विनती माँ सुन लो

विनती यह शारद माँ सुन लो।
तुम शिष्य मुझे अपना चुन लो।
कविता सविता सम ही चमके।
हर शब्द सही लय में दमके।

नव छंद रचूँ नवगीत लिखूँ।
कुछ हार लिखूँ कुछ जीत लिखूँ।
कुछ प्यार भरी कविता लिख दूँ।
कुछ नश्वर की भविता लिख दूँ।

लिख दूँ मन के सब भाव अभी।
दिल के दुखते कुछ घाव अभी।
मन में पलते सुख के सपने।
लिख दूँ सब मीत यहाँ अपने।

यह कविता तोटक छंद में रचित की गयी है 

तोटक छंद विधान 
👉 यह एक वार्णिक छंद है जिसमें कुल चार पंक्तियाँ होती हैं।
👉 प्रत्येक पंक्ति में कुल चार सगण अर्थात् लघु लघु गुरू x 4  कुल 12 वर्ण होते हैं।
👉 दो या चार समतुकांत होते हैं।
⭐ भक्ति, नीति, तथा आदर्श परक रचनाओं के लिए ये छंद प्रसिद्ध है।

छम-छम नाचे राधिका

रास रचाए श्याम,छम-छम नाचे राधिका।
मुरली से अविराम,रस बरसे आनन्द का।

नजरों से ही श्याम,जादू ऐसा कर रहा।
खुशियों से निष्काम,झोली सबकी भर गई।

नंदनवन व्रजधाम,वन-उपवन अरु वाटिका।
बाल-सखा सँग श्याम,नित्य नयी लीला करे।

कैसा ये भगवान,वृन्दावन में आ गया।
देता गीता-ज्ञान,नित्य रास में झूमता।

नाच रहे सब ग्वाल,नाचे गोरी राधिका।
मुरली करे कमाल,बेसुध हैं सब गोपियाँ।

सुन वंशी की तान,लतिकाएँ सब झूमती।
भूले निज का भान,व्रजवासी आनन्द में।

पूनम की है रात,कितनी खुश है चाँदनी?
नाचे माधव साथ,बौराई सी राधिका।

बरस रही है प्रीत,आलौकिक आनन्द है।
सुन वंशी के गीत,पायलियाँ मदहोश हैं।

हर गोपी के साथ,दिखे नाचता साँवरा।
मुरली की क्या बात ,अधर लगी जो झूमती?

दिखला दे गोपाल,एक झलक उस रास की।
जिसमें दे दे ताल,आत्म मिले परमात्म से।

नंद-यशोदा लाल,बाँके ओ घनश्याम रे।
आँखों देखा हाल,जरा सुना दे रास का।


यह कविता सोरठा छंद पर आधारित है।

सोरठा छंद विधान:
  1. यह मात्रिक छंद है।
  2. इसमें चार चरण होते हैं।प्रथम और तृतीय चरणों में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय व चतुर्थ चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
  3. विषम चरणों का अंत एक गुरु व एक लघु अर्थात गुरु लघु मात्रा से होना अनिवार्य है।
  4. यह दोहे से उल्टा होता है।

अप्रेल 18 ई मेल

अप्रेल 18

सोरठा छंद

बाँसुरिया की तान,छेड़ रहा घनश्याम यों।
भगवद्गीता ज्ञान,भरा हुआ हर तान में।

उद्धव करके ध्यान,नहीं कभी जो पा सका।
गोपी को वो ज्ञान,मधुर मुरलिया दे गई।

ललित

30.4.18
सोरठा छंद

हो जाना है मौन,इक दिन हर इंसान को।
बच पाया है कौन,उस अनदेखी मौत से।

जीवन में ये काम,कर लेना इंसान तू।
निशि-दिन जपना राम,भव से होगा पार तू।

ललित

सोरठा

इतना है विश्वास,कान्हा राधा पर मुझे।
पूरी होगी आस,भजनों की पुस्तक छपे।

माँ शारद से आज,इतनी है मेरी अरज।
करें 'राज' भी नाज,छंद सृजन ऐसा करूँ।

ललित

कुण्डलिनी छंद

मोबाइल प्यारा लगे,मानव को यूँ आज।
जैसे होती दाद में,मीठी-मीठी खाज।

मीठी-मीठी खाज,शुरू में मन को भाती।
खुजलाने से हाय,और बढ़ती ही जाती।

ललित

रुबाई

गलती से दीवानी राधा,ऐसी गलती कर बैठी।
श्याम साँवरे की सुंदर छवि,नैनों में वो भर बैठी।
चला गया मथुरा मनमोहन,अँखियों को देकर धोखा।
छैल-छबीले की वो मूरत,चैन हिया का हर बैठी।

ललित
27.4.18
रुबाई

दिल में बसकर कैसे कोई,दिल के टुकड़े करता है?
सोच-सोच कर टूटा दिल ये,निशि-दिन आहें भरता है।
दिल के टुकड़े रोते हैं पर,चीख़ नहीं बाहर आती।
बन्द हुए नैनोंं में से इक,शीतल मोती झरता है।

ललित
रुबाई

शबरी के झूठे बैरों को,बड़े चाव से जब खाया।
प्रीत भरी थी उन बैरों में,लक्ष्मण नहीं समझ पाया।
चुटकी की सेवा हनुमत ने,सिया राम से जब माँगी ।
राज छुपा था क्या चुटकी में, समझ किसी को कब आया?

ललित

रुबाई

1
प्यारी-प्यारी बातें करना,मधु लपेट कर
मुस्काना।
छल औ' कपट भरे हों दिल में,
पर अपना पन जतलाना।
जान गए हम अच्छे से अब,तेरी बड़ी अदाकारी।
अपनी शोख अदाओं से ही,सबको पागल कर जाना।
ललित

ललित

रुबाई

सागर से गहरे नैनों में,ऐसी हाला भर लाई।
पीने को सब मचल उठें वो,ऐसा प्याला भर लाई।
चोरी-चोरी नजरों से ही,पी बैठे सब परवाने।
अपनी आँखो में ऐसा मधु,वो मधुबाला भर लाई।

ललित

24.4.18
रुबाई

सुंदर-सुंदर तस्वीरों से,दीवारें मनहर होतीं।

लेकिन घर में रहने वालों,की वो नफरत पर रोतीं।

आपस में जब गहन प्रेम हो,तो घर सुंदर बन पाए।

वरना तो वो तस्वीरें भी,सुंदरता अक्सर  खोतीं।

ललित
रुबाई छंद

धक-धक करना भूल गया दिल,कविताएं अब लिखता है।

हरदम ये भावों की भँवरों,में ही फँसता दिखता है।

खुश रखना हर दिल को यारों,हरदम ही ये दिल चाहे।

बदले में खुद दीवानों सा,गम के हाथों बिकता है।

ललित
24.4.18
दोहा
कैसा तेरा न्याय है,ओ राजा मुस्तैद।
फाँसी देता एक को,दूजे को बस कैद।

सनाई छंद

इस जीवन से ये सीख मिली,जीवन इक सुंदर सपना है।
अपना दिखता है जो हमको,वो रहता कब तक अपना है?
बस आशा और निराशा में,ये जीवन बीता जाता है।
क्या ले जाता है दुनिया से,क्या ले कर ये नर आता है?

ललित

22.4.18
सनाई छंद

बड़ी अनोखी है प्रभु जी ये,लख-चौरासी भूल-भुलैया।
अंध कूप भी हैं कुछ इसमें,जिनमें अटकी मेरी नैया।
सुमिरन आठों याम करूँ मैं,मन में ऐसी अलख जगा दो।
नाम रूप पतवार थमा दो,नैया मेरी पार लगा दो।

ललित
21.4.18

सनाई छंद

धवल चाँदनी में मृगनयनी,चली जा रही
है इठलाती।
साजन से मिलने को आतुर,नैनों में ले दिल की पाती।
नैन कहेंगें दिल की बतियाँ,मौन रहेंगें साजन सजनी।
दिल की बातें कहने-सुनने,को कम पड़ जाएगी रजनी।

ललित

20.4.18
सनाई

कल-कल कल-कल बहती अविरल,
पावन शीतल गंगा धारा।

चम-चम चम-चम चमके ऊँचे,
हिम-शिखरों में भारत प्यारा।

वन उपवन झरने मनभावन,
बागों में सावन के झूले।

वो घाटी फूल-बहारों की,
कश्मीर न भारत का भूले।

ललित

20.4.18

सनाई छंद

जय-जय जय-जय कृष्ण-राधिका,जय-जय-जय सिया-राम प्यारे।

बरसे जिस पर कृपा तुम्हारी,होते उसके वारे-न्यारे।

मैं भी आया द्वार तुम्हारे,लेकर इक छोटी सी आशा।

भव सागर में नाव न अटके , नाथ न देखूँ और तमाशा।

ललित

17.4.18
सनाई छंद

श्याम साँवरे नटवर नागर,कृष्ण कन्हैया
मुरली वाले।
बिसराए क्यों रात-रात भर,रास रचाते गोपी-ग्वाले?
नंदन-वन को भूल गए क्यों,बाल-सखा क्यों याद न आएँ?
राधा-रानी मात-यशोदा,तुझ बिन कान्हा कौर न खाएँ।

ललित

दोहा
हो जाएगा फैसला,अब दिन में दो-चार।
हर चैनल पर चल रही,है जूतम-पैजार।

मल्लिका छंद

काल यों करे प्रहार।
साथ छोड़ दे बहार।
वक्त की हसीन चाल।
दे बिगाड़ चाल-ढाल।

मल्लिका छंद

दानवी हुई बहार।
वायु ही करे प्रहार।
है कली-कली उदास।
राज से रही न आस।

रक्ष माम रक्ष माम।
बेटियाँ कहें तमाम।
राज की दिखे न रास।
न्याय की रही न आस।

पंख नोंच चाल-बाज।
धौंस दे रहा कुराज।
दो दलीय राज नीति।
वोट तंत्र की अनीति।

अंध कूप सा स्वराज।
स्वप्न ही रहा सुराज।
हाय स्लोगनी विकास।
और बेटियाँ उदास।

ललित

मल्लिका छंद

श्याम बाँसुरी बजाय।
राधिका न पास आय।
बाँसुरी बजाय मीत।
प्यार का सुनाय गीत।

राधिका खड़ी उदास।
बाँसुरी न आय रास।
कृष्ण के करीब आय।
बाँसुरी लई छुड़ाय।

ललित

बिना गेंद के गोल किया है,
गरल हवा में घोल दिया है।
नेता अपनी रोटी सेकें,
बीच सड़क पर बोटी फेंकें।

जनता को तो पिसना ही है,
घावों मरहम घिसना ही है।
वोटों की ये माया देखी,
लहू सनी हर काया देखी।

नेता खेल-तमाशा देखें,
ज्ञानी आज हताशा देखें।
बीज कभी बोए थे जैसे,
आज फसल काटेंगें वैसे।

नेताओं की फौज ये,ले डूबेगी देश को।
करने को खुद मौज ये,बदलें हर परिवेश
को।
ललित

आँखें बोलती हैं
छंद मुक्त रचना

आँखें बोलती हैं
जी हाँ...
बहुत कुछ बोलती हैं आँखें..
मगर
पिछले दस सालों में
बहुत बदल गई है....आँखों की भाषा
पहले
आदमी की आँखों में दिखता था
एक अपनत्व का भाव
एक उत्कंठा....
सामने वाले के बारे में जानने की.
बस,गाड़ी,धर्म शाला में...
मिले सहयात्री के बारे में जानने की
एक ललक होती थी बात करने की
लेकिन अब...
अब उसकी नजरें..
होती हैं...अपने मोबाइल में
ये कहती हुई कि....
तू जो कोई भी तीसमारखाँ हो ...
मुझे मतलब नहीं तुझ से...
सही भी तो है.....
उसे एक अलग ही आभासी
दुनिया अपनी ओर खींच रही होती है
मोबाइल में......
मोबाइल में.....
मोबाइल में.....

ललित

11.4.18

मल्लिका छंद

लोक तंत्र में स्वराज।
है बना मजाक आज।
वोटतंत्र भीड़ तंत्र।
मात्र एक मूल मंत्र।

देश-बंद तोड़-फोड़।
राजनीति का निचोड़।
शर्म का उड़े मखौल।
धर्म का रहा न मोल।

ललित

मल्लिका छंद

जाति देख नाम धाम।
रक्ष माम् रक्ष माम्।
अल्प बुद्धि मोहि मान।
जाति से गरीब जान।

देश का नसीब आज।
जाति के करीब आज।
जाति बद्ध लोकतंत्र।
ये विकास का न मंत्र।

ललित

मल्लिका छंद

तात पुस्तकें उधार।
ला रहा करे विचार।
ज्ञान से भरी किताब।
मूल्य का नहीं हिसाब।

लाल ढो रहा किताब।
बोझ आज बेहिसाब।
पुत्र से उठे न भार।
मात ये करे विचार।

स्कूल फीस दे रुलाय।
ड्रेस चार दी सिलाय।
शूज़ बैग और कोट।
खर्च खूब होय नोट।

खेल फीस फील्ड फीस।
तात है नहीं रईस।
क्या करे भला गरीब?
क्या पढ़े लला गरीब?

ललित

10.4.18

मल्लिका छंद

भूख से निढाल वृद्ध।
भूल से न होय क्रुद्ध।
आसमान पे निगाह।
क्यों खुदा सुने न आह?

याद आ रहा मकान।
और वो भरी दुकान।
जिंदगी बड़ी हसीन।
नौजवान पुत्र तीन।

देखते हसीन ख्वाब।
पुत्र हो गए नवाब।
वक्त से बना नसीब।
होगया फना नसीब।

खून में रही न आँच।
प्यार में रही न साँच।
वक्त आ गया खराब।
पुत्र पी रहे शराब।

वृद्ध तात-मात आज।
जो करें न काम-काज।
पुत्र को नहीं सुहायँ।
अश्रु नैन हैं बहायँ।

ललित

दोस्त यार मीत-वीत
स्वार्थ साधते न प्रीत।
स्वार्थ के हजार हाथ।
स्वार्थ के बिना न साथ।

ललित
9.4.18

मल्लिका छंद
वार्णिक छंद
चार चरण
दो दो समतुकांत
21 21 21 21
1
तात मात और भ्रात
दे सुता न दार साथ।
एक श्याम है सहाय।
दीन बंधु जो कहाय।

श्याम-श्याम तू उचार।
प्रेम से उसे पुकार।
वासुदेव वासुदेव।
नाम जो हरे कुटेव।

ललित

2
मल्लिका छंद

श्याम बाँसुरी बजाय।
गोपियाँ रहा नचाय।
प्रीत के सुनाय गीत।
रात क्यों न जाय बीत?

भोर को करे सुभोर।
बाँसुरी बजाय चोर।
राधिका रही निहार।
बाँसुरी हरे करार।

ललित

मल्लिका छंद

गोप संग नंद-लाल।
साँवरा करे धमाल।
गोपियाँ रही नहाय।
वस्त्र चोर भाग जाय।

श्याम वस्त्र दे हमार।
गोपियाँ रही पुकार।
देख ये न ठीक काज।
छोड़ यूँ न लोक-लाज।

ललित

मल्लिका छंद

ऊँच जात नीच जात।
छोड़ आज छूत-छात।
हो रही बड़ी उदास।
राज नीति आस-पास।

देश का रुका विकास।
वोट से रही न आस।
घोर अंधकार आज।
झेलता यहाँ समाज।

ललित

6.4.18
महाश्रृंगार छंद

दूत है ये अद्भुत वाचाल,अंग अब इसका
कर दो भंग।
देखकर इसका ऐसा हाल,राम आएँगें इसके संग।
बहुत सी तेल-बोरियाँ बाँध,जला दो इस वानर की पूँछ।
भूल जाएगा जपना राम,याद आएगी मेरी मूँछ।

ललित

5.4.18
महाश्रृंगार छंद

नंद-घर जन्मे नंदकुमार,पुष्प सब दौड़े आए द्वार।
चमेली चम्पा कमल गुलाब,मोगरा जूही हरसिंगार।
रात की रानी नरगिस और,गुढल गेंदा
खस सदाबहार।
मोतिया नीलकमल के संग,धतूरा करने को दीदार।

सभी फूलों ने मिलकर साथ,बनाया फूल-बंगला खास।
देव सब लगे सूँघने आज,विरज में बिखरी मधुर सुवास।
विराजी वहाँ यशोदा मात,गोद ले छोटा
सा गोपाल।
दर्श कर नाच रहे हैं झूम,गोप-गोपी सब दे दे ताल।

ललित

महाश्रृंगार
राधा श्रृंगार

करो सखियों मेरा श्रृंगार,मिलेंगें श्यामल नंदकुमार।
मोगरा जूही हरसिंगार,बाँध दो वेणी खुशबूदार।
मधुर गजरों से छलकेे प्यार,नथनियाँ चूमे नंद किशोर।
बजे पैंजनियाँ मेरे पाँव,रास में झूमे जब चितचोर।

ललित
क्रमशः

चुनरिया पचरंगी

4.4.18
महाश्रृंगार छंद

कलम से शब्द निकलते खास,जिन्हें पढ़ पुलक उठें कुछ गात।
नहीं आती जो सबको रास,कलम ऐसी कह देती बात।
कहाँ अब जग में ऐसे लोग,समझ पाएँ जो कवि की पीर।
समझ पाएँ कविता की बात,कहाँ पाठक ऐसे गंभीर।

ललित

4.4.18

महाश्रृंगार छंद
कुछ शब्द

हुए कुछ शब्द बड़े मशहूर,बढ़ाते जो भारत का नूर।
जिन्हें सुन कहते हैं सब लोग,यही है जीवन का दस्तूर।
सुनाता हूँ अब मैं वो शब्द,ध्यान से सुनना जी श्रीमान।
बैंक से अरबों लिया उधार,देश से भागा बैठ विमान।

बंद हुड़दंग और हड़ताल,आग में झोंके बस घर कार।
राजनेता के मन की बात,चुनावी मुद्दों की तकरार।
मरे आतंकी सीमा-पार,आत्म हत्या कर मरा किसान।
करें नेता घोटाले खूब,टोल में मिनिस्टरों की जान।

बालकों के कंधों पर बोझ,निजी विद्यालय को सब छूट।
कचहरी पुलिस न्याय से दूर,अस्पतालों में मचती लूट।
डकैती चोरी लूट खसोट,नारियों का जीना दुश्वार।
दलित वोटों का है आधार,देश की कौन सोचता यार।

ललित

ललित
2.4.18
महाश्रृंगार छंद
स्वप्न में पूजा
पूरी रचना

कृपा इतनी कर दो हे श्याम,स्वप्न में दर्शन हों इक बार।
चरण में शीश नवाऊँ नाथ,करूँ पूजा लाऊँ उपहार।
कराऊँ गंगाजल से स्नान,नवल पीताम्बर
इत्र-गुलाल।
मोगरा-जूही हरसिंगार,तिलक केसर-चंदन हो भाल।

मुकुट हीरों का सोहे शीश,मोर का पंख
मनोहर माथ।
खिलाऊँ छप्पन व्यंजन भोग,साथ में माखन-मिश्री नाथ।
राधिका रानी को ले साथ,विराजो झूले में फिर श्याम।
निहारूँ युगल-रूप अभिराम,करें जो महारास निष्काम।

बाँसुरी मधुर बजाकर आप,अलौकिक रस से भर दो कान।
जलाऊँ दीप सुगंधित धूप,आरती साथ करूँ गुण-गान।
माँग इतनी करना स्वीकार,दया के सागर हे घनश्याम।
मिले सत्संग भजन आनन्द,करे मन सुमिरन आठों याम।

ललित
महाश्रृंगार

मिले हमको नेता जी एक,बड़े ही धीर तथा गंभीर।
बहुत नाजुक दिल के वो नेक,सुनें जनता की सारी पीर।
कही हमने भी अपनी बात,दिखाए कचरे के कुछ ढेर।
गए गुस्से में हम से बोल,नहीं है बाबू तेरी खैर।

ललित

महाश्रृंगार छंद

मुरलिया वाला माखनचोर,खड़ा हो पनघट पे नित भोर।
छेड़ता है मुझको मुँहजोर,साँवरा नटखट नंद किशोर।
नजरिया से मारे यूँ तीर,हुए हैं घायल तन-मन-प्राण।
किसे बतलाऊँ दिल की पीर,धड़कना भूला जो नादान।

ललित

1.4.18
महाश्रृंगार छंद

देख ली दुनिया हमने खूब,और देखे इसके दस्तूर।
कभी था जिनका दिल में वास,वही जा बैठे दिल से दूर।

नजर में रखते थे जो प्यार,फेर बैठे नजरें वो आज।
हमें ठुकराते हैं जो आज,कभी हम पर करते थे नाज।

ललित
महाश्रृंगार छंद

बजाता है मोहन नित भोर,मधुर मोहक मुरली जिस ठाँव।
बनूँ उस नंदनवन का वृक्ष,करूँ मैं तेरे सिर पर छाँव।
बिखेरे माखन माखनचोर,कंकरी जिस मटकी को मार।
बनूँ मैं वो ही मटकी श्याम,तपाए चाहे मुझे कुम्हार।

ललित

महाश्रृंगार छंद

अरे ओ मुरलीधर घनश्याम,छेड़ दे वंशी की वो तान।
जिसे सुन पाए मन विश्राम,मधुर-रस से भर जाएँ कान।
जरा सपनों में आ गोपाल,प्यार से मटका
दे तू नैन।
न हों जब तक तेरे दीदार,भला आए क्यूँ दिल को चैन?

ललित

मार्च 2018 ईमेल डन

ंमार्च 18 ई मेल भेजा 31.3.18
31.3.18
दोहा
जीवन में जो भी मिला,मान और अपमान।
अंत समय में सब यहीं,छोड़ चला इंसान।

27.3.18
ताटंक छंद
2

देखी कुछ सुंदर तस्वीतरें,मनहर मंजर भी देखे।
फूलों के तन में चुभते कुछ,तीखे खंजर भी देखे।
साथ समय के इंसानों के,बदले तेवर भी देखे।
बड़े-बड़े सेठों के तन पर,नकली जेवर भी देखे।

ताटंक
रास में आए भोले बाबा

छम-छम-छम बाजे पायलिया,नाच रही राधा गोरी।
बाँसुरिया की मधुर तान पे,ठुमक रही बाँकी छोरी।
भोला-बाबा ओढ़ चुनरिया,नाच रहा है मस्ती में।
शमशानों का वासी वो शिव,झूम रहा है बस्ती में।

ललित

ताटंक
कुछ मन की बात

देखी दुनियादारी हमने,देख लिए दुनिया वाले।

घाव सभी के अपने-अपने,और टीसते हैं छाले।

मिर्च मिलाकर मरहम में सब,बड़े प्यार से हैं लाते।

छालों को सहला-सहला कर,और घाव हैं दे जाते।

ललित

26.3.18

ताटंक छंद

कान्हा इतनी किरपा कर दे,पल भर भी न तुझे भूलूँ।
राधे-कृष्णा नाम स्वरूपी,झूले में मन से झूलूँ।
मन-मन्दिर में दर्शन होवें,नयनों में झाँकी तेरी।
अधरों से वो लगी बाँसुरी,चितवन वो बाँकी तेरी।

ललित

ताटंक मुक्तक
🙏🌹🙏

जो जिव्हा निशि-दिन राम रटे,उस का तो कहना क्या है?
धारण की जो तुलसी माला,उस जैसा गहना क्या है?
राम नाम नित सुमिरन करना,और हमें करना क्या है?
राम सुधा सरिता में बह कर,और कहीं बहना क्या है?

ललित

ताटंक छंद
2

चंचल मन में एक मिनट में,भाव हजारों हैं आते।
पलक झपकते ही जो मन को,मील हजारों ले जाते।
मन की गति को रोक सकें वो,मानव दुर्लभ हैं होते।
स्वप्न हजारों रंगों के इस, मानव मन में हैं सोते।
ललित

23.3.18
एक अदना प्रयास
देवहूति माता ने अपने पुत्र कपिल भगवान से निम्न प्रश्न किए
ताटंक छंद
कपिल-गीता
1
कपिल देव को सद्गुरु माने,वन्दन करती है माता।
प्रश्न पूछने हैं कुछ मुझको,आज्ञा जो दे दो दाता।
पूछो माँ वो प्रश्न आप जो,मन में उठते हैं सारे।
सच्चा सुख किसको कहते हैं,और कहाँ सुख के द्वारे?

2
देवहूति पूछे दुनिया में,सच्चा सुख होता है क्या?
अविनाशी सुख के ये मानव,बीज कहीं बोता है क्या?
ऐसा परमानंद चाहिए,जो अखण्ड अविनाशी हो।
दुख जीवन में कभी न आए,मन सुख का आभासी हो।
3

भोग सुखों का शान्ति दिलाता,सदा मानती थी ऐसा।
दुख का अंत नहीं होता पर,सुख भोगो चाहे जैसा।
सुख से थोड़ी शान्ति मिले फिर,मन चंचल हो जाता है।
हर इन्द्रिय का सुख भोगा पर,शान्ति नहीं
मन पाता है।
4

सदा रहे जो मन में कायम,जिसका नाश नहीं होता।
क्या ऐसा आनन्द प्रभो जी,प्राणाधार कहीं होता?

दुर्बल-रोगी-वृद्ध हुआ तन,नहीं छोड़ता भोगों को।
इन्द्रिय-सुख देता है तन में,नित्य बुलावा रोगों को।

5

बहुत त्रास देती है मन को,भोग और सुख की माया।
नहीं निकलती मन से क्यों ये,काम-वासना की छाया?
प्रभो वासना से मुझको अब,छुटकारा दिलवा दो जी।
दुःख मिटे आनन्द मिले वो,हाला तुम पिलवा दो जी।

ललित
23.3.18
ताटंक छंद
वंशी मधुर बजा कर कान्हा,मधु-रस कानों में घोले।
नैन-सुधा बरसाता मोहन,नैनों से हौले-हौले।
मोरपंख जो सिर पर धारा,दिल उसमें अटका मेरा।
देकर झटका तूने कान्हा,दिल नीचे पटका मेरा।

ललित
22.3.18
मुक्तक (उल्लाला आधारित)
उलझन सुलझाने चला,चंचल मन के साथ मैं।
और उलझ बैठा वहीं,अपने मन के हाथ मैं।
मन तो मन की ही करे,जोड़े हाथ विवेक है।
परिणामों को देखकर,पकड़ूँ अपना माथ मैं।

ललित किशोर 'ललित'

21.3.18

उल्लाला

उलझन सुलझाने चला,चंचल मन के साथ मैं।
और उलझ बैठा वहीं,अपने मन के हाथ मैं।

मन तो मन की ही कहे,जोड़े हाथ विवेक है।
मन की ही रहती सदा, टँगड़ी ऊँची एक है।

ललित

20.3.18
उल्लाला छंद

रंग बदल गिरगिट करे,रक्षा अपनी जान की।
नेता बदले रंग है,बलि देने को आन की।

उल्लाला छंद
केवट प्रसंग

पत्थर से नारी बनी,तव चरणों की धूल से।
नाव काठ की ये प्रभो,छू मत देना भूल से।

चरण पखारूँ आपके ,शुद्धोदक से नाथ मैं।
ले जाऊंगा पार फिर, बड़ी खुशी के साथ मैं।

गंगा पार उतारती,नैया मेरी खास है ।
तारोगे भव से मुझे,इतना तो विश्वास है।

ललित
माँ तेरे इस लाल को, कहीं न मिलती छांव है ।
पीपल बरगद सब कटे ,कंकरीट का गांव है ।
मोबाइल हावी हुआ,कल पुर्जों के देश में। अनपढ़ मोबाइल रखें ,पढ़े लिखो के वेश में।

19.3.18

उल्लाला

करें दिखावा नेह का,नाते रिश्तेदार सब।
वक्त पड़े पहनायगें,काँटों का वो हार सब।

नाव हमारे प्यार की,डूब गई मझधार में।
लहरें ही थी मौज में,खोट न थी पतवार में।

'राज' गुरू के प्यार में,कितनी मधुर मिठास है।
हुशियारों की डाकटर,आज करे आभास है।

शब्दों की जादूगरी,शब्दों का ही खेल है।
शब्द साधना से फले,काव्य सृजन की बेल है।

काव्य सृजन की बेल ये,छंदों को ले साथ में।
फूलों से लद जाय है,लय को लेकर हाथ में।

ललित

भाव उठें मन में जहाँ,और कलम चल जाय है।
सुंदर छंदों में वहीं,काव्य सृजन ढल जाय है।

'काव्य सृजन' की प्रार्थना,माँ शारद से आज है।
'राज' गुरू किरपा करें,जिन पर हमको नाज है।

ललित
18.3.18
उल्लाला

बिटिया खेले आँगना,छोटे-छोटे पाँव हैं।
लेकिन क्या माता-पिता,देते उसको छाँव हैं?

बेटे-बेटी में बड़ा,फर्क करें कुछ लोग हैं।
क्या बेटे के भेष में,कुछ सुखकर संजोग हैं?

समय बड़ा बैरी हुआ,वृद्धावस्था देख के।
अब तक पन्ने बंद थे,विधना के इस लेख के।

सपने कितने देखता,जीवन भर इंसान है।
सारे सपने तोड़ता,समय बड़ा बलवान है।

माया में उलझा रहा,जीवन भर जो शान से।
राम-कथा चाही नहीं,सुननी जिसने कान से।

पचपन का होकर वही,जपता काहे राम है?
क्यों उसको लगने लगा,सच्चा प्रभु का नाम है?

ललित

उल्लाला छंद
नव वर्ष प्रार्थना

सोचो इस नव वर्ष में,क्या करना है काम जी?
काम करोगे कुछ नया,या करना आराम जी?

माँ शारद की साधना,करनी हमको रोज है।
काव्य सृजन परिवार में,करनी हमको मौज है।

माँ शारद से प्रार्थना,आज करो कर जोड़ के।
माँ शारद मत रूठना,मत जाना मुख मोड़ के।

काव्य सृजन का ये पटल,महके नव मकरंद सा।
हर साथी लिखता रहे,नित नव सुंदर छंद सा।

ललित

17.3.18
उल्लाला

इंतजार कब तक करूँ,सजना तेरी ट्रेन का।
प्लेटफार्म की बेंच पर,भुर्ता बनता ब्रेन का।

ललित

14.3.18
चंद्रमणि छंद
1
स्वर्ण चुनरिया ओढ़ के,प्राची निखरी प्यार से।
हर्षित सब सरवर हुए,स्वर्णमयी श्रृंगार से।

15.3.18
1
चंद्र मणि छंद

बचपन छूटा हाथ से,घुसी जवानी देह में।
रूठ जवानी भी गई,भरे सावनी मेह में।

वृद्धावस्था आ घुसी,काले-काले केश में।
अपने बेगाने हुए,अब अपने ही देश में।

ललित

2
बाँसुरिया है हाथ में,छोटे से गोपाल के।
मोर मुकुट सिर सोहता,कृष्ण कन्हैया लाल के।

गैयन के पीछे चले,फुदक-फुदक वनराह में।
बाल सखा सब घेरते,शुभ-दर्शन की चाह में।

3
मात यशोदा का लला,राधा का चितचोर वो।
राधा का दिल ले गया,चोरों का सिरमोर वो।

नंदनवन पावन हुआ,नंद लला के पाँव से।
यमुना-तट शीतल हुआ,वंशी वट की छाँव से।

ललित

4
चंद्रमणि छंद

निश्छल निर्मल प्रेम की,सबको होती चाह है।
प्रेम सदा सबसे करो,ये ही सच्ची राह है।

होड़ा होड़ी मत करो,जीवन की इस राह में।
खुशियाँ छूटी जा रही,और खुशी की चाह में।
ललित

दिल की सारी धड़कनें,लेती जिसका नाम हैं।
मनमोहन घनश्याम वो,कान्हा जी सुखधाम हैं।

राधा-राधा जो जपे,कान्हा उसका दास है।
कान्हा का नाजुक जिया,राधा जी के पास है।

ललित
16.3.18
1
उल्लाला छंद

रहती हमें निहारती,खिड़की से इक नार थी।
सपने में आकर हमें,करती बेहद प्यार थी।

सपना टूटा एक दिन,नींद उड़ी मझधार में।
टूटे दिल को हम लिए,फिरते हैं बाजार में।

ललित

उल्लाला छंद
3

आया हूं कैलाश से,श्याम दर्श की आस में।
मैया तेरे लाल को, ले आ मेरे पास में ।

एक नजर मैं देख लूं,तेरे शिशु के भाल को।
ले लूँ अपनी गोद में,उस नटखट गोपाल को।

बाबा ले लो भेंट तुम,जो चाहो भंडार से। डर जाएगा लाल तो,नागों के इस हार से।

अलख निरंजन जब सुना,साँवरे नंदलाल ने।
शिव दर्शन की कामना,ठानी उस गोपाल ने।

जोर-जोर से फिर लला, करने लगा विलाप जी ।
भोले के दर्शन मुझे,करने दो माँ आप जी।

खूब जताया लाल से, प्यार यशोदा मात ने।
क्यों रोया लल्ला अभी,चौंकाया इस बात ने।

हँसकर बोले शिव तभी, मात हमारी बात सुन।
चुप हो जाएगा लला, हमें देख कर मात सुन।

ले आई मैया तभी,श्याम लला को गोद में। बाबा के दर्शन किए,श्याम हुआ चुप मोद में।

ललित

ललित
16.3.18
4
उल्लाला छंद

ढैंचू ढैंचू जो करे,पूर्ण गधा श्रीमान हो।
दोस्त उसी को लो बना,यदि उसमें कुछ जान हो।
आधा टुकड़ा दो उसे,आधा अपने पास हो।
फिर देखो बिन  कुछ किए,जनता अपनी दास हो।

ललित

13.3.18
1
रूपमाला छंद
रास में तेरे कन्हैया,क्या छुपा है राज? दौड़ आती गोपियां सब,छोड़ घर के काज।
बाँसुरी जादू भरी तू ,है बजाता खूब।
चर-अचर सब झूम उठते,आत्म रस में डूब।

नैन तेरे हैं समंदर,नील-वर्णी श्याम।
गोप-गोपी राधिका सब,डूबते निष्काम।चाँद-तारे व्रज-धरा औ',वायु जल आकाश।
कृष्ण-राधा मय हुए सब,तोड़ सारे पाश।

रूपमाला छंद
राधा विरह

राधिका हर पल निहारे राह तेरी श्याम।
भोर से तक हो न जाए,आज फिर से शाम।
चूड़ियां खनकें नहीं अब, पायलें भी मौन। राधिका के आँसुओं को,देख सकता कौन?

श्याम तेरे दर्शनों की,आस में दिन-रैन।
तू हृदय में है बसा पर,रो रहे हैं नैन।
सावनी शीतल फुहारें,भर रही हैं आग।
नींद नयनों से उड़ी हर,रैन बीते जाग।

नैन तुझ से क्यों लड़ाए,सोचती है आज?
तोड़ कर दिल को कन्हैया,क्यों न आई लाज?
प्रीत जोड़ी राधिका सँग,बाँसुरी ले हाथ।
आज वंशी और राधा,क्यों बिसारे नाथ?

माँ यशोदा गोप-गोपी,और ये व्रज-धाम।
सब पुकारें श्याम सुंदर,आज तेरा नाम।
तू जहाँ भी जा बसे बरसे,खुशी हर ओर।
आ न पाए श्याम तेरे,पास दुख का छोर।

ललित

12.3.18

1
रूपमाला छंद

फूल इक सुंदर खिला था,कंटकों के बीच।
खूँ-पसीने से रहा था,बागबाँ भी सींच।
क्यों मिली फिर बागबाँ को,एक गहरी चोट?
बागबाँ के खूँ-पसीने,में कहाँ थी खोट?

ललित

2
रूपमाला छंद

जिंदगी अनमोल कितनी,जान ले इंसान।
कब न जाने मौत आकर,छीन ले ये जान।
मौत जब चुपचाप आती,और करती घात।
तब कहीं इंसान को ये,समझ आती बात।

ललित

3
रूपमाला छंद

देश की तकदीर जिनके,हाथ में है आज।
राज-नेता दल-बदल वो,भर रहे परवाज।
मूक जनता भ्रष्ट नेता,को करे स्वीकार।
फिर कहाँ होगा भला इस,देश का उद्धार।

ललित

11.3.18
रूपमाला छंद

देवता ऋषि और मानव,और सारे संत।
दोस्त-दुश्मन मात-शारद,और सब सामंत।
दें मुझे आशीष ऐसा,हों सृजित यूँ छंद।
भाव पूरित ताल-लय में,हो सजा हर बंध

ललित

रूपमाला छंद

प्रेम की ले लो परीक्षा,ओ हसीं दिलदार।
या करो तुम मीत मेरे,प्यार को स्वीकार।
है तुम्हीं से प्यार मुझको,मान लो ये बात।
थाम लो कर आ गई है,ये सुहानी रात।

ललित

अभी अभी मन में आया
मुक्तक
✈✈✈✈✈✈

कितना भी समझालो मन को,
समझ नहीं ये पाता है।
मायावी दुनिया में निश-दिन,
और उलझता जाता है।
उस राधा का नाम न जपता,
जिसका मोहन दीवाना।
अपनी ही दारा में खोया,
राधा को बिसराता है।

ललित किशोर 'ललित'
📣📣📣📣📣📣

त्रिभंगी छंद

ओ धेनु चरैया,रास-रचैया,नाग-नथैया,
श्याम-लला।
गोवर्धन-धारी,कृष्ण-मुरारी,डोर हमारी।
थाम लला।
वन-उपवन सारे,यमुना धारे,तुझे पुकारें,आ जा रे।
बाँसुरिया वारे,गोप सखा रे,माखन- मिश्री ,खा जा रे।

ललित

त्रिभंगी छंद

नेता ही तारें,कष्ट निवारें,पार उतारें,भक्तन को।
नेता ही देवा,उनकी सेवा,देवे मेवा,हर जन को।
भगवान बिसारो,नित्य पुकारो,पाँव पखारो,नेता के।
अब सुनो भारती,करो आरती,पूर्ण स्वारथी,क्रेता के।

ललित

रूपमाला छंद 7.3.18 से प्रारम्भ

7.3.18
रूप माला छंद

प्रार्थना ये शारदा माँ,है हमारी आज।
साधना-पथ में हमारी,आप रखना लाज।
भाव जो मन में उठें वो,लिख सकें हम नित्य।
चहुँ दिशा महके हमारा,छंद मय साहित्य।

ललित

रूप माला छंद

छोटका प्यारा कन्हैया,बाँसुरी ले हाथ।
नाचता है ठुमक-ठुम्मक,राधिका के साथ।
ताल देती है यशोदा,झूमते हैं ग्वाल।
नंद बाबा श्याम के बस,चूमते हैं गाल।

'ललित'

रूपमाला छंद
क्या कुछ विचारणीय बन पाया

कामनाएँ सिर उठाती,नित नई अविराम।
हो न पाता मन हमारा,क्यों कभी निष्काम?
कामनाओं के समन्दर,में रहा मन डूब।
चाहतों ने नित निचोड़ा,मानवी मन खूब।

ललित

रूपमाला छंद

इक परी चंचल सलोनी,चाँदनी सा रूप।
खिलखिलाई आँगना में,भोर की ज्यों धूप।
नाचती है ठुमक-ठुम्मक,खूब सुबहा शाम।
शौक है कहना कहानी,और 'आद्या' नाम।

ललित

रूपमाला छंद

वो मिलन किस काम का जब,हो न दिल में प्रीत?
प्रीत भी क्या प्रीत जिसमें,सिर्फ हो बस जीत ?
धड़कनों में जो बसा हो,बन हृदय का नाथ।
चल पड़ो तुम साथ उसके,हाथ में ले हाथ।

ललित

रूपमाला छंद

चंचला नाजुक कली वो,हुस्न से भरपूर।
नयन चमकें ज्यों सितारे,चाँदनी सा नूर।
पास से जब रूप देखा,रह गया हैरान।
किस बला का रूप इसमें,भर दिया भगवान।

ललित

रूपमाला छंद

रूपसी अनुपम अनोखी,एक देखी आज।
चाँद सा मुखड़ा सलोना,ओट घूँघट लाज।
घाघरा लहँगा बढाता,राजपूती आन।
फैशनेबल युवतियों की,घट रही थी शान।

ललित

रूपमाला छंद

चाँद कुछ रूठा हुआ है,चाँदनी से आज।
बादलों का होगया है,आसमाँ में राज।
चाँदनी गुम हो गयी है,बादलों के पार।
चाँद गुमसुम सा बहाए,आँसुओं की धार।

ललित

रूपमाला छंद
दिल जलाने की अदा क्या,आप में महबूब?
बेवफाई की कला भी,आप में है खूब।
हर कदम करते रहे हम,आप पर विश्वास।
तुम उड़ाते ही रहे इस,प्यार का उपहास।

ललित

रूपमाला छंद
स्वप्न

क्या हुआ जो आज अपने,हो गए हैं दूर?
क्या हुआ जो हो गया है,तू बड़ा मजबूर?
स्वप्न की दुनिया कभी क्या,हो सकी आबाद ?
भूल जा तू स्वप्न सारे,घूम फिर आजाद।

ललित

11.3.18

पहली रचना
रूपमाला छंद

सांवरे इस ओर मुड़कर,देख ले इक बार।
डोलती है नाव मेरी,थाम ले पतवार।
नाव माया के भंवर में, फँस न जाए श्याम।
डूबते को तार देता,एक तेरा नाम।

ललित

रूपमाला छंद

भावपूरित सारगर्भित,हो सृजन हे मात!
काव्य की सुंदर लता का,हो हरित हर पात।
शब्द झंकृत कर रहे हों,हर हृदय के तार।
दें अलंकृत शब्द मेरे,काव्य को विस्तार।

ललित
11.3.18
मुक्तक
फतवा मौत का

मरहम तो दे नहीं सके नश्तर चुभा दिया।
संवेदना की लाश का तकिया बना दिया।
था जो मसीहा अब वही जल्लाद सा दिखे।
इंसानियत को मौत का फतवा सुना दिया।

ललित किशोर 'ललित'

रूपमाला छंद

आज ऐनक हाँफती सी,काँपती सी खूब।
पाल कर रंगीन चश्मा ,खुद रही है डूब।
और अब गोगल दिवाने,का हुआ है राज।
कद्र ऐनक की नहीं है,इस चमन में आज।

ललित

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