मई 2026 की रचनाएँ
अगस्त 2026 की रचनाएँ
पीयूष वर्ष छंद
वृद्धावस्था
गीत
हाथ पैरों में ज़रा भी दम नहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।
दाँत हिल-हिल साथ छोड़े जा रहे।
स्वाद रसना को नये नित भा रहे।
दर्द घुटनों का न जाने दे कहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।
याद में डीमेंशिया झूला हुआ।
नाम अब हर चीज का भूला हुआ।
मौन रह कर मुस्कुराना है यहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।
साथ छोड़े जा रही अब चाम भी।
बेरहम कितनी हुई ये शाम भी ?
अश्रुओं की धार आँखों से बही।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।
प्यार के दो बोल सुनने के लिए।
अब तरसते प्रीत के बुझते दिए।
उम्र ने रुसवाइयाँ सबकी सहीं।
वृद्ध होना इक सजा से कम नहीं।
ललित किशोर 'ललित'
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सिंधु छद
खिला था आसमां में चांँद जब पूरा।
तभी चुप चाँदनी ने चाँद को घूरा।
सितारों से बहुत तुम प्यार करते हो।
कि पूनम को अनोखा रूप धरते हो।
नहीं तुम देखते हो इक नजर मुझको।
धरा की ओर धकियाते मगर मुझको।
नहीं हैं याद तुमको वो पुराने दिन।
हमारे इश्क की रातें सुहाने दिन।
ललित किशोर 'ललित'
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मुक्तक
फूलों का गुलशन चाहा था,शूलों की दरकार न थी।
हँस न सकें जो कागज के उन,फूलों की दरकार न थी।
माना चाहत पूरी होना,मुश्किल होता है लेकिन।
सावन की रिमझिम चाही थी,झूलों की दरकार न थी।
ललित किशोर 'ललित'
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18.08.26
मधुमालती छंद
वो चाहते हैं चुप रहो।
हर ताप हर पीड़ा सहो।
वो राज करना चाहते।
सच से मुकरना चाहते।
क्यों दर्द बाहर आ रहा ?
क्यों गर्द बढ़ता जा रहा ?
क्यों उठ रही आवाज है ?
वो हुक्मराँ नाराज है।
इस दर्द को सहते रहो।
मत हुक्मराँ से कुछ कहो।
मत आसमाँ को तुम तको।
मत स्वप्न में भी सुख चखो।
जो थम गया वो जल नहीं।
जो झुक गया वो बल नहीं।
चलते रहो बढ़ते रहो।
नव स्वप्न नित गढ़ते रहो।
ललित किशोर 'ललित'
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मधुमालती छंद
जो भाव इस दिल में बहें।
हर बात वो किससे कहें ?
दिल की लगी किसको पता।
क्यों कौन सुन लेगा व्यथा ?
जो घाव इस दिल पर लगे।
इक दर्द सा उनमें जगे।
हैं अनगिनत ग़म की तहें।
हर बात वो किससे कहें ?
है राह जो उलझी हुई।
कैसे कहें सुलझी हुई ?
हर मोड़ पर ही धुंध है।
ये देख कर मति कुंद है।
मथती सदा दिल को रहें।
हर बात वो किससे कहें ?
ललित किशोर 'ललित'
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मधु मालती छंद
इस ज़िंदगी ने क्या दिया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।
अब देखने को जो मिला।
वो कर्म का ही है सिला।
जो हाथ खाली थे मिले।
अब रिक्त हैं तो क्या गिले?
इक स्वप्न सा जीवन जिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।
जो कुछ मिला संसार से।
सब छूटता वो प्यार से।
कैसे रहें पकड़े उसे ?
खुद भाग्य ही छीने जिसे।
सारी उमर भटका किया ?
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।
अब देखना पीछे नहीं।
हैं मंजिलें आगे कहीं।
अब है सहारा आस का।
उस ईश में विश्वास का।
संकल्प का प्या़ला पिया।
कुछ खो दिया कुछ पा लिया।
ललित किशोर 'ललित'
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22.08.2026
मुक्तक
सनातनी होने का दावा,करता था जो नर हरदम।
धर्म-सनातन की रक्षा का,जो रखता था हर दमखम।
आज वही खुद इक मंदिर में,बन भगवान
विराजा है।
चुप हैं सारे संत महात्मा,अंध-भक्त बोलें बम-बम।
ललित किशोर 'ललित'
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मुक्तक
1.
तुम तो जीना सीख न पाए,कहते हैं वो हम से।
खा लो पी लो मौज मना लो,दूर रहो हर ग़म से।
अब उनको हम क्या बतलाएँ,अपनी राम कहानी ?
हाँ बस इतना ही कह पाए,सीखेंगें अब तुमसे।
2.
मन ही मन हम सोच रहे थे,क्यूँ थे पापड़ बेले ?
क्यों जीवन-भर झंझावातों,तूफानों से खेले ?
मन मौजी थे हम भी लेकिन,पैसों की थी
तंगी।
कैसे मौज मनाते हम जब,पास नहीं थे धेले।
ललित किशोर 'ललित'
विष्णु पद छंद
अनसुलझी अनबूझ पहेली,मन का चैन हरे।
चिंतित मन को क्या समझाएं,कैसे धीर धरें ?
समझ-समझ कर ये समझा है,इस पागल मन ने।
बचैनी से रिश्ता जोड़ा,है घायल मन ने।
ललित किशोर'ललित'
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गीत
31.08.26
छंद सुमेरु
1222 122,2122
तुम्हारी राधिका रो,रो पुकारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।
न जाओ श्याम व्रज से,छोड़ हमको।
नहीं क्या रास आया,रास तुमको ?
यशोदा नंद बाबा,के दुलारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।
तुम्हारे बिन रहेगा,मौन व्रज में।
करेगा रास कान्हा,कौन व्रज में ?
सखा संगी तजेंगें,काज सारे।
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।
तुम्हारे दर्श ने दुख,दर्द टाले।
तुम्हारी बाँसुरी के,सुर निराले।
बजाएगा मुरलिया,कौन प्यारे ?
न जाओ तोड़ नाता,ओ सखा रे।
ललित किशोर 'ललित'
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छंद श्री सम्मान
मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय!!!
हिंदी साहित्यिक स
मूह " मुक्तक लोक " द्वारा आयोजित तरंगिनी छंद समारोह में मेरी छंद रचना को चयनित कर
"छंद श्री सम्मान" प्रदान किया गया, इस हेतु समारोह अध्यक्ष आद.
सुश्री अनीता सुधीर ‘आख्या’ जी
संयोजक- छंदकार श्री राकेश मिश्र जी
संचालक द्वय- श्री अश्वनी कुमार जी एवं सुश्री गीतांजलि गुप्ता जी संरक्षक आदरणीय प्रो. विश्वम्भर शुक्ल जी एवम मंच के समस्त गुणीजनों का सादर हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ
दुर्मिल सवैया छंद विधान व रचनाएं
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--दुर्मिल सवैया छंद विधान---
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1. यह एक वार्णिक छंद है।
2.इसमें चार चरण होते हैं।
3.चार समतुकांत रखे जाते हैं।
4.आठ सगण अर्थात्
112 112 112 112 112 112 112 112
5.लघु लघु गूरू ×8
6.लय की सुगमता के लिए 12 वें वर्ण पर यति विधान..
7.क्योंकि यह एक वार्णिक छंद है अतः इसमें लघु के स्थान पर लघु व गुरू के स्थान पर गुरू ही रखना होता है।
~~~~~उदाहरण~~~~~
मन के तम को अब दूर करो,विनती करता कर जोड़ हरे।
इस जीवन में अब आस यही,कर दो मन की सब त्रास परे।
प्रभु आप अधार हो प्राणन के, जब होय कृपा हर ताप टरे।
हर लो अब घोर निशा तम को, मम जीवन में नव दीप जरे।
*********रचनाकार************
ललित किशोर 'ललित'
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दुर्मिल सवैया छंद रचनाएँ
1
निरखें नभ से
निरखें नभ से सुख से सुर हैं, प्रभु राम चले गृह से वन को।
पद चिन्ह गहे सुकुमारि चले,अरु भ्रात निहारत पावन को।
मुसुकाति चले वनवास सिया,परखे मन मोहक सावन को।
पगलाय रहे वन के बसिया,अब देख वहाँ मन भावन को।
ललित किशोर 'ललित'
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2
टेर
करते कर जोड़ गुहार प्रभो,रख लो अब लाज हमार हरे।
इस जीवन के तुम प्रान सुधा,कर दो हमरी सब पीर परे।
मन चंचल होय रमे जग में,हरि की छवि से यह दूर टरे।
भव सागर पार उतारन को,तुम से मनवा यह टेर करे।
ललित किशोर 'ललित'
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3.
पथ को मथ दो
पल को न रुको पथ को मथ दो,रन में कुचलो रिपु के फन को।
अब काल कराल करो वश में,कलि काल भजो मनमोहन को।
जिसने मन को निज जीत लिया,करता क्षण में वश में जन को।
उस नाथ दया मय को सुमिरो,जिसने कुचला तब रावन को।
ललित किशोर 'ललित'
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4
करुणा निधि जी
करुणा करके करुणा निधि जी, हर लो सब पीर बसो मन में।
हर पातक लो विनती सुन लो,उजियार भरो इस जीवन में।
तुम दीनदयाल कहावत हो,भर दो खुशियाँ मन पावन में।
अब तो बस है इक आस यही,हरि आन बसो इन नैनन में।
ललित किशोर 'ललित'
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सुख में सुमिरो
सुख में सुमिरो दुख में जप लो नटनागर नाग नचावन को।
भव सागर पार उतारन को भजलो उस प्रीत सिखावन को।
लख श्याम मनोहर की छवि को सुख से भर लो इन नैनन को।
सब ओर मचा यह शोर सुनो मनमोहन के सच वाचन को।
ललित किशोर 'ललित'
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६
दुर्मिल सवैया छंद
मन के तम को अब दूर करो,विनती करता कर जोड़ हरे।
इस जीवन में अब आस यही,कर दो मन की सब त्रास परे।
प्रभु आप अधार हो प्राणन के, जब होय कृपा हर ताप टरे।
हर लो अब घोर निशा तम को, मम जीवन में नव दीप जरे।
ललित किशोर 'ललित'
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७
२.९.१५
सब बात गई जब रात गई, कल की मत बात करो बहना।
कहते कँगना चुप ही रहना,अब प्रीत छुपा कर है रहना।
चुनरी सरके मनवा बहके, चुड़ियाँ खनकें झुमका पहना।
मन मीत मिला मन फूल खिला,यह प्यार बना तन का गहना ।
ललित किशोर 'ललित'
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८
दुर्मिल सवैया छंद
इसमें भगवान विष्णु के 29 नाम हैं।
आशा है सबको पसन्द आयेगी।
समीक्षाहेतु
अपराजित साधु मनोहर हो, मधुसूदन हो भयनाशन हो।
जय रोहित जीव प्रभूत गुरू,रविलोचन हो अमिताशन हो।
हरि केशव वीर गभीर प्रभू ,अज वारुण भानु प्रकाशन हो ।
शुचि साधु अमोघ हलायुध हो,शिव राम प्रजापति पावन हो।
ललित किशोर 'ललित'
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९
जब राम कहा मुख से तब ही,अघ कोटि विनाश हुआ सिर से।
नहि ज्ञात कहाँ ,कब,जीवन में,मुख मोड़ चले तन मंदिर से।
हरि नाम जपो प्रभु नाम रटो,अविराम सुधारस पी फिर से।
यह देह विदेह कहे तुझसे,प्रभु नाम सदा मुख से निकसे।
ललित किशोर 'ललित'
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१०
दुर्मिल सवैया छंद
अब धीरज भी मुख मोड़ रहा,बरसें नयना मन डोल रहा।
इस जीवन में सुख के सपने ,सब टूट गये जग गोल रहा।
इक बार जरा किरपा कर दो,तव दर्शन तो
अनमोल रहा।
यह दास करे विनती सुन लो,हर रोम शिवोहम् बोल रहा।
ललित किशोर 'ललित'
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4.9.15
प्रकृति चित्रण
दुर्मिल सवैया छंद
बिजुरी चमके जियरा हुलसे,बहती मनमें रसधार पिया।
बरसें बदरा हमरे अँगना,खनकें कँगना अब ओ रसिया।
सतरंग भरा नभ ये कहता,परदेस न जा
मन के बसिया।
तन भीग गया मन भीग गया,चुनरी सरके बस में न जिया।
ललित किशोर 'ललित'
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12
भज नदं यशोमति के सुत को,मुरलीधर पूरण काम मिले।
मनमोहन कृष्ण दयामय को,जिस की किरपा अविराम मिले।
जिस की करुणा पल में हरले,सब मोह निशा सुख धाम मिले।
तर कंस गया जब पाप मयी,तब क्यों न तुझे घनश्याम मिले।
ललित किशोर 'ललित'
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13
श्री कृष्ण जन्म
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धरती सहती हर मानुष को,पशु-पेड़-पहाड़ व कानन को।
नद-नाल-सरोवर-पाहुन को,सब तीरथ पाप नसावन को।
पर पाप यहाँ जब घोर बढे,नित ढोकर कंस-दुशासन को।
तब नंद-यशोमति के प्रकटे, धरनीधर बोझ उतारन को।
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ललित किशोर 'ललित'
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14
दुर्मिल सवैया छंद
दरबारि अड़े खुद बोल रहे,दरबार नहीँ चलता शम से।
घपले करते सब ही जम के,सच ओझल हैं करते दम से।
अब राज करें वह काज करें,परदेस रमें दम औ' खम से।
पथराज=हाई वे रोड
कर=रोड टेक्स
ललित किशोर 'ललित'
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15
दुर्मिल सवैया छंद
ललना जनमा
ललना जनमा ब्रज में सुख से,सुर पुष्प सबै बरसाय रहे
दर नंद यशोमति के सबरे,ऋषि गोपिन रूप धराय रहे।
शिव रूप धरे तब साधुन को,शिशु-दर्शन को ललचाय रहे।
डर मातु मनोहर मोहन को,निज आँचल माँहि छुपाय रहे।
ललित किशोर 'ललित'
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16
दुर्मिल सवैया छंद
मात-पिता
मात पिता सुत बंधु सखा,सब साथ रहें निज काम परें।
जब जीवन साथ छुड़ावत है,सब रोदन का बस नाम करें।
अपने उस बंधु सखा को सच,शव केवल मान मसान धरें।
जलता शव तो निज बात करें,घर आँगन शेयर सावन की।
ललित किशोर 'ललित'
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17
दुर्मिल सवैया छंद
हास्य व्यंग्य
अब आज यहाँ इस दौर कहो,कब कौन किसे हँसवाय सके।
जब प्याज मिले सब प्यार मिटे,तब भोजन कौन बनाय सके।
जिसके घर में इक प्याज मिले,वह प्याज पती कहलाय सके।
जब प्याज रुलाय रहा सबको,फिर क्यों यह छंद हँसाय सके।
ललित किशोर 'ललित'
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18
दुर्मिल सवैया छंद
करता कर जोड़ गुहार प्रभो,रख लो अब लाज हमार हरे।
इस जीवन के तुम प्रान सुधा, कर दो हमरी सब पीर परे।
मन चंचल होय रमे जग में,हरि की छवि से यह दूर टरे।
भव सागर पार उतारन को, तुम से मनवा यह टेर करे।
ललित किशोर 'ललित'
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19
दुर्मिल सवैया छंद
धीरज
अब धीरज भी मुख मोड़ रहा,बरसें नयना मन डोल रहा।
इस जीवन में सुख के सपने ,सब टूट गये जग गोल रहा।
इक बार जरा किरपा कर दो,तव दर्शन तो
अनमोल रहा।
यह दास करे विनती सुन लो,हर रोम शिवोहम् बोल रहा।
ललित किशोर 'ललित'
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20
दुर्मिल सवैया छंद
गीत
करुणा कर के
करुणा करके करुणा निधि जी,हर लो सब पीर बसो मन में।
हर पातक लो विनती सुन लो, उजियार भरो इस जीवन में।
मन के तम को अब दूर करो,विनती करता कर जोड़ हरे।
इस जीवन में अब आस यही,कर दो मन की सब त्रास परे।
प्रभु आप अधार हो प्राणन के,जब होय कृपा हर ताप टरे।
हर लो अब घोर निशा तम को,मम जीवन में नव दीप जरे।
तुम दीनदयाल कहावत हो, भर दो खुशियाँ मन पावन में।
हर पातक लो विनती सुन लो,उजियार भरो इस जीवन में।
करता कर जोड़ गुहार प्रभो,रख लो अब लाज हमार हरे।
इस जीवन के तुम प्रान सुधा, कर दो हमरी सब पीर परे।
भव सागर पार उतारन को, तुम से मनवा यह टेर करे।
जब और न कोय सहाय करे,प्रभु कीन्ह कृपा सब काज सरे।
अब तो बस है इक आस यही, हरि आन बसो इन नैनन में।
हर पातक लो विनती सुन लो, उजियार भरो इस जीवन में।
ललित किशोर 'ललित'
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21
दुर्मिल सवैया छंद
निज-पीर दिखे सबसे महती,पर-पीर
कहाँ नर जान रहा ?
निज-घाव दिखें सबसे गहरे,हर घाव हरा दिल मान रहा।
मुड़ देख जरा जग के दुख को,दुख-दारुण
की जग खान रहा।
दुख सौंप दिया जिसने हरि को,उसको दुख का कब भान रहा ?
ललित किशोर 'ललित'
अक्टूबर 2021
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22
दुर्मिल सवैया छंद
जग के सब बंधन तोड़ सखा,कब कौन कहाँ मुख मोड़ चले?
चलती-फिरती यह देह तजे,कब कौन कहाँ जग छोड़ चले?
यह मुश्किल है कहना सजना,कब प्यार भरा दिल तोड़ चले?
उस मौत समक्ष कभी नर का,कुछ भी न कहीं गठ-जोड़ चले।
ललित किशोर 'ललित'
अक्टूबर 2021
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23
दुर्मिल सवैया छंद
गणनाथ गजानन को सुमिरो,हरि मन्दिर में नित शीश धरो।
हरिनाम जपो सियराम जपो,नँदलाल जपो भव पार करो।
वृषभानु-लली सँग मोहन की,छवि नित्य लखो भव-सिंधु तरो।
शिव शम्भु भजो जप-ध्यान करो,मन आँगन में नित पुण्य भरो।
ललित किशोर 'ललित'
अक्टूबर 2022
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24
दुर्मिल सवैया छंद
प्रभु नाम जपें सिय-राम जपें,बजरंग-बली हनुमान सदा।
हरि-कीर्तन में मद-मस्त रहें ,सुनते हरि का गुण-गान सदा।
प्रभु राम सिया हिय में बसते,करते प्रभु का वह ध्यान सदा।
निज-भक्तन की सब पीर हरें,अधरों पर है मुसकान सदा।
ललित किशोर 'ललित'
अक्टूबर 2023
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दुर्मिल सवैया छंद
बदरा बलखाकर यूँ बरसा,चिपकी चुनरी
चिकने तन से।
पग पैंजनियाँ पहने सजनी,सिमटी सकुचा कर साजन से।
मुख लाल लजा कर आज हुआ ,सजना निरखे मदनी-मन से।
सुलगी सजना-सजनी तन में,इक आग झमाझम सावन से।
ललित किशोर 'ललित'
अक्टूबर 2023
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विद्योत्तमा साहित्य विभूषण सम्मान
जून 2026 की रचनाएँ
जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...
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27.06.16 ..👈 आधार छंद रचनाएँ 1 जिस कारण से तू हुआ,गुस्से से भरपूर। मुझको वो बतला जरा,कर दूँ उसको दूर। बिन बदरा बरसे नहीं,क...
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