विष्णु पद


विष्णुपद
सपना

सपनों से अब नाता तोड़ो,समझो जीवन को।
सपनों की माया में क्यों तुम,उलझाते मन को।
चंचल मानव-मन को हरदम,बहलाता सपना।
सपना वो ही तोड़ेगा जो,कहलाता अपना।
ललित

विष्णुपद छंद
अरजी

रद्दी में मत डाले कान्हा,मेरी ये अरजी।
अरजी तो पढ़ले तू करना,तेरी जो मरजी।
चरण-शरण में ले ले मुझको,अपना दास बना।
या मुझको तू अर्जुन जैसा,चेला खास बना।
ललित किशोर 'ललित'

फूल कहे काँटों से भैया,ध्यान ज़रा रखना।
दानव भौंरे जबरन चाहें,रस मेरा चखना।
प्रीत उसी से होती है जो,दिल से प्यार करे।
रस का लोभी भँवरा हरदम,छुपकर वार करे।
ललित

विष्णुपद
असली नकली

जिनके नथुनों में सौरभ के,बीज नहीं उगते।
नकली फूल उन्हें असली से,सुंदर हैं लगते।
असली नकली की माया में,मानव उलझ गया।
नकली सीता को हरकर भी,रावण सुलझ गया।
ललित

विष्णुपद सृजन 3

1
विष्णु पद
श्रृंगार रस
प्यार मुहब्बत की पुरवाई,छूती जब मन को।
सजनी की मादक अँगड़ाई,छेड़े साजन को।
छन छन छन छन छनकर आती,चँदा की सजनी।
चाँद चँदनिया की मस्ती से,बहक रही रजनी।
2
विष्णु पद
श्रृंगार रस
राकेश जी के सुझाव से परिष्कृत

वृक्षों से आलिंगन करती,लतिकाएं महकें।
सावन के झूलों में सजनी,का मन भी बहके।
अधनींदी अँखियों से घर को,लौट रही सजनी?
साजन की बाहों में अब तो,बीते है रजनी।

विष्णु पद
कृष्ण

राधा के नयनों से आँसू,छलक छलक छलकें।
मनमन्दिर में कान्हा दिखते,खुलें नहीं पलकें।
क्यों रूठे हैं श्याम साँवरे,सखियाँ पूछ रहीं।
कान्हा जी दर्शन कब देंगें,अँखियाँ पूछ रहीं।
ललित
विष्णुपद
राकेश जी के सुझाव से परिष्कृत

अंतर में जो उथल पुथल है,सागर नहीं कहे।
पीकर खुद अपने ही आँसू,खारा बना रहे।
सागर की उन्मुक्त तरंगें,हर तदबीर करें।
छूने को उत्तुंग शिखर वो,नभ को चीर धरें।

ललित

गीतिका छंद 2

गीतिका छंद 2
1
राकेश जी व माँ शारदा को नमन

काव्य गंगा की लहर हो,सृजन की पतवार हो।
'राज' सा नाविक जहाँ हो,फिर वहाँ क्यूँ हार हो।
अनवरत लेखन जहाँ हो,हर हृदय में प्यार हो।
क्यूँ न शारद माँ वहाँ पर,आपका दरबार हो।
'ललित'
2
राधिका के नाम से क्यूँ,बाँसुरी के सुर सजें?
बाँसुरी की तान पर क्यूँ,गोपियाँ घर को तजें?
क्यूँ लताएं झूमती हैं,साँवरे के नाम से।
क्यूँ भ्रमर गुंजन करे व्रज,वाटिका में शाम से?
ललित
3
नींद रातों की चुराई,चैन दिन का ले गया।
बाँसुरी का वो बजैया,सुर गमों के दे गया।
फूल सब मुरझा गए हैं,हर भ्रमर खामोश है।
आँसुओं से आँख नम है,सब दिलों में रोष है।
'ललित'

क्यूँ बहारों के नजारे,श्याम तू दिखला गया।
आँसुओं को नैन का क्यूँ

"

गीतिका छंद
2
समीक्षा हेतु

श्याम सुन्दर नाचता है,माथ कालिय नाग के।
और छेड़े बाँसुरी पर,सुर अनोखे राग के।
नाग के सिर पर चढा वो,मुस्कुराता शान से।
जीत लेता जो दिलों को,बाँसुरी की तान से।
"गीतिका4" ललित

गीतिका छंद
2
समीक्षा हेतु

श्याम सुन्दर नाचता है,माथ कालिय नाग के।
और छेड़े बाँसुरी पर,सुर अनोखे राग के।
नाग के सिर पर चढा वो,मुस्कुराता शान से।
जीत लेता जो दिलों को,बाँसुरी की तान से।
"00

"

बालकों को ज्ञान देना,आप माता शारदे।
बुद्धि,बल औ' तेज दे माँ,इक यही उपहार दे।
राह में कंटक बिछे जो,चुभ न पाएँ वो इन्हें।
पुष्प ये महकें सदा जो,आप सौरभ दो इन्हें।

"
आगया कान्हा शरण मैं,आपकी जग छोड़ के।
प्रेम की ले लो परीक्षा,मैं खड़ा कर जोड़ के।
आपने गीता सुनाकर,ज्ञान अनुपम दे दिया।
देह नश्वर है जगत में,जान देही ने लिया।"

पीर भक्तों की हरी है,आपने हरदम हरे।
दीनदुखियों के सदा ही,आपने सब गम हरे।
आज याचक बन खड़ा हूँ,द्वार पर मैं आपके।
दूर बादल आप कर दो,पाप के संताप के।

क्या कहूँ कैसे कहूँ मैं,आप से मन की व्यथा।
है सुनी हरि खूब मैंने,आपकी पावन कथा।
पापियों को तार देते,आप भव से जब प्रभो।
क्य़ों न मुझको तार सकते,आप भव से तब प्रभो।

ललित
गीतिका
हड्डियों का एक ढाँचा,आज बनकर रह गया।
जिन्दगी ने यूँ बजाया,साज बनकर रह गया।
स्वप्न सब आँसू बने अब,आँख से हैं बह रहे।
साथ छोड़ा चाम ने भी,लब न कुछ भी कह रहे।

जिन्दगी जी भी न पाया,हाय यौवन खो गया।
भीग तन मन भी न पाया,और सावन खो गया।
ख्वाब खुश्बू के दिखा कर,फूल सब ओझल हुए।
बीज बोए आम के थे,नीम के क्यूँ फल हुए।

ललित

देश की धरती पुकारे,क्या कहे सुन लो जरा?
देश का हो नाम रौशन,राह वो चुन लो जरा।
शौर्य पुरखों का रहा जो,याद वो कर लो जरा।
गर्व हो इतिहास को भी,काम वो कर लो जरा।

ललित

गीतिका
आरजी 5,2,17
रास का रसिया रसीला,श्याम सुंदर साँवरा।
राधिका के संग नाचे,नंदलाला बावरा।
जादुई मुरली बजे है,जादुई सुरताल है।
झूमते सब गोप-गोपी,हाथ में करताल है।
ललित

"

क्या हुआ जो आज अपने,दूर तुझ से हो गए?
भूल जा उनको खुशी से,जो मिले औ' खो गए।
है बसा परमातमा जो,आज तेरी देह में।
ले शरण बस एक उसकी,खो उसी के नेह में।

""

चौपाई

चौपाई छंद
वृद्धावस्था

खुशी नजर के पास न आती।
दुख की सदा घटाएं छाती।

ऐसे दुर्दिन उनके आये।
दूर हुए सुख के सब साये।

बूढे मात पिता रोते हैं।
आँसू में अरमाँ खोते हैं।

जिस बेटे को नाजों पाला।
उसने छीना चाबी ताला।

काश बुढापा रहम दिखाता।
आँखों से यूँ नूर न जाता।

काश सोच पाते वो पहले।
बेटे तो हैं होते दहले।

बेटा यूँ न निगोड़ा होता।
यूँ विश्वास न तोड़ा होता।

वृद्धावस्था के लिए,रखलो कुछ धन जोड़।
बेटे तो करते सदा,धन से ही मन जोड़।

ललित

चौपाई छंद
श्वान सेवा

सुबह सैर को निकले थे वो।
चैन हाथ में पकड़े थे जो।

बँधा चैन से इक कुत्ता था।
मत पूछो प्यारा कित्ता था।

कुत्ता भागे आगे आगे।
साहब उसके पीछे भागे।

साहब कुत्ते से कुछ कहते।
कुत्ते जी चुप सुनते रहते।

साहब को अब रोना आया ।
कुत्ते से क्यूँ भाग्य बँधाया।

करते मात पिता की सेवा।
तो शायद मिल जाता मेवा।

बिस्कुट देता श्वान को,मानव अंधा हाय।
मात पिता को रोज जो,रोटी को तरसाय।

ललित

पनघट पर आई नखराली।
गोरी सी वो झुमके वाली।।

चाल चले मतवाली प्यारी।
अँखियाँ हैं काली कजरारी।

पायलिया छम छम छम बजती।
माथे पर है बिंदी सजती।।

पहने वो लहँगा पचरंगी।
हाथों में चूड़े सतरंगी।।

ललित

जिंदे को रोटी

चौपाई सृजन 2

चौपाई सृजन 2

दर्द दाँत का इतना प्यारा।
तुच्छ लगे है जग ये सारा।

खाने का इक कौर न भाता।
हर पल हरि की याद दिलाता।

मुख सीधा ही कब रह पाता।
सूजे सूजे गाल दिखाता।

आती है अब याद जवानी।
जब हर रग ही थी दीवानी।

जीभ अदा अब खूब दिखाती।
दुखती रग को है सहलाती।

दुखते दाँतों पर फिर जाती।
अपनी नरमाई दिखलाती।

दाँतों के इस दर्द ने,जीना किया हराम।
खाना पीना छोड़ नर,जपे राम का नाम।

रुबाई सृजन 2


रुबाई छंद
16.1.17
1
फूल
फूल महकते जब बगिया में,झूमे खुश होकर माली।
गजरे में कुछ गुँथ जाएंगें,पहने कोई मतवाली।
कुछ माला में बँध महकेंगें,मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारे।
कुछ मरने वाले की अर्थी,की हर लेंगे बदहाली।
2
मोहन
रात सखी मेरे सपने में,श्यामल वो मोहन आया।
दिनकर से तपती धरती कोे, दे दी हो ज्यों घन छाया।
मुरली की आलौकिक धुन पर,झूम रहा था मतवाला।
वंशी की वो मधुर तान दिल,भूल नहीं अब तक पाया।

ललित
3.
माखन-चोरी

मैया तेरा वो नटखटिया,करता है माखन चोरी।
नैन मटक्का करता है जब,दिखे कहीं सुंदर छोरी।
जादू की बाँसुरिया से वो,तान मधुर मनहर छेड़े।
सुन जिसको छम-छम नाचे वृषभानु सुता चंचल गोरी।

ललित
4.
दिल

प्रेम भरा हो दिल में जितना,उतना ही वो छलकेगा।
नैन झरोखे से वो शीतल,मोती बनकर ढलकेगा।
जिसके सीने में नाजुक सा,प्यार भरा इक दिल होगा।
उसकी उठती गिरती पलकों,में हरदम वो झलकेगा।
ललित
5
नेता

बदल रहे हैं नेता पाला ,बदल रहे हैं अब चोला।
क्या जनता सब समझ रही है,क्या है ये घोटम घोला?
नीति नहीं है नियम नहीं हैं,क्या है ये गड़बड़ झाला।
जनता से सब वोट छीनने,निकल पड़ा है हर टोला।
'ललित,

6.
सपने
सपनों में रँग भरने वाले,थोड़ा सा तू रुक जा रे।
बहुत सुनहरे रँग सपनों में,मत भरना तू सुन प्यारे।
सपनों का जब उड़ता है रँग,वो पल बड़ा दुखद होता।
बदरँग सपनों में रँग भरना,सीख जरा तू मतवारे।
ललित

गीत संग्रह 3

ताटंक
गीत

देखो री वो कुँवर कन्हाई,अब तक लौट न आयो री।
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।

पाँवों में पैंजनियाँ बाजें,मोर मुकुट सिर धारौ है।
वाकी तिरछी चितवन ऊपर, मैंने तो जग वारौ है।
उस नटखट नागर कान्हा ने,सबको नाच नचायो री।
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।

गोप-गोपियों का प्यारा जो,गौओं का रखवाला है।
चोरी करता माखन की वो,माखन-चोर निराला है।
एक वही बदनाम हुआ क्यों,माखन सबने खायो री?
भोर भये जो नंदनवन में,मुरली मधुर बजायो री।

ललित

दोधक छंद
प्रार्थना

राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो गलती कितनी है।

मोह-मयी ममता छलती है।
काम-क्षुधा मन में पलती है।
लोभ दिनों दिन खूब बढ़े है।
क्रोध नसों में खूब चढ़े है।
कंचन देह यहीं गलनी है।
राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो...

रैन-दिना बस राम जपूँ मैं।
चाह नहीं अब काम खपूँ मैं।
दूर करो मन का सब मैला।
देख लिया तन का सब खेला।
प्यास नहीं इसकी बुझनी है।
राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो...

पूजन-पाठ-विधान न जानूँ।
शास्त्र -विचार पुरान न जानूँ।
भक्ति-प्रभो मन में भर देना।
पार मुझे भव से कर देना।
पीर हरो मरजी जितनी है।
राम-लला अरजी इतनी है।
ध्यान न दो....

ललित

दोधक छंद
गीत

बाँसुरिया मधु तान सुना रे।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

यूँ हम से मुख तो मत मोड़ो।
यूँ  व्रज-वासिन को मत छोड़ो।
गोप-सखा  सब राह निहारें।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

नित्य सुभोर भए बज जावे।
वो मुरली सब के मन भावे।
नंद-जसोमति के तुम प्यारे।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

माखन के घट फूट न पाते।
गोपिन-माखन लूट न पाते।
सून पड़े वन बाग बहारें।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

रास नहीं व्रज में अब होते।
नाच बिना घुँघरू अब रोते।
नैन करें कब दर्श तुम्हारे?
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

मोहन ये रज भूल गए क्या?
गैयन का व्रज भूल गए क्या?
वो वृषभानु सुता न भुला रे।
आन मिलो अब श्याम सखा रे।

ललित

जून 2026 की रचनाएँ

जून 2026 की रचनाएँ 01.06.2026 कुण्डलिनी छंद आएँगीं कठिनाइयाँ,पथ में होंगें शूल। कंटक देंगें यातना,चुभ जाएँगें फूल। चुभ जाएँगें फूल,समय भ...