मई 2019 रचनाएँ
अगस्त 2018
[01/08, 5:29 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद
यौवन बीत गया सुख से अब सोच दिमाग लगा कुछ तो।
जो हरि वास करे मन में उस से अब प्रीत पगा कुछ तो।
तात सुता सुत भ्रात सखा इन साथ विराग जगा कुछ तो।
जो हरि एक रमा जग में बस वो बन जाय सगा कुछ तो।
ललित
[01/08, 8:20 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद
2
चाहत है इतनी मनमोहन,
आन बसो मन-आँगन में।
नैन करूँ जब बन्द प्रभो तव,
दर्शन हों इस सावन में।
हाथ पसार करूँ विनती प्रभु,
दाग लिए इस दामन में।
साँस रहे तन में प्रभु तो नित,
जाप चले मन पावन में।
ललित
[02/08, 1:50 PM] ललित:
आल्हा छंद
जीवन बीता समझ न पाया,
अब तक मैं सपनों की बात।
स्वप्न सुनहरे खत्म न होते,
सपनों में ही बीती रात।
रंग-बिरंगे सपने मन जो,
रहा देखता उम्र तमाम।
उन टूटे सपनों की किरचें,
अब बहलाएँ सुबहो-शाम।
ललित
[02/08, 3:14 PM] ललित:
आल्हा छंद
कान्हा के कदमों की आहट,
सुनने को तरसे हैं कान।
कानों में हर-पल गूँजे है,
मधुर बाँसुरी की वो तान।
तान बाँसुरी की ऊधौ जी,
सुन लेता है जो इक बार।
ध्यान-धारणा बिना कन्हैया,
कर देते उसको भव-पार।
ललित
[02/08, 7:29 PM] ललित:
आल्हा छंद
सावन की रिम-झिम बौछारें,
भिगो गई गोरी का गात।
गाल गुलाबी नैन शराबी,
अधरों पर अटकी कुछ बात।
पानी की कुछ चंचल बूँदें,
चूम रही गोरी के गाल।
प्यार भरी नीली अँखियों में ,
तैर रहे हैं डोरे लाल।
ललित
[03/08, 9:55 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद
यौवन में इतरा कर तू अब वृद्ध हुआ पछताय रहा।
जीवन व्यर्थ गवाँय दिया अब क्यों मुँह को बिचकाय रहा?
नाम न राम जपा मुख से दिल से प्रभु को बिसराय रहा।
राम-हरे अब तो जप ले अब क्यों जग में भरमाय रहा ?
ललित
[06/08, 1:46 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
10-8-8-6
बिजुरी जब चमके,
जियरा धड़के,
खन-खन खनके,कँगना रे।
मतवारे साजन,
प्यारे राजन,
सूना सावन,अँगना रे।
सावन हरियाला,
बदरी वाला,
मथ-मथ डाला,इस मन को।
जल्दी घर आ जा,
रस बरसा जा,
भूल न राजा,विरहन को।
ललित
[06/08, 5:29 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
छोटा सा बाजा,बन्दर राजा,खाकर खाजा,ले आया।
कुर्ता पाजामा,बन्दर मामा,मस्जिद-जामा,
से लाया।
सुन ढोल-धमाँसे,छम-छम नाचे, भरे कुलाँचे,बन्दरिया।
बिजुरी जब चमके,नाचे जम के,लगाय ठुमके,सुंदरिया।
ललित
[06/08, 6:56 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
3
रख प्रभु से आशा,छोड़ हताशा,घोर-निराशा,तज दे रे।
जीवन क्षण-भंगुर,
होकर आतुर,
नित मुरली-धर,भज ले रे।
सुन मेरे भैया,
जीवन नैया,
कृष्ण-कन्हैया,खेवेंगें।
गहरा भव-सागर,
पार सकें कर,
हरि को जो नर,सेवेंगें।
ललित
[07/08, 6:46 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद
जय राधे-कृष्णा,जय श्री कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा,जय राधा।
जय-जय सुख सागर,जय मुरली धर,नटवर नागर,हर बाधा।
जय बाल-मुकुंदा,जय गोविंदा,यशुदा-नंदा,दुख हारी।
गोवर्धन-धारी,मुकुट-बिहारी,कृष्ण-मुरारी,सुख कारी।
ललित
[08/08, 7:30 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद
यमुना के तीरे,ढोल-मँजीरे,
धीरे-धीरे,बजते हैं।
वंशी-वट झूमे,भँवरे घूमें,मोर पंख सिर,सजते हैं।
जब नँद का लाला,मुरली-वाला,कान्हा काला,हँसता है।
राधा का मनवा,चंचल चितवा,मुस्कानों में,
फँसता है।
ललित
[10/08, 6:54 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
लालच के मारे,नेता सारे,लगा मुखौटे,फिरते हैं।
दाढ़ी में जिनके,लाखों तिनके,सीना जोरी,करते हैं।
जनता को लूटें,नेता झूँठे,सौदागर ये,सपनों के।
कानून बनाते,फिर इतराते,नहीं सगे ये,अपनों के।
ललित
[11/08, 5:56 AM] ललित:
त्रिभंगी छंद
जय श्री राधा कृष्ण
राधा की बहियाँ,पकड़ कन्हैया,यमुना तीरे जब मोड़े।
राधा शरमाए,कुछ सकुचाए,
पकड़ कन्हैया,कब छोड़े?
दिल धक-धक धड़के,
राधा भड़के,
मन ही मन में,
खुश हो ले।
नैना मटकाए,हँसता जाए,
राधा का घूँघट खोले।
ललित
[11/08, 4:36 PM] ललित:
त्रिभंगी छंद
ये बाग-बगीचे,महल-गलीचे,
साथ समय पर,कब देते?
ये रिश्ते-नाते,प्यार-दिखाते,
हाथ समय पर,कब देते?
वो एक निराला,मुरली वाला,
पीर सभी की,हरता है।
बस उसको भज लो,नाम सुमिर लो,
हाथ वही सिर,धरता है।
ललित
[12/08, 7:52 PM] ललित:
ताटंक छंद
कहलाता आजाद देश ये,अंदर से टूटा-टूटा।
उलट-फेर कानूनों में कर,नेताओं ने ही लूटा।
इकहत्तर की वय में भी है,लगा रैलियों का रेला।
नेताओं की मुट्ठी में क्यों,कैद बहारों का मेला?
ललित
[14/08, 7:50 AM] ललित:
रोला छंद
पूरा गीत
1
🙏🌸🙏
मुरली वाले श्याम,सुनो गोवर्धन धारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?
गोप-गोपियाँ बाल,सखा सब तुम्हें पुकारें।
राधा जी भी राह,तुम्हारी नित्य निहारें।
वंशीवट की छाँव,खड़ी है राधा प्यारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?
तरसे हैं अब कान,मधुर मुरली को प्यारे।
आ जाओ इक बार,अरे ओ कान्हा कारे।
माखन मिश्री भोग,लिए यशुदा बलिहारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?
सूना यमुना तीर,हुआ नंदन-वन सूना।
तुझ बिन ओ नँदलाल,राधिका का मन सूना।
बाँसुरिया की तान,सुना दो फिर से प्यारी।
क्यों छोड़ा व्रजधाम,अरे ओ मुकुट बिहारी?
ललित
🙏🌸🙏
[14/08, 10:19 AM] ललित:
रोला छंद
1
कहाँ गया सँविधान,मूल अधिकारों वाला।
लगा हुआ क्यों आज,न्याय के मुँह पर ताला?
बरगद पीपल नीम,आम का उठा जनाजा।
काँटे-दार बबूल,बना जंगल का राजा।
ललित
[14/08, 3:51 PM] ललित:
रोला छंद
देख लिया घनश्याम,तुम्हारा प्यार अनोखा।
छोड़ गए व्रजधाम,दे गए सबको धोखा।
ओ निष्ठुर मन मीत,कहो क्या थी मजबूरी।
भुला दिए सब मीत,करी राधा से दूरी।
ललित
[14/08, 4:34 PM] ललित:
रोला छंद
अँखियों से मत मार,करे मत तिरछे नैना।
तिरछे तेरे नैन,चुरा लेते हैं चैना।
चैन गया मुँह फेर,मिली हैं जब से अँखियाँ।
फिरती मैं बेचैन,हँसें हैं सारी सखियाँ।
ललित
[15/08, 8:19 PM] ललित:
रोला छंद
अपना हिन्दुस्तान,जहाँ में सबसे न्यारा।
सर्व धर्म सम्मान,हमारा पावन नारा।
देश-भक्ति की गंध,यहाँ माटी ने धारी।
तूफानों से जंग,रहे हरदम ही जारी।
ललित
[16/08, 6:41 PM] ललित:
दोहा
हंसों का रँग देखकर,काग चकित रह जाय।
चुपड़े पॉडर-क्रीम पर,कालिख छूट न पाय।
ललित
[17/08, 10:37 PM] ललित:
रोला छंद
मिलते रहते मीत,सभी को इस जीवन में।
होती सच्ची प्रीत,किसी विरले के मन में।
आदि समय से रीत,यही चलती आई है।
सच्ची जिसकी प्रीत,जीत उसने पाई है।
ललित
[18/08, 5:34 PM] ललित:
रोला छंद
बोर हुए दो यार,रेल में कविता करते।
देख रेल की चाल,आँख में आँसू भरते।
भारत की ये रेल,विश्व में सबसे प्यारी।
करवाती है सैर,पूर्ण भारत की न्यारी।
🙏🙂🙏ललित
[18/08, 5:56 PM] ललित:
रोला
जीने का अंदाज,सजन का सबसे न्यारा।
हँसी-ठिठोली-बाज,साजना मुझ
को प्यारा।
अँगना हो गुलजार,सजनवा के आने से।
तन में बजें सितार,बाँह में भर जाने से।
ललित
[18/08, 6:36 PM] ललित:
रोला छंद
नीले तेरे नैन,समन्दर से भी गहरे।
प्यारे तेरे कान,मगर क्यों इतने बहरे?
दिल की ये आवाज,नहीं क्यों सुन हैं पाते?
क्यों मेरे जज्बात,नहीं तुझको छू जाते?
ललित
[19/08, 5:40 AM] ललित: आइए सुबह की शुरुआत बिटिया रानी के साथ करते हैं...
🙏🌷🙏🙂
रोला छंद
बाबुल का घर-द्वार,छोड़ कर बिटिया रानी।
चली आज ससुराल,लिए नयनों में पानी।
ये आँगन ये गाँव,भूल कैसे पाएगी?
ममता की वो छाँव,और माँ यादाएगी।
भर आई हैं मात,पिता भाई की अँखियाँ।
क्यों जाती हो छोड़,कहें बचपन की सखियाँ?
कहें बहन अरु भ्रात,सदा खुश रहना बहना।
मोबाइल से बात,हमेशा करती रहना।
ललित
[19/08, 2:38 PM] ललित:
रोला सागर
भर ले जिसमें पीर,राधिका सागर जैसी।
कहाँ मिलेगी श्याम,बता दे गागर ऐसी।
काला था जो नीर,कन्हैया यमुना जी का।
उसका रँग भी हाय ,हुआ अँसुवन से फीका।
ललित
[20/08, 12:23 PM] ललित:
रोला छंद
जय गुरूदेव
👏👏👏👏👏👏👏
गुरूदेव का प्यार,मिला है हमको जैसा।
आज उन्हें सम्मान,मिला है बिल्कुल वैसा।
जय-जय शारद मात,आपकी कृपा निराली।
काव्यसृजन परिवार,बजाए खुश हो ताली।
ललित
👏👏👏👏👏👏👏
[21/08, 11:26 AM] ललित: 21.8.18
दोहा क्रमांक : 1
फूल नहीं हैं छोड़ते,मुस्काना दिन-रात।
चाहे कुदरत दे उन्हें,काँटों की सौगात।
ललित
[21/08, 11:46 AM] ललित:
दोहा क्रमांक : 2
मीठा-मीठा रस मिला,खुशबू की सौगात।
भौंरे ने जब फूल से,कही प्यार की बात।
ललित
[21/08, 3:01 PM] ललित:
दोहा क्रमांक : 3
छोटा सा जीवन मिला,सपनों में मत डूब।
निश-दिन हरि का नाम ले,पुण्य कमाले खूब।
ललित
[21/08, 7:12 PM] ललित:
दोहा क्रमांकः4
दुख के पी लेे घूँट जो,लेकर हरि का नाम।
सुख उसका पीछा करे,भजता जो निष्काम।
ललित
[21/08, 7:56 PM] ललित:
दोहा क्रमांक : 5
क्यों भेजा संसार में,हरि ने हमको हाय?
काम क्रोध मद लोभ से,मन जो छूट न पाय।
ललित
[23/08, 8:50 AM] ललित:
मुक्तक प्रतियोगिता
मेरा प्रयास
घाव जो तुमने दिया है क्या कभी भर पाएगा?
क्या खुशी का वो समन्दर लौटकर फिर आएगा?
कौन सा मरहम भला इस दिल को सकता जोड़ है।
दिल खिलौना तो नहीं जो टूटकर जुड़ जाएगा।
ललित
[24/08, 4:54 PM] ललित:
रोला छंद
झूम रहे हैं मोर,देख सावन का मेला।
अम्बर में है शोर,गरजते वारिद छैला।
बगिया में हर ओर,लगे सावन के झूले।
इठलाती हर नार,आज बन-ठन के झूले।
ललित
[24/08, 6:43 PM] ललित:
रोला छंद
रिम-झिम ये बरसात,देख मनवा हर्षाता।
बूँद छुए जब गात,भीग मन भी है जाता।
नदिया झूमी जाय,महकता है हर धोरा।
जोरा-जोरी आज,करे है बाँका छोरा।
ललित
[25/08, 4:11 PM] ललित:
रोला छंद
लोकतंत्र का लाभ,उठाया तुमने कैसा?
हथियाने को वोट,लुटाया कितना पैसा?
सत्ता का है शौक,पागलों तुम पर तारी।
जा-जा कर परदेश,दे रहे भाषण-भारी।
ललित
[26/08, 9:18 AM] ललित:
रोला छंद
लोकतंत्र का लाभ,उठाया तुमने कैसा?
हथियाने को वोट,लुटाया कितना पैसा?
सत्ता का है शौक,पागलों तुम पर भारी।
जा-जा कर परदेश,कर रहे भाषण जारी।
ललित
[26/08, 10:54 AM] ललित:
राखी दोहे
रक्षा बंधन की पहली प्रस्तुति
समीक्षा हेतु
भेज रही हूँ नेह की,
इक छोटी सी डोर।
दे दे ना भैया मुझे,
खुशियों का इक छोर।
भाई मेरा खुश रहे,
यही प्रभू से आस।
जीवन में देखे नहीं,
कभी गमों की त्रास।
वीरा तुझसे है बँधा,
मन का हर इक तार।
तेरे मधुर सनेह से,
जीतूँ सब संसार।
'ललित'
[27/08, 1:45 PM] ललित:
मनोरम छंद
उठ रहा दिल में बवंडर।
भावनाओं का समंदर।
सिर्फ जी ली जिंदगी है।
या करी कुछ बंदगी है?
ललित
[27/08, 1:51 PM] ललित:
मनोरम छंद
2
बंदगी मैं कर न पाया।
जिंदगी ने यूँ सताया।
आस पूरी हो सकी कब?
कामनाएँ खो चुकी सब।
ललित
[27/08, 2:33 PM] ललित:
मनोरम छंद
क्या कहा दिल ने न जाने?
जिंदगी ढूँढे बहाने।
प्यार यूँ गम से किया क्यों?
दूसरों का गम पिया क्यों?
ढूँढती खुशियाँ ठिकाना।
जान कब पाया जमाना?
जिंदगी जिंदादिली है।
रस तभी पीता अली है।
ललित
[27/08, 3:52 PM] ललित:
मनोरम छंद
रास
बाँसुरी बजती सुहानी।
गोपियाँ नाचें दिवानी।
पायलें छम-छम बजे हैं।
राधिका के सुर सजे हैं।
रात भर चलता रहा रे।
रास वंशी के सहा रे।
चाँद भी रुकने लगा है।
आसमाँ झुकने लगा है।
शाँत सुरभित हैं हवाएँ।
झूमती हैं सब दिशाएँ।
श्याम-राधा नैन अंदर।
प्रीत का छलके समंदर।
ललित
[27/08, 4:29 PM] ललित:
मनोरम छंद
नन्द-यशुदा की दुआ है।
जन्म लल्ला का हुआ है।
है बिरज में धूम मचती।
गोपियाँ दर्शन न तजती।
ललित
[28/08, 9:35 AM] ललित:
मनोरम छंद
राधिका रो-रो पुकारे।
आ मिलो अब श्याम प्यारे।
भूल क्यों व्रज को गए हो?
किस जहाँ में खो गए हो?
नंद-बाबा राह देखे।
क्या यही थे भाग्य-लेखे?
माँ यशोदा गोपियाँ सब।
हैं नहीं क्या याद भी अब?
इक घड़ी को दर्श दे दो।
मुस्कुरा कर हर्ष दे दो।
बाँसुरी फिर से बजा दो।
रास में हमको नचा दो।
ललित
[28/08, 8:08 PM] ललित:
मनोरम छंद
प्यार की दीवानगी थी।
क्या तुम्हारी बानगी थी?
दिल जवाँ था तब तुम्हारा।
प्यार जीवन था हमारा।
वक्त ने ये दिन दिखाए।
दो कदम तन चल न पाए।
वक्त करता क्या सितम है?
आज तन में क्यों न दम है?
ललित
।
[29/08, 9:05 AM] ललित:
मनोरम छंद
बुढापा
वक्त ने क्या दिन दिखाए?
दो कदम तन चल न पाए।
वक्त करता क्या सितम है?
आज तन में क्यों न दम है?
जो चला था हर महीना।
जिंदगी भर तान सीना।
आज वो झुक सा गया क्यों?
राह में रुक सा गया क्यों?
ये बुढ़ापा क्या बला है?
वक्त की ये क्या कला है?
आज पथराई नजर है।
और धुँधलाई डगर है।
धमनियाँ जमने लगी हैं।
साँस भी थमने लगी है।
दिल मचलता और ज्यादा।
और जीने का इरादा।
ललित
[29/08, 9:44 PM] ललित:
मनोरम छंद
बाग की नन्हीं कली थी।
शीत-छाया में पली थी।
तात की थी लाडली वो।
थी बड़ी चंचल कली वो।
अब लगी थी वो चहकने।
घर लगा उससे महकने।
तात घर वो रह न पाई।
हो गयी इक दिन पराई।
ललित
[30/08, 11:15 AM] ललित:
सार छंद
चाह
नैन नहीं कुछ चाहें कान्हा,
चाहें दर्शन तेरा।
राधा के सँग निधिवन में वो,
प्यारा नर्तन तेरा।
श्रवण चाहते सुनना अद्भुत,
वंशी-वादन तेरा।
जिव्हा मेरी चखना चाहे,
मिश्री-माखन तेरा।
'ललित'
जुलाई 2018
जुलाई 2018
[01/07, 12:52 PM] ललित:
हरिपद
बेटी की शादी करने की,चिन्ता में है तात।
पर दहेज का दानव कब है,बनने देता बात?
खून-पसीना बहा कमाया,जीवन भर धन खूब।
दे दहेज फिर भी जाएगा,कर्जे में वो डूब।
ललित
[02/07, 3:23 PM] ललित:
बिहारी छंद
हे नाथ जरा हाथ रखो,माथ हमारे।
सब पाप तथा कष्ट हरो,नाथ हमारे।
दो नाथ मुझे आप सिखा,छंद बिहारी।
कर जोड़ खड़ा आज ललित,शरण तिहारी।
'ललित'
[02/07, 8:00 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
यूँ प्यार हुआ आज उसे,श्याम पिया से।
है चैन मिला और गया, काम जिया से।
मिल नैन गए प्यास बुझी,आज जिया की।
वृषभानु सुता आज हुई,श्याम पिया की।
ललित
[03/07, 7:09 AM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
वृषभानुसुता नाच रही,श्याम नचाए।
सब गोप-सखा गोपिन सँग,रास रचाए।
जो कृष्ण अधर छोड़ कहीं,और न जाती।
वो बाँसुरिया प्रेम-भरे,गीत सुनाती।
ललित
[03/07, 7:19 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
ओ श्याम न जा छोड़ हमें, गोप पुकारे।
वंशी न बजेगी व्रज में, हाय सखा रे।
वृषभानुसुता की अँखियाँ ,बरस रही हैं।
मनमोहन के दर्श बिना ,तरस रही हैं।
ललित
[04/07, 4:43 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
जो भेद सुदामा न कहे , श्याम समझ लें।
जो बात न बोले शबरी, राम समझ लें।
जो भेंट न माँगे प्रभु से,भक्त वही है।
भगवान दयावान बड़े ,सत्य यही है।
ललित
[04/07, 7:35 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
'आधार' बिना आज नहीं,काम चले है।
'आधार' रहे साथ तभी ,नाम चले है।
'आधार' बिना आज बजे,साज नहीं है।
पहचान बिना आज कहीं,राज नहीं है।
ललित
[05/07, 4:14 PM] ललित:
मुक्तक 16-14
कलियाँ सब सिकुड़ी-सिमटी हैं,पवन चली हाहाकारी।
कंटक चीर रहे कोमल-तन,सिसक रही अबला नारी।
खग भी उड़ने से डरते हैं,बाज झपटते हैं ऐसे।
कैसा भारत कैसी महिमा,कैसे ये सत्ताधारी?
ललित
[06/07, 4:21 PM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
ओ कृष्ण कन्हैया सुन ले,अर्ज हमारी।
ये प्रीत पुकारें कर ले,दर्ज हमारी।
इक बार दिखा दे अपने ,दर्श कन्हैया।
शुभ दर्श बिना है लगती,पार न नैया।
ललित
[07/07, 5:34 AM] ललित:
बिहारी छंद
221 122 112, 21 122
क्या भेंट करूँ मैं प्रभु ये,सोच न पाऊँ?
हे नाथ तुम्हारे चरणों,शीश नवाऊँ।
बस एक यही है मन में,चाव कन्हैया।
भव-सिंधु नहीं ये अटके,नाव कन्हैया।
ललित
[08/07, 11:31 AM] ललित:
दोहा छंद
गरल हवा में घुल गया,जल बाँधों में कैद।
भ्रमर वासना से भरे,इसमें क्या है भेद?
ललित
[08/07, 1:35 PM] ललित:
दोहे
किटि पार्टी
नारंगी चश्मा लगा,छतरी थामे हाथ।
किटि-पार्टी मैडम चली,सहेलियों के साथ।
शांति किसे भाए वहाँ,झगड़ पड़ीं दो नार।
कर्कश वाणी से करें,इक दूजे पर वार।
साड़ी सुंदर एक की,दूजी का गलहार।
और कुटिल मुस्कान से,तीजी करती वार।
मेजबान का घर बड़ा,महँगा सोफा सेट।
चौथी कोने में खड़ी,देख रही थी गेट।
पंचम झोले में लिए,हाऊजी का गेम।
षष्ठी बोली खेल के,नियम रहेंगें सेम।
सप्तम ने बाँटे टिकट,खड़ी आठवीं मौन।
प्लेटें चम्मच आगए,सर्व करेगा कौन?
ग्यारहवीं थी गाँव की,सीधी-सादी नार।
रजपूती पौशाक में,कर सोलह श्रृंगार।
बारहवीं मॉडर्न बड़ी,जींस-टॉप में हाय।
खड़ी-खड़ी बतिया रही,हाथों को मटकाय।
तेरह चौदह पंद्रवीं,बड़ी तेज तर्रार।
सोलहवीं चंचल सखी,मुस्काती सी नार।
कुछ मीठा कुछ चरपरा,खट्मिट्ठा कुछ भोज।
चटखारे ले खा गईं,सारी ओवरडोज।
कोई जीती गेम में ,रुपए सत्तर-साठ।
हारी कोई प्रेम से,रुपए साढ़े आठ।
अंत भला सो हो भला,हँसी-ठिठोली साथ।
वापस सब घर को चलीं,दिए हाथ में हाथ।
ललित
[08/07, 2:33 PM] ललित: दोहे
प्याज रोटी
प्याज और रोटी मिले,सब बच्चों को आज।
सोच यही घर से चला,करने को वह काज।
मजदूरी दिन-भर करी,बहा पसीना-खून।
लाया रोटी प्याज वो,लेकिन था घर सून।
पूछ पड़ोसी से लिया,कहाँ गए सब आज।
कहा पुलिस है ले गई,कुछ पूछन के काज।
दौड़ा-दौड़ा वह गया,थाने में कर-जोड़।
बोला थानेदार ने,कर ले कुछ गठ-जोड़।
बच्चे तेरे जेल में,सड़ जाएँगें देख।
ले आ तू कुछ नोट तो,बदलेंगें हम लेख।
क्या ला पाऊँगा कभी,इतने सारे नोट?
सोच रहा कानून में,कैसी है यह खोट।
ललित
[08/07, 5:20 PM] ललित:
दोहा प्रतियोगिता
क्रमांक - 1
कच्ची माटी से बनी,मन की हर दीवार।
इस ढँग से ढालो उसे,हो जाओ भव-पार।
क्रमांक - 2
मत सींचो मन में कभी,राग-द्वेष की पौध।
भव तरने की राह में,यही बड़ा अवरोध।
क्रमांक - 3
चाह नहीं सुंदर दिखे , माटी की यह देह।
मन मेरा सुंदर दिखे, रखूँ सभी से नेह।
क्रमांक -4
द्वेष नहीं मन में रखो,पिओ घूँट अपमान।
अमृत सम तो प्रीत है, द्वेष गरल सम जान।
क्रमांक - 5
सपने सुंदर देखते,जीवन बीता जाय।
अंत समय सच जान के,मुख से निकले हाय।
ललित किशोर 'ललित'
[09/07, 8:56 AM] ललित: छंद सिंधु
पहला प्रयास
कहीं कलियाँ बिखरती थी हवाओं में।
कहीं भाषण दिए जाते चुनाओं में।
कहीं थी लाडली अस्मत रही खोती।
कहीं थी चैनलों पर ही बहस होती।
ललित
[09/07, 1:21 PM] ललित:
छंद सिंधु
न कलियाँ मुस्कुरा सकती कभी खुलकर।
हवा में बह रही जब वासना घुलकर।
न फूलों में बची खुशबू वहाँ कोई।
कि मानवता जहाँ मुख फेर कर सोई।
ललित
[09/07, 2:24 PM] ललित:
छंद सिंधु
अगर है प्रेम का सागर कहीं कोई।
कन्हैया सा कहीं प्यारा नहीं कोई।
कभी मुरली बजाता सात सुर वाली।
कभी माखन चुराता देख घर खाली।
कहीं वो नाग के फन पर चढ़ा नाचे।
कहीं वो गोपियों के सँग खड़ा नाचे।
मरोड़े राधिका की वो कभी बहियाँ।
सजाए वेणियों में वो कभी कलियाँ।
ककभी वो बाँटता माखन गरीबों में।
महल लिखता सुदामा के नसीबों में।
सुदामा से गले मिलता चरण धोता।
नहीं ऐसा कहीं राजा कभी होता।
ललित
[09/07, 8:42 PM] ललित:
छंद सिंधु
सुदामा नाम का था मित्र मोहन का।
रखे दिल में सदा जो चित्र मोहन का।
नहीं की कामना उसने कभी धन की।
सदा की वंदना उस मित्र मोहन की।
ललित
[09/07, 8:45 PM] ललित:
छंद सिंधु
चुभन उस दर्द की दिल से नहीं जाए।
दिया जो दर्द अपनों ने हमें हाए।
बड़ी बेदर्द टीसें दर्द की होतीं।
न सोने दर्द को देतीं न खुद सोतीं।
ललित
[10/07, 11:37 AM] ललित:
छंद सिंधु
1
हवाओं में घुली खुशबू बताती है।
कली अब फूल बनकर मुस्कुराती है।
खुशी से बागबाँ भी मुस्कुराया है।
धरा चहकी गगन ने सिर झुकाया है।
ललित
[10/07, 11:56 AM] ललित:
छंद सिंधु
2
कृपा कर श्याम यूँ अपनी निगाहों से।
न हों हम दूर अब तेरी पनाहों से।
हमें विश्वास है तू खुश अगर होगा।
खुशी से झूमता सारा नगर होगा।
ललित
[15/07, 8:57 PM] ललित: आज एक मित्र से मिलने गया जिसे कैंसर ने निचोड़ कर रख दिया है।
तभी उपजे ये विचार
छंद सिंधु
कहीं मजबूरियाँ पथ रोक देती हैं।
कहीं तनहाइयाँ यूँ घेर लेती हैं।
न होते पास रिश्ते खास होकर भी।
न हँस पाता जहाँ दिलदार जोकर भी।
ललित
[16/07, 7:40 AM] ललित: सुप्रभात
🙏🌸🙏
सगुण छंद
चलो आज ऐसा करें कुछ धमाल।
लिखें लेखनी से 'ललित' कुछ कमाल।
'सगुण' छंद में हो मधुर कृष्ण रास।
मधुर प्रेम हो काम आवे न पास।
ललित
[16/07, 12:45 PM] ललित:
सगुण छंद
हुई है हवा आज दिल की मरीज।
न दिल आदमी का रहा क्यों पसीज?
बहारें हुई हैं नजरबंद आज।
मगर आदमी आ रहा है न बाज।
ललित
[16/07, 5:10 PM] ललित:
सगुण छंद
3
कन्हैया अलौकिक मुरलिया बजाय।
हँसे मोरपंखी मुकुट को सजाय।
मुरलिया अधर चूमती बार-बार।
हरे राधिका के जिया का करार।
ललित
[17/07, 10:00 PM] ललित: सगुण छंद
कली खूबसूरत भ्रमर को लुभाय।
कहीं दूर जाना भ्रमर को न भाय।
कली से करे प्यार वो बेशुमार।
हँसे बागबाँ और हँसती बहार।
ललित
[18/07, 11:24 AM] ललित:
सगुण छंद
1
प्रभो जी सुनो भक्त की ये पुकार।
करो ज्ञान-वर्षा हरो सब विकार।
न जानूँ न कर मैं सकूँ यज्ञ-ध्यान।
जपूँ नाम निश-दिन नहीं वेद-ज्ञान।
ललित
[18/07, 12:49 PM] ललित:
सगुण छंद
2
कली एक नाजुक करे ये पुकार।
कि माँ तू मुझे कोख में यूँ न मार।
जगत देखना चाहती मैं बखूब।
कि नैया भँवर में नहीं जाय डूब।
ललित
[18/07, 6:05 PM] ललित:
सगुण छंद
3
न हिंदू न मुस्लिम न सिख हैं महान।
सभी जातियाँ हिंद में हैं समान।
मगर राज-नेता करें भेदभाव।
न चाहें कभी जातियों का जुड़ाव।
ललित
[18/07, 7:53 PM] ललित:
सगुण छंद
न स्वामी न नेता न मंत्री महान।
चमत्कार को पूजता है जहान।
सभी स्वार्थ में आज अंधे हजूर।
अजी मुफ्त में चाहते ये खजूर।
ललित
[18/07, 10:42 PM] ललित:
सगुण छंद
न बदली धरा ये न ही आसमान।
बदल क्यों गया आदमी का जहान?
चले है अकड़ कर फटे वस्त्र धार।
फटी जींस में आज खुश होय नार।
ललित
[19/07, 11:34 AM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी
बेटी
मैया मैं दुलारी तेरी,सुनले अरज मेरी।
जग में आने दे मुझे,कभी न सताऊँगी।
कलेजे का टुकड़ा हूँ,तेरा ही तो मुखड़ा हूँ
घर में आने दे मुझे,सदा मुसकाऊँगी।
तू जो मुख मोड़ लेगी,मेरा दम तोड़ देगी।
समझ न पाऊँ तुझे,कैसे भूल पाऊँगी।
तू भी जब आई होगी,तेरी कोई माई होगी।
जैसे पाल लिया तुझे,मैं भी पल जाऊँगी।
'ललित'
[19/07, 12:18 PM] ललित:
मनहरण घनाक्षरी
चाहो जो हरि का साथ
जोड़कर दोनों हाथ।
प्रभु चरणों में आप
शीश तो झुकाइए।
नित्य कर स्नान-ध्यान
सूरज को अर्घ्य-दान।
तुलसी के बिरवा में
जल तो चढ़ाइए।
रामायण पाठ कर
भगवद गीता पढ़
नैन बन्द कर आप
ध्यान तो लगाइए।
एक उस भगवान
को ही अपना तो मान।
प्रभु दर्शनों की आप
प्यास तो जगाइए।
ललित
[20/07, 6:29 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
3
रखे पाल मन में सदा ही विकार।
नहीं जिंदगी में रखे सद्विचार।
किए पुण्य के काम क्या हैं जनाब?
यही चाहता है विधाता जवाब?
ललित
[20/07, 7:11 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
4
करे रात-दिन राधिका ये विचार।
कि उस श्याम के सँग किया क्यूँ विहार?
दिखाता रहा स्वप्न में रंग सात।
खुली नींद तो ले गया रंग साथ।
ललित
[20/07, 7:53 PM] ललित:
भरी संसदों आँख मारे कुमार।
कि उतरा नहीं है अभी भी खुमार।
गले मिल लिए ले हृदय में विकार।
नज़र है कहीं औ' कहीं है शिकार।
ललित
🙏🌹🙏
सगुण छंद
122 122 122 121
जहाँ साँस की डोर ही टूट जाय।
अधिक एक भी साँस नर ले न पाय।
दबे पाँव उस दिन चली आय मौत।
वही ज़िंदगी की बड़ी एक सौत।
ललित
सगुण छंद
122 122 122 121
रखे जो सदा पाल मन में विकार।
कहाँ से मिलेंगें वहाँ सद विचार।
किए क्या कभी पुण्य तुमने जनाब?
कभी माँग ले जो विधाता जवाब।
ललित
सगुण छंद
122 122 122 121
करे रात-दिन राधिका ये विचार।
किया श्याम के सँग कभी क्यों विहार?
दिखाता रहा स्वप्न में रँग अनेक।
खुली आँख तो ले गया एक-एक।
ललित
[21/07, 7:44 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
कली मखमली देख सावन-बहार।
पिया से मिलन को हुई बेकरार।
घटा बादलों की घिरी देख आज।
दिली धड़कनें खोलतीं प्रीत-राज।
ललित
[22/07, 2:07 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
1
न जाने खफा क्यों हुई है बहार?
कहाँ खो गया है दिलों का करार?
नहीं प्रेम दिखता दिलों में न प्रीत।
न माटी सुगंधित हवा में न गीत।
ललित
[23/07, 10:55 AM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
1
लिखोगे तभी छंद लेगा निखार।
नहीं तो चढ़ा ही रहेगा बुखार।
सभी शारदे से लगाओ गुहार।
तभी तो पटल पर दिखेगी बहार।
ललित
[23/07, 2:40 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
2
बनी खूब दुश्मन दिवानी बहार।
लिए जा रहे आज डोली कहार।
सजन रो रहा मल रहा आज हाथ।
चँदनिया चली जा रही चाँद साथ।
ललित
[23/07, 7:40 PM] ललित:
सगुण छंद
122 122 122 121
3
नहीं पाठ पूजा नहीं ज्ञान-ध्यान।
नहीं सोच ऊँची न आचार-ज्ञान।
न ममता हृदय में न लज्जा-विचार।
नई पौध देखो बड़ी होशियार।
ललित
[24/07, 12:07 PM] ललित:
राधिका छंद
दर्शन को तेरे श्याम,भक्त हैं आए।
भव से तरने की आस,संग हैं लाए।
तू मधुर-रास की श्याम,झलक दिखला दे।
ये भव तरने की कला,हमें सिखला दे।
ललित
[24/07, 2:23 PM] ललित:
राधिका छंद
माँ के मन को संतोष,दिला कर देखो।
उसके मन से तुम तार,मिला कर देखो।
माँ की ममता की छाँव,जहाँ है होती।
फिर फूलों की बरसात,वहाँ है होती।
ललित
[25/07, 2:19 PM] ललित:
राधिका छंद
जब आँगन में दीवार,खड़ी हो जाए।
बरगद की शीतल छाँव,कहाँ मिल पाए?
कुछ दीवारें तो बोझ,उठाएँ छत का।
कुछ दीवारें उन्मान,घटाएँ छत का।
ललित
[25/07, 5:46 PM] ललित:
राधिका छंद
2
यूँ झुमके वाली नार,चले बल खाती।
जो देखे उसकी साँस,वहीं थम जाती।
वो कजरारे दो नैन,झील से गहरे।
जो भी देखे दिल थाम,वहीं पर ठहरे।
ललित
[25/07, 7:57 PM]
राधिका छंद
बिटिया है लक्ष्मी-रूप,फूल सी प्यारी।
अँगना ज्यों तुलसी छाँव,पावनी न्यारी।
सारे रिश्तों में प्यार,वही है बुनती।
है मात-तात की पीर,वही सब सुनती।
ललित
[25/07, 8:47 PM] ललित:
राधिका छंद
3--क्यों?
ढलती जीवन की शाम,दर्द क्यों लाई ?
सुख-सपनों को क्यों साँच,नहीं कर पाई?
क्यों छोड़ डूबती नाव,गई पतवारें?
क्यों पतवारें रँग-रूप,नया इक धारें?
ललित
[26/07, 11:05 AM] ललित:
तरो ताजा दो दोहे
अपनों की इस भीड़ में,बेगाना है कौन?
प्रेम भरी नजरें लिए , सब बैठे हैं मौन।
बेगानों से प्यार क्यों ,इंसाँ करता आज?
अपनों से धोखा मिले,बेगानों से ताज।
ललित
[26/07, 11:36 AM] ललित:
कुण्डलिनी ताजा
मन-चाहा सब हो यहाँ,सबकी ये ही चाह।
रब-चाहे में खुश रहो, सच्ची ये ही राह।
सच्ची ये ही राह,शीश चरणों में धर लो।
सुख-दुख जो दे राम,उसी से झोली भर लो।
ललित
[26/07, 12:00 PM] ललित:
कुण्डलिनी
करते नौटंकी सभी,नेता धोखे बाज।
भीड़-तंत्र से कर रहे,लोकतंत्र में राज।
लोकतंत्र में राज,करें ये नेता सारे।
विद्वानों की फौज,एक नेता से हारे।
ललित
[27/07, 8:50 AM] ललित:
जय गुरू देव
🙏🌸🙏
सारे रिश्तों से बड़ा,पावन रिश्ता एक।
गुरू शिष्य के बीच जो,बाँधे बंधन नेक।
बाँधे बंधन नेक,बड़ा ही निर्मल न्यारा।
गुरू-कृपा से शिष्य,करे जग में उजियारा।
ललित
[27/07, 11:51 AM] ललित: पीयूष वर्ष छंद
गुरू वन्दन
शिक्षकों से ज्ञान जो हमको मिला।
जिन्दगी है ये उसी का तो सिला।
तार देते हैं गुरू मझधार से।
ताड़ देते हैं बड़े ही प्यार से।
है गुरू औ' शिष्य का रिश्ता सरल।
घुल नहीं सकता कभी इसमें गरल।
हर गुरू को आज मैं करता नमन।
जब गुरू आशीष दें महके चमन।
'ललित'
[27/07, 11:54 AM] ललित:
आल्हा छंद रचना
गुरू मिले सौभाग्य हमारा,गुरू कृपा से हो कल्याण।
गुरु मूरत की किरपा से ही,एकलव्य सीखा संधान।
अंधकार से ले जाते हैं,वो नित-नव प्रकाश की ओर।
गुरू-शिष्य का पावन-रिश्ता,कभी न हो सकता
कमजोर।
'ललित'
[27/07, 5:36 PM] ललित:
मुक्तक
गुरु के मुख से मां शारद ही,ज्ञानसुधा बरसाती है।
उनकी आंखों से माँ ही तो, प्रेमामृत छलकाती है।
मां शारद की किरपा से ही,'राज' गुरू मिल पाए हैं।
गुरू-कृपा को याद करूं तो,
आँखें भर-भर आती हैं।
ललित
[28/07, 5:36 PM] ललित:
राधिका छंद
श्रृंगार प्रयास
चंचल हैं उसके नैन,नशीले प्याले।
जो देख हुए बेचैन,कई दिल वाले।
केशों में लाल गुलाब,लवों पर लाली।
हँस कर देखे इक बार,मने दीवाली।
ललित
[28/07, 10:10 PM] ललित:
राधिका छंद
पावन पुष्पों की प्रीत,भ्रमर से ऐसी।
चंदा से करती प्रीत,चाँदनी जैसी।
गाता है निशि-दिन गीत,प्यार में पगला।
करता न्यौछावर जान,फूल पे अगला।
ललित
[29/07, 9:35 AM] ललित:
राधिका छंद
है कान्हा तेरा चोर,बड़ा नटखटिया।
माखन की मटकी फोड़,हँसे नटवरिया।
ओ मैया यशुदा देख ,रोक ले उसको।
वो करे बहुत उत्पात ,टोक ले उसको।
ललित
[29/07, 7:45 PM] ललित:
राधिका छंद
जब वृद्ध पिता की आस,टूटती दिखती।
तब आँसू की हर बूँद,कहानी लिखती।
क्यों स्वप्न गए सब टूट,सोचती आँखें?
क्यों अपनों ने ही आज,नोंच दी पाँखें?
ललित
.
[29/07, 9:03 PM] ललित:
राधिका छंद
जो मिले गुरू से ज्ञान,वही है सच्चा।
भूले जो छंद विधान,वही है कच्चा।
ये काव्य सृजन परिवार,अनोखी शाला।
रघुवंशी संग विवेक,जिता ही डाला।
ललित
[30/07, 1:36 PM] ललित:
मदिरा सवैया छंद
वानर,बालक,गोप सखा सब, संग लला बतराय रहा।
खोजत है हर रोज नया घर, गोपिन को चकराय रहा।
फोड़ दिया घट मोहन ने झट, माखन खा इतराय रहा।
बाल सखा सब माँगत माखन, माधव है बिखराय रहा।
'ललित'
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