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दिसम्बर 2019 की रचनाएँ

दिसम्बर 2019 की रचनाएँ

शायद...।
सदियों पुरानी है ये कहावत
'देर है अंधेर नहीं'  

मगर शायद न्याय-पालिका से
कभी किसी ने नहीं पूछा
इस देर की कोई सीमा है या नहीं?
सीमा नहीं है तो क्यों नहीं है?
और यदि सीमा है तो कितनी है?
कितनी है सीमा उस देर की?
वह सीमाहीन देर क्या
त्वरित अंधेर को जन्म नहीं देगी?

9.12.19

मुक्तक
मौत की मुस्कान
दर्द-दुख-गम से भरा संसार नर पाता यहां।

मौत सम्मुख देख लेकिन,कौन मुस्काता
यहाँ?

लाख दुख भोगे भले पर चाहता जाना नहीं।
मुस्कुराते-मुस्कुराते कौन है जाता वहाँ?

ललित

5.12.19
गीतिका छंद
मुस्कान ममतामयी

गर्भ में नौ माह रख निज,रक्त से सींचा जिसे।
प्रसव-पीड़ा झेल माँ संसार में लाई उसे।

देख उसकी इक झलक माँ भूल अपना दुख गई।
प्यार-ममता से भरी मुस्कान चमका मुख गई।

ललित

05.12.19
गीतिका छंद
फूल की मुस्कान
 
फूल ऐसे मुस्कुराएँ,भोर से संध्या तलक।

सूँघते सौरभ सभी हैं,बंद कर अपनी पलक।

खुशबुओं का है खजाना,पुष्प की मुस्कान में।

हर खुशी का आशियाना,पुष्प की मुस्कान में।

ललित
05.12.19
गीतिका छंद
बिन बात मुस्कुराना

मुस्कुराहट का दिवाना,यार हर कोई जहाँ।

मुस्कुराकर बेच देते,माल घटिया भी वहाँ।

मुस्कुराने की अदा उन,सेल्स गर्लों  में दिखे।

बात बिन जो मुस्कुरातीं,माल चुटकी में बिके।

ललित




शक्ति छंद

बहे दर्द के अश्रु इतने कहीं।
बचा आँख में एक आँसू नहीं।
ग़मो से भरा दिल सिसकता रहा।
नहीं दर्द अपना किसी से कहा।

जली मोमबत्ती कहे ये कथा।
सुनेगा यहाँ कौन दिल की व्यथा?
वही देश है ये वही राज है।
जहाँ द्रोपदी थी वहीं आज है।

ललित

शक्ति छंद

मटकती हुई चाँदनी आ गई।
धवल-कांति-काया ज़मीं पा गई।
मिली चाँदनी से धरा यूँ गले।
कि जैसे सखी इक सखी से मिले।

मुलाकात वो रात ही भर चली।
हुई भोर फिर चाँदनी घर चली।
धरा ओढ़ स्वर्णिम चुनरिया हँसी।
हँसा चाँद अब चाँदनी थी फँसी।

ललित

10.12.19
शक्ति छंद

हवा प्यार की बाग में यूँ चले।
भ्रमर मिल रहे हर कली से गले।
नहीं प्यार ये वासना है खरी।
कली रो पड़ी लाज से वो मरी।

ललित

10.12.19
शक्ति छंद

चटकने लगी हर कली धूप में।
नई ताज़गी भर गई रूप में।
महकने लगे पुष्प जब बाग में।
भ्रमर खो गए प्यार के राग में।

हवा प्यार की बाग में यूँ चले।
भ्रमर मिल रहे हर कली से गले।
पिया ओ भ्रमर अब न जाना कहीं।
किसी और से दिल लगाना नहीं।

भ्रमर हर कली को लगा चूमने।
दिवाना हुआ वो लगा झूमने।
नहीं प्यार ये वासना है खरी।
कली रो पड़ी लाज से वो मरी।

ललित

11.12.19
शक्ति छंद

गुलों से महकती हुई क्यारियाँ।
खुशी बाँटती शोख फुलवारियाँ।
मिली बाग में चार सखियाँ जहाँ।
हँसी की खिली फूलझड़ियाँ वहाँ।

ललित

शक्ति छंद
बपावर गाँव-ननिहाल

'बपावर' यही नाम था गाँव का।
कि ननिहाल रूपी घनी छाँव का।
रहा शाँत वातावरण जो वहाँ।
दिखेगा शहर में  भला वो कहाँ?

न फैशन न ईर्ष्या भरी होड़ थी।
हवा में घुली प्रीत बेजोड़ थी।
दिलों में बड़ा प्यार देखा वहाँ।
निगाहों में सत्कार देखा वहाँ।

नदी नाम 'परवन' वहाँ बह रही।
कि नानी हमारी जहाँ रह रही।
नहाए बड़े शौक से तैर कर।
पड़ी डाँट लौटे बहुत देर कर।

अभी तक हमें याद है वो घड़ी।
खड़ी द्वार नानी लिए थी छड़ी।
बने दोस्त ऐसे निराले वहाँ।
मिले शुद्ध घी के निवाले वहाँ।

खुशी गाँव के मन्दिरों में मिली।
भजन-भाव-गंगा दिलों में मिली।
न नानी रही अब न ननिहाल है।
'बपावर' मगर गाँव खुशहाल है।

'ललित'

11.12.19
शक्ति छंद

न व्रजधाम सा गाँव देखा कहीं।
कन्हैया नचैया पला था यहीं।
यहीं बाँसुरी थी सुरीली बजी।
यहीं वाटिका थी गुलों से सजी।

हजारों भ्रमर घूमते थे यहाँ।
सभी रास में झूमते थे यहाँ।
यहीं राधिका कृष्ण मिलते रहे।
सुमन प्यार के सुर्ख खिलते रहे।

ललित

14.12.19
शक्ति छंद
सुता

सुता जन्म ले तो मनाओ खुशी।
सुता को पढ़ाकर भुनाओ खुशी।
सलोनी सुघड़ बेटियाँ हों जहाँ।
सुखों के समन्दर सदा हों वहाँ।

धरा भारती की सिखाती यही।
सुतों से नहीं बेटियाँ कम रही।
नहीं भार बेटी बने बाप पर।
मिलाए कदम वक्त की थाप पर।

मिला मार्गदर्शन सदा गर सही।
सुता आसमाँ को झुकाकर रही।
सुता पर खुशी हर निछावर करो।
सदा गर्व अपनी सुता पर करो।

ललित

शक्ति छंद

न देखा कहीं कृष्ण जैसा सखा।
सदा भक्त का ध्यान जिसने रखा।
पुकारा जिसे चोर संसार ने।
रिझाया उसे भक्त के प्यार ने।

कभी रास करता रहा रात-भर।
कभी रूठ बैठा ज़रा बात पर।
कभी राधिका का दिवाना बना।
कभी गोपियों का निशाना बना।

कभी इंद्र को जा चखाया मजा।
कभी पापियों को स्वयं दो सजा।
कभी सत्य का वो बना सारथी।
कभी कृष्ण-गीता सुना सार दी।

चढ़ाएँ कली-फूल या पत्तियाँ।
पढे प्यार से भक्त की चिट्ठियाँ।
जपे कृष्ण का नाम जो प्यार से।
उसे तारते मृत्यु-संसार से।

ललित

मुक्तक

जिंदगी के बाग में हरदम खिलें बस फूल ही।
मत करो ये आस मत इस बात को दो तूल ही।
फूल की आभा क्षणिक बस साँझ तक ही साथ दे।
शूल कोई जब चुभे उसको निकाले शूल ही।

ललित


पीयूष वर्ष छंद
2122 2122 212

पुष्प काँटों से घिरा रहता जहाँ।
फूल से खुशियाँ मिलें सबको वहाँ।
कंटकों बिन फूल की शोभा नहीं।
दुःख में ही सुख छिपा रहता कहीं।

ललित

पीयूष वर्ष छंद

ठंड का मौसम सुहाना आ गया।
गर्म पानी से नहाना भा गया।
धूप में मालिश करें सारा बदन।
झूमने लगता वदन में वो मदन।

ललित

16.12.19
पीयूष वर्ष छंद

सोच सोचो सोचकर सोचो जरा।
स्वर्ण सा अब कौन कितना है खरा?
आदमी से आदमी है लड़ रहा।
धर्म कोने में पडा़ है सड़ रहा।

ललित

17.12.19
पीयूष वर्ष छंद

ओ कन्हैया! श्याम सुंदर साँवरे।
आ कभी तो देख मेरा गाँव रे।
फिर बजा वंशी मधुर इस ग्राम में।
ज्यों बजाता तू रहा व्रज-धाम में।

बाँसुरी तेरी निराली सोहनी।
तान उसकी है मधुर मनमोहनी।
श्याम तेरी वो मुरलिया जब बजे।
सात सुर से आत्म का मंदिर सजे।

गोप-गोपी झूमते जिस गान पर।
नाचती थी राधिका जिस तान पर।
फिर बजा उस तान में मुरली जरा।
मुस्कुरा दे फिर जरा मुरलीधरा।

मुस्कुराहट से भरी जादूगरी।
नैन मटका कर करे जो मसखरी।
वो अदा हमको दिखा इक बार तो।
आत्म-रस हमको चखा इक बार तो।

ललित

पीयूष वर्ष छंद 2122 2122 212

शीत जैसी शीत हो तो ठीक है।
शीत ने क्यूँ आज छोड़ी लीक है?
टोपियाँ मफलर बिगाड़ें रूप को।
हम खड़े छत पर तरसते धूप को।

ओढ़ भाया ओढ़ ले दादी कहे।
पैर-नंगे घूमते बालक रहे।
नाक बहती है बड़ी रफ्तार से।
विक्स डॉक्टर सब लगें बेकार से।

ललित


पीयूष वर्ष छंद

चाँदनी के दर्प से उकता गए।
वो सितारे सब धरा पर आ गए।
आसमाँ सूना हुआ रौनक गई।
चाँदनी आँसू बहाकर थक गई।

चाँद भी गुम-सुम हुआ बौरा गया।
चाँदनी को पड़ हृदय-दौरा गया।
सब सितारे मौन हो पछता रहे।
लौटकर सब आसमाँ में आ रहे।

ललित

पीयूष वर्ष छंद

पूर्व में लाली मचलती जोर की।
आसमाँ में खूबसूरत भोर की।
शीत का कुहरा धरा को घेरता।
चाँद भी अब मुख धरा से फेरता।

वाटिका-वन और उपवन बाग में।
चहचहाते खग अनोखे राग में।
मस्त नर-नारी भ्रमण में योग में।
और कुछ निद्रा-स्वपन में भोग में।

ललित

छंदमुक्त रचना

ज़िन्दगी क्या है.......?

कुछ मोतियों को माला में पिरोने का प्रयास,
कुछ को सहेज कर रखने की आस।

कुछ मोतियों का बिखर जाना...
कुछ का माला में बँधकर चिकने हो जाना।

कुछ मोतियों का रंग बदल जाना,
और कुछ का हर रंग में ढल जाना।

कुछ मोतियों का बेवजह मुस्कुराना,
और कुछ का तमतमाना।

कुछ मोतियों की कुटिल मुस्कुराहट
और कुछ की हसीन चहचहाहट।

कुछ के ग़मगीन चेहरे,
और कुछ कानों से बहरे।

कुछ माला में बँधने का दर्द महसूस करते हुए,
और कुछ सहज मुस्कान से माला को सुशोभित करते हुए।

इन्हीं मोतियों के इर्द-गिर्द जो घूमती है,
रेंगती है या दौड़ती है.......बस...

वही है ज़िंदगी.....!

ललित

पीयूष वर्ष छंद
चित्रानुसार सृजन

चूड़ियाँ सुंदर हरी गगरी भरी।
सुर्ख साड़ी की किनारी भी हरी।
केश काले रूप निखरा धूप में।
शूल क्यूँ आकर चुभा इस रूप में

ललित

पीयूषवर्ष छंद


पैर-नंगे राह शूलों से भरी।
कंटकों से कब यहाँ नारी डरी।
कंटकों के बीच ही फूली-फली।
शुद्ध-जल भरने कली पनघट चली।

ललित

पीयूषवर्ष छंद

नीर भरने जब चले गजगामिनी।
कंटकों से कब डरे वो दामिनी।
राह में  चाहे बिछे हों शूल ही।
छू वदन चंचल बनें वो फूल ही।

ललित


21.12.19
मुक्तक

देश हमारा धरती अपनी,फिर काहे ये आग लगाई?
देख मनुज का ऐसा ताण्डव,अग्नि देव को लज्जा आई।
लिए मशालें घूम रहे जो,लगा रहे हैं अद्भुत नारे।
देश किसे कहते वो अपना,धर्म कौन सा उनका भाई?

ललित


पियूषवर्ष छंद
शीत

शीत की है रात सजना मदभरी।
जा बसे परदेश तुमने हद करी।
रात ये बाइस दिसंबर की बड़ी।
और धीमे चल रही घर की घड़ी।

ललित

पियूषवर्ष छंद
शीत 2

चाँद को शीतल हवा नहला गई।
चाँदनी भी धुंध में कुम्हला गई।
ठण्ड में टिम-टिम सितारे कर रहे।
कुछ सितारे शीत-मारे फिर रहे।

हर नगर हर गाँव में ठण्डी हवा।
चुभ रही तन में नहीं कोई दवा।
शॉल स्वेटर कार्डिगन फर-कोट भी।
कर न सकते सूट थोड़ी ओट भी।

ललित

23.12.19
मुक्तक

मुस्कुरा कर मुस्कुराना सीख लो।
जिंदगी के गीत गाना सीख लो।
शीत की शीतल सुहानी धूप से।
रूठते को भी मनाना सीख लो।

ललित

छंद रजनी
2122 2122,2122 2

जन्मदिन शुभकामनाएँ,आज हम लाए।
आपकी आभा बढ़े जी,खूब बढ़ जाए।
शारदे माँ साथ दे जी,आपका हरदम।
भोर हर खुशियों भरी हो,छू न पाए ग़म।

ललित

छंद रजनी
2122 2122,2122 2

गूँजता है धड़कनों में,नाम बस तेरा।
रात-दिन ये नाम सुनना,काम बस मेरा।
प्यार में नादान ये दिल,डूबता जाए।
प्रीत के नव-गीत हर-पल,झूमकर गाए।

ललित

छंद रजनी
2122 2122,2122 2

आज जाने किस भँवर में,मित्रता खोई।
मित्र उस घनश्याम जैसा,है नहीं कोई।
जिस सुदामा को लगाया,था गले अपने।
कर दिए साकार उसके अनकहे सपने।
ं
ललित

छंद रजनी

साँवरा नट-खट कन्हैया,नंद का लाला।
भागता माखन चुराकर,कृष्ण मतवाला।
गोपियाँ दौड़ी पकड़ने,श्याम प्यारे को।
माँ यशोदा नंद-बाबा,के दुलारे को।

ललित

दोहा
नव वर्ष

सब ग़म पिछले साल के,भूलें अपनी राह।
मुस्कानें नव-वर्ष में,बढ़ें माह-दर-माह।


ललित

नव-वर्ष

ठण्डे बस्ते में रखो,उन्निस का ये साल।
नव-ग्रह की नव-वर्ष में,सुधरेगी जी चाल।

ललित

छंद रजनी

मान हो,अपमान हो या,औपचारिकता।
मन सदा निर्लिप्तता में,क्यों नहीं टिकता?
मान दौलत का करें नर,शुभ्र-वस्त्रों का।
और कुछ बस मान करते,अस्त्र-शस्त्रों का।

ललित

छंद रजनी

भागता ये वर्ष उन्निस,क्या हमें सिखला गया?
ग़म-खुशी-आनंद-मस्ती,क्या हमें दिखला गया?
जो हुआ अच्छा हुआ उन्नीसवें को भूलिए।
बीसवें नव-वर्ष की संकल्पना में झूलिए।

ललित


माही जन्म दिवस शुभकामना
गीतिका छंद

तात-माँ की लाडली माही सदा महकी रहो।
दे 'ललित' आशीष माही तुम सदा चहकी रहो।
मात शारद की कृपा से विद्वता हासिल करो।
पुष्प राहों में बिछे हों,पार हर मंजिल करो।

ललित

गीतिका छंद
कँप-कँपाती ठण्ड

पूर्व में लाली मचलती,नाचता कुहरा घना।ओस की बूँदें चमकती,सुरमई मोती बना।
मंदिरों में आरती की,घंटियाँ टन-टन बजें।
कँप-कँपाती ठण्ड में कैसे भला बिस्तर तजें?

ललित

गीतिका छंद
नव-वर्ष

क्या हुआ क्यों रूठकर ये,वर्ष उन्निस चल दिया?
दे चला खुशियाँ किसी को,औ' किसी को बल दिया।
हाय रे ज़ालिम ज़माना,भूल उन्निस को गया।
पूजता नव-वर्ष को आती न पिछले पर दया।

ललित


छंद रजनी

ज़िंदगी दो पल कहीं रुक,साँस लेने दे।
दम घुटा जाता ज़रा सा,खाँस लेने दे।
किस भँवर में आ फँसी है,नाव जीवन की?
खींच लूँ मैं डोर थोड़ी,भागते मन की।

ललित


नव-वर्ष

नया साल दे नयी उमंगें,पूर्ण करे सब सपनों को।
सुख-शांति-हर्ष के नव-पल्लव,नव-पंख मिलें सब सपनों को।
विगत वर्ष के भूल तराने,नए गीत अब लिखने हैं।
श्याम-रंग रँग डालो सब,रंग-बिरंगे सपनों को।

ललित

विविध


शक्ति छंद
मधुर रास

सितारों भरी चाँदनी रात में,बजी पायलें खूब बरसात में।
गरजते हुए बादलों के तले,मिले राधिका से कन्हैया गले

बजे बाँसुरी चूड़ियाँ भी बजें,हँसें गोपियाँ कृष्ण राधा सजें।
कन्हैया सुनाता नये राग वो,सुनें गोपियाँ तो खुले भाग वो

दसों ही दिशाएं लगी झूमने,धरा भी गगन को लगी चूमने।
सजे मोगरा वेणियों में जहाँ,कन्हैया बजाए मुरलिया वहाँ।

बसन्ती हवाएं छूएं गात को,थिरकने लगीं गोपियाँ रात को।
नथनियाँ हिलें हास के साथ में,कि झुमके हिलें रास के साथ में।

ललित

निश्चल छंद
छलिया घनश्याम

राधा जी की रूप माधुरी,ललित ललाम।
चकित नैन कनखी से निरखे,मनहर श्याम।

अँखियों ही अँखियों से पीता, माखन चोर।
राधा के नैनों की मदिरा,वो नित भोर।

ऐसा जादू करता छलिया,वो घनश्याम।
खिंची चली आती है राधा,सुबहो शाम।

गोप-गोपियाँ हँसी उड़ायें,दे दे ताल।
वो नटखट नैना मटकाए,चूमे गाल।

कैसे कैसे नाच नचाता,नटवर श्याम।
आत्मानंदी रास रचाता,वो निष्काम।

मधुर बाँसुरी से छेड़े कुछ,ऐसी तान।
आलौकिक मद से भर देता,सबके कान।

जादू की मुरली ले आया,माखन चोर।
बजा मधुर वंशी खींचे वोे,मन की डोर।

व्रज का छोरा बरसाने की,छोरी साथ।
जोरा-जोरी करे छुड़ाए,गोरी हाथ।

सिंहावलोकन घनाक्षरी

प्रार्थना

थक गये अब नाथ,
नैया खेते मेरे हाथ।
आप ही सँभालो अब,
पतवार नाव की।

पतवार नाव की लो.
थाम करकमलों में।
झलक दिखादो जरा,
दयालु स्वभाव की।

दयालु स्वभाव की वो,
छवि तारणहार की।
दवा आज दे दो प्रभु,
मेरे हर घाव की।

मेरे हर घाव की वो,
दवा श्याम नाम की जो।
लगन लगा दो तव,
चरणों में चाव की।

ललित

गीतिका छंद

बेटियाँ

प्यार की हर इक कसौटी,पर खरी वो बेटियाँ।
तात-माता की दुलारी,हैं परी वो बेटियाँ।
हौसला दामन छुड़ाए,माँ-पिता का जब कभी।
बेटियाँ देती सहारा,हौसला रख कर तभी।

'ललित'

लावणी मुक्तक

मैं क्या जानूँ

बात कहूँ मैं अपने दिल की,औरों की मैं क्या जानूँ।

फूलों में जजबात नहीं हैं,भौंरों की मैं क्या जानूँ।
प्यार बिके अरमान बिकें हैं,आज यहाँ सब कुछ बिकता।
झरनों में आवाज नहीं है,धौरों की मैं क्या जानूँ।
'ललित'

ताटंक मुक्तक

किरचें

टूटे सपनों की कुछ किरचें,बाकी हैं अब झोली में।
कैसे कैसे रंग दिखे हैं,सपनों की इस होली में।
स्वप्न सुनहरे खो देते हैं,कब क्यूँ अपने रंगों को?
बेरंगा मन बैठा रहता,क्यूँ सपनों की डोली में?

मुक्तक
माँ 

क्यूँ होता है अक्सर ऐसा,माँ छुप-छुप कर रोती है?
बेटा नजरें फेर रहा क्यूँ,सोच दुखी वो होती है।
माँ के अरमानों का सूरज,दिन में क्यूँ ढल जाता है?
एक अँधेरे कोने में वो,बेबस सी क्यूँ  सोती है?

ताटंक छंद

नई धुनें

नये वर्ष में नयी धुनों पर,मुरली श्याम बजा देना।
मेरे अधरों पर मंगलमय,नित नव गीत सजा देना।
मनमंदिर में मूरत तेरी,संग राधिका प्यारी हो।
दिन तो दिन है कान्हा मेरी,नहीं रात भी कारी हो।
'ललित'

कुकुभ मुक्तक

पुष्प

पुष्प बहुत ऐसे देखे हैं,काँटों में जोें पलते हैं।
चुभन सहें कंटक की फिर भी,मुस्कानों में ढलते हैं।
सौरभ उनकी चहुँ दिशि फैले,काँटे बेबस रह जाते।
कंटक चुभ-चुभ थक जाते हैं,दिल ही दिल में जलते हैं।

ललित


कुकुभ मुक्तक

फूल और कााँँटे

फूल और काँटों का रिश्ता,मानव नहीं समझ पाये।
पुष्पों की रक्षा करते ये,काँटे ही हरदम आये।
कंटक से फूलों की शोभा,आजीवन हमदम काँटे।
काँटों में जो फूल खिले वो,कहीं न फिर ठोकर खाये।
ललित

मुक्तक

पहरेदारी


काँटों की पहरेदारी में,फूल सुगंधित खिलते हैं।
प्यार करें कंटक फूलों से,रोज गले वो मिलते हैं।
दुश्मन के हाथों में चुभकर,शूल पुष्प को सहलाएं।
वो कंटक बदनाम हुए जो,दिल के टुकड़े सिलते हैं।

ललित

कुकुभ मुक्तक


प्रेम भरा हो दिल में जितना,उतना ही वो छलकेगा।
नैन झरोखे से वो शीतल,मोती बनकर ढलकेगा।
जिसके सीने में नाजुक सा,प्यार भरा इक दिल होगा।
उसकी उठती गिरती पलकों,में हरदम वो झलकेगा।
ललित

रोला छंद
गीत

दिल के रिसते घाव

दिल के रिसते घाव,छिपाकर जग में डोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

देखे सुंदर मीत,देख ली प्रीत अनोखी।
केवल अपनी जीत,लगे है सबको चोखी।
जब भी बोलो बात,जरा मन ही मन तोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

झूठा ये संसार,यहाँ की रस्में झूठी।
जो होता गमगीन,उसी से रहती रूठी।
पी लो गम के घूँट,मगर तुम मुँह मत खोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

दुनिया की है रीत,किसी के साथ न रोये।
हँसी उड़ाये और,राह में काँटे बोये।
जपलो हरि का नाम,पाप खुद अपने धोलो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

भगवन दयानिधान,उन्हीं से विनती करलो।
हरि को अपना मान,शीश चरणों में धरलो।
तर जाएगी नाव,प्रभू के आगे रो लो।
अपने मन की पीर,किसी से कभी न बोलो।

ललित

रोलाछंद

गीत

दे देते हैं घाव

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।

और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जिस पर है विश्वास,वही दिल को तोड़ेगा।
जो है अपना खास,वही फिर मुख मोड़ेगा।
सहलाता है घाव,नहीं शीतल सावन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जो होता फनकार,यशस्वी वो हो जाता।
दुनिया भर का प्यार,उसे फन है दिलवाता।
दिल के गहरे घाव,नही भर पाता फन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

ईश्वर से विश्वास,कभी यूँ ही उठ जाता।
जिसकी टूटी आस,नहीं फिर वो उठ पाता।
भर देता है घाव,कभी जानी दुश्मन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

जीवन भर तो साथ,नहीं तन भी दे पाता।
विषम रोग में साथ,नहीं धन भी दे पाता।
भरें उसी के घाव,करे जो यहाँ भजन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

दे देते हैं घाव,कभी कुछ अपने जन भी।
और कुरेदे घाव,निगोड़ा मानव मन भी।

'ललित'

मनोरम छंद
वृद्धावस्था/बुजुर्गी

आँसुओं से तरबतर

आँसुओं से तर बतर था,एक बेबस वृद्ध नर था।
देह जर्जर हो गई थी,वासना भी सो गई थी।

प्यार की प्यासी निगाहें,जो खुली रहना न चाहें।
हर तरफ पसरी उदासी,दे खुशी क्यों कर जरा सी।

याद आती है जवानी,जब नसों में थी रवानी।
पाल बच्चों को लिया था,दो जहाँ का सुख दिया था।

बन गये लायक सभी वो,सुख न दे पाए कभी वो।
व्यस्त सब बच्चे हुए हैं,कान के कच्चे हुए हैं।

स्वप्न सब बिखरे सुनहरे,होगए हैं पूत बहरे।
दर्द में डूबी निगाहें,कण्ठ से निकलें कराहें।

जिन्दगी की क्या कला है?ये बुजुर्गी क्या बला है?
जान जीवन भर न पाया,बालकों ने जो दिखाया।

देह में रमता रहा था,नेह में जीवन बहा था।
स्वार्थमय जीवन जिया था,याद कब रब को किया था।

आज रब है याद आता,भूल इक पल वो न पाता।
या खुदा अब तो रहम कर,दु:ख दारुण ये खतम कर।

प्यार जो उसने दिया था,त्याग जो उसने किया था
काश बच्चे जान पाते,दर्द को पहचान पाते।

नेह से नजरें मिलाकर,दीप आशा का जलाकर।
घाव पर मरहम लगाते,बोल मीठे बोल जाते।

ललित

जुलाई 19 की रचनाएँ


जुलाई 19

ताटंक छंद
माँ
सबसे प्यारी सबसे न्यारी,दुनिया में है होती माँ।
संतानों के जीवन में है,बीज सुखों के बोती माँ।
नित लें जो आशीष मात का,छू कर माँ के पैरों को।
धूल चटा देते हैं वो नर,अच्छे-अच्छे शेरों को।

ललित

रूबाई

छंदों की रानी रूबाई,लिखने बैठे हम भाई।
रचनाएँ सारे मित्रों की,सुंदर बहुत नज़र आईं।
नया विषय अनछुआ चुनें क्या,सोच रहे थे
हम बैठे।
गरमा-गरम पकौड़ों के सँग,आई वो लेकर चाई।

ललित

रुबाई छंद


अखियों पर नारंगी चश्मा,छतरी थी सिर पर प्यारी।
नारी सुलभ नहीं थी लज्जा,भाव-भंगिमा असुरारी।
बाल कटे सैंडल ऊँचे थे,जींस-टॉप तन चिपके से।
चंदन की सौरभ में लिपटी,क्या थी वो सुंदर नारी?
 ललित

रुबाई 


सुंदर फूल खिले बगिया में,झूमे मन ही मन माली।
रात-रात भर जाग-जाग कर,की थी उसने रखवाली।
जग में सौरभ फैलाएँगें,सुमन सदा इस बगिया के।
यही सोच कर मुस्काता है,हाथ रह गए अब खाली।

ललित

रुबाई

बात कहो जब अपने मन की,उसकी भी लो सुन थोड़ी।
जिसने अपनी बात आपका, मूड देख मन रख छोड़ी।
हँसी-खुशी-विश्वास-प्रेम से,रिश्तों में रस भर जाए।
होता सफल वही है जिसने,राह समय के सँग मोड़ी।

ललित

रुबाई छंद

रहा देखता स्वप्न सुनहरे,अब तक तो हर पल प्यारे।
जाग नींद से भोर हुई अब,छोड़ रहे अम्बर तारे।
शाम रँगीली करनी हो तो, सुबहा में तू 
हँस ले रे।
सपनों में रँग भरने हों तो,कर्मों में रँग भर
जा रे।

 ललित

शक्ति छंद
122 122,122 12

दिखे खूबसूरत उसे ज़िंदगी।
करे श्याम की जो सदा बंदगी। 
न बाधा कभी राह में आ सके।
धरे ध्यान जो श्याम को पा सके।

ललित

शक्ति छंद

न माखन भला आज क्यों खा रहा?
न गैया चराने लला जा रहा।
कहे माँ यशोदा कन्हैया बता।
रहा मात को क्यों लला तू सता?

नई बाँसुरी ये अधर से लगा।
बजा कर दिलों में उमंगें जगा।
सखा-ग्वाल सब ले रहे चुटकियाँ।
दिला श्याम माखन भरी मटकियाँ।

ललित

शक्ति छंद

नहीं ज़िंदगी से मुझे कुछ गिला।
मिला है किए कर्म का ही सिला।
नहीं है कमी कुछ मिला खूब है।
अजी कर्म का ये सिला खूब है।

ललित

शक्ति छंद

छिपी ये दुआ मात के प्यार में।
न संतान उलझे कभी खार में।
दुआ मात की जिस सुता को मिले।
सदा छू सके वो नई मंजिलें।

ललित

शक्ति छंद

कन्हैया ज़रा अर्ज सुन भक्त की।
मिटा दे निशानी बुरे वक्त की।
ज़रा देख ले इक नज़र भक्त को।
बुला दे इसी पल भले वक्त को।

ललित

मुक्तक

कुछ बूँदें बरसा कर मेघा,चले गए तुम और कहीं।
क्या तुमको भायी कोटा से,सुंदर कोई ठौर कहीं?
ताल-तलैया-पोखर-नदिया,धरती का हर-कण प्यासा।
क्या तुमको भटका बैठे हैं,सुंदर-सुंदर मोर कहीं?

ललित

शक्ति छंद

मधुर राग में बाँसुरी बज रही।
मधुर रात है राधिका सज रही।
गरजते हुए बादलों के तले।
मिले राधिका से कन्हैया गले।

ललित

शक्ति छंद

चलो आज सपने सुहाने बुनें।
नई गीत गाएँ पुराने सुनें।
नई मंजिलों के नई राह को।
चुनें मुस्कुराकर नई चाह को।

ललित

शक्ति छंद

बरसने लगे मेघ यूँ झूम कर।
तरसती धरा के अधर चूम कर।
लिए मस्त सौरभ हवा आ रही।
तटों से सटी हर लहर जा रही।

ललित

शक्ति छंद

नदी ताल झरने न दिखते जहाँ।
कलमकार कविता न लिखते वहाँ।
वनों पादपों की कमी से दुखी।
कलमकार कब हो सके है सुखी?

ललित

15.07.19
दोधक छंद
211 211 211 22
वार्णिक छंद

निष्ठुर ओ बदरा अब आजा
हर्ष भरी बुँदियाँ बरसा जा।

नीर फुहार मिले बदरों की।
प्यास बुझे मन की अधरों की।

ललित
दोधक छंद

जीवन की बस एक कहानी।
भूल करे नर ये अभिमानी।
पत्थर में भगवान तलाशे।
मन्दिर सा मन क्यों न तराशे?

ध्यान जरा मन में कर ले जो।
कृष्ण-कथा मन में भर ले जो।
श्याम-प्रभो दुख-ताप हरेंगें।
राह दिखा भव-पार करेंगें।

ललित

दोधक छंद

छोड़ गये व्रज को तुम ऐसे।
प्राण गए तन को तज जैसे।
वो वृषभानसुता बिसराई।
श्याम रही बन जो परछाई।

ये यमुना-तट राह निहारें।
गोप-सखा सब मीत पुकारें।
माखन के घट भूल गए क्या?
भा मथुरा के फूल गए क्या?

ललित

आल्हा छंद
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित

आज गुरू चरणो में मेरा,नमस्कार है बारम्बार।
छंद और लय ज्ञान दिया है,और दिया है बेहद प्यार।
शब्दों का संयोजन सीखा,उनसे ही है मैंने आज।
छंदों की रचना में खोया,भरता हूँ मैं नित परवाज

गुरू देव की इच्छा में ही,मिल जाती है
जिनकी चाह।
ऊँची फिर परवाज भरें वो,और सुगम हो जाती राह।
नियमों का पालन करने से,लेखन पाता और निखार।
माँ शारद को हैं वो प्यारे,जो नर करें गुरू से प्यार।

गुरू रूप में ईश्वर आए,देने हमें ज्ञान भण्डार।
गुरू तत्व को तुम पहचानो,इसकी महिमा अपरम्पार।
मंगल सदा शिष्य का होता,गुरू कृपा से ही तो खास।
गुरू शिष्य का बंधन ऐसा,जो आता है दिल को रास।

मात-पिता गुरु के चरणों में,जो नित अपना शीश झुकाय।
सदा विजय उसकी है होती,मनचाही मंजिल वो पाय।
एकलव्य सा शिष्य मिले तो,गुरु मूरत भी दे दे ज्ञान।
गुरू द्रोण की किरपा से ही,अर्जुन ने सीखा संधान।

'ललित'

दोधक छंद

जीवन की अनबूझ कहानी।
वृद्ध हुआ कल का अभिमानी।
छोड़ चली हर इन्द्रिय ऐसे।
साथ यहीं तक था बस जैसे।

लेकिन डोल रहा मन प्यासा।
हाय बढ़े नित काम-पिपासा।
अंत नहीं मद-मोह-निशा का।
और नहीं कुछ भान दिशा का।

ललित

दोधक छंद
सुख-दुख

जीवन में दुख वो कब पाए?
जो वृषभानुसुता गुण गाए।
नाम जपो मुख से नित राधा।
पार करो दुख में हर बाधा।

ललित 

21.07.19
लावणी छंद

हर पंछी की यही कहानी,साँझ पड़े घर आना है।
सुबह सवेरे फिर से उड़कर,दाना चुगने जाना है।
चीं-चीं करते नन्हे बच्चे,जो भूखे बैठे घर में।
उनके मुख में भी रखने हैं,चुग्गे दाने दिन-भर में।

ललित

जीवन की अनबूझ पहेली,समझ कहाँ मन है पाता।
कभी मिले खुशियों का रेला,कभी दुःख 
दारुण आता।

लावणी छंद

पुष्पों की बगिया से थोड़ी,खुशबू लेते आना तुम।
सीख साथ में आना प्यारे,फूलों से मुस्काना तुम।
चुभन सहें काँटों की फिर भी,हर-पल हैं जो मुस्काते।
उन सुमनों की सौरभ से ही,देव-मनुज सब हर्षाते।

ललित


लावणी छंद

झम-झम-झम-झम बरसे बदरा,गरज-गरज कर फिर बरसे।
भिगो दिया गोरी का लहँगा,निकली ज्यों ही वो घर से।
शर्माई सकुचाई गोरी,भीग-भीग कर फिर भागी।
साजन से मिलने की इच्छा,जाग-जाग कर फिर जागी।

ललित

लावणी छंद

प्यार छुपाए दिल ही दिल में ,चाँद भटकता  रजनी में।
प्यारा सा इक प्यार भरा दिल, ढूँढे अपनी सजनी में।
कहे चाँदनी सजना प्यारे,प्यार भरा दिल ये मेरा।
दे दूँगी इक झटके में यदि,प्यार मिले मुझको तेरा

ललित

लावणी छंद

मिलते हैं वो चाँद चँदनिया,दुनिया रोशन करने को।
अँधियारे को चीर दिलों में,प्रेम तरंगें भरने को।
रात अमावस की काली कब,दिल की प्यास बुझा पाती।
चाँद-चँदनिया की मादकता,प्रेमी जोड़ों को
भाती।

ललित

लावणी छंद

दिल चाहता था प्यार के कुछ,पल समेटूँ 
झोलियों में।
पर प्यार का प्यासा रहा दिल,खो गए पल बोलियों में।
ऐ वक्त तू इक पल ठहर जा,प्यार का अहसास कर लूँ।
मैं प्यार की गहराइयों में,चार गहरी साँस भर लूँ।

ललित

30.07.19
चौपाइयाँ

श्यामप्रिया राधा सुकुमारी,नटवर-नागर कृष्णमुरारी।
नंदनवन महका है ऐसे,चंदन-कानन महके जैसे ।

पुष्प लदी हर डाली चहके,लतिकाओं का मन भी बहके।
राधा की वेणी में जूही,महक रही मस्ती में यूँही।

नाक नथनियाँ पहने राधा,कान्हा ने वंशी-सुर साधा।
मोरपंख कान्हा ने धारा,राधा ने दिल उस पर वारा।

कान्हा की कजरारी अखियाँ,देख-देख बलिहारी सखियाँ।
रास-रचाए रस बरसाए,कान्हा सबका मन हर्षाए।

दोहा

मगन हो रहा रास में,व्रज का माखनचोर।
ठुमक-ठुमक कर नाचता,नटखट नंदकिशोर।

ललित



चौपाई

बड़ा लालची मानव मन है,
हर रिश्ते में खोजे धन है।

ईश्वर को भी धन दिखलाए,
हरि को भी देना सिखलाए।

तन करता धन का  साधन है,
मन काला और गोरा तन है।

नहीं मिले जब मनचाहा धन।
बिदक-बिदक जाता है ये मन।

ललित

अप्रेल 2019

अप्रेल 2019

मुक्तक 16-14

जितना काला कृष्ण-कन्हैया,उतनी गोरी है मैया।
क्या जाने मैया ये कान्हा,तारेगा सबकी नैया।
माखन-मिश्री खिला जिसे वो ,रोज सुनाती है लोरी।
नहीं जानती नाग-फणों पर,नाचेगा ता-ता थैया।

ललित


आल्हा छंद

रंग-बिरंगी बाँसुरिया मैं,ले आया हूँ बीच बजार।

मधुर धुनों से जो भर देगी,कर्णों में मधुरिम रस-धार।

अधरों से लगकर गाएगी ,मन को सुख दें ऐसे गीत।

इसी मुरलिया से कान्हा ने,पाई थी हर दिल पर जीत।

सात सुरों के संगम से ये,मधुर धुनों की छेड़े तान।

सुनने वाले के अधरों पर ,छा जाती है मधु-मुस्कान।

सिखलाती जीवन जीने का,एक अलग ही ये अंदाज।

इसीलिए तो करता था वो, श्याम मुरलिया पर यूँ नाज।

ललित


कुण्डलिनी

वोट माँगता फिर रहा,गली-गली वो खास।
बाद चुनावों के नहीं,डालेगा जो घास।

डालेगा जो घास,गधों को या चमचों को।
कर लो ये विश्वास,नहीं  ऐ मित्रों चौंको।

ललित

मधुमालती छंद

नदिया जहाँ कल-कल बहे।
सुरभित हवा शीतल बहे।
सुख-छाँव वंशीवट करे।
नित भोर गोरी घट भरे।

फूलों भरी सब क्यारियाँ।
मुस्कान की फुलवारियाँ।
कलियाँ सभी खिलने लगें।
प्रेमी हृदय मिलने लगें।

ललित

मधुमालती छंद

नव वर्ष में है कामना।
माँ हाथ मेरा थामना।
मुश्किल न आए राह में।
हर-पल रहूँ उत्साह में।

सत्संगियों से नित मिलूँ।
सद्धर्म के पथ पर चलूँ।
करता रहूँ माँ बन्दगी।
पुरुषार्थ मय हो जिंदगी।

ललित
क्रमशः

मधुमालती छंद

फिर सोचना क्या प्यार में?

जब रब दिखा दिलदार में।

संसार सुंदर हो गया।

जब यार में दिल खो गया।


इस प्यार में क्या बात है?

चंचल हुआ ये गात है।

मन की कली खिलने लगी।

दीवानगी पलने लगी।


ये प्यार की दीवानगी।

जिसकी नहीं कुछ बानगी।

साँसें रुकें रुक-कर चलें।

सुख-स्वप्न नयनों में पलें।


सजना नयन में आ बसा।

छाया बहारों पर नशा।

जब भी मिलें सजना कहें।

हर पल मिलें मिलते रहें।

ललित

मधुमालती छंद

कुछ धूप में कुछ छाँव में।
जीवन जिया इस गाँव में।
कुछ प्यार में कुछ खार में।
भटका किया मँझधार में।

अब आ गया वो दौर है।
इक हाशिया हर ओर है।
यूँ ही गुज़ारी ज़िन्दगी।
कुछ हो न पाई बन्दगी।

जो ख्वाब थे दिल में पले ?
वो कब हकीकत में ढले ?
कुछ स्वप्न सपने रह गए।
कुछ आँसुओं में बह गए ।

जो ज़िन्दगी की चाल है।
उलझी हुई हर हाल है।
जैसी मिले स्वीकार है।
जैसी चले स्वीकार है

ललित

मधुमालती
रास आनंद.

वंशी अधर से ज्यों छुई।

वो चाँदनी शीतल हुई।
मुरली मधुर बजने लगी।
घर गोपियाँ तजने लगी।

जो बाँसुरी की धुन सुने।
वो राह मधु-वन की चुने
चूड़ी बजे पायल बजे।
गजरा सजे वेणी सजे।

जब श्याम से नैना मिले।
गल-हार राधा का हिले।
सब गोप-गोपी झूमते।
बादल धरा को चूमते।

ललित

कुण्डलिनी छंद

हाथ जोड़ कर माँगता,नर-नारी से वोट।
अधरों पर मुस्कान है,दिल में भारी खोट।

दिल में भारी खोट,करे वो झूठे वादे।
वादों पर दें वोट,सभी जन सीधे-सादे।

ललित

गीतिका

रासलीला गीतिका कुछ यूँ बनी
सादर प्रस्तुत....
2122 2122 212

कृष्ण-राधा-रास की क्या बात है?
रात पूनम की बनी  सौगात है।

गोप-गोपी सँग कन्हैया नाचता।
हर लता का झूमता हर पात है।

धुन सुरीली बाँसुरी की गूँजती।
ताल दे-दे झूमता हर गात है।

चाँद भी रुक सा गया आनंद में।
रास-लीला की अनोखी रात है।

पायलें छम-छम-छमा-छम बोलतीं।
बाँसुरी को आज देनी मात है।

आत्म की सब खुल रही हैं गुत्थियाँ।
हो रही परमात्म-रस बरसात है।

रास-लीला ज्ञान ये है दे रही।
आत्म औ' परमात्म की इक जात है।

ललित किशोर 'ललित'


सार छंद

शिव-शंकर से माँग रहा हर,नेता आज मनौती ।
पहन श्वेत खादी का कुर्ता,और बाँध कर धोती।

नहीं चाहिए सोना-चाँदी,गहने-हीरे-मोती।
सीट वही दिलवा दे बाबा,संसद में जो  होती।

बैठ सीट पर मैं जाऊँ तो,सेवक कहलाऊँगा।
अपने घर में धन-दौलत की ,वर्षा कर पाऊँगा।

मुझे बता दे बाबा कैसे ,जनता ये रीझेगी।
करूँ घोषणा क्या जिससे ये,वोट मुझे ही देगी?
ललित


मुक्तक( विष्णुपद आधारित)

हे शिवशंकर हे अभयंकर,निर्भय तू कर दे।
अमर सुहाग रहे मेरा हे!नाथ मुझे वर दे।

हे मात-अम्बिके-दुर्गा-गौरी,विनती है तुझसे।
रहूँ सुहागिन अंत-साँस तक,हाथ शीश धर दे।

ललित

9.4.19
तोटक छंद

112 112 112 112

हर भोर बजे मुरली व्रज में।
बस प्यार बसा जिसकी रज में।
वृषभानुसुता सँग साँवरिया।
चहकें सखियाँ सुन बाँसुरिया।

ललित

10.04.19
तोटक छंद

112 112 112 112

गणनाथ गजानन प्रात जपे।
नर वो न कभी दुख-धूप तपे।
जिस द्वार विराज गणेश रहे।
उस द्वार नहीं दुख-क्लेश रहे।

शिवशंकर नाम सदा जपता।
नर वो भव-ताप नहीं तपता।
मन में शिव-ध्यान किया करता।
भव-सागर से नर वो तरता।

हरि-नाम जपे नर जो मुख से।
दुख भी सहता समता-सुख से।
हरि मूरत देख झुके सिर जो।
भव-सागर पार करे फिर वो।

वृषभानुसुता सँग श्याम कहे।
सुख की सरिता नर डूब रहे।
मुरलीधर का नित ध्यान धरे।
नर वो भव से हर हाल तरे।

सिय-राम बसें जिसके मन में।
कब रोग बसें उसके तन में।
बजरंग-बली सिय-राम भजे।
नर वो भव-दुःख तमाम तजे।

ललित

तोटक छंद

112 112 112 112

चलता-फिरता दिखता नर है।

पलता कितना विष भीतर है।

चुपचाप निरंतर रोग बढ़े ।

फिर देह तपे अरु ताप चढ़े।


फिर डाक्टर चंगुल वो फँसता।

मन ही मन डॉक्टर है हँसता।

वह फीस व जाँच कमीशन ले।

लिख डोज बड़ी पोजीशन ले।


ललित

तोटक छंद

112 112 112 112

नव-वधू

बलखाय चले इठलाय चले।

पग-पायल खूब बजाय चले।

चहकी-चहकी फिरती अँगना।

नव-सेज सजी बजते कँगना।


अमियाँ लटकें वन-बागन में।

छमियाँ रमती निज साजन में।

सजना सँग प्रीत जवान हुई।

अँखियाँ अब तीर-कमान हुई।

ललित

गीतिका छंद

ज़िन्दगी का हर सितम हम,प्यार से सहते गए।

दुःख-सुख की धार में हम,नाव-सम बहते गए।

स्वप्न टूटे चौंक कर हम ,नींद में जगने लगे।

अब किनारे भी पराए से हमें लगने लगे।

ललित

मुक्तक

भूल-भुलैया में जीवन की,आँख मिचौली 

खेल लिए।

हमने सब किस्मों के पापड़,इस जीवन में बेल लिए।


खुशियों के सब स्वप्न सुनहरे,किर्चों में बिखरे देखे।

अब क्या बाकी रहा झेलना,बेदर्दी गम झेल लिए।


ललित किशोर 'ललित'


12.4.19

तोटक छंद

मन

मन चंचल धीर नहीं धरता।

नव-आस लिए उड़ता फिरता।

समझा मन की गति कौन यहाँ?

समझा मन की मति कौन यहाँ?


कुछ ज्ञान लिए नर डोल रहा।

मन मेंं मन को नर तोल रहा।

तन में नर खोज रहा मन को।

मन मौन करे बस में तन को।


मन जो कहता तन वो करता।

मन तर्क-वितर्क कला-धरता।

कुछ धीर हुए ऋषि-संत बड़े।

मन सम्मुख ज्यों हनुमंत अड़े।


मन हार रहा जब था रण में।

गुरु-ज्ञान-प्रकाश मिला क्षण में।

मन को वश में कर कृष्ण-सखा।

उस अर्जुन ने गुरु-मान रखा।

ललित

तोटक छंद

 मित्र

सुख में दुख मेंं अरु दुर्दिन में।

रहता सँग जो सब व्याधिन में।

वह नंद-लला गिरिराज उठा।

व्रज-वासिन संकट देत मिटा।


ललित

तोटक छंद

सिय-राम

सिय-राम सदा जप लो मुख से।

जय तारण-हार कहो सुख से।

जप ये हनुमान सदा करते।

भव-ताप दुखी-जन के हरते।


दिल में सिय-राम बिठाय लिए।

दिल-चीर सबै दिखलाय दिए।

हनुमान समान न भक्ति कहीं।

सिय-राम समान न शक्ति कहीं।


शबरी तकती नित राह जहाँ।

वन में पहुँचे प्रभु राम वहाँ।

चख बैर खिलाय रही शबरी।

पद-पंकज ध्याय रही शबरी।


मन केवट पावन भाव रहा।

तट-गंग लिए निज नाव रहा। 

उसको पग राम पखारन दें।

निज भक्तन जन्म सुधारन दें।


सिय-राम सदा जप लो मुख से।

जय तारण हार कहो सुख से ।

ललित

15.04..19

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

लगी डूबने नाव उनकी जहाँ।

मिले मंच पर एक सारे वहाँ।

निराला बहुत एक दुश्मन मिला।

सभी को उसी से रहा बस गिला।


करें यत्न सब हाथ में हाथ दे।

कि दुश्मन नहीं अब हमें मात दे।

लिए हाथ पतवार भागें सभी।

किनारे बड़ी दूर दिखते अभी।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

बजाए लला जादुई बाँसुरी।

चले राधिका के जिया पे छुरी।

मचलते जिया को लिए हाथ में।

लगी राधिका नाचने रात में।

सुरीली बड़ी बाँसुरी की धुनें।

मगन ध्यान में गोप-गोपी सुनें।

थिरकने लगे घुँघरुओं के वदन।

कि मदहोश खुद होगया है मदन।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

सद्भाव

न सोचें-विचारें  ,न मानें कभी।

न आचार-व्यवहार, जानें कभी।

रहे दौड़ अंजान पथ-पर युवा।

कि मंजिल जहाँ वासना का कुँआ।


न अनुभव-भरा ज्ञान ही चाहिए।

सहारा किसी का नहीं चाहिए।

फँसेगी भँवर में कभी नाव जो।

करेंगें तभी याद सद्भाव को।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

चाँदनी

महकती हुई चाँदनी रात में।

सितारे चले चाँद के साथ में।

हसीं चाँदनी ने धरा को छुआ।

मिली ज्यों धरा को अनोखी दुआ।


ललित

चाँदनी

दुआ में धरा को मिली चाँदनी।

धरा के बिना कब खिली चाँदनी?

मिली बादलों से जहाँ चाँदनी।

गुमी बादलों में वहाँ चाँदनी।

ललित

चाँदनी

नहीं बादलों में घुली चाँदनी।

गले चाँद से जा मिली चाँदनी।

चमकने लगा चाँद फिर रात में।

सितारे हँसे चाँद के साथ में।

मुक्तक 16-14

कुछ ज़ुबान से फिसले होंगें,कुछ यूँ ही बोले होंगें।

बेचारे नेता ने शायद,शब्द नहीं तोले होंगें।

शब्दों की माया-नगरी में,उलझे जो नेता सारे।

क्यों उनको लगता है वोटर,गैया-सम भोले होंगें?

ललित

आल्हा छंद

मतदाता पहचान पत्र क्या,होता क्या बोलो आधार?

कैसा होता है घर पक्का,होता क्या उसका आकार?

नहीं जानते हैं हम कुछ भी,कैसे डाले जाते वोट।

भूखे ही सो जाते हैं हम,रोज़ इसी पाइप की ओट।

ललित

शक्ति छंद

सदा खिल-खिलाकर हँसे प्यार से।

बिखेरे खुशी सौम्य व्यवहार से।

निराली सरस रास-लीला करे।

लुटा आत्म-रस प्रीत-प्याले भरे।


रही राधिका खोज उस चोर को।

रखे शीश पर जो मुकुट-मोर को।

बजा बाँसुरी चैन जिसने हरा।

छुपा है कहाँ श्याम मुरलीधरा?


ललित

शक्ति छंद

प्रभो द्वार तेरे खड़े हम सभी।

निहारो हमें प्यार से भी कभी।

बनाए रखो नाथ ऐसी कृपा।

नहीं दुःख हमको सकें अब तपा।

ललित

शक्ति छंद

कृपा है प्रभो आपकी सब कृपा।

नहीं दुःख मुझको सके जो तपा।

यही मात्र विनती करूँ रात-दिन।

न इक-पल गुजारूँ कभी जाप बिन।

ललित

शक्ति छंद

नदी

122 122 122 12

नदी नाव की मित्रता हो जहाँ।

न कैसे किनारा मिले फिर वहाँ?

मिले आत्म को ज्ञान परमात्म का।

न उद्धार रुकता वहाँ आत्म का।


चले जीव सद्भाव के पथ सदा।

करे कूप उपकार ज्यों सर्वदा।

न गंगा न यमुना उसे धो सके।

भरा मैल मन में अगर नर रखे।

ललित 

मुक्तक 16-10

चोर-चोर का शोर मचाते,मुख सूखे जिनके।

हाथ जोड़ माफी माँगें अब,उतरे मुँह उनके।

खोजा करते थे तिनके जो,दाढी में सबकी।

साफ जरा कर लें वो खुद की ,दाढी के तिनके।

ललित 

शक्ति छंद

कली

122 122 122 12

मिली स्वप्न में एक नाजुक कली।

बड़ी खूबसूरत बड़ी मनचली।

निगाहें मिलाकर झुकाती रही।

कली स्वप्न में भी छकाती रही।


कभी प्यार से वो निहारे हमें।

यही सोचकर हम वहाँ थे थमे।

मगर प्यार की बात मन में रही।

खुली नींद तो स्वप्न नगरी बही।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

प्यार हर दिल में पनपता है जहाँ।

ज़िंदगी भी मुस्कुराती है वहाँ।

ज़िन्दगी जिंदादिली से जो जिए।

है भला गम चीज क्या उसके लिए?

ललित

पियूष वर्ष छंद

बाँसुरी

2122 2122 212

बाँसुरी की मस्त धुन में खो गया।

वो कन्हैया का दिवाना हो गया।

नाम राधा का जपे दिन-रात है।

चाहता घनश्याम का जो साथ है।

ललित

पियूष वर्ष छंद

प्यार  

2122 2122 212

प्यार की धुन में मगन दो दिल मिले।

फूल खुशबू से भरे सुंदर खिले।

नैन में हैं स्वप्न सुख-संसार के।

दिल धड़कते हैं लिए सुर प्यार के।


प्यार की खुशबू भरी हो ज़िंदगी।

है नहीं इससे बड़ी कुछ बंदगी।

प्यार है निष्काम जिस दिल में भरा।

है वही दिल हर कसौटी पर खरा।


प्यार की नगरी बड़ी जादू भरी।

प्रीत की नौका भँवर में भी तरी।

चाँद-तारों को ज़मीं से आस है।

प्रेम के दम पर टिका आकाश है


हर समंदर प्यार का प्यासा दिखा।

प्यार सबके भाग्य में है कब लिखा?

प्रीत की हो प्यास जिस दिल में जगी।

इक अनोखी आग उस दिल में लगी।

ललित

पियूष वर्ष छंद

प्रदूषण

2122 2122 212

ज़िंदगी का बेसुरा अब राग है।

अब हवाओं में सुलगती आग है।

स्वार्थ नर ने इस कदर पोषित किए।

वायु,धरती और जल दूषित किए।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

चैन मन पाए नहीं संसार में।

खूब भटके रूप के बाजार में।

ध्यान तब धर लो जरा तुम श्याम का।

नाम जप लो तब जरा तुम राम का।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

साजना ये चाँदनी क्या कह रही?

प्रीत की प्यासी नदी क्यों बह रही?

चाँद से है चाँदनी को प्रेम गर।

प्यार करती है समंदर से लहर।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

सोलहों श्रृंगार कर सजनी सजी।

छम-छमा-छम रात भर पायल बजी।

तार दिल के छेड़ बैठा यूँ पिया।

नींद रूठी हो गया चंचल जिया।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

हिंद देश की आजादी का,पर्व बड़ा मतदान का।

वोट डालने से चमकेगा, मुखड़ा हिंदुस्तान का।

सोचो,समझो और विचारो,किसको देना वोट है।

चुनो उसीको अपना नेता,जिसमें कुछ कम खोट है।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

मनमोहना हे! श्याम सलौने,विनती इतनी सी सुनो।

चरणों की सेवा में प्रभु जी,चाकर मुझको ही चुनो।

इक पल भी मैं तुम्हें न भूलूँ,सुमिरन आठों 

याम हो।

राधे-कृष्णा जाप तुम्हारा,जिव्हा से अविराम हो।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

भोर सुहानी मंगलकारी,देती है संदेश ये।

मुस्कानों की चादर ओढ़ो,छोड़ क्लेश का वेश ये।

नित्य भोर में ऊर्जा भर लो,तन में प्राणायाम से।

ध्यान-भजन का समय निकालो,थोड़ा दैनिक काम से।

ललित

मुक्तक 16-14

सपनों की माया-नगरी में,उधेड़-बुन  सपना होगा।

सत्य एक ईश्वर का मन से,नाम सदा जपना होगा।

ये संसार असत्-क्षण-भंगुर,मान बात ये ले प्राणी।

संचय कर लेगा तू जितना,पुण्य वही अपना होगा।

ललित किशोर 'ललित'


मधुमालती छंद

2212 2212

जीवन पुकारे ओ पथिक।
रुकना न तू इक पल तनिक।
चलता निरंतर जो रहे।
मंजिल उसी की हो रहे।

हो कंटकों से सामना।
तो पग न अपना थामना।
फूलों भरी राहें मिलें।
सम्भव नहीं ये सिलसिले।

ललित

अप्रेल 2019

मधुमालती छंद

2212 2212

हर आदमी इस देश का।
हर जाति का हर वेश का।
हर राज्य का हर गाँव का।
पूछे पता बस छाँव का।

हर छाँव उससे छिन गई।
बस धूप है हर दिन नई।
अब छाँव भी बिकने लगी।
रोटी कहीं सिकने लगी।

कुछ भाषणों में खो रहे।
कुछ बोझ अपना ढो रहे।
जनता झुकी ही जा रही।
बस स्वप्न में सुख पा रही।

नेता निराले हैं यहाँ।
पग-पग शिवाले हैं यहाँ।
नेता वहीं सुख पा रहे।
निश-दिन शिवाले जा रहे।

है देश की चिन्ता किसे?
नेता बना जो क्या उसे?
ये सोचने की बात है।
नेता करे क्यों घात है?

ललित






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