से रही न आस।
घोर अंधकार आज।
झेलता यहाँ समाज।

ललित

6.4.18
महाश्रृंगार छंद

दूत है ये अद्भुत वाचाल,अंग अब इसका
कर दो भंग।
देखकर इसका ऐसा हाल,राम आएँगें इसके संग।
बहुत सी तेल-बोरियाँ बाँध,जला दो इस वानर की पूँछ।
भूल जाएगा जपना राम,याद आएगी मेरी मूँछ।

ललित

5.4.18
महाश्रृंगार छंद

नंद-घर जन्मे नंदकुमार,पुष्प सब दौड़े आए द्वार।
चमेली चम्पा कमल गुलाब,मोगरा जूही हरसिंगार।
रात की रानी नरगिस और,गुढल गेंदा
खस सदाबहार।
मोतिया नीलकमल के संग,धतूरा करने को दीदार।

सभी फूलों ने मिलकर साथ,बनाया फूल-बंगला खास।
देव सब लगे सूँघने आज,विरज में बिखरी मधुर सुवास।
विराजी वहाँ यशोदा मात,गोद ले छोटा
सा गोपाल।
दर्श कर नाच रहे हैं झूम,गोप-गोपी सब दे दे ताल।

ललित

महाश्रृंगार
राधा श्रृंगार

करो सखियों मेरा श्रृंगार,मिलेंगें श्यामल नंदकुमार।
मोगरा जूही हरसिंगार,बाँध दो वेणी खुशबूदार।
मधुर गजरों से छलकेे प्यार,नथनियाँ चूमे नंद किशोर।
बजे पैंजनियाँ मेरे पाँव,रास में झूमे जब चितचोर।

ललित
क्रमशः

चुनरिया पचरंगी

4.4.18
महाश्रृंगार छंद

कलम से शब्द निकलते खास,जिन्हें पढ़ पुलक उठें कुछ गात।
नहीं आती जो सबको रास,कलम ऐसी कह देती बात।
कहाँ अब जग में ऐसे लोग,समझ पाएँ जो कवि की पीर।
समझ पाएँ कविता की बात,कहाँ पाठक ऐसे गंभीर।

ललित

4.4.18

महाश्रृंगार छंद
कुछ शब्द

हुए कुछ शब्द बड़े मशहूर,बढ़ाते जो भारत का नूर।
जिन्हें सुन कहते हैं सब लोग,यही है जीवन का दस्तूर।
सुनाता हूँ अब मैं वो शब्द,ध्यान से सुनना जी श्रीमान।
बैंक से अरबों लिया उधार,देश से भागा बैठ विमान।

बंद हुड़दंग और हड़ताल,आग में झोंके बस घर कार।
राजनेता के मन की बात,चुनावी मुद्दों की तकरार।
मरे आतंकी सीमा-पार,आत्म हत्या कर मरा किसान।
करें नेता घोटाले खूब,टोल में मिनिस्टरों की जान।

बालकों के कंधों पर बोझ,निजी विद्यालय को सब छूट।
कचहरी पुलिस न्याय से दूर,अस्पतालों में मचती लूट।
डकैती चोरी लूट खसोट,नारियों का जीना दुश्वार।
दलित वोटों का है आधार,देश की कौन सोचता यार।

ललित

ललित
2.4.18
महाश्रृंगार छंद
स्वप्न में पूजा
पूरी रचना

कृपा इतनी कर दो हे श्याम,स्वप्न में दर्शन हों इक बार।
चरण में शीश नवाऊँ नाथ,करूँ पूजा लाऊँ उपहार।
कराऊँ गंगाजल से स्नान,नवल पीताम्बर
इत्र-गुलाल।
मोगरा-जूही हरसिंगार,तिलक केसर-चंदन हो भाल।

मुकुट हीरों का सोहे शीश,मोर का पंख
मनोहर माथ।
खिलाऊँ छप्पन व्यंजन भोग,साथ में माखन-मिश्री नाथ।
राधिका रानी को ले साथ,विराजो झूले में फिर श्याम।
निहारूँ युगल-रूप अभिराम,करें जो महारास निष्काम।

बाँसुरी मधुर बजाकर आप,अलौकिक रस से भर दो कान।
जलाऊँ दीप सुगंधित धूप,आरती साथ करूँ गुण-गान।
माँग इतनी करना स्वीकार,दया के सागर हे घनश्याम।
मिले सत्संग भजन आनन्द,करे मन सुमिरन आठों याम।

ललित
महाश्रृंगार

मिले हमको नेता जी एक,बड़े ही धीर तथा गंभीर।
बहुत नाजुक दिल के वो नेक,सुनें जनता की सारी पीर।
कही हमने भी अपनी बात,दिखाए कचरे के कुछ ढेर।
गए गुस्से में हम से बोल,नहीं है बाबू तेरी खैर।

ललित

महाश्रृंगार छंद

मुरलिया वाला माखनचोर,खड़ा हो पनघट पे नित भोर।
छेड़ता है मुझको मुँहजोर,साँवरा नटखट नंद किशोर।
नजरिया से मारे यूँ तीर,हुए हैं घायल तन-मन-प्राण।
किसे बतलाऊँ दिल की पीर,धड़कना भूला जो नादान।

ललित

1.4.18
महाश्रृंगार छंद

देख ली दुनिया हमने खूब,और देखे इसके दस्तूर।
कभी था जिनका दिल में वास,वही जा बैठे दिल से दूर।

नजर में रखते थे जो प्यार,फेर बैठे नजरें वो आज।
हमें ठुकराते हैं जो आज,कभी हम पर करते थे नाज।

ललित
महाश्रृंगार छंद

बजाता है मोहन नित भोर,मधुर मोहक मुरली जिस ठाँव।
बनूँ उस नंदनवन का वृक्ष,करूँ मैं तेरे सिर पर छाँव।
बिखेरे माखन माखनचोर,कंकरी जिस मटकी को मार।
बनूँ मैं वो ही मटकी श्याम,तपाए चाहे मुझे कुम्हार।

ललित

महाश्रृंगार छंद

अरे ओ मुरलीधर घनश्याम,छेड़ दे वंशी की वो तान।
जिसे सुन पाए मन विश्राम,मधुर-रस से भर जाएँ कान।
जरा सपनों में आ गोपाल,प्यार से मटका
दे तू नैन।
न हों जब तक तेरे दीदार,भला आए क्यूँ दिल को चैन?

ललित

रुबाई सृजन 2


रुबाई छंद
16.1.17
1
फूल
फूल महकते जब बगिया में,झूमे खुश होकर माली।
गजरे में कुछ गुँथ जाएंगें,पहने कोई मतवाली।
कुछ माला में बँध महकेंगें,मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारे।
कुछ मरने वाले की अर्थी,की हर लेंगे बदहाली।
2
मोहन
रात सखी मेरे सपने में,श्यामल वो मोहन आया।
दिनकर से तपती धरती कोे, दे दी हो ज्यों घन छाया।
मुरली की आलौकिक धुन पर,झूम रहा था मतवाला।
वंशी की वो मधुर तान दिल,भूल नहीं अब तक पाया।

ललित
3.
माखन-चोरी

मैया तेरा वो नटखटिया,करता है माखन चोरी।
नैन मटक्का करता है जब,दिखे कहीं सुंदर छोरी।
जादू की बाँसुरिया से वो,तान मधुर मनहर छेड़े।
सुन जिसको छम-छम नाचे वृषभानु सुता चंचल गोरी।

ललित
4.
दिल

प्रेम भरा हो दिल में जितना,उतना ही वो छलकेगा।
नैन झरोखे से वो शीतल,मोती बनकर ढलकेगा।
जिसके सीने में नाजुक सा,प्यार भरा इक दिल होगा।
उसकी उठती गिरती पलकों,में हरदम वो झलकेगा।
ललित
5
नेता

बदल रहे हैं नेता पाला ,बदल रहे हैं अब चोला।
क्या जनता सब समझ रही है,क्या है ये घोटम घोला?
नीति नहीं है नियम नहीं हैं,क्या है ये गड़बड़ झाला।
जनता से सब वोट छीनने,निकल पड़ा है हर टोला।
'ललित,

6.
सपने
सपनों में रँग भरने वाले,थोड़ा सा तू रुक जा रे।
बहुत सुनहरे रँग सपनों में,मत भरना तू सुन प्यारे।
सपनों का जब उड़ता है रँग,वो पल बड़ा दुखद होता।
बदरँग सपनों में रँग भरना,सीख जरा तू मतवारे।
ललित

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