जून 2019 की रचनाएँ


जून 2019


01.06.19
राम नाम
कुण्डल छंद

रोम-रोम जपे नाम,राम-राम हर पल।
साँस रोक देत मौत,बिना किए हल-चल।
चार दिन की ज़िंदगी,मूल्यवान पाई।
जप ले तू राम-राम, चुका कर्ज भाई।

ललित

माँ

माँ तेरी अँखियों में मैंने,प्यार सदा निश्छल पाया।
भूल नहीं पाया मैं अब तक,तेरी ममता की
छाया।
सपनों में दिखती है अब भी,तू मेरा सिर सहलाती।
आज याद करके तुझको माँ,अश्रु आँख में भर आया।

ललित

03.06.19

हील
आधार छंद

नारंगी चश्मा लगा,पहने ऊँची हील।
चलते-चलते कर रही,मोबाइल पर डील।

पत्थर से टकरा गिरी,चश्मा छिटका दूर।
गरम सड़क थी कर रही,हँसकर उसको फील।

ललित

झटका
आधार छंद

ऐसा झटका था लगा,दिल को मेरे यार।
जब उस नारी से हुईं,मेरी आँखें चार।
बेशर्मी थी आँख में,फटी हुई थी जींस।
उमर साठ के पार थी,जुल्फें फुग्गे-दार।

ललित 

आधार छंद
स्वार्थ

मतलब की हैं यारियाँ,स्वार्थ भरे सम्बंध।
दें फूलों की क्यारियाँ,मतलब से  मधुगंध।
सबको अपनी है पड़ी,सबको खुद से प्रीत।
परमारथ के नाम से,हर दरवाजा बंद।

ललित.

सूर्यदेव
आधार छंद

सूर्य देव कुछ कम करो,गर्मी का ये ताप।
मत गरीब की हाय लो,लू-लपटें दे आप।
एसी-कूलर-कुल्फियाँ,वट-पीपल की छाँव।
सबको है झुलसा रही,ये गर्मी बे-माप।

ललित

आधार छंद
भोर-मोर

मधुर-मधुर जब बाँसुरी,बजती है हर भोर।
सात सुरों की रागिनी,बिखराए हर ओर।
अधरों पर कान्हा लिए,मंद-मंद मुस्कान।
वंशी सुनकर नाचते,नंदन-वन में मोर।

ललित

आधार छंद
राजनीति

बैरी से बैरी मिलें,राजनीति के मंच।
बेशर्मी लादे हुए,देखें सपने टंच।
जनता को उल्लू समझ,मिला हाथ में हाथ।
कुर्सी पाने के लिए,रचते खूब प्रपंच।

ललित

आधार छंद
देह

बहुत सँभाली प्यार से,माटी की ये देह।
और किसी को कब किया,इससे ज्यादा नेह?
वृद्धावस्था में मगर,साथ छोड़ती चर्म।
सिखला देती चाटना,राम-नाम अवलेह।

 ललित

आधार छंद
देश

इंद्रधनुष सम देश में,सात रँगों का मेल।
रिमझिम बारिश में दिखे,अद्भुत सुंदर खेल।
मिल-जुल कर सब जातियाँ,करें देश उत्थान।
छुक-छुक कर चलती रहे,सतरँग की ये रेल।

ललित

ताटंक छंद
चिड़िया

छोटी-सी इक नन्ही-सी इक ,चिड़ियामेरे घर आई।
मनी-प्लाँट की बेल न जाने,क्यों उसके मन को भाई?
एक माह तक हर-दिन थोड़े,तिनके चुन मुँह में लाई।
बना घोंसला मनी-प्लाँट पर,बन बैठी सबकी ताई।

ललित

आधार छंद
गर्मियाँ

कैसी-कैसी गर्मियाँ,सह सकते हैं आप।
वृक्ष लगो जब काटने,ये कर लेना माप।
हरी-भरी थी जो धरा,वन-उपवन समृद्ध।
कटे वृक्ष तो दे रही,नर को निशि-दिन शाप।

ललित

आधार छंद
नंदकिशोर

नैन बंद कर राधिका,मंद-मंद मुस्काय।
नटखट नंद-किशोर का,हिय में दर्शन पाय।
सब कहते वो साँवरा,ऐसा है चितचोर।
जिसका दिल चोरी करे,उसके हिय बस जाय।

ललित

आधार छंद
नई पौध

अनजानी सी हो गई,अब तो हर पहचान।
कंकरीट में फँस गई,ज्यों धरती की जान।
जल बिन बंजर हो रही,धराआज हर ओर।
वन-उपवन सर-कूप से,नई पौधअंजान।


ललित

रोला छंद
जजबात

फूलों के जजबात,यहाँ कब समझा कोई?
काँटों के सह वार,सदा ही कलियाँ रोई।
कलियाँ बनके पुष्प,कहाँ अब खिल पाती हैं।
पानी की क्या बात,हवा कातिल पाती हैं।

ललित


छंद सिंधु
कलियाँ

कहीं कलियाँ बिखरती थी हवाओं में।
कहीं भाषण दिए जाते चुनाओं में।
कहीं थी लाडली अस्मत रही खोती।
कहीं थी चैनलों पर ही बहस होती।

ललित

कलियाँ
छंद सिंधु

न कलियाँ मुस्कुरा सकती कभी खुलकर।
हवा में बह  रही जब वासना घुलकर।
न फूलों में बची खुशबू वहाँ कोई।
कि मानवता जहाँ मुख फेर कर सोई।

ललित

कलियाँ
मुक्तक 16-14

कलियाँ सब सिकुड़ी-सिमटी हैं,पवन चली हाहाकारी।

कंटक चीर रहे कोमल-तन,सिसक रही अबला नारी।

खग भी उड़ने से डरते हैं,बाज झपटते हैं ऐसे।

कैसा भारत कैसी महिमा,कैसे ये  सत्ताधारी?

ललित

देह
आधार छंद

पंचतत्त्व से जो बनी,भरी विषों से देह।
साथ सदा देगी नहीं,मत कर उससे नेह।
वृद्धावस्था में सदा,तन को छोड़े चाम।रसना से नित चाट तू,राम-नाम अवलेह।

ललित

सपने
मुक्तक  

सपनों की दुनिया में खोए,जगकर चलना भूल गए।
पापों से जो फटी चुनरिया,उसको सिलना 
भूल गए।
बचपन बीता गई जवानी,वृद्धावस्था गले पड़ी।
नाते-रिश्ते रहे निभाते,खुद से मिलना भूल गए।

ललित

जिंदगी
आधार छंद

चार दिनों की ज़िंदगी,हँसकर जी ले मीत।
कान लगाकर सुन ज़रा,जीवन का संगीत।
सुन कोयल की कूक तू, झरनों की आवाज़।
खुश रहना तू सीख ले,छिपी इसी में जीत।

ललित

गर्मी
आधार छंद

कुछ तो गर्मी कम करो,हे! दिनकर भगवान।
लू-लपटें नित ले रही,मासूमों के प्राण।
ताल-तलैया कूप में,जल की बची न बूँद।
एसी-कूलर ठप हुए,साँसत में है जान।

ललित

वृक्ष
आधार छंद

धरती को नंगा किया,काट-काट कर वृक्ष।
रुकी धरा की साँस है,घायल उसका वक्ष।
अब गर्मी का दोष दें,दिनकर को सब लोग।
मन ही मन कहते रहें,मानव खुद को दक्ष।

ललित
10.06.19

भोला-बाबा
कबीर छंद/सरसी

भोला-भाला बाबा आया,मात तुम्हारे द्वार।
श्याम-लला के दर्शन करने,की है बस  दरकार।
झाड़-फूँक कर नजर उतारे,ये बाबा है खास।
बालक रोना बंद करेगा,आएगा जब पास।

ललित 

कलियाँ
कबीर छंद/सरसी

भारत में कलियों का खिलना,दूभर कितना आज?
खिलने से पहले तन नोचें, कदम-कदम पर बाज।
सरकारें ही जब अंधी हों,अंधे थानेदार।
न्याय मिले आहत कलियों को,करो नहीं दरकार।

ललित

श्याम साँवरे
कबीर छंद/सरसी छंद

श्याम साँवरे तेरी मुरली,की धुन है क्या खूब।
धरती अम्बर और सितारे,जाते जिसमें  डूब।
सपने में ही हमें सुना दे,उस वंशी की तान।
जिसकी मधुर धुनों में बसती,है राधा की जान।

ललित

चाय
कबीर छंद

छम-छम-छम-छम बजें पायलें,जियरा झूमा जाय।
आएँगें अब साजन पीने,अदरक वाली चाय।
आज कहू्ँगी मैं प्रियतम से,अपने मन की बात।
मोबाइल को छोड़ो ये है,मधुर-मिलन की रात।

ललित

इंद्रधनुष
कबीर छंद

घन-घन-घन-घन बादल गरजें,मोर मचाएँँ शोर।

ऊँचे पर्वत के पीछे से,झाँके स्वर्णिम भोर।

शीतल निर्मल जल की बूँदें,ले आई बरसात।

इंद्रधनुष ने सात रंग की,दी अद्भुत सौगात।

ललित

17.06.19


कबीर छंद
सलाह

भाग-दौड़ से जीवन की कुछ,समय निकालो आप।
सुबह-सैर दो कोस करो सब,मिट जाएँ संताप।
खुली हवा में बैठो थोड़ा,कर लो कुछ व्यायाम।
प्राणायाम ज़रा कर लो तो,मन पाए विश्राम।

ललित

19.06.19

सुख-दुख
कुकुभ छंद

सुख-दुख में गोते खाते ही,बीत गया जीवन सारा।
वृद्धावस्था में आकर क्यूँ ,लगता है जीवन हारा?
जिस मस्ती में यौवन बीता,उस मस्ती में अब जी ले।
औरों से मत कर आशा तू,खुद अपने सब ग़म पी ले।

ललित

बाँसुरिया
कुकुभ छंद

जादू नगरी से बाँसुरिया,ऐसी लाया नँदलाला।
अधरों से जब लगती है तो,झूम उठे हर व्रज-बाला।

गोप-गोपियाँ दौड़े आते,काम छोड़ कर सब आधा।
बिना पादुका दौड़ी आती,सुन मुरली की धुन राधा।

ललित

मोबाइल
कुकुभ छंद

मोबाइल का भूत सभी को,लगता है बेहद प्यारा।
पाँच इंच की डिबिया में अब,बंद हुआ है जग सारा।
शादी की हर वर्ष-गाँठ अरु,जन्म-दिवस ये दिखलाता।
किसे बधाई कैसे देनी,मोबाइल ही सिखलाता।

ललित

दिनकर
कुकुभ छंद

एक अकेला दिनकर सारे,जग को रोशन कर देता।
स्वर्ण-रश्मियों की झिलमिल से,धरती का तम हर लेता।

जो नित सूर्यदेव को जल का, अर्पण करता इक लोटा।
दसों दिशा यश फैले उसका,कभी न देखे दिन खोटा।

ललित

20.06.19
कान्हा
कुकुभ छंद

माटी-खाना माखन-खाना,चोरी-करना कब छोड़ा?
ओ कान्हा बतला दे तूने,कपड़े हरना कब छोड़ा?
जिस प्यारी राधा के सँग तू,नंदन-वन में नित झूला।
जरा बता दे उस राधा को,क्यों-कर कैसे कब भूला?

ललित

बदरा प्यारे
ताटंक छंद

सूख गया सब नीर धरा का,बचे समंदर हैं खारे।
अधर नैन मन की प्यासों से,नर-नारी सब हैं हारे।
इंद्र-देव से आज्ञा लेकर,बरसा दे जल
के धारे।
इस धरती की प्यास बुझाने,आजा ओ बदरा प्यारे।

ललित


22.06.19
कुकुभ छंद
श्रृंगार

अंग सुकोमल रूप मनोहर,
चंचल चितवन तिरछी सी।

कान्हा की दीवानी राधा,
बोले तीखी मिरची सी।

छम-छम-छम-छम करती आए,
गीत बाँसुरी जब गाए।

देखे उसको इक-टक मोहन,
नज़र शरारत कर जाए।

ललित

चंचल मन
कुकुभ छंद

चंचल मन नित खोया रहता,नए-नए सुख-सपनों में।
खोजा करता खुशियों के पल,सभी परायों-अपनों में।
आनँद अपने अंदर का क्यों,देख नहीं ये मन पाता ?
वो आनँद जो अनुभव करता,नर वो भव से तर जाता।

ललित

वोट
कुकुभ छंद

देश-प्रेम की बातें कर जो,वोट बटोरा करते हैं।
उनसे अच्छे भिखमंगे गा,भजन कटोरा भरते हैं।
कुछ नेता जनता को धोखा,दे हत्याएँ करवाएँ।
कुछ वोटों की खातिर अपने,ही लोगों को मरवाएँ।

ललित

आपा-धापी
ताटंक छंद

कैसी आपा-धापी में कब,ये जीवन सारा बीता?
समझ नहीं पाया कुछ भी मन, क्या हारा अरु क्या जीता?
बचपन की कुछ मीठी यादें,सुंदर स्वप्न जवानी के।
यही बचे हैं अब झोली में,अंतिम दौर रवानी के।

ललित

ताटंक छंद
राधा-राधा

राधा-राधा रटते-रटते,मोर-मुकुट सिर है धारा।
कारे-कारे मनमोहन की,अँखियों में कजरा कारा।
पीताम्बर पहना दे मैया,राह निहारे है राधा।
बाँसुरिया-लकुटी पकड़ा दे,दिन चढ़ आया है आधा।


ललित

ताटंक
नवीन भाव

फूलों की बगिया में सौरभ,की ऐसी महिमा पाई।
हवा चुरा खुशबू सुमनों से,मन-आँगन में ले आई।
पुलक उठा यों मन का उपवन,
सौरभ से भीनी-भीनी।
आई हो ज्यों स्वप्न सुंदरी,ओढ़ चुनर झीनी-झीनी।

ललित

नन्ही परी
ताटंक छंद

सुंदर सपनों में रँग भरने,नन्ही एक परी आई। 
रंग-बिरंगे खुशियों के पल,अपनी झोली में लाई।
प्यारी-प्यारी बातें करती,शैतानों की नानी 
है।
रोज रात को दादू से वो,सुनती नयी कहानी है।

ललित

कारे बदरा
ताटंक छंद

कारे बदरा आगे मत जा,नीर यहीं बरसा जा रे।
जल बिन सूखे अधर हमारे,क्यों हमको
तरसाता रे?
बहुत सही है गर्मी हमने,लू ने बहुत तपाया है।
वो शीतलता हमको दे जा,सागर से जो लाया है।

ललित

बेटी
 ताटंक छंद

बहुत पढाया बेटों को अब,बेटी को भी मौका दो।
अपनी प्यारी बेटी को मत,जबरन चूल्हा चौका दो।
बेटी के सपनों में सुंदर,प्यारे रँग भरते जाओ।
उसकी राहें आसाँ कर दो, हर बाधा हरते जाओ।

ललित

सुख-दुख
कुकुभ छंद

सुख अरु दुख की परिभाषाएँ,आपस में यों उलझी हैं।
जीवन भर सुलझाए नर-मन,लेकिन ये कब सुलझी हैं?
दुख में सुख अनुभव करने की,कला कई
मानव जानें।
और कई मानव सुख में भी,अल्प कमी को दुख मानें।

ललित

राधा-कान्हा
ताटंक छंद

मन-मन्दिर में शोभित हो जब,राधा-कान्हा की जोड़ी।
नयन बन्द करते ही उठती,आनँद की लहरें थोड़ी।
कभी दिखाई देता कान्हा,मन्द-मन्द मुस्काता सा।
कभी दिखाई देता आँखें,गोल-गोल मटकाता सा।

नंदन-वन में गाय चराता,मुरली मधुर बजाता वो।
कभी राधिका अरु सखियों सँग,मनहर रास रचाता वो।
गोवर्धनधारी जो देता,मात इंद्र की चालों को।
खेल-खेल में वो मिलवाता,ईश्वर से व्रज वालों को।

ललित

बाबुल का अँगना
ताटंक छंद

अँखियों में हैं सुंदर सपने,दिल में प्रीत पिया की है।
डोली में बैठी है गोरी,थामे रास हिया की है।
छोड़ चली बाबुल का अँगना,छूट गईं सखियाँ सारी।
पहली पारी खेल चुकी अब,खेलेगी दूजी पारी।

ललित

माली
ताटंक छंद

फूलों में सुंदर रँग भरकर,खुशबू किसने है डाली?
सोच रहा खुश हो कर माली,देख गुलाबों की लाली।
मुस्कानों को भी देते हैं,जो सीखें मुस्काने की।
वही सुमन जानें तरकीबें,काँटों से टकराने की।

ललित

बच्चे
ताटंक छंद

सोच पुरानी की अब खिल्ली,उड़ा रहे हैं 
जो बच्चे।
जीवन की दुर्गम राहों में,इक दिन खाएँगें 
गच्चे।
जो जनरेशन-गैप कहाता,नहीं समझ में आता है।
बच्चों के बच्चे होते तो,गैप कहाँ खो जाता है?

ललित

मई 2019 रचनाएँ

मई 2019
कर्मठ नारी
मुक्तक

नयनों में हैं सुंदर सपने,सिर पर बोझ तगारी का।

भाल पसीने में है भीगा,ऐसी कर्मठ नारी का।

मजदूरी कर पेट पालना,और पढ़ाना बच्चों को।

मुश्किल काम बड़ा है पर ये,जीवन है खुद्दारी का।

ललित किशोर 'ललित'

साजन-सजनी
प्रदीप छंद
16-13

मधुर-मधुर कल-कल लहरों की,कर्णों में रस घोलती।
पतवारों के दम पर बढ़ती,नैया ढुल-मुल डोलती।
शीतल सुरभित पवन सुहानी,सहलाती जब गात को।
साजन अँखियों में ही कहता,समझो सजनी बात को।

ललित

गोरी के अँगना
प्रदीप छंद
16-13

गोल-गोल मोती सी बूँदें,लेकर बदरा आ
गए।
गोरी के अँगना में रिम-झिम,वो बूँदें बरसा गए।
भिगो दिया गोरी का तन-मन,रंग-रँगीली शाम में।
भीगे वसनों में लिपटी वो,खोई घर के काम में।

ललित

नन्हा कान्हा
प्रदीप छंद
16-13

मैया इक मुरली मँगवा दे,नन्हा कान्हा मचल गया।
मोर-पंख का मुकुट लगाया,नन्हा मोहन बहल गया।
गैया के सँग वन जाऊँगा,लेकर लकुटी साथ में।
ग्वाल-बाल सँग नृत्य करूँगा,लिए बाँसुरी हाथ में।


ललित

05.05.19
दोहा

जीवन की इस दौड़ का,पकड़ न आए छोर।
मन चाहे कुछ और है, मिलता है कुछ और।

' ललित '

मुस्कान
छंद प्रदीप

कुछ बन्दे अंजाने भी हैं,हँसी और मुस्कान से।

कमा न पाए मुस्कानें जो,जीवन की दूकान से।

मन्द-मधुर मुस्कानों की जो,नर हैं कीमत जानते।

अधरों पर मुस्कानें रखने,की वो मन में ठानते।

ललित

मुस्कान
छंद प्रदीप

चुरा न पाए मुस्कानें जो,जीवन की दूकान से।
कुछ बन्दे अंजाने भी हैं,हँसी और मुस्कान से।
मन्द-मधुर मुस्कानों की जो,नर हैं कीमत जानते।
अधरों पर मुस्कानें रखने,की वो मन में ठानते।

ललित

मुस्कान
मुक्तक 

कुछ मुस्कानें ऐसी होती,जादू सब पर जो करें।
कुछ मुस्कानें दीन-दुखी के,दुःख और चिन्ता हरें।
कुछ मुस्कानें पगी प्रीत में,प्रियतम को करती सुखी।
होयँ कुटिल कुछ मुस्कानें जो,नेता नित मुख पर धरें।

ललित 

मुस्कान
हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

अधरों पर मुस्कान,गाल पर लाली।
मदिर-गुलाबी नैन,चाल मतवाली।

मस्त नज़र के तीर,चला कर गोरी।
गयी चली वो हाय,गाँव की छोरी।

ललित

श्रृंगार रस
हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

कल-कल बहती जाय,नदी दीवानी।
सागर के सँग प्यार,करेगी रानी।
मिलने की है चाह,बला की मन में।
लगी अजब सी आग,मचलते तन में।

खारी हो जल-धार,भले साजन की।
लेगी बहियाँ थाम,करेगी मन की।
लग सागर के अंग, नदी बहकेगी।
तन-मन होंगें एक,प्रीत महकेगी।

ललित

आपा-धापी

आपा-धापी में बीता जो,जीवन वो क्या जीवन है?
वो घर भी क्या घर है जिसमें,नहीं लगा तुलसी-वन है?

हंस गति छंद
11-9 यति पूर्व लघु अंत दो गुरू

माँ

माँ है जिसके पास,वही बड़-भागी।
माँ चरणों का खूब,रहे अनुरागी।

करता है जो पूत,मात की सेवा।
बन जाए हर काम,चखे वो मेवा।

ललित

हंस गति छंद
आनंद लीजिए

वृन्दावन सरताज,कन्हैया प्यारा।
बाँका वो नँद-लाल,जगत से न्यारा।

पल में करे कमाल,मटकियाँ फोड़े।
हाथ न आए श्याम ,गोपियाँ दौड़ें।

ललित

14.05.19
कान्हा
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

माखन-मिश्री हाथ में,लेकर कान्हा भागा।
लीला जिसने देख ली,भाग्य उसी का जागा।

छोटा सा नँद-लाल ये,माखन-चोर निराला।
माखन जिसको दे वही, हो जाता मतवाला।

ललित

स्वप्न सुनहरे
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

स्वप्न सुनहरे देखते,जीवन सब का बीते।
कुछ की भरती झोलियाँ,कुछ रह जाते रीते।

धर्म-राज की पोथियाँ,रखतीं सब का लेखा।
पाप-पुण्य जो भी किया,देखा या अनदेखा।

ललित

16.05.19
मन पागल
मुक्तक

मन पागल क्यों मचल रहा है?
क्या भीतर कुछ उबल रहा है?
क्या कोई कविता लिखने को
मन में लेखक टहल रहा है?

अपना जिसको मान रहा था
जिसको अपनी  जान कहा था
मृगमरीचिका सम वो निकली
दिल में जिसका प्यार बहा था।

क्यों अक्सर ऐसा है होता ?
ये दिल जिसके प्यार में खोता
प्यार नहीं उसको है पचता
तब बेबस दिल प्यार है ढोता।

ललित

15.05.19
दिल की बातें
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत


कौन सुने किससे कहूँ,दिल की बातें सारी?
किसने नैया दी डुबो,अरु किसने है तारी?

बेगाने अपने हुए,मीत हुए बेगाने।
नहीं मिला वो मीत जो,दिल की पीड़ा जाने।

ललित

तुलसी
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत


फूलों की हों क्यारियाँ,मनहर सौरभ वाली।
सुंदर फूलों से लदी,हर गुलाब की डाली।

उस घर की तुलना भला,किस मंदिर से होगी।
तुलसी की सेवा जहाँ,करता हो इक योगी।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद
13-12, यति पूर्व लघु गुरु,
अंत दो गुरु,दो-दो समतुकांत

वाम नैन के पास जो,छोटा-सा तिल  काला।
गोरी उसने ही मुझे,यूँ पागल कर डाला।

उस पर बाँकी चाल ये,और महकता गजरा।
दिल को घायल कर गया,नैनों का ये कजरा।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद

चाँद चाँदनी से रहे,हरदम कुछ शरमाता।
गोरी सुंदर चाँदनी,रूप बड़ा मदमाता।

टिम-टिम-टिम तारे करें,देख चाँदनी चम-चम।
मधुर-रास में नाचती, राधा-रानी छम-छम।

ललित

श्रृंगार रस
मुक्तामणि छंद

नैना ऐसे मद भरे,जैसे मदिरा प्याले।
अधर मधुर रस से भरे,तरसें पीने वाले।

नखरों की क्या बात है,मटक-मटक वो चलती।
नैनों से जादू चला,दीवानों को छलती।

ललित

मुक्तामणि छंद

कैसा होगा रास वो,कैसी होंगीं बातें?
विश्व-नियंता नाचता,था जब सारी रातें।

व्रज-रज का हर कण जहाँ,गीत प्रीत के गाता।
राधा के सँग गोपियाँ,करती थीं जगराता?

ललित

18.05.19
मुक्तामणि छंद आधारित गीतिका

छोटे से इक गाँव में,नानी जी का घर था।
छोटी सी थी झोंपड़ी,ऊपर इक छप्पर था।

मन्दिर था इक पास में,ठाकुर जी का प्यारा।
ठाकुर जी के बाग में,तुलसी-वन सुंदर था।

मीठे पानी का कुआँ,वहीं एक था गहरा।
मनहर सौरभ से भरा,मन्दिर का परिसर था।

होती थी नित आरती,साँझ ढले मंदिर में।
लगता मुझको तो बड़ा,सुंदर वो मंजर था।

कुल चार बैलगाड़ियाँ,थी नानी के घर में।
पहियों में जिनके कभी,नहीं हुआ पंचर था।

ललित

मुक्तामणि छंद

मैया में श्री राम का,दूत नाम हनुमंता।
ढूँढन आया आपको,दिल में हैं भगवंता।

राम-नाम की मुद्रिका,भेजी है रघुवर ने।
देख मुद्रिका नैन में,लगे अश्रु थे भरने।

ललित


20.05.19
शंकर छंद

वो मुस्कुराकर देख लेना,आपका इक बार।
था जान लेवा ही कसम से,आपका दीदार।
अब रात-दिन मैं देखता हूँ,आपकी तस्वीर।
फिर कर सकूँ दीदार ऐसी,है कहाँ तकदीर।

ललित

20.05.19
शंकर छंद


ऐसी  दिखायी ज़िन्दगी ने,प्यार की तासीर।
अब आगयी है समझ में हर,बागबाँ की पीर।
जो प्यार का गुलशन सजाए,सींच कर दिन-रात।
उस बाग के कब सुमन मानें,बागबाँ
की बात?

ललित 

शंकर छंद

सुन राधिका अब ध्यान से तू,सार की ये बात।
व्रज-गोपियों सँग मैं करूँगा,रास सारी रात।
जब छम-छमा-छम पायलें सब,की बजेंगीं 
खूब।
परमात्म रस बरसात में हर,जीव जाए डूब।

ललित

16:11

चुनाव बीते खत्म हुआ सब,नेताओं का जोश।
इ वी एम में भाग्य बंद कर,जनता है खामोश।
झूठे-सच्चे चैनल खोलें,एग्ज़िट वाली पोल।
जनता के क्या कहने जो अब,हँसती है दिल खोल।

ललित


22.05.19
शब्द युग्म समारोह 258
चयनित युग्म"फटाफट'
स. अ. आ.श्री रवींद्र वर्माजी,सं.आ.कांति शुक्लाजी,
आ.उमा प्रसादजी एवं मंच को निवेदित
दो मुक्तक
1 मुक्तक

फिसल रहा है समय फटाफट,हाथों से अपने।
लेकिन देखे ये चंचल मन,नित्य नए सपने।
सपनों में डूबा मानव मन,भूल गया हरि को।
सुबह-सवेरे निकल पड़े वो,इस जग में खपने।

2 मुक्तक

करना है हर काम फटाफट,नहीं समय है पास।
भाग-दौड़ मानव जीवन का,हिस्सा है अब खास।
दो पल रुककर नहीं करे वो,प्रभु का थोड़ा ध्यान।
धन-दौलत-माया-ममता का,हर मानव है दास।

ललित

22.05.19

शंकर छंद

लव पर लिए मुस्कान ताजा,और स्वर में साज।

पा ले हजारों दर्द दिल में,घूमता नर आज।

जिससे कहे वो पीर दिल की,है कहाँ वो मीत?

डूबा हुए निज दर्द में भी,गारहा वो गीत।

ललित

मुक्तक
अपने दिल को ज़िंदा रख

यश-अपयश सुख-दुख जो आएँ,सबको थोड़ा-थोड़ा चख।
मीत मिलें या दुश्मन सबको,एक नज़र से ही तू लख।
जीवन की नैया तो भैया,डोलेगी डगमग-डगमग।
ज़िंदादिल हो कर जी प्यारे, अपने दिल को ज़िंदा रख।

ललित

शंकर छंद

नदिया ओढ़ चुकी है चुप्पी,आज झरने मौन।
सागर की लहरें चुप-चुप हैं,जिम्मेदार कौन?
बाँध बना छीनी मानव ने,नदी की आवाज़।
मानव ने दानव बन कर दी,बंजर धरा आज।

ललित
23.05.19
दोहे
हाथों के तोते उड़े, हुए शर्म से लाल।
धोती-कुर्ता कर सका,नहीं कोई कमाल।


वो  चिल्लाते रह गए,  चोर है चौकीदार।
दिखा अँगूठा बन गई, चोरों की सरकार।


24.05.19

शंकर छंद

मनमोहना तेरे सिवा है,और मेरा कौन?
यूँ मोह-माया ने छला मैं,हो गया हूँ मौन।
कर दे कृपा घनश्याम ऐसी,आत्म का हो ज्ञान।
अपने-पराए सब भुला निशि,दिन करूँ मैं ध्यान।

ललित

शंकर छंद

जो बात मन को मथ रही वो,क्यों न कह दूँ आज?
क्यों ज़िन्दगी हर-पल दिखाती,इक नया अंदाज़?
इक पल सुनहरापन लिए तो,दूसरा रँग हीन।
इक क्षण भरा आनंद से तो,दूसरा ग़मगीन।

ललित 
शंकर छंद

ये ज़िंदगी इक खेल ही है,मानलो ये बात।
हर पल यहाँ मिलती नए इक,दर्द की सौगात।
हँसकर सहे हर दर्द को जो,है वही जाँबाज।
वो है सफल इंसान पहने ,दर्द का जो ताज।

ललित

शंकर छंद

यह भोर की बेला सुहानी,दे रही संदेश।
है मुस्कुराहट से भरा हर,प्रात का परिवेश।
मुस्कान कुछ उससे चुरा तुम,मुस्कुराओ मीत।
फिर चहचहाहट में परिंदों,की सुनो संगीत।

ललित


दिल पर लगा जो घाव वो है,सालता दिन- रात।

शंकर छंद
कुछ यूँ ही

जो चाँद धरती पर बिखेरे,
चाँदनी का नूर।
है वो धरा का चंद्रमा क्यों,
आज इतना दूर?
जिस चाँदनी से है चमकता,चाँद का  संसार।
वो चाँदनी निश्छल करे क्या,
चाँद से है प्यार?

ललित

शंकर छंद
ट्रेन में से

जो आँसुओं का दर्द समझें,वो कहाँ नर खास।
सब सेल्फियों में भूल जाते,दर्द का अहसास।
मरती न मानवता अगर यूँ,कैमरे में आज।
तो जान बच जाती किसी की,मौत आती बाज।

ललित


शंकर छंद
ट्रेन में से


जितना करो अभ्यास उतनी, लय पकड़ में आय।
माँ शारदे फिर लेखनी को,शब्द देती जाय।
हो छंद कोई भी मगर हो ,लेखनी में जोश।
रचना बने फिर खूबसूरत,बद्ध-लय बिन दोष।

ललित


जो घोंसला है नित बनाती,जोड़ तिनके बेशुमार।
है होगये हमतो उसी की,चहचहाहट पे निसार।


28.5.19

बाँसुरी
कुण्डल छंद

बाँसुरी की मनुहार,राधिका न माने।
छूती क्यों श्याम-अधर,जिया को जलाने।

राधा का कृष्ण-प्यार,जलन को बढ़ाए।
बाँसुरिया अधर धरे,श्याम मुस्कुराए।

ललित

बाँके बिहारी
कुण्डल छंद

बाँके-बिहारी सुनो,भक्त ये पुकारे।
चार कदम चलो साथ,दीन के सखा रे।

भक्त-माथ धरो हाथ,मोर-मुकुट धारी।
ले चलना श्याम जहाँ,चाह हो तुम्हारी।

ललित

भाव
कुण्डल छंद

मन में जो भाव उठें,शब्द में पिरोना।
कुण्डल है खास छंद,ताल-लय भरोना।
एकदंत दयावंत ,चार भुजा धारी।
इसी छंद लिखी गयी,आरती उतारी।

ललित

30.5.19

प्यार का पुजारी
कुण्डल छंद

अँखियों में प्रीत लिए,प्यार का पुजारी।
सजनी की राह तके,रात-रात सारी।

शशी ओर हाथ उठा,माँगता दुआ ये।
रुके रहो चाँद जरा,भोर हो न जाए।

ललित

मात्रा नियम हिंदी छंद के लिए


मात्रा गिनने के नियम हिंदी छंद के लिए
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हिंंन्दी मेें छंद-बद्ध रचना लिखने के लिये मात्राभार की गणना का ज्ञान आवश्यक है ।

इसके निम्न लिखित नियम हैं :-
(1) ह्रस्व स्वरों की मात्रा १ होती है जिसे लघु कहते
हैं , जैसे - अ, इ, उ, ऋ

(2) दीर्घ स्वरों की मात्रा २ होती है जिसे गुरु कहते
हैं,जैसे-आ, ई, ऊ, ए,ऐ,ओ,औ

(3) व्यंजनों की मात्रा १ होती है , जैसे -
.... क,ख,ग,घ / च,छ,ज,झ,ञ / ट,ठ,ड,ढ,ण / त,थ,द,ध,न /
प,फ,ब,भ,म /
.... य,र,ल,व,श,ष,स,ह


(4) व्यंजन में ह्रस्व इ , उ की मात्रा लगने पर उसका
मात्राभार १ ही रहती है


(5) व्यंजन में दीर्घ स्वर आ,ई,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ की मात्रा
लगने पर उसका मात्राभार
 २ हो जाता है।


(6) किसी भी वर्ण में अनुनासिक लगने से मात्राभार
में कोई अन्तर नहीं पडता है,
जैसे - रँग=११ , चाँद=२१ , माँ=२ , आँगन=२११,
गाँव=२१


(7) लघु वर्ण के ऊपर अनुस्वार लगने से उसका
मात्राभार २ हो जाता है , जैसे -
.... रंग=२१ , अंक=२१ , कंचन=२११ ,घंटा=२२ , पतंगा=१२२


(8) गुरु वर्ण पर अनुस्वार लगने से उसके मात्राभार में
कोई अन्तर नहीं पडता है,
जैसे - नहीं=१२ , भींच=२१ , छींक=२१ ,
कुछ इन इसे अनुनासिक मानते हैं लेकिन
मात्राभार यही मानते हैं,


(9) संयुक्ताक्षर का मात्राभार १ (लघु) होता है , जजज
- स्वर=११ , प्रभा=१२
.... श्रम=११ , च्यवन=१११


(10) ज में ह्रस्व मात्रा लगने से उसका
मात्राभार १ (लघु) ही रहता है ,
जैसे - प्रिया=१२ , क्रिया=१२ , द्रुम=११ ,च्युत=११,
श्रुति=११


(11) संयुक्ताक्षर में दीर्घ मात्रा लगने से उसका
मात्राभार २ (गुरु) हो जाता है ,
जैसे - भ्राता=२२ , श्याम=२१ ,
स्नेह=२१ ,स्त्री=२ , स्थान=२१ ,


(12) संयुक्ताक्षर से पहले वाले लघु वर्ण का
मात्राभार २ जजJ(गुरु) हो जाता है ,
जैसे - नम्र=२१ , सत्य=२१ , विख्यात=२२१


(13) संयुक्ताक्षर के पहले वाले गुरु वर्ण के मात्राभार में
कोई अन्तर नहीं पडता है,
जैसे - हास्य=२१ , आत्मा=२२ , सौम्या=२२
शाश्वत= , भास्कर=२११.


(14) संयुक्ताक्षर सम्बन्धी नियम (१२) के कुछ नियम
भी हैं , जिसका आधार पारंपरिक उच्चारण है , अशुद्ध उच्चारण नही
जैसे- तुम्हें=१२ , तुम्हारा/तुम्हारी/तुम्हारे=१२२,
जिन्हें=१२, जिन्होंने=१२२,
 कुम्हार=१२२, कन्हैया=१२२ 


(15)उदाहरणों में अधिकांशत
का परवर्ती अक्षर 'ह' होता है
..... किन्तु यह कोई नियम नहीं है जैसे कुल्हाड़ी=122
जबकि कुल्हड़=211

नटखट मोहन

अप्रेल 2019

अप्रेल 2019

मुक्तक 16-14

जितना काला कृष्ण-कन्हैया,उतनी गोरी है मैया।
क्या जाने मैया ये कान्हा,तारेगा सबकी नैया।
माखन-मिश्री खिला जिसे वो ,रोज सुनाती है लोरी।
नहीं जानती नाग-फणों पर,नाचेगा ता-ता थैया।

ललित


आल्हा छंद

रंग-बिरंगी बाँसुरिया मैं,ले आया हूँ बीच बजार।

मधुर धुनों से जो भर देगी,कर्णों में मधुरिम रस-धार।

अधरों से लगकर गाएगी ,मन को सुख दें ऐसे गीत।

इसी मुरलिया से कान्हा ने,पाई थी हर दिल पर जीत।

सात सुरों के संगम से ये,मधुर धुनों की छेड़े तान।

सुनने वाले के अधरों पर ,छा जाती है मधु-मुस्कान।

सिखलाती जीवन जीने का,एक अलग ही ये अंदाज।

इसीलिए तो करता था वो, श्याम मुरलिया पर यूँ नाज।

ललित


कुण्डलिनी

वोट माँगता फिर रहा,गली-गली वो खास।
बाद चुनावों के नहीं,डालेगा जो घास।

डालेगा जो घास,गधों को या चमचों को।
कर लो ये विश्वास,नहीं  ऐ मित्रों चौंको।

ललित

मधुमालती छंद

नदिया जहाँ कल-कल बहे।
सुरभित हवा शीतल बहे।
सुख-छाँव वंशीवट करे।
नित भोर गोरी घट भरे।

फूलों भरी सब क्यारियाँ।
मुस्कान की फुलवारियाँ।
कलियाँ सभी खिलने लगें।
प्रेमी हृदय मिलने लगें।

ललित

मधुमालती छंद

नव वर्ष में है कामना।
माँ हाथ मेरा थामना।
मुश्किल न आए राह में।
हर-पल रहूँ उत्साह में।

सत्संगियों से नित मिलूँ।
सद्धर्म के पथ पर चलूँ।
करता रहूँ माँ बन्दगी।
पुरुषार्थ मय हो जिंदगी।

ललित
क्रमशः

मधुमालती छंद

फिर सोचना क्या प्यार में?

जब रब दिखा दिलदार में।

संसार सुंदर हो गया।

जब यार में दिल खो गया।


इस प्यार में क्या बात है?

चंचल हुआ ये गात है।

मन की कली खिलने लगी।

दीवानगी पलने लगी।


ये प्यार की दीवानगी।

जिसकी नहीं कुछ बानगी।

साँसें रुकें रुक-कर चलें।

सुख-स्वप्न नयनों में पलें।


सजना नयन में आ बसा।

छाया बहारों पर नशा।

जब भी मिलें सजना कहें।

हर पल मिलें मिलते रहें।

ललित

मधुमालती छंद

कुछ धूप में कुछ छाँव में।
जीवन जिया इस गाँव में।
कुछ प्यार में कुछ खार में।
भटका किया मँझधार में।

अब आ गया वो दौर है।
इक हाशिया हर ओर है।
यूँ ही गुज़ारी ज़िन्दगी।
कुछ हो न पाई बन्दगी।

जो ख्वाब थे दिल में पले ?
वो कब हकीकत में ढले ?
कुछ स्वप्न सपने रह गए।
कुछ आँसुओं में बह गए ।

जो ज़िन्दगी की चाल है।
उलझी हुई हर हाल है।
जैसी मिले स्वीकार है।
जैसी चले स्वीकार है

ललित

मधुमालती
रास आनंद.

वंशी अधर से ज्यों छुई।

वो चाँदनी शीतल हुई।
मुरली मधुर बजने लगी।
घर गोपियाँ तजने लगी।

जो बाँसुरी की धुन सुने।
वो राह मधु-वन की चुने
चूड़ी बजे पायल बजे।
गजरा सजे वेणी सजे।

जब श्याम से नैना मिले।
गल-हार राधा का हिले।
सब गोप-गोपी झूमते।
बादल धरा को चूमते।

ललित

कुण्डलिनी छंद

हाथ जोड़ कर माँगता,नर-नारी से वोट।
अधरों पर मुस्कान है,दिल में भारी खोट।

दिल में भारी खोट,करे वो झूठे वादे।
वादों पर दें वोट,सभी जन सीधे-सादे।

ललित

गीतिका

रासलीला गीतिका कुछ यूँ बनी
सादर प्रस्तुत....
2122 2122 212

कृष्ण-राधा-रास की क्या बात है?
रात पूनम की बनी  सौगात है।

गोप-गोपी सँग कन्हैया नाचता।
हर लता का झूमता हर पात है।

धुन सुरीली बाँसुरी की गूँजती।
ताल दे-दे झूमता हर गात है।

चाँद भी रुक सा गया आनंद में।
रास-लीला की अनोखी रात है।

पायलें छम-छम-छमा-छम बोलतीं।
बाँसुरी को आज देनी मात है।

आत्म की सब खुल रही हैं गुत्थियाँ।
हो रही परमात्म-रस बरसात है।

रास-लीला ज्ञान ये है दे रही।
आत्म औ' परमात्म की इक जात है।

ललित किशोर 'ललित'


सार छंद

शिव-शंकर से माँग रहा हर,नेता आज मनौती ।
पहन श्वेत खादी का कुर्ता,और बाँध कर धोती।

नहीं चाहिए सोना-चाँदी,गहने-हीरे-मोती।
सीट वही दिलवा दे बाबा,संसद में जो  होती।

बैठ सीट पर मैं जाऊँ तो,सेवक कहलाऊँगा।
अपने घर में धन-दौलत की ,वर्षा कर पाऊँगा।

मुझे बता दे बाबा कैसे ,जनता ये रीझेगी।
करूँ घोषणा क्या जिससे ये,वोट मुझे ही देगी?
ललित


मुक्तक( विष्णुपद आधारित)

हे शिवशंकर हे अभयंकर,निर्भय तू कर दे।
अमर सुहाग रहे मेरा हे!नाथ मुझे वर दे।

हे मात-अम्बिके-दुर्गा-गौरी,विनती है तुझसे।
रहूँ सुहागिन अंत-साँस तक,हाथ शीश धर दे।

ललित

9.4.19
तोटक छंद

112 112 112 112

हर भोर बजे मुरली व्रज में।
बस प्यार बसा जिसकी रज में।
वृषभानुसुता सँग साँवरिया।
चहकें सखियाँ सुन बाँसुरिया।

ललित

10.04.19
तोटक छंद

112 112 112 112

गणनाथ गजानन प्रात जपे।
नर वो न कभी दुख-धूप तपे।
जिस द्वार विराज गणेश रहे।
उस द्वार नहीं दुख-क्लेश रहे।

शिवशंकर नाम सदा जपता।
नर वो भव-ताप नहीं तपता।
मन में शिव-ध्यान किया करता।
भव-सागर से नर वो तरता।

हरि-नाम जपे नर जो मुख से।
दुख भी सहता समता-सुख से।
हरि मूरत देख झुके सिर जो।
भव-सागर पार करे फिर वो।

वृषभानुसुता सँग श्याम कहे।
सुख की सरिता नर डूब रहे।
मुरलीधर का नित ध्यान धरे।
नर वो भव से हर हाल तरे।

सिय-राम बसें जिसके मन में।
कब रोग बसें उसके तन में।
बजरंग-बली सिय-राम भजे।
नर वो भव-दुःख तमाम तजे।

ललित

तोटक छंद

112 112 112 112

चलता-फिरता दिखता नर है।

पलता कितना विष भीतर है।

चुपचाप निरंतर रोग बढ़े ।

फिर देह तपे अरु ताप चढ़े।


फिर डाक्टर चंगुल वो फँसता।

मन ही मन डॉक्टर है हँसता।

वह फीस व जाँच कमीशन ले।

लिख डोज बड़ी पोजीशन ले।


ललित

तोटक छंद

112 112 112 112

नव-वधू

बलखाय चले इठलाय चले।

पग-पायल खूब बजाय चले।

चहकी-चहकी फिरती अँगना।

नव-सेज सजी बजते कँगना।


अमियाँ लटकें वन-बागन में।

छमियाँ रमती निज साजन में।

सजना सँग प्रीत जवान हुई।

अँखियाँ अब तीर-कमान हुई।

ललित

गीतिका छंद

ज़िन्दगी का हर सितम हम,प्यार से सहते गए।

दुःख-सुख की धार में हम,नाव-सम बहते गए।

स्वप्न टूटे चौंक कर हम ,नींद में जगने लगे।

अब किनारे भी पराए से हमें लगने लगे।

ललित

मुक्तक

भूल-भुलैया में जीवन की,आँख मिचौली 

खेल लिए।

हमने सब किस्मों के पापड़,इस जीवन में बेल लिए।


खुशियों के सब स्वप्न सुनहरे,किर्चों में बिखरे देखे।

अब क्या बाकी रहा झेलना,बेदर्दी गम झेल लिए।


ललित किशोर 'ललित'


12.4.19

तोटक छंद

मन

मन चंचल धीर नहीं धरता।

नव-आस लिए उड़ता फिरता।

समझा मन की गति कौन यहाँ?

समझा मन की मति कौन यहाँ?


कुछ ज्ञान लिए नर डोल रहा।

मन मेंं मन को नर तोल रहा।

तन में नर खोज रहा मन को।

मन मौन करे बस में तन को।


मन जो कहता तन वो करता।

मन तर्क-वितर्क कला-धरता।

कुछ धीर हुए ऋषि-संत बड़े।

मन सम्मुख ज्यों हनुमंत अड़े।


मन हार रहा जब था रण में।

गुरु-ज्ञान-प्रकाश मिला क्षण में।

मन को वश में कर कृष्ण-सखा।

उस अर्जुन ने गुरु-मान रखा।

ललित

तोटक छंद

 मित्र

सुख में दुख मेंं अरु दुर्दिन में।

रहता सँग जो सब व्याधिन में।

वह नंद-लला गिरिराज उठा।

व्रज-वासिन संकट देत मिटा।


ललित

तोटक छंद

सिय-राम

सिय-राम सदा जप लो मुख से।

जय तारण-हार कहो सुख से।

जप ये हनुमान सदा करते।

भव-ताप दुखी-जन के हरते।


दिल में सिय-राम बिठाय लिए।

दिल-चीर सबै दिखलाय दिए।

हनुमान समान न भक्ति कहीं।

सिय-राम समान न शक्ति कहीं।


शबरी तकती नित राह जहाँ।

वन में पहुँचे प्रभु राम वहाँ।

चख बैर खिलाय रही शबरी।

पद-पंकज ध्याय रही शबरी।


मन केवट पावन भाव रहा।

तट-गंग लिए निज नाव रहा। 

उसको पग राम पखारन दें।

निज भक्तन जन्म सुधारन दें।


सिय-राम सदा जप लो मुख से।

जय तारण हार कहो सुख से ।

ललित

15.04..19

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

लगी डूबने नाव उनकी जहाँ।

मिले मंच पर एक सारे वहाँ।

निराला बहुत एक दुश्मन मिला।

सभी को उसी से रहा बस गिला।


करें यत्न सब हाथ में हाथ दे।

कि दुश्मन नहीं अब हमें मात दे।

लिए हाथ पतवार भागें सभी।

किनारे बड़ी दूर दिखते अभी।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

बजाए लला जादुई बाँसुरी।

चले राधिका के जिया पे छुरी।

मचलते जिया को लिए हाथ में।

लगी राधिका नाचने रात में।

सुरीली बड़ी बाँसुरी की धुनें।

मगन ध्यान में गोप-गोपी सुनें।

थिरकने लगे घुँघरुओं के वदन।

कि मदहोश खुद होगया है मदन।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

सद्भाव

न सोचें-विचारें  ,न मानें कभी।

न आचार-व्यवहार, जानें कभी।

रहे दौड़ अंजान पथ-पर युवा।

कि मंजिल जहाँ वासना का कुँआ।


न अनुभव-भरा ज्ञान ही चाहिए।

सहारा किसी का नहीं चाहिए।

फँसेगी भँवर में कभी नाव जो।

करेंगें तभी याद सद्भाव को।

ललित

शक्ति छंद

122 122 , 122 12

चाँदनी

महकती हुई चाँदनी रात में।

सितारे चले चाँद के साथ में।

हसीं चाँदनी ने धरा को छुआ।

मिली ज्यों धरा को अनोखी दुआ।


ललित

चाँदनी

दुआ में धरा को मिली चाँदनी।

धरा के बिना कब खिली चाँदनी?

मिली बादलों से जहाँ चाँदनी।

गुमी बादलों में वहाँ चाँदनी।

ललित

चाँदनी

नहीं बादलों में घुली चाँदनी।

गले चाँद से जा मिली चाँदनी।

चमकने लगा चाँद फिर रात में।

सितारे हँसे चाँद के साथ में।

मुक्तक 16-14

कुछ ज़ुबान से फिसले होंगें,कुछ यूँ ही बोले होंगें।

बेचारे नेता ने शायद,शब्द नहीं तोले होंगें।

शब्दों की माया-नगरी में,उलझे जो नेता सारे।

क्यों उनको लगता है वोटर,गैया-सम भोले होंगें?

ललित

आल्हा छंद

मतदाता पहचान पत्र क्या,होता क्या बोलो आधार?

कैसा होता है घर पक्का,होता क्या उसका आकार?

नहीं जानते हैं हम कुछ भी,कैसे डाले जाते वोट।

भूखे ही सो जाते हैं हम,रोज़ इसी पाइप की ओट।

ललित

शक्ति छंद

सदा खिल-खिलाकर हँसे प्यार से।

बिखेरे खुशी सौम्य व्यवहार से।

निराली सरस रास-लीला करे।

लुटा आत्म-रस प्रीत-प्याले भरे।


रही राधिका खोज उस चोर को।

रखे शीश पर जो मुकुट-मोर को।

बजा बाँसुरी चैन जिसने हरा।

छुपा है कहाँ श्याम मुरलीधरा?


ललित

शक्ति छंद

प्रभो द्वार तेरे खड़े हम सभी।

निहारो हमें प्यार से भी कभी।

बनाए रखो नाथ ऐसी कृपा।

नहीं दुःख हमको सकें अब तपा।

ललित

शक्ति छंद

कृपा है प्रभो आपकी सब कृपा।

नहीं दुःख मुझको सके जो तपा।

यही मात्र विनती करूँ रात-दिन।

न इक-पल गुजारूँ कभी जाप बिन।

ललित

शक्ति छंद

नदी

122 122 122 12

नदी नाव की मित्रता हो जहाँ।

न कैसे किनारा मिले फिर वहाँ?

मिले आत्म को ज्ञान परमात्म का।

न उद्धार रुकता वहाँ आत्म का।


चले जीव सद्भाव के पथ सदा।

करे कूप उपकार ज्यों सर्वदा।

न गंगा न यमुना उसे धो सके।

भरा मैल मन में अगर नर रखे।

ललित 

मुक्तक 16-10

चोर-चोर का शोर मचाते,मुख सूखे जिनके।

हाथ जोड़ माफी माँगें अब,उतरे मुँह उनके।

खोजा करते थे तिनके जो,दाढी में सबकी।

साफ जरा कर लें वो खुद की ,दाढी के तिनके।

ललित 

शक्ति छंद

कली

122 122 122 12

मिली स्वप्न में एक नाजुक कली।

बड़ी खूबसूरत बड़ी मनचली।

निगाहें मिलाकर झुकाती रही।

कली स्वप्न में भी छकाती रही।


कभी प्यार से वो निहारे हमें।

यही सोचकर हम वहाँ थे थमे।

मगर प्यार की बात मन में रही।

खुली नींद तो स्वप्न नगरी बही।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

प्यार हर दिल में पनपता है जहाँ।

ज़िंदगी भी मुस्कुराती है वहाँ।

ज़िन्दगी जिंदादिली से जो जिए।

है भला गम चीज क्या उसके लिए?

ललित

पियूष वर्ष छंद

बाँसुरी

2122 2122 212

बाँसुरी की मस्त धुन में खो गया।

वो कन्हैया का दिवाना हो गया।

नाम राधा का जपे दिन-रात है।

चाहता घनश्याम का जो साथ है।

ललित

पियूष वर्ष छंद

प्यार  

2122 2122 212

प्यार की धुन में मगन दो दिल मिले।

फूल खुशबू से भरे सुंदर खिले।

नैन में हैं स्वप्न सुख-संसार के।

दिल धड़कते हैं लिए सुर प्यार के।


प्यार की खुशबू भरी हो ज़िंदगी।

है नहीं इससे बड़ी कुछ बंदगी।

प्यार है निष्काम जिस दिल में भरा।

है वही दिल हर कसौटी पर खरा।


प्यार की नगरी बड़ी जादू भरी।

प्रीत की नौका भँवर में भी तरी।

चाँद-तारों को ज़मीं से आस है।

प्रेम के दम पर टिका आकाश है


हर समंदर प्यार का प्यासा दिखा।

प्यार सबके भाग्य में है कब लिखा?

प्रीत की हो प्यास जिस दिल में जगी।

इक अनोखी आग उस दिल में लगी।

ललित

पियूष वर्ष छंद

प्रदूषण

2122 2122 212

ज़िंदगी का बेसुरा अब राग है।

अब हवाओं में सुलगती आग है।

स्वार्थ नर ने इस कदर पोषित किए।

वायु,धरती और जल दूषित किए।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

चैन मन पाए नहीं संसार में।

खूब भटके रूप के बाजार में।

ध्यान तब धर लो जरा तुम श्याम का।

नाम जप लो तब जरा तुम राम का।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

साजना ये चाँदनी क्या कह रही?

प्रीत की प्यासी नदी क्यों बह रही?

चाँद से है चाँदनी को प्रेम गर।

प्यार करती है समंदर से लहर।

ललित

पियूष वर्ष छंद

2122 2122 212

सोलहों श्रृंगार कर सजनी सजी।

छम-छमा-छम रात भर पायल बजी।

तार दिल के छेड़ बैठा यूँ पिया।

नींद रूठी हो गया चंचल जिया।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

हिंद देश की आजादी का,पर्व बड़ा मतदान का।

वोट डालने से चमकेगा, मुखड़ा हिंदुस्तान का।

सोचो,समझो और विचारो,किसको देना वोट है।

चुनो उसीको अपना नेता,जिसमें कुछ कम खोट है।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

मनमोहना हे! श्याम सलौने,विनती इतनी सी सुनो।

चरणों की सेवा में प्रभु जी,चाकर मुझको ही चुनो।

इक पल भी मैं तुम्हें न भूलूँ,सुमिरन आठों 

याम हो।

राधे-कृष्णा जाप तुम्हारा,जिव्हा से अविराम हो।

ललित

प्रदीप छंद

16-13

भोर सुहानी मंगलकारी,देती है संदेश ये।

मुस्कानों की चादर ओढ़ो,छोड़ क्लेश का वेश ये।

नित्य भोर में ऊर्जा भर लो,तन में प्राणायाम से।

ध्यान-भजन का समय निकालो,थोड़ा दैनिक काम से।

ललित

मुक्तक 16-14

सपनों की माया-नगरी में,उधेड़-बुन  सपना होगा।

सत्य एक ईश्वर का मन से,नाम सदा जपना होगा।

ये संसार असत्-क्षण-भंगुर,मान बात ये ले प्राणी।

संचय कर लेगा तू जितना,पुण्य वही अपना होगा।

ललित किशोर 'ललित'


मधुमालती छंद

2212 2212

जीवन पुकारे ओ पथिक।
रुकना न तू इक पल तनिक।
चलता निरंतर जो रहे।
मंजिल उसी की हो रहे।

हो कंटकों से सामना।
तो पग न अपना थामना।
फूलों भरी राहें मिलें।
सम्भव नहीं ये सिलसिले।

ललित

अप्रेल 2019

मधुमालती छंद

2212 2212

हर आदमी इस देश का।
हर जाति का हर वेश का।
हर राज्य का हर गाँव का।
पूछे पता बस छाँव का।

हर छाँव उससे छिन गई।
बस धूप है हर दिन नई।
अब छाँव भी बिकने लगी।
रोटी कहीं सिकने लगी।

कुछ भाषणों में खो रहे।
कुछ बोझ अपना ढो रहे।
जनता झुकी ही जा रही।
बस स्वप्न में सुख पा रही।

नेता निराले हैं यहाँ।
पग-पग शिवाले हैं यहाँ।
नेता वहीं सुख पा रहे।
निश-दिन शिवाले जा रहे।

है देश की चिन्ता किसे?
नेता बना जो क्या उसे?
ये सोचने की बात है।
नेता करे क्यों घात है?

ललित






मार्च 2019

मार्च 2019

मात-पिता के चरणों में तो,सचमुच में रहता है रब।
याद आपकी मन को छूकर,दे जाती पावन सौरभ।
संकट-मोचक रूप आपका,देखा है हमने हरदम।
परम-पूज्य हे पिता आपको,सादर नमन करें हम सब।
'ललित'

कुण्डलिया

मनमोहन हे ! साँवरे,इतनी सी है आस।
तन कर्मों में लीन हो,मन हो तेरे पास।
मन हो तेरे पास,नयन में छवि हो तेरी।
श्याम-नाम अविराम,जपे ये रसना मेरी।
तुच्छ ललित को श्याम,लगें हीरे धन-यौवन।
मन कर दो निष्काम,साँवरे हे!मनमोहन।

ललित

कुण्डलिनी

यमुना की लहरें थमीं,पायल हुई उदास।
नंदन-वन सूना पड़ा,वंशी-वट के पास।

वंशी-वट के पास,नहीं दिखते अब ग्वाले।
वन-वन खोजें श्याम,पड़े पैरों में छाले।

ललित

आल्हा छंद

जीत गया दुश्मन से अब तू ,भीतर वालों से भी जीत।
नहीं भा रहे जिनको तेरे,यशोगान करते कुछ गीत।

देश विरोधी तत्व अनेकों,जो अलापते बेसुर राग।
उनको भी दे दे सबूत तू ,दिखलाकर वो जलती आग।

ललित किशोर 'ललित'

आल्हा छंद

अलख निरंजन हे!शिव शम्भो,हे!देवों के देव महेश।
गरल कण्ठ में धारण कीन्हा,और गले में  नाग-विशेष।
अंग भभूत रमाए डोले,डम-डम डमरू बजे त्रिकाल।
माला और त्रिशूल साथ में,पहने नर-मुण्डों की माल।

मृगाधीश चर्माम्बर धारी,कैलाशी भूतों के नाथ।
पारवती-पति महादेव हे!,देना निज भक्तों का साथ।
माथ विराजे गंग-धार है,शशि से शोभित सुंदर भाल।
हे!त्रिनेत्र हे!शंकर भोले,एक नजर भक्तों पर डाल।

ललित किशोर 'ललित'

05.03.19

कुण्डलिया छंद
प्रयास

अभिनन्दन ने कर दिया,दुश्मन का वो हाल।

खुसुर-फुसुर हैं कर रहे,पाकिस्तानी लाल।

पाकिस्तानी लाल,कसमसाते ही डोलें।

और हिंद के लाल,हिंद की जय-जय बोलें।

धरा रही है महक,देश की जैसे चंदन।
बच्चा-बच्चा आज,कहे जय-जय-अभिनंदन।

ललित

चौपाई

भाँति-भाँति के हैं नर-नारी,जिनसे महके धरती सारी।

लम्बे-ठिगने गोरे-काले,मोटे-पतले सभी निराले।

कुछ अनपढ़ कुछ बहुत पढ़े हैं,कुछ नीचे कुछ शिखर चढ़े हैं।

कुछ निर्धन कुछ बहुत धनी हैं,कुछ के सिर पर छाँव घनी है।

पुण्यों से कुछ भरते झोली,कुछ खेलें पापों की होली।

दोहा

अपने-अपने कर्म-फल,सभी रहे हैं भोग।
निज कर्मों में हैं लगे, भाँति-भाँति के लोग।

ललित

चौपाई

शीतल सुरभित पावन छाया,वृक्ष नीम का देता आया।

वट-पीपल तालाब किनारे,गर्मी में सुख देते सारे।

चौपाई

केशव-माधव कृष्ण-मुरारी।
मनमोहन गोवर्धनधारी।

माखनचोर नंद का लाला।
धेनु-चरैया वंशीवाला।

नटवर-नागर मोहन प्यारा।
यमुना के जल जैसा कारा।

राधा जी का छैल-छबीला।
निशि-दिन करता रास-रसीला।

दोहा

यशुदा-नंदन साँवरा,मुरलीधर गोपाल।
जपने वाले का कभी,होय न बाँका बाल।

ललित

08.03.19
चौपाई

जीवन का रथ बड़ा निराला।
दो पहियों पर चलने वाला।

इक नारी इक नर का चक्का।
दोनों मिलकर देते धक्का।

जीवन में रँग भरती नारी।
नहीं कभी विपदा से हारी।

नारी से ही हर घर महके।
घर का कोना-कोना चहके।

पहिए हों जब ढीले-ढाले।
दोनों पहिए वही सँभाले।

दोहा

फूल बिछाएँ नारियाँ,जिस पथ सुबहो-शाम।
जीवन-रथ चलता रहे,उस पथ पर अविराम।

ललित

चौपाइयाँ
जीवन के रँग
समीक्षा हेतु

जीवन के रँग बड़े निराले।
शैशव को यौवन में ढाले।

यौवन का मद सिर चढ़ बोले।
वृद्धावस्था अँखियाँ खोले।

जिसे जन्म दे पाले-पोसे।
तात-मात को वो सुत कोसे।

बदला जितनी शीघ्र ज़माना।
तात रहा उससे अंजाना।

जीवन के सारे रँग काले।
वृद्धावस्था ने ही पाले।

दोहा

वृद्धावस्था के लिए,बचा रखो धन शेष।
जीवन के रँग दे रहे,आज यही संदेश।

ललित

मुक्तक
भोर

हौले से जब छुटका कान्हा,भोर भए
अँखियाँ खोले।
मात यशोदा लेत बलैयाँ,मधुर-मधुर बतियाँ बोले।
बाल-सखा सँग गैयाँ प्यारी,नंदन-वन की ओर चलें।
वंशी-लकुटी लेकर कान्हा,गैयन के पीछे हो ले।

ललित किशोर 'ललित'

चौपाई

भोर भए जैसे ही जागा।
माखन का लौंदा ले भागा।

भाग रही है पीछे मैया।
हाथ न आए कृष्ण कन्हैया।

बेबस होकर मात पुकारे।
रुक जा मेरे राज-दुलारे।

रुकजा-रुकजा छुटके राजा।
पहले तू मुख तो धुलवाजा।

शुद्धोदक से स्नान कराऊँ।
नए वस्त्र धारण करवाऊँ।

केश सँवारूँ सुंदर तेरे।
मोरपंख से कान्हा मेरे।

काला टीका भाल लगा दूँ।
बुरी नज़र को दूर भगा दूँ।

फिर तू माखन-मिश्री खाना।
मधुर मुरलिया तान सुनाना।

दोहा

भक्तों की सुख के लिए,बन कर माखन चोर।
लीला-धर लीला करे,नटखट नंदकिशोर।

ललित

चौपाई

इस मन को कितना समझाया,
सुख-दुख आती जाती छाया।

सुख की चाह सदा ही रहती।
दुख की तो नदिया ही बहती।

मन सुख को मुट्ठी में जकड़े।
सुख आए तो सबसे अकड़े।

दुख की छाया से घबराता।
मन्दिर-मन्दिर ढोक लगाता।

दोहा

सुख-दुख में जो सम रहे,मन में हो आनंद।
उसके उर में नित बहें,खुशियों के मकरंद।
 
ललित

चोपाइयाँ (समीक्षा हेतु)
शादी

नई-नई शादी थी मेरी
पत्नी की थी जुल्फ घनेरी।
मुझे प्यार से देखा करती।
प्रीत नैन से उसके झरती।

स्वर्ग समान बीतती रातें।
भोर भए तक चलती बातें।
स्वप्न सुनहरे देखें निशि-दिन।
नहीं रहें इक दूजे के बिन।

वक्त मगर तेजी से घूमा।
बाहों में इक बच्चा झूमा।
रातों में जो बच्चा जागा।
आधा प्यार वही ले भागा।

जैसे तैसे खुद को ढाला।
बच्चे को भी हमने पाला।
मगर प्यार अब नजर न आए।
पत्नी दूर-दूर ही जाए।

धीरे-धीरे दिन वो आया।
पत्नी ने हमको धमकाया।
छोड़ो अब ये प्यारी बातें।
तारे गिन-गिन काटो रातें।

दोहा

सतरंगी सपने लिए,शादी-लड्डू खाय।
चार बरस मीठा लगे,कड़वा होता जाय।

ललित

11.03.19

प्रथम प्रयास
गीतिका छंद(समीक्षा हेतु)

पूर्णिमा की चाँदनी में,बाँसुरी लेकर खड़ा।
राधिका सँग रास करता,साँवरा बाँका बड़ा।
पायलों की छम-छमा-छम,कान में रस घोलती।
गोपियों सँग राधिका जब,बाँसुरी सुन डोलती।

'ललित'

गीतिका छंद
प्यार और दिल
समीक्षा हेतु

भावनाएँ प्यार की दिल,में दबी मेरे रही।

अनगिनत दुर्भावनाएँ,प्यार में मैंने सही।

प्रेम में कोमल हुआ दिल,टूटता भी तो नहीं।

प्रीत का ऐसा नशा है,छूटता भी तो नहीं।

ललित

उधेड़-बुन में रात भर,करवट बदले तात।
बेटी के कैसे करूँ,अब मैं पीले हाथ।

हाल ही में एक शादी में दुल्हन को ठुमके लगा लगा कर नाचते देखा....और बना ये छंद

गीतिका छंद
लाज
समीक्षा हेतु

गाल पर वो शर्म की अब,लालियाँ दिखती नहीं।
कान में नवयौवना के,बालियाँ दिखती नहीं।
हाथ में चूड़ी न कंगन,भाल पर बिंदी नहीं।
दुल्हनों के नैन में भी,लाज की चिंदी नहीं।

गीतिका छंद
धरम
समीक्षा हेतु

लाज को भी लाज आए,शर्म मरती देखकर।
जींस फट-कर गोरियों की,लाज हरती देखकर।
सोच का निकला दिवाला,आँख से निकली शरम।
धन कमाना और खाना,रह गया है अब धरम।

ललित

गीतिका छंद

नाव का है रंग अपना ,और अपनी है डगर।
छा रहे बादल गगन में,दूर अपना है नगर।
नाविकों को मंजिलों की,दूरियाँ कब रोकती?
हौसलों में धार हो तो,मुश्किलें कब टोकती।

ललित

गीतिका छंद

है जहाँ आतंकियों का,सरगना सरकार में।
वार छुप-छुप कर रहा जो,शांति की दरकार में।
पाक वो नापाक अपना,सिर छिपाएगा कहाँ?
गंदगी के ढेर की बदबू दबाएगा कहाँ?

ललित

मुक्तक 14-14

देह में वो रक्त है जो,भारती माँ ने दिया है।

आज सिर बाँधा कफन है,प्रण यही हमने लिया है।

देह की हर बूँद भारत,देश को अर्पण करेंगें।

खत्म हर आतंक होगा,फैसला हमने किया है।

ललित

मुक्तक 16-12

जीवन के इस रंग-मंच पर,मिलते रंग अनोखे।
सतरंगी सपनों में अक्सर,रंग भरें जो चोखे।
कुछ रँग बीच भँवर में से भी,पार कराते नैया।
मिलें गरल-सम रंग कई जो,दे जाते हैं धोखे।

ललित

मुक्तक 16-12

बही जा रही जीवन-धारा,निशि-दिन मंथर गति से।
मत भागो तुम आगे-आगे,धन की लोभी मति से।
आगे भागोगे तो सब सुख,पीछे रह जाएँगें।
सीखो समता में रह जीना,वेद पुराणो श्रुति से।

ललित

मुक्तक 16-12

श्री राधे श्याम राधे श्याम,राधे श्याम  बोलिए।
जो राधिका का नाम लेता,श्याम उसके हो लिए।
जब चल रहे हों राह में तो,जाप मन ही मन चले।
हर समय कर जाप समझो,पाप सारे धो लिए।

ललित

गीतिका छंद
समीक्षा हेतु

पायलों के घुँघरुओं की,उस मधुर झंकार में।
चाँदनी भी खो गई है,रास के संसार में।
चाँद कुछ थम सा गया है,गोपियाँ हैं झूमती।
कृष्ण-अधरों को निराली,बाँसुरी है चूमती।

ललित

गीतिका छंद

दीप-बाती साथ मिलकर,रोशनी करते वहाँ।
प्यार में दो दिल धड़क कर,एक होते हैं जहाँ।
छोड़ सिंदूरी उजाला,प्रेम के आकाश में।
दीप-बाती खुद बँधे हैं,प्रीत के इक पाश में।

ललित

गीतिका छंंद

सात फेरे ले बँधे वो,सात जन्मों के लिए।
स्वप्न आँखों में हजारों,भर सुनहरे चल दिए।
प्यार के संसार की सब ,कल्पनाएँ सच हुईं।
अब छुएँगें मंजिलें जो ,अब तलक थी अनछुई।

ललित

गीतिका छंद

साजना के साथ दुल्हन,सात फेरे ले रही।
तात हैं खुश हो रहे माता दुआएँ दे रही।
राज-रानी बन रहे तू , खुश रहे फूले-फले।
भाग्य-लक्ष्मी साथ तेरे,लाडली बेटी चले।

ललित

गीतिका छंद

रूप दुल्हन का निखारा,प्यार से हल्दी लगा।
नाचती हैं सालियाँ सब,साथ जीजा है सगा।
नाचते समधी सभी हैं,साथ में घरवालियाँ।
गूँजती पांडाल में बारातियों की तालियाँ।

ललित

गीतिका छंद
पड़ोसन

वो पड़ोसन नित खरीदे ,खूब महँगी साड़ियाँ।
साजना उसका चलाए,चमचमाती गाड़ियाँ।
मेक-अप ऐसा करे वो,गाल पर लाली लगा।
घूरते हैं सब पड़ोसी,ऐनकें काली लगा।

ललित

गीतिका छंद
माँ-बेटी

आज माँ की लाडली बेटी पराए घर चली।
अश्रु भाई तात माँ की आँख में वो भर चली।
जो कली महका रही थी,आँगना के बाग को।
संग सौरभ चल पड़ी वो,साजना के बाग को।

ललित

मुक्तक
आद्या

छोटी-छोटी दो-दो चोटी,वाली आद्या रानी।
सीधी इसको समझो तुम ये,मत करना नादानी।
पशू-पक्षियों से ये छुटकी,प्यार बहुत करती है।
छोटी सी ये दिखती पर है,शैतानों की नानी।

ललित

गीतिका छंद

क्या उचित है और क्या अनुचित जरा ये जान लो।
बात अपने से बड़ों की,प्यार से तुम मानलो।
ठोकरें खा कर जिन्होंने,ज्ञान कुछ अर्जित करा।
ठोकरें खानी न हों तो,सीख लो उनसे जरा।

ललित

गीतिका छंद

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...