पसन्द अपनी अपनी में प्रस्तुत

पसन्द अपनी अपनी
22.10.16

ताटंक छंद

घर की दीवारों की भाषा,मानव समझ कहाँ पाया?
मौन खड़ी मीनारों से भी,ये मन सुलझ कहाँ पाया?
ताजमहल क्या कभी किसी को,अंदर का सुख दे पाया?
रिश्तों की दुनिया से भी क्या,ये मन वो सुख ले पाया?

पकड़ नहीं पाता क्यों सुख को,मन ये अपनी मुट्ठी में?
माँ भी नहीं पिला सकती क्यों,सुख बचपन की घुट्टी में?
कितना समझाया इस मन को,मत भागो सुख के पीछे।
लेकिन ये तो दीवाना सा,भाग रहा आँखे मींचे।

दुख में कोई हँसता देखा,कोई सुख कम ही आँके।
खुद के सुख को भूला कोई,दूजे के सुख में झाँके।
दूजे का दुख हरकर कोई,अंदर का सुख पाता है।
अंदर का सुख पाकर मानव,मंद मंद मुस्काता है।

सुख दुख के बादल इस नभ में,रह रह कर
यूँ छाते हैं।
बिन बरसात किये ही बादल,दूर कहीं उड़ जाते हैं।
पर मानव क्यूँ डर जाता है,देख बादलों को आया।
सूरज पर विश्वास करें तो,मिले बादलों से छाया।

रंग चढ़ा सुख दुख के मन को,रब ने खूब निचोड़ा है।
सुख दुख में गोते खाता ये,मानव तभी निगोड़ा है।
मन हरदम उलझा रहता है,सुख दुख की परिभाषा में।
सुख हाथों से निकला जाए,और सुखों की आशा में।

'ललित'

27.10.16
सिंहावलोकन घनाक्षरी
6

थक गये अब नाथ,
नैया खेते मेरे हाथ।
आप ही सँभालो अब,
पतवार नाव की।

पतवार नाव की लो.
थाम करकमलों में।
झलक दिखादो जरा,
दयालु स्वभाव की।

दयालु स्वभाव की वो,
छवि तारणहार की।
दवा आज दे दो प्रभु,
मेरे हर घाव की।

मेरे हर घाव की वो,
दवा राम नाम की जो।
लगन लगा दो तव,
चरणों में चाव की।

ललित
31.3.17
ताटंक छंद

देखी दुनिया दारी हमने,देख लिये दुनियावाले।
माँ की सूनी आँखें देखी,देख लिये दिल के छाले।
चार चार बेटों की माँ को,रोते भी हमने देखा।
बेटों की आँखों को क्रोधित,होते भी हमने देखा।

माँ की आँखो की कोरें अब,टूटे ख्वाब सँजोती हैं।
रानी बनकर आई थी अब,लगती एक पनोती है।
जिस घर की ईंटो को उसने,रात रात भर था सींचा।
आज उसी घर से बेटों ने,हाथ पकड़ कर है खींचा।

'ललित'

शक्ति छंद रचनाएँ

12.10.16

शक्ति छंद रचनाएँ
1

लिखो आज सारे,नया छंद ये।
गुणों से भरा है,कलाकंद ये।
लिखो भक्ति भावों,भरे गीत वो।
सुनें आज जो भी,बनें मीत वो।

ललित

शक्ति छंद

कन्या भ्रूण हत्या

न मारो उसे यूँ,न मारो उसे।
जरा प्यार से तुम,निहारो उसे।
न जन्मी अभी जो,तुम्हारी परी।
वही यातना से,तुम्हारी डरी।

बड़े भाग्य से आज बेटी मिली।
दुआएँ फली तो,कली ये खिली।
यही भाग्य लक्ष्मी,भवानी यही।
यही चंचला है,सयानी यही।

ललित

शक्ति छंद

न जाने वहाँ आग कैसे लगी।
हवाएं लिए प्यास जैसे जगीं।
जले झोंपड़े झुग्गियाँ भी जलीं।
सुलगने लगी जिन्दगी हर गली।

'ललित'
शक्ति छंद
भाग 2

जुबाँ चुप हुई डोलता है जहाँ।
निगाहें कहें कौन सुनता यहाँ?
पढाई लिखाई न जिसने करी।
सुनाए किसे आज खोटी खरी?

ललित

शक्ति छंद
भाग 3
खुला आसमाँ मुँह चिढाता लगे।
उड़ाता हँसी वो विधाता लगे।
बहाया पसीना इमारत चुनी।
खुदा ने नहीं पर इबादत सुनी।

ललित
शक्ति छंद
चली आज ऐसी, अनोखी हवा।
गरल में नहाई, हुई है दवा।
हसीं रासतों पर जवानी चली।
नहीं सीख कोई,लगे है भली।

ललित
शक्ति छंद
1

सबूतों गवाहों न जाओ कहीं।
सुनेगा विभीषण कहानी यहीं।
लिखो आज इतिहास की वो घड़ी।
तमाचा जड़ा जब निकाली अड़ी।

ललित
केडीआरजी26*1*17
शक्ति छंद

कहे राधिका श्याम ये तो बता।
बजा के मुरलिया रहा क्यूँ सता?
हसीं गोपियों को रहा यूँ नचा।
सिवा रास के क्या नहीं कुछ बचा?

निगाहें मिलें तो बताए धता।
कन्हैया नहीं कुछ बताए खता।
कहे राधिका श्याम ये ही अदा।
लगे खूब प्यारी हमें है सदा।

अरी बाँसुरी राज तू ही बता।
कन्हैया रहा है मुझे क्यूँ सता
अधर से लगाए रहे वो तुझे।
नहीं प्यार से वो निहारे मुझे।

ललित

शक्ति छंद
5

झुका नैन गजगामिनी सी चले।
हजारों दिलों को कुचलती चले।
नशीली निगाहें रसीले अधर।
गिरें बिजलियाँ देख ले वो जिधर।

ललित

शक्ति छंद
1
नही बिजलियाँ बादलों से डरी।
हँसें तितलियाँ शोखियों से भरी।
बजें चूड़ियाँ प्यार में हर घड़ी।
सजे कण्ठ में मोतियों की लड़ी।

ललित
शक्ति छंद
2

लताएं बनी प्रेम की प्यालियाँ।
पियें प्यार से वृक्ष की डालियाँ।
नशीली हुई आज पुरवाइयाँ।
बजें कान में शोख शहनाइयाँ।

ललित

शक्ति छंद
1

नहीं रास आयी हमें बन्दगी।
हवा में उड़ी जा रही जिन्दगी
सफेदी हमें अब चिढ़ाने लगी।
हसीं कामनाएं बढ़ाने लगी।

शक्ति छंद
2
राकेश जी के सुझाव से परि

चितेरे कई जिन्दगी में मिले।
बनाते रहे जो हवाई किले।
हमें काठ की पुतलियाँ वो बना।
हुए आज जाने कहाँ हैं फना।

ललित
शक्ति छंद
3
राकेश जी के सुझाव से परि

कभी हाथ थामे चले जिन्दगी।
कभी रासतों में पले जिन्दगी।
कभी तो लगे ये दुआ जिन्दगी।
कभी क्यों लगे बद्दुआ जिन्दगी।

ललित
शक्ति छंद
4

पढ़ी जिन्दगी की,किताबें कई।
पुरानी धुरानी,नई से नई।
मगर हम जहाँ के जहाँ रह गए।
जवाँ आज हमको गधा कह गए

ललित

शक्ति छंद
5

मिला जिन्दगी से हमें ये सिला।
जवाँ पूत से मत करो कुछ गिला।
पराया हुआ बागबाँ बाग में।
हवन ही धुआँ हो गया आग में।

ललित

शक्ति छंद
6
राकेश जी के सुझाव से परि

हवन उम्रभर तात ने यूँ किया।
न बुझने दिया आस का वो दिया।
मगर पूत ने दम किया नाक में।
हवन कुण्ड है अब मिला खाक में।

ललित

शक्ति छंद
7
सलीके सिखाते जवाँ हैं उन्हें।
गयी छोड़ पीछे जवानी जिन्हें।
नये दौर के ये नये रासते।
कभी जिन्दगी के नहीं पास थे।

ललित
शक्ति छंद
8
बनी आज नासूर है जिन्दगी।
दिलों से बड़ी दूर है जिन्दगी।
हँसी औ' खुशी अब हवा हो गयी।
कि हँसना हँसाना दवा हो गयी।
ललित
[16/10 16:00] Rakesh Raj: किया है अनौखा ललित जी सृजन।
लगे चूमने अब धरा से गगन।
किया जो परिश्रम उसी का सिला।
करो याद कितना यहाँ से मिला।

😀💐"राज" दीक्षित 💐😀
[16/10 16:07] Rakesh Raj: 💐 आभार 💐

प्रकट कर रहा राज आभार ये।
रहे यूँ बरसता सदा प्यार ये।
नदी नेह की यूँ दिलों में बहे।
नहीं दूर कोई किसी से रहे।

🙏�💐"राज" दीक्षित 💐🙏

शक्ति छंद
9
न जाने जहाँ है सरक क्यूँ रहा?
हरिक खास रिश्ता दरक क्यूँ रहा?
मुखौटे लगे सब मुखों पर यहाँ।
कि रिश्ते टिके हैं सुखों पर यहाँ।

न आँखें हँसें औ' न लब बोलते।
दिलों में रहें वो गरल घोलते।
अहम का यहाँ खास किरदार है।
पुजाता धनी और सरदार है।

ललित
शक्ति छंद
राकेश जी के सुझाव से परिष्कृत पेरी रचना

कभी प्यार से भी निहारा करो।
हमें प्रेम से भी पुकारा करो।
न रूठा करो यूँ जरा बात में।
हमारी जरा सी खुराफात में।

सुनहरे पलों को न जाया करो।
मचल कर जरा पास आया करो।
लुभाता हमें हुस्न ये आपका।
करें प्यार तुमसे बिना माप का।

न जाने तुम्हारी घड़ी क्यों रुकी?
अरे प्यार की वो झड़ी क्यो रुकी?
नयन कनखियों में अजी क्यों रुके?
हमें देखकर ये पलक क्यों झुके?

जरा याद कर लो हमारी वफा।
नहीं हम हुए हैं कभी भी खफा।
करो प्यार के याद वादे अभी।
भुलादो हमारी खताएँ सभी।

ललित

शक्ति छंद
श्रृंगार समसामयिक

चली नाजनीं बाँध के जूड़ियाँ।
खनकती नहीं हाथ में चूड़ियाँ।
गले में नहीं स्वर्ण का हार है।
लुटेरा खड़ा बीच बाजार है।

न पायल बजी औ' न अँखियाँ लड़ी।
कि रंगीन चश्मा लगाए खड़ी।
चली आज ऐसी हवा देश में।
नजर आरही नार नरवेश में।

ललित
शक्ति छंद
राधा गोविंद 14-2-17
मधुर रास
सितारों भरी चाँदनी रात में।
बजी पायलें खूब बरसात में।
गरजते हुए बादलों के तले।
मिले राधिका से कन्हैया गले

बजे बाँसुरी चूड़ियाँ भी बजें।
हँसें गोपियाँ कृष्ण राधा सजें।
कन्हैया सुनाता नये राग वो।
सुनें गोपियाँ तो खुले भाग वो

दसों ही दिशाएं लगी झूमने।
धरा भी गगन को लगी चूमने।
सजे मोगरा वेणियों में जहाँ।
कन्हैया बजाए मुरलिया वहाँ।

बसन्ती हवाएं छूएं गात को।
थिरकने लगीं गोपियाँ रात को।
नथनियाँ हिलें हास के साथ में।
कि झुमके हिलें रास के साथ में।

ललित

दिखा चाँद तारे हसीं साथ में।
खड़ी प्रेयसी थाल ले हाथ में।
पुकारे पिया को दिखाओ दरस।
सुहागन रहूँ मैं जिऊँ सौ बरस।
ललित

27.2.17
शक्ति छंद

नजारों सितारों बताओ मुझे।
बहारों कहो क्यूँ सताओ मुझे?
कहे चाँद ये चाँदनी से सदा।
बड़ी शोख चंचल तुम्हारी अदा।

हरा रात भर क्यूँ हमारा जिया?
हुई भोर तो क्यूँ किनारा किया?।
किया प्यार तो क्यूँ निभाया नहीं?
किसी और को क्या लुभाया कहीं?

ललित

शक्ति छंद

कहाँ जा रहा था कहाँ आ गया।
घुटे दम यहाँ मैं जहाँ आ गया।
न सोचा न समझा विचारा कभी।
न जीवन पथों को सँवारा कभी।

मिलीं राह में कर्मशाला कई।
मिलीं राह में धर्मशाला कई।
किये कर्म जितने यहाँ हो सके।
किये धर्म जितने वहाँ हो सके।

मगर कर्म फल दे न पाये कभी।
सभी पुण्य फल दे न पाये अभी।
बता कौन मुझसे खता हो गई?
खुशी दूर क्यों रब बता हो गई?

ललित

शक्ति छंद

नहीं रास आयी हमें बन्दगी।
हवा में उड़ी जा रही जिन्दगी
सफेदी हमें अब चिढ़ाने लगी।
हसीं कामनाएं बढ़ाने लगी।

चितेरे कई जिन्दगी में मिले।
बनाते रहे जो हवाई किले।
हमें काठ की पुतलियाँ वो बना।
हुए आज जाने कहाँ हैं फना।

कभी हाथ थामे चले जिन्दगी।
कभी रासतों में पले जिन्दगी।
कभी तो लगे ये दुआ जिन्दगी।
कभी क्यों लगे बद्दुआ जिन्दगी।

मिला जिन्दगी से हमें ये सिला।
जवाँ पूत से मत करो कुछ गिला।
पराया हुआ बागबाँ बाग में।
हवन ही धुआँ हो गया आग में।

हवन उम्रभर तात ने यूँ किया।
न बुझने दिया आस का वो दिया।
मगर पूत ने दम किया नाक में।
हवन कुण्ड है अब मिला खाक में।

सलीके सिखाते जवाँ हैं उन्हें।
गयी छोड़ पीछे जवानी जिन्हें।
नये दौर के ये नये रासते।
कभी जिन्दगी के नहीं पास थे।

बनी आज नासूर है जिन्दगी।
दिलों से बड़ी दूर है जिन्दगी।
हँसी औ' खुशी अब हवा  हो गयी।
कि हँसना हँसाना दवा हो गयी।"
ललित

शक्ति छंद

न जाने जहाँ है सरक क्यूँ रहा?
हरिक खास रिश्ता दरक क्यूँ रहा?
मुखौटे लगे सब मुखों पर यहाँ।
कि रिश्ते टिके हैं सुखों पर यहाँ।

न आँखें हँसें औ' न लब बोलते।
दिलों में रहें वो गरल घोलते।
अहम का यहाँ खास किरदार है।
पुजाता धनी और सरदार है।

ललित

5.3.17
शक्ति छंद

किनारा न पहचानता धार को।
समझता नहीं धार के प्यार को।
मगर धार भी हार माने नहीं।
किनारा भले प्रीत जाने नहीं।

मिली धार फिर एक फनकार को।
नया रूप उसने दिया धार को।
बदलने लगी धार अब फाग में।
किनारा सुलगने लगा आग में।

किनारा समझने लगा प्यार को।
लगा चूमने प्यार से धार को।
किनारा कहे धार रुक जा यहीं।
मगर धार रुकना न जाने कहीं।

कहे धार है दूर जाना मुझे।
अभी आसमाँ को झुकाना मुझे।
नदी का करूँ नाम रौशन जहाँ।
मिलूँगी तुम्हें प्यार से आ वहाँ।

ललित
क्रमशः

विष्णुपद सृजन 2

Koविष्णु पद

मानव चाहे तो पुष्पों से,पट जाए धरती।
रंग-बिरंगी फुलवारी ये,दुख सबके हरती।
दिनकर की पहली किरणें जब,फूलों को चूमें।
फूलों का मादक रस पीने,सभी भ्रमर झूमें।

ललित

विष्णु पद
1

प्राची में जब सूर्य रश्मियाँ,लाल रंग भरती।
खिल जाते हैं हृदय कमल मन,में उमंग भरती।
नवजीवन की धारा हर दिल,में बहने लगती।
छूने हैं उत्तंग शिखर अब,ये कहने लगती।

ललित

विष्णु पद
2

बैठ ध्यान में बात सुनो तुम,अपने इस मन की।
मन में ही ढूँढो खुशियाँ तुम,अपने जीवन की।
बाहर की खुशियाँ तो सच में,क्षण भंगुर रहतीं।
मन में खुशियों की गंगा है,हरदम ही बहती।

'ललित'

विष्णु पद
3

संसारी माया इस मन को,कितना है छलती?
मानव की अनमोल जवानी,दो दिन में ढलती।
बालों को काला करने से,जरा नहीं रुकती।
तन की अकड़ नहीं जाती है,कमर भले झुकती।

ललित

विष्णु पद
1

खूब देखली हमने तेरी, ये माया नगरी।
कहीं भरे भण्डार कहीं पर,खाली है गगरी।।
पाप पुण्य की शिक्षा दें जो,सबको खूब खरी।
उनके पापों की नैया इस,जग में खूब तरी।

ललित

विष्णु पद
2
काश राधिका मोहन से यूँ,प्यार नहीं करती।
अपने चंचल नैनों में वो,प्यास नहीं भरती।
अगन विरह की उसके दिल में,आज नहीं जलती।
उस छलिया की यादों में हर,शाम नहीं ढलती।
'ललित'

विष्णु पद

प्रथम प्रयास
राकेश जी के सुझाव से परि

अंतर में जो उथल पुथल है,सागर कब कहता?
पीकर अपने आँसू खुद ही,खारा बन रहता।
सागर की उन्मुक्त तरंगें,हर तदबीर करें।
छूने को उत्तुंग शिखर वो,नभ को चीर धरें।

ललित

विष्णु पद

द्वितीय प्रयास
समीक्षा हेतु

ऊँचे शिखर हिमालय के तो,गर्व नहीं करते।
मानव अपनी ऊँचाई का,दम्भ सदा भरते।
पावन गंगा हरदम ऊपर,से नीचे बहती।
मानव मन में ऊँचाई की,चाह सदा रहती।

'ललित'

विष्णु पद

तृतीय प्रयास
समीक्षा हेतु
द
पूनम की हर रात चाँदनी,निकले सज धज के।
शोख सितारे इतराते हैं,चुनरी पर सजके।
चाल बदल जाती है उसकी,गहने जब पहने।
छूकर उसके सुंदर तन को,चमक उठे गहने।

ललित

विष्णु पद

चौथा प्रयास
समसामयिक

मिश्री मावा सोहन हलवा,रसगुल्ला बरफी।
या हमको समझा था तूने,ट्रांजिस्टर मरफी।
हर दम तेरी रसना रहती,एटम बम रटती।
देख रही है दुनिया तेरी,नाक आज कटती।

ललित
विष्णु पद

प्रथम प्रयास
समीक्षा हेतु

रोज कहाँ ऐसा होता है,रोटी प्याज मिले।
दिन भर जो बोझा ढोता वो,मुख को रोज सिले।
पानी पीकर रोज देखता,रोटी के सपने।
भोर हुए जल्दी उठकर फिर,चल देता खपने।

ललित
विष्णु पद

प्रथम प्रयास
समीक्षा हेतु

भौरों का गुंजन सुनते ही,फूल सभी चहके।
पुष्पों की खुशबू मदमाती,भौंरे भी बहके।

शीतल पवन हिलोरें दे जब,ये दोनों मिलते।
इन दोनों की प्रीत देखकर,दिल जवान खिलते।

'ललित'

विष्णु पद

दूसरा प्रयास
समीक्षा हेतु

चंचल हिरणी से दो नैना,छुप-छुप वार करें।
कजरारी अँखियों का कजरा,दिल को चीर धरे।
नैन झुका कर बिन बोले वो,बात कहे मन की।
तन को जिसके सहलाती हैं,बूँदें सावन की।

'ललित'

मुक्तक काव्य निखार 17.9.16 से

मुक्तक 16,,,,,14

कुछ अपनों में कुछ सपनों में,जीवन के दिन बीत गए ।
कुछ पाने में कुछ खोने में,सुंदर सपने रीत गए।
जीवन का सपनों से रिश्ता,मन क्यूँ समझ नहीं पाया।
जिनके सपनों खोया मन,भूल वही मनमीत गए।

'ललित'

अब तो अपने जीवन की तू,अंतिम साँसें गिन प्यारे।
भारत का बच्चा बच्चा भी,हर पल तुझको ललकारे।
सरल शांत भारत को तूने,गम का क्यों सैलाब दिया?
अब तेरी कुछ खैर नहीं है,ओ रे बुजदिल हत्यारे।
'ललित'

मुक्तक 16,,,,,14

जनता को जो मान रहे हैं,भीड़ मकोड़े- कीड़ों की।
लड़ते दिखते रोज लड़ाई,अपने सुंदर नीड़ों की।
कितने शातिर नेता हैं ये,कितनी बेबस जनता है।
भेड़चाल का लाभ उठाते,ये जनता की भीड़ों की।

'ललित'

मुक्तक

अब तो तेरी बर्बरता ने,सारी सीमायें तोड़ी।
देख जरा अब आईना तू,शर्म जरा करले थोड़ी।
लेंगें हम चुन -चुन कर बदला,तेरी सब करतूतों का।
ओ नापाक पाक अब तेरी,बनने वाली है घोड़ी।

'ललित'

मुक्तक  16....14

क्या कहता है दीप सुनो तुम,दीवाली के मस्तानों।
खुद जलकर जग रोशन कर दो,ज्योति जगत के परवानों।
याद करेगी तुमको दुनिया,हर होली दीवाली पर।
दुश्मन को तुम धूल चटा दो,हिन्द फौज के दीवानों।

ललित

मुक्तक  16....14

आज दिवाली  के अवसर पर,याद गुरू को कर लो जी।
प्रेम प्यार से वन्दन करलो,शीश चरण में धर लो जी।
लौह धातु से स्वर्ण बनाने,वाले पारस को पूजो।
कृपा गुरू की बनी रहे ये,माँ लक्ष्मी से वर लो जी।

ललित

मुक्तक  16...14

दीवाली की रौनक है या,चाँद सितारों का मेला।
धरती पर उतरा है जैसे,दीप-बातियों का रेला।
हर आँगन में खनक रही हैं,खन-खन-खन खन-खन खुशियाँ।
लक्ष्मी जी के स्वागत की है,आयी मधुर-मधुर बेला।

'ललित'

उल्लाला/चंद्र मणि सृजन 2

16.9.16

कलियुगी सत्य

नगर निगम जिस शहर में,जनता का धन खाय है।
खुश होकर जनता वहाँ,जय-जय-जय-जय गाय है।

मेला देखन मैं गया,नगर निगम की ओर जी।
देखा मेला लुट रहा,पकड़ न आएं चोर जी।

बच्चों का सब अन्न जो,कच्चा ही खा जाय रे।
वो फिर जाकर जेल में,पकी रोटियाँ खाय रे।

'ललित'

उल्लाला
1

तरसे है मन आज क्यों,खुशियों के संसार को?
समझ नहीं क्यों पा रहा,अपनों के व्यवहार को?

ऊपर से खुश दीखता, मन का पागल मोर है।
खुशी चुराकर हँस रहा,कान्हा पक्का चोर है।

ललित

उल्लाला
2

छीन झपट कर था मिला,मन का थोड़ा चैन जो।
लहरों में ही खो गया,ज्यों सागर का फैन वो।

हाय नहीं मिल पा रहे,कान्हा से ये नैन क्यों?
चादर मैली देख के,मनवा है बेचैन क्यों?

ललित

अपने ही करने लगे,इस दिल पर आघात क्यों?
अपने ही समझें नहीं,इस दिल के जजबात क्यों?

उल्लाला
1
राकेश जी के सुझाव से परि
नदी नाव की दोसती,जैसा ये संयोग है।
हरे घाव को देखकर,नमक लगाते लोग हैं।
एक जरा से छेद से,नैया जाती डूब है।
खुद ही तरना सीख लो,नदिया गहरी खूब है।

'ललित'

उल्लाला
2
याकेश जी के सुझाव से संशोधित

पल पल बीता जा रहा,बिना किए आवाज रे।
हर पल का उपयोग कर,बजा कर्म का साज रे।।
पाना चाहे मोक्ष तो,हर पल हरि का नाम ले।
नश्वर तन ये है भला,कुछ तो इससे काम ले।।

'ललित'

उल्लाला

मन में मूरत साँवरी,उस चंचल चितचोर की।
राधा नैन न खोलती,सुने मुरलिया भोर की।।
राधा वन वन डोलती,ढूँढे निर्मम श्याम को।
वादा था जिसने किया,मगर न आया शाम को।

'ललित'

उल्लाला

राकेश जी के सुझाव से परि

सुख के पीछे भागता,देखा हर इंसान है।
छोटा सा दुख सालता,सुख अंतर की शान है।

सुख दुख मन के भाव हैं,मन को जो भटकायँ हैं।
दुख से जो ऊपर उठें,सुख में डूबे जायँ हैं।

ललित

शिप्रा विवाह

14.9.16

ममा पपा की लाडली,चली आज ससुराल।
माँ आँसू भर आँख में,चूमे उसका भाल।

'ललित'

गज़ल (विधान)रचना

04.09.16

गज़ल विधान

[04/09 08:27] Rakesh Raj: 💐 आज का विषय 💐
आज सभी मित्र मित्र दिग्पाल छंद के विधान पर..अर्थात
2212122, 2212122 की बहर पर एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश करें....
कैसे लिखें..?
सर्वप्रथम उपरोक्त बहर ( मात्रा विधान ) के आधार पर दो पंक्तियाँ लिखें जिनके तुकांन्त (काफ़िये) समान हों....इसे ग़ज़ल का मतला कहा जाता है..👈🏻 इसे गीत विधा में स्थायी कहा जाता है....
👉🏻 ततपश्चात उक्त विधान और भाव के अनुसार ही एक पंक्ति लिखें जो तुकांन्त मुक्त अथवा स्वतंत्र तुकांन्त लिए हो। इसके बाद चौथी पंक्ति इसी भाव और विधान के अनुसार लिखें जिसमें मतले की पंक्तियों के अनुसार तुकांन्त (काफ़िया ) मिलाना है....सर्व प्रथम मतला और एक शेर लिखें जो कुल चार पंक्तियाँ होंगी...पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुकांन्त तीसरी पंक्ति स्वतंत्र तुकांन्त होगी.....
👉🏻 छंद की चारों पंक्तियों में एक ही भाव आता है किंतु ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ जो शेर कहलातीं हैं उनमें ही भाव और विषय का साम्य रखा जाता है....ग़ज़ल का प्रत्येक शेर अपने आप में पूर्ण ( मुकम्मल ) होता है .. की हुई बात या कथ्य यहां पूर्ण स्पष्ट हो जाता है...यह आवश्यक नहीं है कि अगला शेर पढ़ने के बाद ही ही उसका भाव स्पष्ट हो....केवल दो - दो शेर लिखें...ग़ज़ल में कम से कम 10 पंक्तियाँ जिनमें दो पंक्ति मतला 👈🏻 अंतिम दो पंक्ति जिनमें शायर अपना नाम देता है 👈🏻 इसके अतिरिक्त 3 शेर आवश्यक होते हैं...इस प्रकार 10 पंक्तियों में 3 शेर ही कहे जाते हैं ...शेर हमेशा विषम संख्या में ही लिखे जाते हैं जिनकी संख्या अधिकतम 21 हो सकती है...हमें आज केवल 5 शेर 2 -2 पंक्तियों के और चार लाइन मतले और मक्ता की..कुल 14 पंक्तियाँ ही लिखनी हैं....शीघ्रता न करें....सोच समझ कर लिखें...बेहतर लिखें....विधान और भाव के अनुसार लिखें...बेहतरीन ग़ज़ल 1 सप्ताह में 1..पर्याप्त होती है....👍🏻👍🏻😊😊👍🏻👍🏻
[04/09 08:57] Rakesh Raj: 22 121 22, 22 121 22 की बह्र पर एक ग़ज़ल...

🍃🌻 ग़ज़ल 🌻🍃

होती नहीं कभी ये, रुसवाइयाँ  हमारी।
लेतीं न जान ऐसे, तन्हाइयाँ  हमारी।

👆🏻👆🏻मतला 👆🏻👆🏻

👇🏻👇🏻 शेर 👇🏻👇🏻
हर पोर पोर मेरा, दिन रात दूखता है,
ये मानती न बातें, पुरवाइयाँ हमारी।

अंत में हमारी शब्द यहाँ बार बार रिपीट हो रहा है इसे "रदीफ़" कहते हैं...इससे पूर्व का जो शब्द है
तन्हाइयाँ , रुसवाइयाँ, पुरवाइयाँ 👈🏻 ये सब  तुकांन्त (काफ़िया ) हैं....

👍🏻💐 "राज" दीक्षित 💐👍🏻
[04/09 09:08] Rakesh Raj: आवश्यक नहीं हैं कि हर शेर का विषय और भाव अलग ही हो ललित जी....हो भी सकता है और नहीं भी....👍🏻💐👍🏻
ग़ज़ल में उर्दू शब्दों का प्रयोग किया जाता है...हिंदी छंदों में नहीं....यहाँ काफ़िये का अंतिम वर्ण उसकी ध्वनि के आधार पर भी काफ़िया मिलाया जा सकता है....
जैसे....रहा नहीं, खता नहीं, सजा नहीं, बना नहीं....यहाँ... हिंदी छंदों में रहा/खता/ सजा/ बना 👈🏻 सटीक तुकांन्त नहीं हैं किंतु ये सभी शब्द आकारांत "आ" की ध्वनि होने से ग़ज़ल के उपयुक्त तुकांन्त हो सकते हैं....हिंदी छंद में "ना" का प्रयोग निषेध है किंतु ग़ज़ल में ना का प्रयोग मान्य है....👍🏻👍🏻💐💐👍🏻👍🏻👍🏻

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