राधिका छंद रचना

राधिका छंद
3.1.17

1
मोक्ष

जब तक बाकी है प्यास,काम की मन में।
कैसे आएंगें रास,राम जीवन में।
पाले रख मन में आस,मोक्ष पाने की।
मिल ही जाएगी राह,पार जाने की।

'ललित'
2
नटखट

पकड़े कान्हा के कान,यशोदा मैया।
क्यूँ जाता है हर भोर,चराने गैया।
छोटा सा मेरा लाल,बड़ा नटखट है।
माखन मिश्री का भोग,करे झटपट है।

ललित
3
मुरली

तेरी मुरली ओ श्याम,हरे मन ऐसे।
यमुना के जल में प्यास,जगी हो जैसे।
अधरों से मुरली श्याम,लगाता क्यूँ है?
सोये मेरे जजबात,जगाता क्यूँ है?

'ललित'

13.1.17
राधिका छंद
4
साँवरे प्यारे

है कैसा तेरा प्यार,साँवरे प्यारे?
राधा तरसे दिन रैन,बाँसुरी वारे।
छीने तू सबका चैन,नींद हरता है।
क्यूँ तिरछे करके नैन,हास करता है।

'ललित'

राधिका
5
पाती

मैं लिख दूँ तुम को आज,प्रेम की पाती।
पर दिल को मेरे बात,नहीं ये भाती।
इस दिल से दिल को राह,जहाँ है होती।
तो चिट्ठी की फिर चाह,कहाँ है होती।

ललित'
6
प्यार
इन बागों में हम आज,चले हैं आये।
पर दिल के टूटे साज,संग हैं लाये।

जिन फूलों से ये बाग,जवाँ है होता।
उन पुष्पों से क्या प्यार,रवाँ है होता?

'ललित'
7
दिल की प्रीत

इस दिल की दिल से प्रीत,जहाँ होती है।
फिर वादों की बरसात,वहाँ होती है।
कुछ झूँठे वादे खूब,किया करते हैं।
प्रीतम को धोखे रोज,दिया करते हैं।

'ललित'
8

भावना

जैसा होता है प्यार,भावना जैसी।
वैसा मिलता उपहार,कामना वैसी।
वैसा होता श्रृंगार,चाव हो जैसा।
वैसा दिखता करतार,भाव हो जैसा।

'ललित'
9
पतवार

जब पतवारें ही नाव,डुबाने लगतीं।
जब मीनारें ही छाँव,छुपाने लगतीं।
तब एक नई पतवार,नाव तैराती।
तब एक नई मीनार,छाँव ले आती।

'ललित'

राधिका छंद
10
श्री कृष्ण उवाच
🌿💐🌿💐🌿💐
ये प्रिये हमारा प्रेम,नेक औ' निर्मल।
है नहीं काम दुर्गन्ध,शुद्ध ये हरपल।
ये पूर्ण समर्पित प्रेम,कौन का किस में।
नहीं मिलता कहीं छोर,प्रीत का जिसमें।

'ललित'
🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇

11
सावन

वो सावन जब श्रृंगार,करे धरती का।
हर पोखर,नद औ' ताल,भरे धरती का।
हर पात हरा हर शाख,खुशी से झूमे।
हर फूल खिले हर कली,हुस्न को चूमे।

'ललित'
12
छैल-छबीली

वो छैल छबीली नार,बला की गोरी।
जो साजन को भरमाय,सुना कर लोरी।
फिर शर्माकर वो नैन,बन्द कर लेती।
प्रिय साजन जी के नाम,माँग भर लेती।

'ललित'
13
बेसुध राधा

बेसुध बेकल होगई,श्याम की राधा।
बैरन वंशी डालती,प्यार में बाधा।
मिलना चाहे राधिका,श्याम से ऐसे।
मिलती है वो चाँदनी,चाँद से जैसे।

'ललित'
14
कान्हा

है कान्हा जी नाम,बड़ा सुख कारी।
जो जपने से निष्काम,हरे दुख भारी।
है राधा जी का नाम,कृष्ण को प्यारा।
जो जपता 'राधा' नाम,उसी को तारा।

'ललित'
15
दुश्मन

तुम दुश्मन को तो खूब, छकाते रहना।
हरदम ही उसको धूल,चटाते रहना।
जो हरकत सीमा पार,यार तुम देखो।
तो इक के बदले चार,मार तुम देखो।

'ललित'
16
मुलायम

तुम नहीं सीट की दौड़,मुलायम छोड़ो।
जीतोगे तुम ही रेस,जोर से दौड़ो।
बेटे से देखो हार,नहीं तुम मानो।
हर बाप तुम्हारे साथ,सही तुम जानो।

'ललित'
17
मन

है कोई तो जो रोज,मथे है मन को।
जो होने दे संतोष,नहीं जीवन को।
जो खोजो उसको डूब,जरा तुम मन में।
तो पाओगे संतोष,इसी जीवन में।

'ललित'
18
सेवा

कुछ तो सेवा के काम,करो जीवन में।
कुछ संतों के उपदेश,भरो इस मन में।
ये धन दौलत कुछ साथ,नहीं जाएगा।
जो पुण्य करोगे काम,वही आएगा।

'ललित'

19
नुक्ता

बेटे-बेटी दोहिते,और पोते ये।
जब मरता है इंसान,खूब रोते ये।
जिन्दे की सेवा करें,पूत कब ऐसे?
मरने पर नुक्ता करें,पूत सब जैसे।

'ललित'

20
नाम की माला

देता है वो ही साथ,आसमाँ वाला।
है जपता जब इंसान,नाम की माला।
दुनिया दिखलाए खूब,सुखों के सपने।
हो जाते दुख में दूर,यहाँ सब अपने।

'ललित'

21
मन की बात

सुन लेती है दीवार,गुणी हैं कहते।
दीवारों के भी कान,यहाँ है रहते।
उस्तादों के उस्ताद,वही रहते हैं।
जो अपने मन की बात,नहीं कहते हैं।

'ललित'
22
हालात

कुछ ऐसे भी हालात,पेश आते हैं।
जो दु:खोंं की सौगात,साथ लाते हैं।
पर पाना दुख से पार,वही है जाने।
जो कभी दुखों से हार,नहीं है माने।

'ललित'
23
शेर

वो छोटा सा इक शेर,सभी से डरता।
जो चुभ जाए इक फाँस,शोर है करता।
वो नानी से भी फाँस,नहीं निकलाता।
जो ममा निकाले फाँस,बड़ा चिल्लाता।

'ललित'

24
राधिका छंद
यशोदा

है कैसा नटखट लाल,यशोदा तेरा।
है दर्शन के बिन हाल,बुरा अब मेरा।
है दर्शन की बस आस,अरी ओ मैया।
अब पार लगादे मात,डोलती नैया।

25
मुरली

छेड़े मुरली की तान,श्याम मतवाला।
राधिका के संग रास,करे लट वाला।
गोपियाँ रही हैं नाच,संग साँवरिया।
पायलें बनी हैं साज,हुई बावरिया।

राधिका छंद
26
रास

कान्हा के मन की बात,राधिका जाने।
राधा जो बोले बात,कन्हैया माने।
परमात्म-आत्म के बीच,प्यार पलता है।
तब सारी सारी रात,रास चलता है।

ललित

[26/03 19:22]
राधिका छंद
27
आस

कैसी ये बदली चाल,हवाओं की है।
हर साँस जो मोहताज,दवाओं की है।
जीने की दिल में आस,टूटती ऐसे।
मरने से पहले साँस,छूटती जैसे।
ललित
[26/03 19:32]
राधिका छंद
28
आवाज

टूटे दिल की आवाज,कहाँ है सोई?

करने को अब अफसोस,कहाँ है कोई?

खुशियों का क्यूँ दीदार,नहीं है होता?

दु:खों का क्यूँ अहसास,नहीं है सोता?

ललित

राधिका छंद

29
वादे

ये वादों का संसार,खूब सुख देता।
टूटे वादों का तार,खूब दुख देता।
करते हैं वादे रोज,राज नेता ये।
वादों के हैं सरताज,बाज नेता ये।

ललित

पसन्द अपनी अपनी

30.12.16

आदरणीय प्रधान सम्पादक महोदय,
दैनिक भास्कर
अहा!ज़िंदगी के नई कलम कॉलम में
प्रकाशन हेतु मेरी निम्न रचना सादर प्रेषित है...

मनोरम छंद
वृद्धावस्था

आँसुओं से तर बतर था,एक बेबस वृद्ध नर था।
देह जर्जर हो गई थी,वासना भी सो गई थी।

प्यार की प्यासी निगाहें,जो खुली रहना न चाहें।
हर तरफ पसरी उदासी,दे खुशी क्यों कर जरा सी।

याद आती है जवानी,जब नसों में थी रवानी।
पाल बच्चों को लिया था,दो जहाँ का सुख दिया था।

बन गये लायक सभी वो,सुख न दे पाए कभी वो।
व्यस्त सब बच्चे हुए हैं,कान के कच्चे हुए हैं।

स्वप्न सब बिखरे सुनहरे,होगए हैं पूत बहरे।
दर्द में डूबी निगाहें,कण्ठ से निकलें कराहें।

हाय जीवन क्या बला है?जिन्दगी की क्या कला है?
जान जीवन भर न पाया.बालकों ने जो दिखाया।

देह में रमता रहा था,नेह में जीवन बहा था।
स्वार्थमय जीवन जिया था,याद कब रब को किया था।

आज रब है याद आता,भूल इक पल वो न पाता।
या खुदा अब तो रहम कर,दु:ख दारुण ये खतम कर।

प्यार जो उसने दिया था,त्याग जो उसने किया था
काश बच्चे जान पाते,दर्द को पहचान पाते।

नेह से नजरें मिलाकर,दीप आशा का जलाकर।
घाव पर मरहम लगाते,बोल मीठे बोल जाते।

ललित किशोर 'ललित'
#5, मारुति कॉलोनी,
नयापुरा ,कोटा
मो.9784136478

ताटंक सृजन 4 राधा जी

ताटंक छंद 3
26.12.16

राधा वियोगी

कान्हा तेरे सुख की खातिर,ये वियोग सह लूँगी मैं।
तेरी बाहों के झूले की,यादों में रह लूँगी मैं।

फूल बिछा दूँगी राहों में,चुन लूँगी पथ के काँटे।
हँस कर झेलूँगी सब दुख जो,किस्मत ने मुझको बाँटे।

ललित

पीर पराई किसने जानी,किसने पर-पीड़ा भोगी।
जो औरों के दुख को समझे,वो होगा कोई योगी।
दु:खों की गंगा में गोता,हर मानव ही खाता है।
हरपल याद रखे जो हरि को,वो भव से तर जाता है।

'ललित'

छोटा सा है जीवन अपना,चार दिनों का है मेला।
इक दिन धोखा दे जाएगा,चलती साँसों का रेला।
कर लो सबसे प्यार जगत में,प्रीत बिना कैसा जीना?
जीवन को संगीत बना लो,गीत बिना कैसा जीना?

'ललित'
नव वर्ष

करने को श्रृंगार धरा का,दिनकर पूरब से आया।
ढकने को धरती का आँचल,स्वर्ण चुनर प्यारी लाया।
नये वर्ष में नये रूप में,नयी उमंगें ले आया।
तूफानों को मायूसी की,कटी पतंगें दे आया।

ताटंक छंद
राधा-उद्धव संवाद
1
उन सुजान कान्हा को उद्धव,भूल भला सकती कैसे?
जिनकी याद बसी आत्मा में,जीवन-प्राणों में ऐसे।
नित्य निरंतर ये मन प्रिय की,मधुरिम यादों मे खोया।
प्राणि,पदार्थ,परिस्थिति-सब को,भूल गया है ये गोया।

क्रमश:

'ललित'

ताटंक छंद
राधा-उद्धव संवाद
2
सुंदरता,माधुर्य,रूप जो,नित्य नऐ धर लेते हैं।
नित नव नेह,प्रेम,प्रीती से,मन मेरा हर लेते हैं।
नित नवीन भावों की यादें,शोभित हैं मन में मेरे।
नित नवीन संगम की यादें,रहें मधुर मन को घेरे।

क्रमश:

'ललित'

नये वर्ष में नयी धुनों पर,मुरली श्याम बजा देना।
मेरे अधरों पर मंगलमय,नित नव गीत सजा देना।
मनमंदिर में मूरत तेरी,संग राधिका प्यारी हो।
दिन तो दिन है कान्हा मेरी,नहीं रात भी कारी हो।
'ललित'

चाट चाट कर अँगुली से जब,चाट आपने खायी थी।
याद करो सोला का वो दिन,जब भाभी बहलायी थी।
अब सतरा में उस भाभी को,भूल नहीं जाना प्यारे।
चाँद नहीं ला सकते तो तुम,ला देना थोड़े तारे।

ललित

कान्हा की वंशी की धुन सुन,

करने को श्रृंगार धरा का,दिनकर पूरब से आया।
ढकने को धरती का आँचल,स्वर्ण चुनर प्यारी लाया।
नये वर्ष में नये रूप में,नयी उमंगें ले आया।
तूफानों को मायूसी की,कटी पतंगें दे आया।

छोटा सा है जीवन अपना,चार दिनों का है मेला।
इक दिन धोखा दे जाएगा,चलती साँसों का रेला।
कर लो सबसे प्यार जगत में,प्रीत बिना कैसा जीना?
जीवन को संगीत बना लो,गीत बिना कैसा जीना?

चाट चाट कर अँगुली से जब,चाट आपने खायी थी।
याद करो सतरा का वो दिन,जब भाभी बहलायी थी।
अट्ठारा में उस भाभी को,भूल नहीं जाना प्यारे।
चाँद नहीं ला सकते तो तुम,ला देना थोड़े तारे।
'ललित'

ताटंक
गीत

देखो री वो कुँवर कन्हाई,अब तक लौट न आयो री।
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।

पाँवों में पैंजनियाँ बाजें,मोर मुकुट सिर धारौ है।
वाकी तिरछी चितवन ऊपर, मैंने तो जग वारौ है।
उस नटखट नागर कान्हा ने,सबको नाच नचायो री।
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।

गोप-गोपियों का प्यारा जो,गौओं का रखवाला है।
चोरी करता माखन की वो,माखन-चोर निराला है।
एक वही बदनाम हुआ क्यों,माखन सबने खायो री?
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।

लीलाधर वंशीधर गिरधर,वैजंती माला धारी।
नाम जपा है जिसने निश-दिन,उसकी ही नैया तारी।
बेड़ा पार करे वो भव से,जाने वाको ध्यायो री।
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।
ललित

सर्वश्रेष्ठ 13.12.16

कुण्डलिया छंद रचनाएँ 3

कुण्डलिया सृजन 3

कुण्डलिया

जय माखन चोर की
💐🌿💐🌿💐🌿💐

खोजत हारीं गोपियाँ,वन-उपवन हर छोर।
नन्दभवन में जा छुपा,वो माखन का चोर।

वो माखन का चोर,बड़ा बनता है भोला।
घट माखन के देख,सदा जिसका मन डोला।

कहे 'ललित' कविराय,विविध ढँग सोचत हारीं ।
छुप गयो नंदकिशोर, गोपियाँ खोजत हारीं।।

ललित
✈✈✈✈✈✈✈

हर लो हे मनमोहना,मेरे मन का राग।
मान और यशकामना,विषय सुखों की आग।
विषय सुखों की आग,बुझा दो किरपा जल से।
मिलें आत्म-परमात्म,तुम्हारे ही दल-बल से।
कहे 'ललित' कर जोड़,मुझे बाहों में भर लो।
दे दो दर्शन श्याम,सभी पापों को हर लो।

'ललित'

कुण्डलिया सृजन 2 E MAIL

19.12.16
कुण्डलिया सृजन 2
1
मोहन

प्यारे मोहन देखलो,हमको भी इक बार।
माखन घट स्वीकार लो,करदो अब उद्धार।

कर दो अब उद्धार,पिलादो प्रेम पियाले।
मुरली की अब तान,सुना दो मुरली वाले।

आज ललित की पीर,हरो ओ ग्वाल सखा रे।
नटखट नटवर श्याम, अरे ओ मोहन प्यारे।

कुण्डलिया सृजन 2
2
नाते

नाते-रिश्तेदार भी,देखे हमने खूब।
जो नोटों के भँवर में,रहे गले तक डूब।

रहे गले तक डूब,खड़े हम नदी किनारे।
टूटी हर पतवार,तेज हैं इतने धारे।
कहे 'ललित' ए काश,अकेले हम चल पाते।
झूठे हैं अब यार,यहाँ सब रिश्ते-नाते।

'ललित'
3
जीवन

जीवन की तस्वीर में,रंग भरे हर कोय।
किस्मत करे मजाक तो,बदरंगा सब होय।

बदरंगा सब होय,नहीं फिर कुछ भी भाता।
उड़ जाता हर रंग,तोड़ कर उस से नाता।
कहे 'ललित' पछताय,उधड़ जाती हर सीवन।
जितना रखो सँभाल,बिखरता उतना जीवन।
'ललित'

4
दोस्ती

जीवन भर की दोसती,पल में देता छोड़।
मानव मन का आज भी,नहीं दीखता तोड़।

नहीं दीखता तोड़,फिरे ऐसा मदमाता।
दूजे का सुख देख,न जाने क्यों जल जाता?
कहे 'ललित' कविराय,करे मन ऐसी छीजन।
खूब बिगाड़े काम,दुखी कर देता जीवन।

'ललित'
5
राधा
कृषण दीवाने10.1.17
राधा की पायल बजे,छम-छम-छम जब श्याम।
तब तेरी मुरली बजे,मधुर मधुर अविराम।

मधुर मधुर अविराम,कान में रस वो घोले।
मन ही मन में नाम,राधिका का तू बोले।
कहे 'ललित' है श्याम,राधिका के बिन आधा।
करे उसे भव पार,रटे जो राधा-राधा।

'ललित'

6

अपनापन

पाया है जो आपसे,अपनापन सौ बार।
दीवानापन ये नहीं,ये है सच्चा प्यार।

ये है सच्चा प्यार,हमारा दिल है कहता।
दिल में ही तो यार,सदा दिलवर है रहता।

सुनो 'ललित' की बात,विष की खान ये काया।
बन गईअमृत खान,ऐसा प्यार जो पाया।
'ललित'
7
पायल

छम-छम-छम-छम बज रही,पायलिया मुँह जोर।
प्रीतम से मिलने न दे,पनघट के उस छोर।

पनघट के उस छोर,पुकारे साजन प्यारा।
गोरी का दुख देख,हँसे हर झिलमिल तारा।

कहे 'ललित' कविराय,प्रीत की दुश्मन हरदम।
सखियाँ हँसती खाँस,बजे जब पायल छम-छम।

ललित
8
नव दुल्हन
खन-खन खनकें चूड़ियाँ,नव-दुल्हन के हाथ।
अधरों पर नथनी सजे,टीका सोहे माथ।

टीका सोहे माथ,कान में झूले बाली।
पहने मंगल सूत्र,लिये अँखियन में लाली।
कहे 'ललित' सिंगार,करे नव दुल्हन बन-ठन।
घर होता गुलजार,बजे जब चूड़ी खन-खन।

ललित
9
बरगद

देते शीतल छाँव थे, जो बरगद के पेड़।
भूल गए बच्चे उसे,याद रही बस मेड़।

याद रही बस मेड़,न सींचे बरगद पीपल।
बोते हैं जो आज,वही काटेंगें वो कल।
कहे 'ललित' वो छाँव,नहीं बरगद की लेते।
छोड़ो अब ये ठाँव,सीख बरगद को देते।

'ललित'
10
चाँद चाँदनी

होने टिम-टिम-टिम लगे,तारों की चमकार।
चाँद चँदनिया का तभी,करता है श्रृंगार।

करता है श्रृंगार,चाँदनी का वो ऐसे।
दुल्हन नई नकोर,सजी हो कोई जैसे।

देख 'ललित' ये प्यार,चँदनिया लगती रोने।
बूँदों की बरसात,लगे टिम-टिम-टिम होने।

'ललित'
11

बादल बिजली

बादल बिजली में दिखे,बड़ा अनोखा प्यार।
घन का पथ रोशन करे,शम्पा की चमकार।

शम्पा की चमकार,लगे नीरद को प्यारी।
बरसादो रसधार,कहे बिजुरी उजियारी।

'ललित' गाज के अधर,चूमता वारिद का दल।
करने को बौछार,मिलें बिजली औ' बादल।

'ललित'
12
सावन

मदमाती बूँदे गिरें,सावन की चहुँ ओर।
दादुर टर-टर कर रहे,नाचे वन में मोर।

नाचे वन में मोर,पपीहा पिहु पिहु गाए।
अमरबेल तज लाज,वृक्ष से लिपटी जाए।

'ललित' चंचला नार,कहे कुछ कुछ शर्माती।
हाय भिगोती गात,गिरें बूँदें मदमाती।

'ललित'
13
लीला

तेरी लीला को प्रभो,मन ये समझ न पाय।
मन चाहा होता नहीं,अनचाहा हो जाय।

अनचाहा हो जाय,नहीं जो मन को भाता।
सुख की होती चाह,मगर दुख फिर फिर आता।
कहे 'ललित' कविराय,देख ली ये अंधेरी।
पापी सब सुख पाय,अजब है लीला तेरी।

'ललित'
14
काला पीला धवल

काले धन को ढूँढने,निकला 'मोदी' राज।
काला पीला हो गया,बिगड़े सब के काज।

बिगड़े सब के काज,रंग सब हुए पराए।
बैंकर से ही श्वेत,जब काले भी कराए।

'ललित' रहा सहलाय,काले दे गये छाले।
धवल खड़े पछतायँ,सयाने थे सब काले।

'ललित'

कुण्डलिनी सृजन 2

कुण्डलिनी सृजन 2श
11.12.16
1
कान्हा तेरी प्रीत में,यही बात है खास।
आत्मा का होता मिलन,चले रात भर रास।
चले रात भर रास,अलौकिक है ये रीती।
नाचा तेरे साथ,उसी ने दुनिया जीती।

'ललित'
2
फूलों को रब से मिली,काँटों की सौगात।
फिर भी वो महकें सदा,दिन हो चाहे रात।

दिन हो चाहे रात,सदा मुस्काते रहते।
प्रेम-प्रीत के भाव,सदा बिखराते रहते।

'ललित'
3
खूब किये जिसने सितम,छीना चैन करार।
उस कातिल की हर अदा,हमें गयी है मार।

हमें गयी है मार,चलाए दिल पर आरी।
भूले हम संसार,हँसे है दुनिया सारी।
ललित
4
कान्हा तेरी बाँसुरी,छेड़े अद्भुत तान।
जिसको सुनने के लिए,तरसें सबके कान।

तरसें सबके कान,गोपियाँ घर को त्यागें।
बरसाने को छोड़,राधिका व्रज को भागें।
ललित

5
कैसा ये अन्याय है,कैसी है ये रीत?
मैया भी सुनती नहीं,जीवन का संगीत।

जीवन का संगीत,अजन्मी कन्या गाए।
इक बेटी का जन्म,नहीं क्यों माँ को भाए?
ललित

6
मिलते नित नव मीत हैं,बिछुड़े हैं कुछ मीत।
रोज बदलता साज ये,जीवन का संगीत।
जीवन का संगीत,भोर में पंछी गाते।
समझें इसका सार,वही आगे बढ़ पाते।

'ललित'

7
अपनी-अपनी है व्यथा,अपने-अपने घाव।
अपनी ही पतवार से,पार लगेगी नाव।
पार लगेगी नाव,मिलेगा उसे किनारा।
देख डोलती नाव,नहीं जो हिम्मत हारा।

'ललित'
8
शीतल सुरभित ये हवा,पिय की याद दिलाय।
छम-छम-छम-छम बाज के,पायल नीद उड़ाय।
पायल नीद उड़ाय,हो रहे नैन गुलाबी।
साजन बैरी हाय,ले गया दिल की चाबी।

ललित

9
कृष्ण दीवाने 15.1.17
राधा गोविंद 15.1.17
कुसुम करें अठखेलियाँ,कलियाँ झूमी जायँ।
जब मुरली की तान पर,गीत गोपियाँ गायँ।

गीत गोपियाँ गायँ,भूल सुध-बुध वो झूमें।
हर गोपी के साथ,रास का रसिया घूमे।
ललित
10

12

कृष्ण दीवाने 22.1.17
राधा गोविंद 22.1.17
कंकर से घट फोड़ता,नटखट माखन चोर।
गोपी पीछे दौड़ती,पकड़ न पाए छोर।

पकड़ न पाए छोर,कन्हैया घर को भागे।
सोये चादर ओढ़,उनींदा सा वो जागे।

'ललित'
13
हे गणनाथ गजानना,नित मैं जोड़ूँ हाथ।
घर मे सदा विराजिए,ऋद्धि सिद्धि के साथ।

ऋद्धि सिद्धि के साथ,कृपा बरसाते रहना।
जो भी आएं विघ्न,उन्हें टरकाते रहना।
ललित
14
जीने की आशा लिए,जीवन बीता जाय।
मौत उसे लगती सगी,जो नर गीता गाय।

जो नर गीता गाय,उसे जीना है आता।
मन में लेता जान,मौत से पक्का नाता।
ललित

15

अदरक वाली चाय से,जिसे नहीं परहेज।
वो दूल्हा स्वीकारता,दुल्हन बिना दहेज।

दुल्हन बिना दहेज,चाँदनी जैसी प्यारी।
देती जो हर रोज,पिया को खुशियाँ सारी।

ललित
16

17
कृष्ण दीवाने 23.1.17
राधा गोविंद 23.1.17
फूल सुगंधित खिल रहे,बगियन में हर ओर।
राधा जी से आ मिले,साँवरिया चितचोर।
साँवरिया चितचोर,आँख से करें इशारे।
जग के सारे फूल,राधिका तुझ पर वारे।

ललित

18
यमुना की लहरें थमीं,सुन मुरली की तान।
तरु-पल्लव सब झूमके,कहते कृपानिधान।

कहते कृपानिधान,नजर भर हमको देखो।
बन जाए कुछ बात,पलट कर हमको देखो।

ललित

19
सूख गयी नदियाँ सभी,लुप्त हुए तालाब।
मानव ने छोड़ा नहीं,आँखों में भी आब।

आँखों में भी आब,नही क्यों अब है दिखता?
क्यों कोड़ी के मोल,यहाँ मानव है बिकता?

'ललित'
20
ममा मुझे है खेलना,मोबाइल मे खेल।
चाबी वाली ये मुझे,नहीं चलानी रेल।

नहीं चलानी रेल,मुझे बहलाना छोड़ो।
मेरे नाजुक गाल,ममा सहलाना छोड़ो।

'ललित'
21

लेडी फिंगर जी कहें,भिण्डी से सब लोग।
और टमाटर से कहें,कर ले बेटा योग।

कर ले बेटा योग,तभी भिण्डी से शादी।
होगी तेरी और,नहीं होगी बरबादी।

'ललित'

22
बित्ते भर की छोकरी,पहने चूड़ी लाल।
सारी गलियों में फिरे,करती खूब धमाल।

करती खूब धमाल,बाग में झूला झूले।
पाठ किए जो याद,उन्हें पलभर में भूले।

'ललित'

बूफे पार्टी में गये,बंदर जी इक रोज।
इमली की चटनी लिए,रहे समोसा खोज।

रहे समोसा खोज,मगर फिर सू सू आई।
इक कोने को खोज,वहीं पर धार लगाई।

'ललित'

जंगल में मंगल हुआ,नाच रहे सब मोर।
बन्दर जी शादी करें,बाजे का है शोर।

बाजे का है शोर,कोयलें गाती गाना।
भालू चीते शेर,खा रहे जमकर खाना।

'ललित'

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